अनुक्रम
भाषा की लघुतम पूर्ण इकाई है। पतंजलि ने महाभाष्य में वाक्य के 5 लक्षण दिए हैं-
- एक क्रियापद वाक्य है।
- अव्यय, कारक और विशेषण से युक्त क्रिया-पद वाक्य है।
- क्रिया-विशेषण-युक्त क्रिया-पद वाक्य है।
- विशेषण-युक्त क्रिया-पद वाक्य है।
- क्रियापद-रहित संज्ञा-पद भी वाक्य होता है।
आचार्य ‘भर्तहरि’ ने वाक्य की परिभाषाएं दी हैं।
- क्रिया-पद को वाक्य कहते हैं।
- क्रिया-युक्त कारकादि के समूह को वाक्य कहते हैं।
- क्रिया एवं कारकादि-समूह में रहनेवाली ‘जाति’ वाक्य है।
- क्रियादि-समूह-गत एक अखण्ड शब्द (स्फोट) वाक्य है।
- क्रियादि-पदों के क्रम-विशेष को वाक्य कहते हैं।
- क्रियादि के बुद्धिगत समन्वय को वाक्य कहते हैं।
- साकांक्ष प्रथम पद को वाक्य कहते हैं।
- साकांक्ष पृथक्-पृथक् सभी पदों को वाक्य कहते हैं ।
पतंजलि और थ्रॉक्स दोनों ही आचार्यों ने वाक्य की परिभाषा इस प्रकार दी है- ‘पूर्ण अर्थ की प्रतीति
कराने वाले वाले शब्द-समूह को वाक्य कहते हैं।’ इसमें दो बातों पर विशेष बल दिया गया है:-
- वाक्य शब्दों का समूह है।
- वाक्य पूर्ण अर्थ की प्रतीति कराता है।
- भाषा की इकाई वाक्य है, न कि शब्दसमूह या पद।
- यह आवश्यक नहीं है कि वाक्य शब्दों का समूह ही हो। एक पद वाले भी वाक्य प्रयोग में आते हैं। ‘चलोगे ?’ ‘हाँ’, ‘कहाँ
से?’ ‘घर से’, ‘कुत:’ ‘नद्या:’ आदि। - अनेक भाषाओं में एक समस्त पद ही पूरे वाक्य का काम देता है।
- वाक्य भाषा का अंग है, वह सम्पूर्ण अर्थ की प्रतीति नहीं करा सकता। एक ग्रन्थ या भाषण में सहस्रों वाक्य होते हैं, तब
पूर्ण की अभिव्यक्ति होती है। एक-एक वाक्य विचार-धारा की एक-एक तरंग मात्रा है।
‘भतृ हरि’ ने अपने ग्रन्थ ‘वाक्यपदीय’ में अपने पूर्ववर्ती न्यायवादी आचार्यों के मतों को संकलित करते हुए उनके
द्वारा मान्य वाक्य की 8 परिभाषा दी हैं-
- क्रियापद को वाक्य कहते हैं।
- क्रियापद-सहित कारकादि के समूह को वाक्य कहते हैं।
- क्रिया तथा कारकादि-समूह में रहने वाली ‘जाति’ को वाक्य कहते हैं।
- क्रियादि समूहरूप एक अखण्ड शब्द (स्फोट) को वाक्य कहते हैं।
- क्रियादि पदों के विशेष क्रम को वाक्य कहते हैं।
- क्रियादि के बुद्धिगत अखण्ड समन्वय को वाक्य कहते हैं।
- आकांक्षायुक्त प्रथम पद को ही वाक्य कहते हैं।
- आकांक्षायुक्त पृथक्-पृथक् सभी पदों को वाक्य कहते हैं ।
वाक्य के प्रकार
1. आकृति के आधार वाक्य
इसके आधार पर वाक्य भी चार प्रकार
के मिलते हैं-
और प्रत्यय को अलग-अलग करना कठिन होता है। भारोपीय परिवार की प्राचीन भाषाएँ संस्कृत, लैटिन, ग्रीक,
अवेस्ता आदि इसी प्रकार की हैं।
से न मिलना) ढंग के मिले हुए होते हैं। प्रकृति और प्रत्यय जुड़े होने पर भी तिल-तण्डुल-वत् (तिल और चावल
की तरह) अलग-अलग देखे जा सकते हैं। तुर्की भाषा में इसके सुन्दर उदाहरण मिलते हैं।
को पृथक् करना कठिन होता है। पूरा वाक्य एक शब्द-सा हो जाता है। ऐसे उदाहरण दक्षिण अमेरिका की चेरोकी
भाषा, पेरीनीज पर्वत के पश्चिमी भाग में बोली जानेवाली बास्क भाषा आदि में मिलते हैं।
2. रचना के आधार वाक्य
वाक्य की रचना या गठन के आधार पर वाक्य के तीन भेद होते हैं।
पढ़ता है।
हैं अथवा नहीं भी होते हैं। जैसे- जब में गुरु की कुटी पर पहुँचा तो वे स्नान करने नदी पर गए थे।, यदाहं गुरुगृहं प्रापम्, तदा स स्ननार्थ नदीं गत आसीत्।
3. अर्थ या भाव के आधार वाक्य
अर्थ या भाव की दृष्टि से वाक्य के प्रमुख 7 भेद किए जाते हैं-
- विधि-वाक्य कृष्ण काम करता है।
- निषेध-वाक्य कृष्ण काम नहीं करता है।
- प्रश्न-वाक्य क्या कृष्ण काम करता है?
- अनुज्ञा-वाक्य तुम करो।
- सन्देह-वाक्य कृष्ण काम करता होगा।
- इच्छाार्थक-वाक्य ईश्वर, तुम्हें सद्बुद्धि दे।
- संकेतार्थ-वाक्य यदि कृष्ण पढ़ता तो अवश्य उत्तीर्ण होता।
- विस्मयार्थक-वाक्य अरे तुम उत्तीर्ण हो गए!
4. क्रिया के आधार वाक्य
वाक्य में क्रिया के आधार पर दो भेद होते हैं-
अधिकांश वाक्य इसी कोटि में आते हैं। जैसे- स: पुस्तकं पठति (वह पुस्तक पढ़ता है)।
वाच्य (Voice) के आधार पर क्रियायुक्त वाक्य तीन प्रकार के होते हैं-
- कर्तृवाच्य में कर्ता मुख्य होता है। कर्ता में प्रथमा होती है। जैसे- राम: पुस्तकं पठति (राम पुस्तक पढ़ता है)।
- कर्मवाच्य में कर्म मुख्य होता है, अत: कर्म में प्रथमा होती है और कर्ता में तृतीया। जैसे- मया पुस्तकं पठ्यते
(मेरे द्वारा पुस्तक पढ़ी जाती है)। - भाववाच्य में क्रिया मुख्य होती है। कर्म नहीं होता। कर्ता में तृतीया होती है और क्रिया में सदा प्रथम पुरुष
एकवचन होता है। जैसे- मया हस्यते (मेरे द्वारा हँसा जाता है), मया हसितम् (मैं हँसा)।
2. क्रियाहीन वाक्य: प्रचलन के आधार पर कई भाषाओं में क्रियाहीन वाक्यों का भी प्रयोग होता है। वहाँ क्रियापद
गुप्त रहता है।
- प्रचलन-मूलक: प्रचलन के आधार पर संस्कृत, रूसी, बंगला आदि में सहायक क्रिया के बिना भी वाक्यों का
प्रयोग होता है। क्रिया अन्तर्निहित मानी जाती है। हिन्दी, अंग्रेजी में सामान्यता सहायक क्रिया
का होना अनिवार्य है। जैसे- संस्कृत- इदम् मम गृहम् (यह मेरा घर है) रूसी- एता मोय दोम (यह मेरा घर है) बंगला- एइ आमार बाड़ी (यह मेरा घर है) - प्रश्न-वाक्य: प्रश्न-वाक्यों में प्रश्न और उत्तर दोनों स्थलों पर या केवल उत्तर-वाक्य में क्रिया नहीं होती।
जैसे- प्रश्न – कस्मात् त्वमृ (कहाँ से?)। उत्तर- प्रयागात् (प्रयाग से)। यहाँ पर पूरा प्रश्न वाक्य होगा- तुम कहाँ से आ रहे हो? उत्तर- मैं प्रयाग से आ रहा हूँ। प्रयत्नलाघव के
कारण क्रियाहीन वाक्य का प्रयोग होता है।
5. शैली के आधार वाक्य
ढंग से बात कहता है। जैसे- ‘एक थी रानी कुन्ती, उसके पाँच पुत्तर, एक का नाम युघिष्ठिर, एक का नाम भीम,
एक का नाम कुछ और, एक का नाम कुछ और, एक का नाम भूल गया’। यह कथावाचकों आदि की शैली
होती है।
पैसा, उसी के मित्र), यतो धर्मस्ततो जय:, इतो भ्रष्टस्ततो भ्रष्ट: यथा राजा तथा प्रजा, जिसकी लाठी उसकी भैंस,
न घर का न घाट का। समीकृत वाक्य विरोधमूलक भी होते हैं। जैसे- कहाँ हंस कहाँ बगुला, कहाँ राजा कहाँ
रंक, कहाँ शेर कहाँ सूअर। समीकृत वाक्य सन्तुलन आदि गुणों के कारण लोकोक्ति के रूप में प्रचलित हो
जाते हैं।
होती है। यदि, अगर आदि लगाकर वाक्यों को लंबा किया जाता है। जैसे- ‘यदि सुख चाहिए, यदि शान्ति चाहिए,
यदि कीर्ति चाहिए, यदि अमरता चाहिए तो विद्याध्ययन में मन लगाओ।’
वाक्य में पदक्रम
वाक्य में पदों के उचित स्थान का विचार पदक्रम कहलाता है। वाक्य-रचना करते समय
यह विचार करना पड़ता है कि पद अर्थात् कर्ता, कर्ता का विस्तार, कर्म, कर्म का विस्तार,
पूरक (यदि वाक्य में है), पूरक का विस्तार, क्रिया, क्रिया का विस्तार आदि किस क्रम में रखे
जाएँ। हिन्दी वाक्यों में पद क्रम का नियम निश्चित-सा है।
अशुद्ध हो जाता है और अर्थ भी स्पष्ट नहीं होता। पदक्रम सम्बन्धी नियम हैं:
- वाक्य में पहले कर्ता, फिर कर्म या पूरक और अंत में क्रिया रखते हैं, जैसे – बालक
(कर्ता) पुस्तक (कर्म) पढ़ता है (क्रिया)। राम (कर्ता) शिक्षाथ्र्ाी (पूरक) है (क्रिया)। - द्विकर्मक क्रियाओं में गौण कर्म पहले और मुख्य कर्म पीछे रखते हैं, जैसे – मैंने (कर्ता)
राम को (गौण कर्म) पुस्तक (मुख्य कर्म) दी (क्रिया)। - विशेषण संज्ञा के पहले और क्रिया-विशेषण प्रश्नवाचक के अतिरिक्त क्रिया के पहले
आते हैं : जैसे – बड़े प्रसिद्ध (विशेषण) अभिनेता (संज्ञा-कर्ता) आज यहाँ (क्रिया-विशेषण)
आए हुए हैं (क्रिया)। - निषेधवाचक अव्यय “न”, “नहीं”, “मत” प्राय: क्रिया के पूर्व आते हैं, जैसे – मैं नहीं
पढूँगा, तुम मत आना, जब तक मैं न आऊँ तब तक तुम वहीं रहना। -
विशेष अर्थ में “नहीं”, “मत” क्रिया के बाद आते है, जैसे – मैंने आपको देखा नहीं। उसे
बुलाना मत। - तो, भी, ही, भर, तक, मात्र (निपात) उन शब्दों के बाद आते हैं, जिन पर बल देना होता
है, जैसे – वह भी स्कूल जाएगा। तुमने ही उसे मारा था। इनका स्थान बदल जाने
से वाक्य में अर्थोत्तर हो जाता है, जैसे – वह स्कूल भी जाएगा, तुमने उसे ही मारा
था। यहाँ “भी” और “ही” का स्थान बदल देने से अर्थ भिन्न हो गया। - शर्तबोधक, समुच्चयबोधक (यदि-तो, यद्यपि-तथापि) प्राय: जोड़ने वाले वाक्यों के
प्रारंभ में आते हैं, जैसे – वह आएगा तो मैं जाऊँगा। यद्यपि उसने बहुत परिश्रम किया
तथापि सफल नहीं हो सका। - विस्मयादिबोधक और संबोधन प्राय: वाक्य के प्रारंभ में आते हैं, जैसे – अरे! यह क्या
हुआ? मित्र तुम अब तक कहाँ थे? - बल के लिए विशेष पदक्रम: बल के लिए हिन्दी वाक्य में पदक्रम बदल भी जाता है,
जैसे – लड़के को मैंने नहीं देखा (कर्म का स्थानांतरण)। मैंने बुलाया राम को और
आए तुम (क्रिया का स्थानांतरण)।
वाक्य में परिवर्तन की दिशाएँ
वाक्य में परिवर्तन की मुख्य दिशाएँ ये हैं:-
- पदों में परिवर्तन
- अन्वय में परिवर्तन
- अधिक पद-प्रयोग
- पद या प्रत्यय का लोप
- कोष्ठ और डैश का प्रयोग
- आदरार्थ बहुवचन
- प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कथन
- कारक के लिए अर्धविराम
1. पदों में परिवर्तन –
हिन्दी में नवीनता के लिए पदक्रम में कुछ नये परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं। पहले ‘मात्रा’ का प्रयोग
संबद्ध शब्द के बाद होता था; अब पहले होने लगा है। जैसे- मानवमात्र, प्राणिमात्र, एक रुपयामात्र के स्थान पर मात्र मानव, मात्र प्राणी, मात्र एक रुपये के लिए, आदि।
विशेष्य के बाद भी विशेषण का प्रयोग होता है। काला आदमी, प्राकृतिक दृश्य, उस महात्मा की जीवन लीला, सूअर का
बच्चा, निर्धनता का अभिशाप के स्थान पर आदमी काला, दृश्य प्राकृतिक, जीवनलीला उस महात्मा की, बच्चा सूअर
का, जैसे प्रयोग प्रचलित हो गए हैं।
संस्कृत में विशेष्य-विशेषण में लिंग और वचन की अन्विति अनिवार्य है-
- शोभन: बालक:
- शोभनौ
बालकौ - शोभना बालिका
- शोभनं पुष्पम्
- विद्वान् शिष्य:
- विदुषी शिष्या।
हिन्दी में प्रारम्भ में इसी आधार पर पूज्य पिताजी,
पूज्य माताजी, सुन्दर बालक, सुन्दरी कन्या आदि प्रयोग प्रचलित थे, परन्तु अब इस भेद को हटाकर केवल पुँलिंग विशेषण
का ही प्रयोग किया जाता है। पूज्य पिताजी, पूज्य माताजी, सुन्दर कन्या आदि।
अज्ञान आदि के कारण वाक्य में कुछ अधिक पदों का प्रयोग किया जाता है। जैसे-
- ‘फजूल’ (व्यर्थ)
के स्थान ‘बेफूजल’ - ‘दरअसल’ (वस्तुत:) के स्थान पर ‘दरअसल में’
- घर जाता हूँ- घर को जाता हूँ
- मुझे-मेरो को, वह
दुर्जन व्यक्ति - श्रेष्ठ-श्रेष्ठतम, सौन्दर्य-सौन्दर्यता।
4. पद या प्रत्यय का लोप –
संक्षेप या प्रयत्नलाघव के लिए कहीं-कहीं पर पद या प्रत्यय का लोप कर दिया जाता है।
जैसे-
- अहं गच्छामि के स्थान पर ‘गच्छामि’; त्वं पठ, त्वं लिख, पठ, लिख।
- ‘त्वं कुत: आगच्छसि’ को कुत:?। ‘मैं नहीं पढ़ता
हूँ’को ‘मैं नहीं पढ़ता’। - ‘वह बीमार उठ नहीं सकता है और न बैठ सकता है’ को ‘वह बीमार उठ-बैठ नहीं सकता’।
5. कोष्ठ और डैश का प्रयोग –
अर्थ की स्पष्टता के लिए कहीं-कहीं पर कोष्ठ ( ) और डैश ( – ) का प्रयोग किया जाता
है। जैसे-
- राम (परशुराम) ने क्षत्रिय वंश का नाश किया।
- राम-जमदग्नि पुत्र, परशुराम-का क्रोध असह्य था।
6. आदरार्थ बहुवचन –
आदर या महत्व दिखाने के लिए एक के लिए भी बहुवचन का प्रयोग होता है। जैसे-
- गुरु: पूज्य:’
। - ‘अत्राभवान्’ (पूज्य) का अत्रावन्त:।
- ‘राम वन गया’ को -राम वन गए’।
इसी प्रकार ‘आपके शुभदर्शन हुए’, ‘आप कब
पधारे’, ‘हमारा (मेरा) अनुरोध है’।
अंग्रेजी के वाक्यगठन के प्रभाव के कारण हिन्दी में भी तदनुरूप
वाक्यों का प्रयोग होने लगा है। ‘शीला ने कहा कि मैं कल नहीं आऊंगी’ के स्थान पर ‘शीला ने कहा कि वह कल
नहीं आएगी’।
अंग्रजी के अनुसरण पर हिन्दी में भी संक्षेप के लिए कारक-चिन्हों के स्थान पर
अर्ध-विराम (कॉमा ) का प्रयोग होता है। जैसे- ‘प्रयाग विश्वविद्यालय के कुलपति’ के स्थान पर ‘कुलपति, प्रयाग विश्वविद्यालय’। इसी प्रकार ‘अध्यक्ष, लोकसभा’
प्रधानमंत्री, भारत सरकार’ आदि
वाक्य परिवर्तन के कारण
यहाँ कुछ प्रमुख कारणों
का उल्लेख किया जा रहा है।
- अन्य भाषाओं का प्रभाव
- विभक्तियों का घिस जाना
- बलाघात
- स्पष्टता
- मानसिक स्थिति
- प्रयत्न-लाघव
- अनुकरण की प्रवृत्ति
- नवीनता का प्रयास
- अज्ञान
- परम्परावादिता
1. अन्य भाषाओं का प्रभाव –
विश्व की विविध भाषाओं के परस्पर सम्पर्क के कारण भाषाओं के वाक्य-गठन पर प्रभाव पड़ता
है। भारत में भवनों की भाषा अरबी, फारसी और अंग्रेजी की भाषा अंगे्रजी का प्रभाव हिन्दी भाषा पर पड़ा। वाक्यों में
‘कि’ और ‘चूँकि’ का प्रयोग फारसी का प्रभाव है। हिन्दी के प्रारम्भिक साहित्य में ‘कि’ वाले प्रयोग नहीं मिलते हैं।
में ‘कि’ के लिए ‘यत्’ निपात है। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कथन वाले वाक्यों में अंगे्रजी का प्रभाव पड़ा है। ‘सीता ने कहा
कि मैं भी वन जाऊँगी’ के स्थान पर ‘सीता ने कहा कि वह भी वन जाएगी’। अंगे्रजी के प्रभाव के कारण हिन्दी में भी
बड़े-बड़े वाक्यों की रचना होने लगी है। संस्कृत में विशेषण-बहुल लम्बे वाक्य दूसरे ढंग के हैं।
क्रिया के बाद कर्म का प्रयोग भी कुछ चलने लगा है- ‘वह पुस्तक पढ़ता है’ के स्थान पर ‘वह पढ़ता है पुस्तक’। इसी
प्रकार के वाक्य हैं- मैं पीता हूं चाय, मैं लाया हूँ गुड़िया, मैं खाता हूँ मक्खन, आदि।
का प्रयोग अंगे्रजी के देन है।
अंगे्रजी आदि में विद्यमान है। इसमें कर्ता और कर्म का स्थान बदलने पर अर्थ का अनर्थ हो जाता है। हिन्दी में ने (तृ.
एक. एन), पर (उपरि) आदि घिसे हुए कारक-चिन्ह हैं।
बलाघात के कारण वाक्य-गठन में परिवर्तन हो जाता है। ‘मैं पराजय जैसी चीज नहीं जानता’, के स्थान पर
‘पराजय, मैं नहीं जानता’।
स्पष्टता के लिए वाक्य-गठन में परिवर्तन होता है। इसके लिए कोष्ठ या डैश का प्रयोग होता है। ‘अमरत्व (मोक्ष
की कामना) मानव-जीवन का लक्ष्य है’।
भाषा में वाक्यों की रचना पर वक्ता की मानसिक स्थिति का भी पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। यदि किसी
बाह्य अथवा आन्तरिक कारण से वक्ता क्षुब्ध है, घबराया हुआ है, तो उसकी भाषा में वाक्य छोटे-छोटे, पदक्रम अव्यवस्थित
रहता है। यही कारण है कि युद्धकालीन भाषा तथा शान्तिकालीन भाषा में बड़ा अन्तर रहता है। शान्ति-काल में भाषा
में प्रयुक्त वाक्यों में व्यवस्था अधिक रहती है।
प्रयत्न-लाघव के लिए तो सभी जगह अवकाश रहता है। अत: भाषा के अन्य अंगों की ही भाँति
वाक्य-परिवर्तन में भी यह कारणरूप में रहता है। वाक्यों में कुछ प्रत्ययों तथा पदों का लोप इसी का परिणाम है। जैसे
“आँखों से देखी बात सच होती है।” के स्थान पर “आँखों देखी बात सच होती है” आदि।
अनेक वक्ताओं में कुछ विशेष कारणों से विशेषत: उच्चता की भावना के कारण किसी भाषा के
अनुकरण की प्रवृत्ति उत्पé हो जाती है। ऐसे वक्ता उस तथाकथित उच्च भाषा का अनुकरण जानबूझकर करने लगते
हैं, जिससे उनकी अपनी भाषा के वाक्यों में परिवर्तन हो जाता है; जैसे-
- “मैं जा रहा हूँ।”- मोहन ने कहा।
- “तुम नहीं जा सकते।”-
- सोहन ने उसे रोका।
यह अंगे्रजी की वाक्य-रचना का अनुकरण है।
अन्य भाषा का प्रभाव जहाँ वाक्य-रचना को अनजाने में प्रभावित करता है, वहाँ अनुकरण से जानबूझकर अपनी भाषा
को दूसरी भाषा के आधार पर बदलने का प्रयास किया जाता है।
अनेक वक्ता तथा लेखक अपनी भाषा में नवीनता लाने के लिए वाक्यों के नये-नये प्रयोग करते हैं।
इस प्रयास में वाक्य में प्रचलित पदक्रम को बदल दिया जाता है: जैसे- ‘‘यह स्थान मनुष्य मात्रा के लिए है।” के स्थान
पर “यह स्थन मात्रा मनुष्यों के लिए है।” इसके अतिरिक्त अनेक बार कर्ताविहीन या क्रियाविहीन वाक्यों का प्रयेाग भी देखा जाता है।
अज्ञान के कारण भी वाक्यों में अधिक पदों का प्रयोग होने से, वाक्य-परिवर्तन हो जाता है। अनेक वक्ता
‘दरअसल’, ‘दरहकीकत’, ‘सज्जन’ आदि शब्दों के स्थान पर वाकयों में ‘दरअसल में’ ‘दरहकीकत में’, ‘सज्जन पुरुष’ आदि
का प्रयोग करते हैं, जिससे वाक्य-रचना में परिवर्तन हो जाता है।
कभी-कभी परम्परावादिता से भी वाक्यों में परिवर्तन हो जाता है। संस्कृत के विशेषण-विशेष्य का
अन्वय आवश्यक था, और विशेषण भी पुल्लिंग, स्त्रीलिंग तथा नपुंसकलिंग होता था। हिन्दी में, इस परम्परा का पालन
कुछ विशेषणों में तो हो रहा है, किन्तु कुछ में हिन्दी की प्रकृति के अनुसार विशेषण का एक ही लिंग रह गया है। जैसे,
‘चतुर: बालक: या ‘चतुरा बालिका’।
प्रयोग करते हें, जिससे हिन्दी-वाक्यों में परिवर्तन हो जाता है।
