अनुक्रम
स्वर एवं लय के सुन्दर संयोजन को ही संगीत कहते हैं। संगीत शब्द ‘गीत’ शब्द में ‘सम’ उपसर्ग लगाकर बना है। ‘सम’ यानि ‘सहित’ और ‘गीत’ यानि ‘गान’। ‘गान के सहित’ अर्थात् अंगभूत क्रियाओं (नृत्य) व वादन के साथ किया हुआ कार्य संगीत कहलाता है। स्वरों की ऐसी रचना जो कानों को मधुर और सुरीली मालूम हों एवं जो लोगों के चित्त को प्रसन्न करें उसे ही हम संगीत कहते हैं।
संगीत का अर्थ
संगीत की परिभाषा
‘गीतं वाद्यं तथा नृत्तं त्रयं संगीतमुच्यते’।
अर्थात् संगीत एक अन्विति है, जिसमें गीत, वाद्य तथा नृत्य तीनों का समावेश है। ‘संगीत’ शब्द में व्यक्तिगत तथा समूहगत दोनों विधियों की अभिव्यंजना स्पष्ट है। इसी कारण व्यक्तिगत गीत, वादन तथा नर्तन के साथ समूहगान, समूहवादन तथा समूहनर्तन का समावेश इसके अन्तर्गत होता है।
‘‘सम्यग्गीतं तु संगीतं गीतादित्रियं तुवा।
समष्टि व्यष्टि भावेन शब्द नानेन गीयते।।’’
अर्थात् जो सम्यक रूप से गाया जाय वह संगीत है अथवा गीत, वाद्य और नृत्य इन तीनों की समष्टि और व्यष्टि भाव से अभिव्यक्त संगीत है
संगीत की उत्पत्ति
होती है-
- संगीतोपयोगी ध्वनि जिसे हम ‘नाद’ कहते हैं।
- संगीतेतर ध्वनि जिसे हम ‘राव’ कहते हैं।
सभी प्रकार की ध्वनि द्रव्य के कम्पन्न से होती है। जब हम तबले में मढ़े
हुये चमड़े पर थाप मारते हैं तो हम अनुभव कर सकते हैं कि सारे चमड़े में एक
प्रकार का कम्पन्न उत्पन्न होता है। चाहे नाद हो या राव, कम्पन्न से ही ध्वनि
उत्पन्न होती है। अन्तर यह है कि राव के उत्पादक का कम्पन नियमित और
सतत् (लगातार) होता है। इसी प्रकार राव माध्यम को भी क्षणिक अभिधात से
आन्दोलित का अनुभव करता है किन्तु नाद से मध्यम और कान के पर्दे में
नियमित स्पन्दन होता है।
- अनाहत और
- आहत
अनाहत नाद बिना किसी आघात में होता है वह संगीत के लिए उपयोगी
नहीं होता क्योंकि वह रंजक नहीं है। उसका गुरू के द्वारा उपदिष्ट मार्ग योगी
लोग अभ्यास करते है। वह मुक्तिदायक होता है।
होता है। उस आहत ध्वनि को जिसमें नियमित और सतत् कम्पन होता है,
संगीत में नाद कहते हैं।
नियमित और सतत् कम्पन्न का यह वैशिष्टय है कि वह रंजकता पैदा
करता है। भौतिक नियमों के कारण इस प्रकार की ध्वनि करता है। भौतिक
दृष्टि से ध्वनि की नियमितता और सत्ततता से ही संगीत का उद्भव होता है।
वस्तुत भौतिक शास्त्र में हमें संगीत का उद्भव नहीं बतलाता है यह तो जब
संगीत उद्भव हो चुका है तब उसका भौतिक विश्लेषण करके यह बतलाता है
कि ‘नाद’ के आवश्यक तत्व क्या है। यह नाद का उद्भव नहीं लक्षण बतलाता
है।
संगीत के तत्व
स्वर एवं लय संगीत के मूल तत्व हैं। स्वर समूहों के कई लय के प्रयोग से संगीत की रचना होती है। संगीत को समझने
के लिए स्वर एवं लय को समझना आवश्यक है। स्वर, ध्वनि से प्राप्त होता है एवं लय पूरी सृष्टि में
विद्यमान है। स्वर एवं लय दोनों प्रकृति में मौजूद हैं। विद्वानों द्वारा प्रकृति से स्वर एवं लय
को पहचान कर संगीत की रचना की गई।
1. स्वर –
आवाजों से इस प्रकार मानी गई हैः-
मोर – ‘सा’ अथवा षडज
चातक – ‘रे’ अथवा ऋषभ
बकरा – ‘ग’ अथवा गन्धार
कौआ – ‘म’ अथवा मध्यम
कोयल – ‘प’ अथवा पंचम
मेढक – ‘ध’ अथवा धैवत
हाथी – ‘नी’ अथवा निषाद
कोई ठोस ऐतिहासिक एवं वैज्ञानिक सन्दर्भ प्राप्त नहीं होता, परन्तु
यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि प्रकृति में व्याप्त ध्वनियों से ही स्वर स्थापित किए गए चाहे
वो जल धाराएं हो, नदियों की कल-कल ध्वनियाॅं हो अथवा प्रकृति में उपस्थित पशु-पक्षियों की
आवाजें।
स्वर, ध्वनि का वह स्वरूप है जिसमें नियमित कंपन होता है। स्वर, कानांे
को अच्छा लगता है एवं इसको ही हम संगीत हेतु प्रयोग करते हैं। स्वर को अन्य शब्दों में
सांगीतिक ध्वनि भी कह सकते हैं। यदि ध्वनि में कंपन अनियमित होते हैं तो यह
ध्वनि कानों को अच्छी नहीं लगती है, जिसे हम शोर कहते हैं। इस प्रकार की
ध्वनि को असांगीतिक ध्वनि कहते हैं एवं इस प्रकार की ध्वनि को संगीत में प्रयोग नहीं किया जाता
है।
स्वर के बाद में विद्वानों द्वारा सात स्वर जिसको सप्तक कहा गया एवं एक सप्तक में बाद
में कोमल एवं तीव्र स्वरों की पहचान कर बारह स्वर भी स्थापित किए गए। इसी सप्तक में बाईस
श्रुतियाॅं भी स्थापित की गई। श्रुति, स्वर का वह सूक्ष्म रूप है जो कि एक दूसरे को सुनकर अलग
से पहचाना जा सकता है। शास्त्रीय संगीत के रागों में इन्हीं श्रुतियों का प्रयोग किया जाता है।
2. लय –
समय दुगुना होने पर मध्यलय एवं मध्यलय का अन्तराल दुगुना होने पर द्रुत लय हो जाती है।
मध्यलय स्वाभाविक लय है। हम अपनी स्वाभाविक चाल को मध्यलय कह सकते हैं। उससे आहिस्ता
अथवा तेज गति में चलना किसी विशेष कारण से ही होता है। यदि मध्यलय के अन्तराल का समय
एक सैकेंड माना जाए तो इस प्रकार दो सैकंेड का अन्तराल विलम्बित एवं आधा सैकेंड का
अन्तराल द्रुत लय कहलाएगी।
