अनुक्रम
व्यवहारवाद का अर्थ
व्यवहारवाद
का ऐसी समग्र क्रान्ति है जो राजनीति शास्त्र को तथा इसकी अन्य शाखाओं को व्यवहारवादी
चश्मे से देखती है। व्यवहार से मिलते-जुलते शब्दों-आचरण, कार्य, क्रिया आदि को व्यवहारवाद
नहीं कहा जा सकता। ये शब्द मूल्यों पर आधारित हैं। व्यवहारवाद एक मूल्य रहित या
मूल्य-निरपेक्ष अवधारणा हैं। कई बार व्यवहारवाद तथा व्यवहारिकतावाद (Behaviourism) को
भी समान समझ लिया जाता है। व्यवहारिकतावाद एक मनोविज्ञान की अवधारणा है। उस शब्द
का प्रयोग 1925 में श्रण्ण् वाटसन ने मानव’-व्यवहार की शारीरिक तथा भौतिक व्याख्या करने
के लिए किया था। इसका उद्देश्य प्रयोजनों, भावनाओं, इच्छाओं या विचारों के आधार पर शोद्य
सामग्री एकत्रित करना था। यह एक मनोस्थिति का परिचायक था। इसके द्वारा प्रयोगशालाओं
में मानव के व्यवहार की परीक्षा होती थी। व्यावहारिकतावादियों ने सिद्ध किया कि व्यक्ति का
व्यवहार पर्यावरण से-उसकी अनुकूलता-प्रतिकूलता से, पुरस्कार तथा दण्ड आदि से प्रभावित
होता है। परन्तु व्यवहारवाद आचरण, कार्य, क्रिया, व्यवहारिकतावाद सभी से भिन्न है। यह एक
व्यापक अवधारणा है जिसका प्रयोग राजनीति विज्ञान के अध्ययन क्षेत्र में होता है।
व्यवहारवाद एक मूल्य-निरपेक्ष अवधारणा है। यह व्यवहार को अपने अध्ययन, अवलोकन,
व्याख्या तथा निष्कर्ष का आधार मानकर चलती है। इसके अन्तर्गत सामाजिक अनुसंधान से
सम्बन्धित प्रत्येक प्रकार की वैज्ञानिक सामग्री शामिल हैं जो व्यवहार से सम्बन्धित होती है।
यह राजनीति विज्ञान में क्रान्तिकारी विचारों को जन्म देने वाला दृष्टिकोण है।
व्यवहारवाद की परिभाषा
ने इसे परिभाषित करते हुए कहा है-’’व्यवहारवाद राजनीति विज्ञान का ऐसा विरोधी आन्दोलन
है जो राजनीतिक अध्ययन को आधुनिक मनोविज्ञान, समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र में विकसित
सिद्धान्तों, पद्धतियों, खोजों और दृष्टिकोणों के समीप लाकर इसे वैज्ञानिक अध्ययन बनाता है।’’
ने व्यवहारवाद को परिभाषित करते हुए कहा है-’’राजनीति विज्ञान में शोद्य को व्यवस्थित
बनाना तथा आनुभाविक प्रणालियों का विकास ही व्यवहारवाद है।’’
करते हुए कहा है-’वह राजनीति जो क्या, कब और कैसे प्राप्त करती है-व्यवहारवाद
है।’’
उपलब्धियों के प्रति असन्तोष का परिणाम है और इसका उद्देश्य राजनीति को वैज्ञानिक
बनाना है।’’
(2) हींज यूलाऊ के अनुसार ‘‘राजनीतिक व्यवहार के अध्ययन का संबंध राजनीतिक संदर्भ में मानव के कार्यों, रुख, वरीयताओं एवं आकांक्षाओं से है।’’
(3) डेविड ईस्टन के अनुसार – ‘‘ व्यवहारवादी शोध वास्तविक व्यक्ति पर अपना समस्त ध्यान केन्द्रित करता है।’’
व्यवहारवाद का कार्यक्षेत्र
व्यवहारवाद एक विकासशील अवधारणा है। इसका क्षेत्र तेजी से बढ़ रहा है। कोई भी ऐसा
क्षेत्र नहीं है जो व्यवहारवाद के अन्तर्गत न आ सके। आज बहु-पद्धति विज्ञान, व्यवस्था
विश्लेषण, प्रकार्यवादी उपागम, समाजशास्त्रीय उपागम आदि ने इसके वास्तविक स्वरूप में
परिवर्तन कर दिया है। इसलिए व्यवहारवाद के कार्यक्षेत्र को निश्चित करना कठिन हो गया
है। राजनीतिक शास्त्र में हम राजनीति व्यवहार का ही अध्ययन करते हैं। इसके अन्तर्गत मनुष्य
के राजनीति व्यवहार की समस्त गतिविधियां शामिल हैं।
विशेष योगदान है, सभी ने व्यवहारवाद के अध्ययन क्षेत्र में विषय शामिल किए
हैं-
- तुलनात्मक राजनीति।
- मतदान व्यवहार।
- नीतियां व मूल्य।
- राजनीतिक सिद्धान्त व उपागम।
- संकल्प, शक्ति, प्रक्रियाएं, निर्णय, समूह, संरचना आदि अवधारणाएं।
- राजनीतिक दल, दबाव समूह तथा व्यवस्थापिकाएं।
- नवीन उपकरण तथा प्रविधियां।
- छोटे समूहों व संगठनों का व्यक्ति या समष्टि रूप।
- क्रिया व प्रक्रिया की विधियां।
- व्यक्तियों के आपसी सम्बन्ध।
व्यवहारवाद की उत्पत्ति व विकास
यह बात सत्य है कि व्यवहारवाद विकसित अवस्था के रूप में एक आधुनिक अवधारणा है,
लेकिन इसके अंश प्राचीन काल में भी देखने को मिलते हैं। प्राचीन काल से ही राजवेत्ता और
शासक दोनों ही सीमित अर्थों में व्यवहारवादी रहे हैं और मानव के व्यवहार को देखकर ही
काम करते रहे हैं प्लेटो, अरस्तु, सिसरो, मैकियावेली, हॉब्स, लॉक व रुसो आदि अनेक
राजनीतिक विचारकों ने मानव-व्यवहार का अवलोकन अवश्य किया है।
व्यवहारवाद का आधुनिक संस्थापक माना जाता है। उनकी उदारवादी लोकतन्त्र की अवधारणा
अनुभववादी दृष्टिकोण पर आधारित थी। बहुलवादी विचारकों ने इसे गति प्रदान की। इसको
विकसित करने में वाल्टर बेजहॉट, जेम्स ब्राइस और लोवेल ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। कार्ल
माक्स्र, मैकस वेबर तथा दुर्खीम आदि विचारकों ने इसको गति प्रदान की।
ने अपनी पुस्तक ‘Human Nature in Politics’ तथा आर्थर एफ0 बेण्टले ने ‘The Process of
Government’ में व्यवहारवाद का पोषण किया।
बेण्टले ने कहा है-’’हमारा राजनीति शास्त्र निर्जीव है, यह शासकीय संस्थाओं के बाहरी स्वरूप
का औपचारिक अध्ययन करता है, गुण-दोषों द्वारा सरकारों का विवेचन करता है। जब इसे
कानून की परिधि से बाहर निकाला जाता है तो यह एक मजाक बनकर रह जाता है।’’ इसलिए
आर्थर बेण्टले ने राजनीतिक प्रक्रियाओं की विशेषताओं का पता लगाने के लिए समूहों के अध्
ययन व अवलोकन पर बल दिया। उसने कहा कि इस बात का कोई महत्व नहीं है कि संविधानों
और विधियों का अध्ययन किया जाए।
राजनीतिक संस्थाओं के प्रति लोगों की प्रतिक्रिया की जानकारी प्राप्त करने का प्रयास करना
चाहिए। इसके बाद 1925 में चार्ल्स ई0 मेरियम ने अपनी पुस्तक ‘New Aspects of Politics’
में राजनीतिक व्यवहार के अध्ययन के लिए व्यवहारवादी दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया।
1930 में प्रकाशित पुस्तक ‘A Study of the Principles of Politics’ में भी व्यवहारवादी विचारों
का ही पोषण हुआ। लासवैल तथा कैटलिन ने शिकागो सम्प्रदाय के सदस्यों के रूप में
अनुभववाद व व्यवहारवाद का ही समर्थन किया। इन्होंने शक्ति-सम्बन्धों को राजनीति-विज्ञान
का अध्ययन बिन्दु माना।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिकन विद्वानों ने व्यवहारवाद को विकसित करने में महत्वपूर्ण
योगदान दिया। उन्होंने समाज-विज्ञानों को व्यवहारवादी विज्ञान की संज्ञा दी। अमेरिका में
व्यवहार ने एक बौद्धिक प्रवृत्ति के रूपमें प्रभवशाली आन्दोलन का रूप ग्रहण कर लिया और
अनेक शोद्य पत्र प्रकाशित होने लगे जैसे-Public Opinion, World Politics, American Behavioural
Scientist rFkk Behaviour Science आदि। अमेरिका में इसके विकास के लिए ‘Social science
Reasearch Council’ की भी स्थापना की गई।
(APSA) तथा ‘सोशल साइंस रिसर्च कौंसिल’ ने मिलकर व्यवहारवादी क्रान्ति को आगे बढ़ाया।
इस तरह डेविड ईस्टन, लासवैल, कोलमैन, हींज युलाऊ, कार्ल डयूश, साइमन, पावेल, बैण्टले,
मेरियम, ग्राहम वालास, मैकस वेबर, माक्र्स, दुर्खीम, फ्रायडल, पेरेटो, मोस्का आदि विचारकों के
प्रयासों के परिणामस्वरूप व्यवहारवादी आन्दोलन अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया। इन सभी
के प्रयासों के परिणामस्वरूप परमपरावादी राजनीतिक सिद्धान्त अपनी अन्तिम घड़ियां गिनने
लगा और एक ऐसे आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्त के प्रयासों को बल मिला जो द्वितीय विश्वयुद्ध
के बाद परिवर्तित अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक व्यवहार को भी समझने के योग्य था।
व्यवहारवाद के उदय के कारण
1. परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त के प्रति असंतोष – परम्परावादी राजनीतिक सिद्धान्त
द्वितीय विश्व युद्ध तक बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों की व्याख्या करने में
असफल रहा। परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त के दोषों तथा सैद्धान्तिक कठोरता ने
राजनीतिक सिद्धान्तकारों में असन्तोष की भावना को जन्म दिया। इसी कारण उन्होंने
ऐसे तथ्यों की खोज की जिनसे व्यवहारवादी क्रान्ति की नींव पड़ी।
को नई चुनौती पेश की। जब राजनीतिक विद्वानों ने अपने सिद्धान्तों को नई
परिस्थितियों के सन्दर्भ जांचा-परखा तो उन्हें राजनीतिक यथार्थ के प्रतिकूल पाया।
इसलिए राजनीतिक विद्वानों ने अपने शास्त्र को दूर करने के लिए नए-नए दृष्टिकोणों
तथा प्रविधियों की तलाश शुरू की। ताकि ऐसे सिद्धान्त का निर्माण किया जा सके
जो अन्य प्राकृतिक विज्ञानों के समान ही तथ्यों का अध्ययन करके निश्चित भविष्यवाणी
करने में समर्थ हो। इसी कारण से व्यवहारवाद लोकप्रिय हुआ।
विद्वानों ने व्यवहारवाद के लिए अनुकूल परिस्थितियां पैदा की। ऑगस्ट काम्टे ने
अनुभवकारी पद्धति को विकसित किया और वैज्ञानिक प्रविधियों को सामाजिक तथ्यों
पर लागू किया। इसी तरह मार्क्स ने भी सर्वप्रथम राजनीतिक कार्यों की सामाजिक
सन्दर्भ में व्याख्या की। दुर्खीम ने भी राजनीतिक व्यवस्थाओं के संरचनात्मक-क्रियात्मक
दृष्टिकोण की व्याख्या की। इस तरह यूरोपियन विद्वानो के प्रयासों के कारा ही
व्यवहारवाद का जन्म हुआ।
आदि के क्षेत्र में वैज्ञानिक क्रान्ति बहुत पहले ही आ चुकी थी। इससे इनमें नए-नए
दृष्टिकोणों का विकास हो रहा था। राजनीतिक विद्वानों ने इस परिवर्तन को देखकर
स्वयं भी राजनीति शास्त्र को व्यवहारिक बनाने के प्रयास शुरू कर दिए। उन्होंने एक
अन्तर्शास्त्रीय दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया और व्यवहारवाद का विकास किया।
की स्थापना के साथ ही राजनीति शास्त्र में व्यवहारवादी शोद्य कार्य शुरू हो
गए। इसके साथ ही ‘Social Science Research Council’ ने भी व्यवहारवाद का
विकास करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान किया। 1940 में ‘Centre for Advanced
Studies’ की स्थाना से भी व्यवहारवाद को प्रोत्साहन मिला।
को अनुभव कराया। राजनीतिक विचारक गणितज्ञों की तरह आंकड़े एकत्रित करने लगे और
कम्प्यूटर के आविष्कार ने इसमें और अधिक तेजी ला दी। औद्योगिक क्रान्ति, संचार तकनीकी
का विकास आदि ने भी व्यवहारवाद को महत्वपूर्ण बना दिया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद
राजनीतिक चुनौतियों का सामना करने के लिए तथा अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों का अध्ययन
व्यवहारिक दृष्टि से करने पर जोर दिया जाने लगा। इस तरह युद्ध की समाप्ति के तुरन्त
बाद ही व्यवहारवाद एक व्यापक बौद्धिक आन्दोलन बन गया।
व्यवहारवाद की आधारभूत मान्यताएं
ईस्टन, डाहल, कैटलिन जैसे समाजशास्त्री व्यवहारवाद की चार आधारभूत मान्यताएं लेकर चलते
हैं-
की इकाई बड़ी होगी तो न तो गहन अध्ययन हो सकेगा और न ही अययन के परिणाम
उपयोगी व सार्थक होंगे। इसलिए उपयोगी निष्कर्षों के लिए अध्ययन की इकाई छोटी
होनी चाहिए।
कि वैज्ञानिक विधि के द्वारा ही ज्ञान को स्थायी व सार्वदेशिक बनाया जा सकता है।
इसके द्वारा ही ज्ञान गहरा, सत्य और निष्पक्ष बनकर विश्वसनीय बनता है। इसलिए
हमें निरीक्षण, अनुभव व प्रयोग पर आधारित वैज्ञानिक विधि द्वारा ही अध्ययन करना
चाहिए।
समग्रता तथा सच्चाई का परीक्षण उसका ज्ञान के अन्य पहलूओं के साथ सम्बन्ध
स्थापित करके ही किया जा सकता है। राजनीति शास्त्र के निष्कर्ष तभी उपयोगी
होंगे, यदि उनका अन्य सामाजिक विज्ञानों-अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र आदि
से भी सम्बन्ध होगा। इस प्रकार व्यवहारवादी एक अन्तर:-अनुशासनीय अध्ययन पर
जोर देते हैं।
यह भी मानना है कि अनुभव, निरीक्षण, प्रयोग, सन्दर्भ आदि के द्वारा राजनीति शास्त्र
को एक स्वतन्त्र विषय बनाया जा सकता है। इस तरह अन्तर-अनुशासनीय विषय
के साथ-साथ राजनीति शास्त्र एक स्वतन्त्र अनुशासन भी हो सकता है।
व्यवहारवाद की विशेषताएं
सभी व्यवहारवादी विचारकों ने व्यवहारवाद का विकास करने में अपनी सभी महत्वपूर्ण भूमिका
निभायी। लेकिन डेविड ईस्टन ने व्यवहारवाद को एक बौद्धिक आन्दोलन बनाकर अपना विशेष
योगदान दिया। उसने चाल्र्सवर्थ द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘Contemporary Political Analysis’
में अपना निबन्ध ‘The cuurent meaning of Behaviouralism’ लिखकर व्यवहारवाद को विकसित
किया। डेविड ईस्टन ने इस निबन्ध के व्यवहारवाद की आठ विशेषताओं का वर्णन किया है।
ये विशेषताएं हैं-
- नियमितताएं (Regularities)
- सत्यापन (Verification)
- तकनीक या प्रविधियां (Techniques)
- परिमाणीकरण (quantification)
- मूल्य (Value)
- क्रमबद्धता या व्यवस्थीकरण (Systematization)
- विशुद्ध विज्ञान (Pure Science)
- एकीकरण या समायोजन (Integration)
1. नियमितताएं –
ईस्टन का कहना है कि प्रत्येक व्यक्ति के राजनीतिक
व्यवहार में कुछ ऐसी प्रवृत्तियां पाई जाती हैं जो बार-बार देखने को मिलती हैं। इन
बार-बार होने वाली प्रवृत्तियों के आधार पर उपयोगी निष्कर्ष निकालकर उन्हें सिद्धान्त
का रूप दिया जा सकता है। यद्यपि यह व्यवहार कई अवसरों पर भिन्न हो सकता
है, लेकिन व्यक्ति भिन्न अवसरों पर कुछ बातों के बारे में अपनी समान राय ही प्रकट
करता हैं व्यक्ति के व्यवहार की बारम्बारता या नियमितताएं कानून, नियमों व उपनियमों
का आधार होती हैं। इन्हीं के आधार पर राजनीतिक व्यवहार का नियमतन होता है
और चुनाव के समय समस्त राजनीतिक घटनाक्रम को समझा जा सकता है। इस
नियमित व्यवहार के कारण ही प्राकृतिक विज्ञानों की तरह भविष्यवाणी भी की जा
सकती है। इसलिए सभी व्यवहारवादी विचारकों ने राजनीति व्यवहार को नियमितताओं
की खोज करके शुद्ध राजनीतिक सिद्धान्तों के निर्माण का मार्ग तैयार किया है।
व्यवहार की नियमितताओं का सामान्यीकरण या निष्कर्ष परीक्षण या सत्यापन योग्य
होना चाहिए। सत्यापन वैज्ञानिक विधि का आधार है। जब तक नियमितताओं की जांच
व परीक्षण नहीं किया जाएगा तो वैज्ञानिक सिद्धान्त का मार्ग प्रशस्त नही होगा।
विधि द्वारा ही निकाले जा सकते हैं। इस तरह समस्त राजनीतिक घटनाओं को समझने
के लिए नियमितताओं का सत्यापन होना जरूरी है। इसलिए व्यवहारवादियों ने
राजनीतिक व्यवहार की नियमितताओं के परीक्षण या सत्यापन पर जोर दिया है।
पद्धतियों और प्रविधि पर बहुत जोर देते हैं। व्यवहारवादियों का कहना है कि तथ्यों,
आंकड़ों तथा नियमितताओं को प्राप्त करने के लिए हमें मान्य शोद्य-प्रविधियों का ही
सहारा लेना चाहिए। विषय सामग्री प्राप्त करने तथा उसकी प्रामाणिकता की जांच
करने के लिए ऐसी प्रविधियों या तकनीकों का प्रयोग करना चाहिए जे बार-बार
परीक्षण में सहायक हो, क्योंकि आधार सामग्री एवं उसका निर्वचन करने वाले साधन
स्वयं सिद्ध नहीं होते। एक उचित प्रविधि के अभाव में उपलब्ध आंकड़े भी निरर्थक
साबित हो सकते हैं। नए तथ्यों के परीक्षण के लिए नई व उन्नत तकनीक का ही
सहारा लेना चाहिए। उचित साधन या तकनीक ही उपयोगी अध्ययन व निष्कर्ष का
आधार होती है। इसलिए शोद्य कार्यों में ऐसे उपकरणों या प्रविधियों का ही प्रयोग
करना चाहिए जिनके आधार पर सुसंगत, विश्वसनीय और तुलनात्मक व उपयोगी
सामग्री प्राप्त हो सके।
बहुत जटिल होता है, इसलिए उसका मापन भी एक कठिन कार्य है। किन्तु बिना
मापन के मात्रात्मक तथ्य भी अनुपयोगी रहते हैं इसलिए अध्ययन े विवरण तथा
आधार-सामग्री को लक्ष्यों के अनुरूप बनाने के लिए माप एवं परिमाणन की जरूरत
पड़ती है। इससे अध्ययन में सूक्ष्मता एवं परिशुद्धता आती है और तथ्यों में भी
सुनिश्चितता तथा स्पष्टता आती है। इसलिए तथ्यों को प्रामाणिक बनाने के लिए तथ्यों
का परिमाणन करते रहना चाहिए।
तथ्यों और मूल्यों में कोई सम्बन्ध नहीं है। यदि राजनीतिक व्यवहार का अध्ययन मूल्यों
को ध्यान में रखकर किया जाएगा तो उसमें अध्ययनकर्ता के निजी मूल्यों, आदर्शों
व भावनाओं के शामिल होने का डर बना रहेगा और प्राप्त निष्कर्ष भेदभावपूर्ण व
अनुपयोगी होंगे। राजनीतिक व्यवहार का अध्ययन आनुभाविक प्रणालियों पर आधारित
होने के कारण उसका मूल्यों से कोई सम्बन्ध नहीं रह जाता। इसलिए तथ्यों और
मूल्यों का अलग-अलग अध्ययन करना चाहिए। जहां तक सम्भव हो राजनीतिक
व्यवहार के अध्ययन को मूल्य निरपेक्ष ही बनाने का प्रयास करना चाहिए। इसके द्वारा
ही सही निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।
राजनीति विज्ञान में शोद्य व्यवस्थित होनी चाहिए अर्थात सिद्धान्त निर्देशित होनी
चाहिए। यदि शोद्य सिद्धान्त से अनुप्रमाणित नहीं होगी तो वह महत्वहीन रहेगी और
यदि वह सिद्धान्त सामग्री से समर्थित नहीं है तो भी वह निरर्थक रहेगी। इसलिए अध्
ययन, अवलोकन, तथ्य संग्रह, सिद्धान्त निर्माण, सत्यापन आदि सभी में क्रमबद्धता रहनी
चाहिए। इसलिए प्रत्येक शोद्य कार्य सिद्धान्त के साथ जुड़ा होना चाहिए। अर्थात् उसमें
क्रमबद्धता या व्यवस्थीकरण का गुण होना चाहिए।
सामाजिक उपयोगिता की दृष्टि से नहीं संचालित होनी चाहिए। ज्ञान की खोज स्वयं
ही सामाजिक समस्याओं के समाधान में उपयोगी बन सकती है। सिद्धान्त और प्रयोग
दोनों ही वैज्ञानिक प्रयत्नों के अंग होते हैं। राजनीतिक व्यवहार को समझना तथा
उसका विश्लेषण करना प्राथमिक आवश्यकता होनी चाहिए। उसके बाद उसकी
सामाजिक उपादेयता पर विचार करना चाहिए। अर्थात् अर्जित ज्ञान की कसौटी केवल
सैद्धान्तिक तथा शुद्ध वैज्ञानिक होनी चाहिए। इसी से राजनीति-शास्त्र को विशुद्ध
विज्ञान बनाया जा सकता है।
सामाजिक प्राणी है। उसकी सामाजिक आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक व अन्य सभी
प्रकार की गतिविधियां उसके व्यवहार से बराबर जुड़ी हुई है। इसलिए मनुष्य की
प्रत्येक गतिविधि उसके सम्पूर्ण जीवन के व्यापक परिप्रेक्ष्य में ही समझी जा सकती
है। इसलिए मानवीय परिस्थितियों की निकटता के कारण सभी सामाजिक विज्ञान
एक-दूसरे के निकट हैं। इसलिए कोई भी राजनीतिक विद्वान अन्य सामाज विज्ञानों
में हो रही शोद्यों की उपेक्षा नहीं कर सकता। यदि उसने ऐसा किया तो उसकी शोद्य
के परिणाम अप्रमाणिक और असामान्य होंगे।
सामाजिक विज्ञानों के क्षेत्रों में हो रहे शोद्य कार्यों पर अपनी गहरी व तीव्र दृष्टि रखनी
चाहिए और अन्त:अनुशासनात्मकता का पोषण करना चाहिए। अन्य अनुशासनों (विज्ञानों)
की मदद के बिना राजनीति-विज्ञान कभी समृद्ध नहीं हो सकता।
इस प्रकार डेविड ईस्टन द्वारा बताई गई व्यवहारवाद की विशेषताएं उसे परम्परावादी दृष्टिकोण
से पृथक करती हैं। इन विशेषताओं में व्यवहारवादी विश्लेषण की पूर्व-धारणाएं, लक्ष्य और
बौद्धिक आधार शामिल हैं। यह विश्लेषण राजनीति विज्ञान में आनुभाविक प्रवधियों के प्रयोग
के साथ-साथ उसे परिशुद्ध विज्ञान के लिए भी प्रयासरत् है। व्यवहारवादी क्रान्ति ने राजनीति
शास्त्र को नई दिशा प्रदान की है और उसे एक अन्तर:अनुशासित दृष्टिकोण बनाने का प्रयास
किया है।
व्यवहारवाद की सीमाएं
व्यवहारवादी दृष्टिकोण नि:सन्देह एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण है। उसने राजनीति शास्त्र के क्षेत्र
और प्रकृति में क्रान्तिकारी परिवर्तन ला दिया है। उसने राजनीतिक व्यवहार के अध्ययन द्वारा
राजनीति-शास्त्र को नई दिशा दी है। लेकिन फिर भी यह दृष्टिकोण कई दुर्बलताओं का शिकार
है और इसकी अपनी कुछ सीमाएं हें। इसकी सीमाओं को हींज यूलाऊ, मलफोर्ड सिबली, स्टीफन
एल. वासबी आदि विद्वानों ने निम्न प्रकार से स्पष्ट किया है-
है। लेकिन कोई भी जीवित प्राणी अपने अध्ययन में पूर्ण रूप से मूल्यों से दूर नहीं
रह सकता। समस्या का चयन करते समय शोद्यकर्ता के निजी मूल्य स्वत: ही अध्ययन
में शामिल हो जाते हैं।
लिखा है-’’मूल्य किसी भी शोद्य से पहले आते हैं, चाहे वह राजनीति क्षेत्र में हो या
अन्य में। शोद्यकर्ता की कुछ प्राथमिकता उसके अध्ययन से ज्यादा महत्वपूर्ण होती है।’’
इसी तरह हीज यूलाऊ ने अपने लेख ‘Segments of Political Science most
Susceptible to Behaviouristic Treatment’ में लिखा है कि ‘‘व्यवहारवादी स्वयं को
मूल्य निरपेक्ष मानता है, लेकिन स्वयं व्यवहारवादी का व्यक्तित्व, उसका आचरण, उसके
ज्ञान की सीमाएं, साधन, राग-द्वेष, झुकाव, पक्षपात आदि उसके व्यवहारात्मक अध्ययन
के महत्वपूर्ण चर हैं। विषयों का चयन करते समय वह अपने मूल्यों और
विचारधारा से प्रभावित होता हैं ये मूल्य अध्ययन के ‘क्या’ और ‘कैसे’ को निर्धारित
करते हैं।’’
व्यवहारवाद से प्राप्त निष्कर्षों के अलावा नीति-निर्माण की प्रक्रिया पर अन्य कारकों
का भी प्रभाव पड़ता है।
नहीं है। इसलिए यह केवल वास्तविकता का ही चित्रण करता है। किसी समस्या के
हल करने के उपाय बताए बिना राजनीति-शास्त्र में किसी भी विश्लेषण का कोई
महत्व नहीं रह जाता है। ‘क्या होना चाहिए’ के अभाव में व्यवहारवादी विश्लेषण एक
अपूर्ण दृष्टिकोण है।
करने में व्यवहारवाद प्राय: असफल रहता है। व्यवहारवादी केवल स्थाई दशाओं के
अध्ययन पर ही अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं।
और परिस्थितियों के सन्दर्भ में ही करते हैं। इसलिए राजनीतिक व्यवहार की हर
परिस्थिति में सम्पूर्ण व्याख्या करना व्यवहारवादियों के लिए असम्भव होता है।
जन्म लेना इसकी अपूर्णता को दर्शाता है। व्यवहारवादियों ने स्वयं ही व्यवहारवादी
मान्यताओं का खण्डन किया है।
प्रक्रिया पर कोई नियन्त्रण नहीं होता है। अध्ययनकर्ता अपनी इच्छानुसार न तो
राजनीतिक व्यवहार के घटकों को चुन सकता है और न ही उनका विश्लेषण करते
समय उन पर अपना नियन्त्रण रख सकता है।
इससे प्राप्त निष्कर्षों को कुछ विशेष परिस्थतियों में ही लागू किया जा सकता है।
में इनसे प्राप्त परिणामों की परवाह नहीं करते हैं।
व्यवहारवाद की आलोचना
1. परम्परावादियों द्वारा आलोचना –
परम्परावादी विचारकों ने डेविड ईस्टन के द्वारा बताई
गई व्यवहारवाद की विशेषताओं की निम्न आलोचनाएं की हैं-
- परम्परावादियों का कहना है कि राजनीतिक वास्तविकताएं बहुचरित्र व विशिष्टता
का गुण लिए हुए होती हैं। इसलिए उनमें नियमितताएं या समानताएं ढूंढ़ना बेकार
है। - राजनीतिक व्यवहार में वस्तुनिष्ठता शत-प्रतिशत नहीं हो सकती। व्यवहारवादी
अध्ययन को वस्तुनिष्ठ बनाने पर जोर देते हैं वे विषय सामग्री एवं समस्याओं
की तुलना में पद्धतियों और तकनीकों को अधिक महत्व देते हैं। इससे वस्तुनिष्ठता
का ही बोध होता है। राजनीतिक व्यवहार के अध्ययन में पूर्ण वस्तुनिष्ठता
असम्भव है। - राजनीति में मानव व्यवहार का अध्ययन कोरे साक्षात्कारों और प्रश्नावलियों आदि
से ही नहीं किया जा सकता है। इसको वास्तविक रूप से जानने के लिए
समकालीन सामाजिक व सांस्कृतिक परिवेश को समझना आवश्यक है। इसके
अभाव में अध्ययन से प्राप्त निष्कर्ष सत्यापित नहीं हो सकते - व्यवहारवाद में अध्ययन के आंकड़ों का परिमाणीकरण असम्भव होता है। राजनीतिक
व्यवहार का अध्ययन करते समय देशभक्ति तथा ईमानदारी जैसे तत्वों को मापना
असम्भव है, क्योंकि ये धारणाएं अनिश्चित तथा परिवर्तनशील प्रकृति की होती हैं।
इसी तरह राजनीतिक व्यवहार के अन्य तत्व भी परिवर्तनशील हैं। अत: इसमें मापन
असम्भव है। - राजनीतिक व्यवहार में मूल्य-निरपेक्षता एक असम्भव बात है, क्योंकि इसमें
समस्या के चयन से पहले ही अध्ययनकर्ता की मूल्यात्मक प्राथमिकताएं सर्वोपरि
होती हैं। अध्ययन करते समय इन मूल्यात्मक प्राथमिकताओं से अध्ययन का
अछूता रहना एक कठिन व असम्भव कार्य है।
2. सामान्य आलोचनाएं –
मलफोर्ड सिबली, स्टीफन एल0 वासबी, हीज यूलाऊ, रेमने, डाहल,
कार्ल ड्यूश, एवरी लीसारसन, क्रिश्चियन बे, एल्फ्रैड कब्बन, किर्क पैट्रिक आदि विद्वानों ने
व्यवहारवाद की आलोचनएं की हैं-
- व्यवहारवादी दृष्टिकोण का प्रयोग नीति-निर्माण के क्षेत्र में नहीं किया जा सकता
है। यह नीति-शास्त्र का विरोधी है। - व्यवहारवादी तकनीकों व पद्धतियों पर अधिक जोर देते हैं, विषय वस्तु पर नहीं।
इससे सम्पूर्ण विश्व का अध्ययन करना असम्भव होता है। - व्यवहारवादी दूसरे सामाजिक विज्ञानों पर अधिक आश्रित हैं। वे अपने अध्ययन
के लिए दूसरे शास्त्रों की प्रविधियों व पद्धतियों पर अधिकाधिक निर्भर होते जा
रहे हैं। सिबली ने कहा है-’’व्यवहारवादियों का शोद्य कार्य समाजशास्त्र तथा
मनोविज्ञान से अधिक प्रभावित है।’’ - व्यवहारवादियों के आचरण में विरोधाभास पाया जाता हैं वे अपने आपको
मूल्य-निरपेक्ष विज्ञानी बताते हैं, परनतु उनका अध्ययन मूल्य निरपेक्ष नहीं है।
वे स्वयं दूसरे शास्त्रों की पद्धतियों को प्रयोग करते हैं और फिर भी किसी अन्य
अध्ययन पद्धति को मान्यता देने के लिए तैयार नहीं है। - व्यवहारवादियों ने मानव व्यवहार का विज्ञान प्रस्तुत करने में अब तक असफलता
ही प्राप्त की है। हींज यूलाऊ, किर्क पैट्रिक, डाहल आदि का कहना है कि करोड़ों
डोलर खर्च करने के बाद भी व्यवहारवादी एक विश्वसनीय, व्यापक, सत्यापित
और सन्तोषप्रद राजनीति का विज्ञान बनाने में असफल रहे हैं। - व्यवहारवादी इस बात को भूल जाते हैं कि प्राकृतिक विज्ञानों एवं राजनीति
विज्ञान के तथ्यों में बहुत अधिक अन्तर होता है। इस दृष्टि से पद्धतियों और
प्रविधियों को दोनों में समान रूप से प्रयोग करना असम्भव है। राजनीतिक
वैज्ञानिक प्राकृतिक विज्ञानों की पद्धतियों को राजनीतिक विज्ञान में थोपने का
प्रयास करते हैं। इन दोनों विज्ञानों को समान बनाने का प्रयास तर्कसंगत नहीं
है। एवरी लीसरसन का कहना है कि व्यवहारवादी प्राय: अतर्कसंगत तथा
महत्वहीन आंकड़े एकत्रित करने में लगे रहते हैं। - व्यवहारवादी दृष्टिकोण संकुचित व काल्पनिक है। एल्फ्रैड कॉबन ने कहा है कि
यह उपागम बिना विज्ञान को प्राप्त किए, राजनीति के खतरनाक चक्कर से बचने
के लिए विश्वविद्यालयों के शिक्षकों द्वारा अविष्कृत युक्ति हैं। ये शिक्षक इन्द्रपुरी
या कल्पना-लोक के निवासी हैं जहां मूल्य, इतिहस, संस्कृति व परम्पराएं आपस
में घनिष्ठ रूप से जुड़ी हों, उनको पृथक करके देखना संकुचित दृष्टिकोण का
परिचायक है। व्यवहारवादी राजनीतिक घटनाओं को मूल्यों से पृािक करके
देखते हैं इसके कारण व्यवहारवादी दृष्टिकोण संकुचित बनकर रह गया है।
इसलिए व्यवहारवाद से प्राप्त ज्ञान सीमित ज्ञान है।