राजनैतिक शब्दावली में दो भागों – उत्तर (विकसित) तथा दक्षिण (विकासशील) में बंट गया। उत्तर में सभी साम्राज्यवादी ताकतें
या विकसित धनी देश थे। उत्तर में साम्राज्यवादी शोषण के शिकार रहे गरीब देश थे। जब इन देशों ने स्वतन्त्रता प्राप्त की
तो इन्हें अपने को आर्थिक पिछड़ेपन की समस्या से ग्रस्त पाया। स्वतन्त्र अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के निर्वहन में भी आर्थिक साधनों
की कमी इनके आड़े आई। ऐसी स्थिति में अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को अधिक प्रासांगिक बनाने के लिए इन्होंने नई अंतर्राष्ट्रीय
अर्थव्यवस्था (NIEO) की स्थापना के लिए उत्तर के देशों से उदार रवैया अपनाने का आग्रह किया और इसके परिणामस्वरूप
उत्तर-दक्षिण सहयोग के प्रयास शुरू हुए। लेकिन सकारात्मक परिणाम न निकलने से विकासशील देशों ने विकसित देशों के
साथ सहयोग की बजाय आपसी सहयोग (दक्षिण-दक्षिण सहयोग) की शुरुआत की। इसके लिए आपसी विचार-विमर्श की
प्रक्रिया शुरू हुई अर्थात् दक्षिण-दक्षिण संवाद का जन्म हुआ। इसके कारण विकासशील देशों में अंतर्निर्भरता के प्रयास तेज
हुए।
“विकासशील देशों को दक्षिण-दक्षिण संवाद की प्रक्रिया द्वारा आत्मनिर्भर बनाने तथा उनकी विकसित देशों पर निर्भरता कम
करने की प्रक्रिया दक्षिण-दक्षिण सहयोग के नाम से जानी जाती है।” दक्षिण-दक्षिण सहयोग के परिणामस्वरूप विकासशील
देशों में एक नए युग का सूत्रपात हुआ। इसके अंतर्गत तकनीकी आदान-प्रदान की प्रक्रिया तेज हुई। अति-पिछड़े हुए राष्ट्र
भी इसका लाभ उठाकर अधिक विकासशील देशों की श्रेणी में शामिल होने लगे। आज दक्षिण-दक्षिण सहयोग अंतर्राष्ट्रीय
सम्बन्धों को प्रभावित करने वाला प्रमुख तत्व है।
दक्षिण दक्षिण सहयोग की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
दक्षिण-दक्षिण सहयोग का आरम्भ 1968 में आयोजित अंकटाड सम्मेलन (नई दिल्ली) से माना जाता है। इसके बाद 1970 में
लुसाका सम्मेलन में भी इसकी आवश्यकता पर बल दिया गया। 1974 में संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा बुलाए गए विशेष
सत्र में नई अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के आव्हान में इसका विशेष जिक्र हुआ। 1976 में गुटनिरपेक्ष सम्मेलन तथा चौथे अंकटाड
सम्मेलन में विकासशील देशों के आपसी व्यापार तथा सामूहिक अन्तर्निर्भरता की आवश्यकता पर बल दिया गया। 1981 में
काराकास सम्मेलन में भी इसका उल्लेख हुआ। इसी वर्ष नई दिल्ली में 44 देशों के सम्मेलन में भी दक्षिण-दक्षिण संवाद और
सहयोग की बात कही गई। इसमें सऊदी अरब, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात जैसे धनी देश बुलाए गए थे ताकि वे अपने गरीब
भाईयों के लिए कुछ सहायता दें। लेकिन इनकी भूमिका अधिक सहयोग की नहीं रही। इसके बाद अक्तूबर, 1982 में न्यूयॉर्क
में G-77 (विकासशील देशें का समूह) के देशों ने आपसी व्यापार में वृद्धि करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
गुटनिरपेक्ष देशों के हरारे सम्मेलन में उत्तर-दक्षिण संवाद की बजाय दक्षिण-दक्षिण संवाद पर अधिक ध्यान दिया गया। इसमें
राबर्ट मुंगावे ने स्पष्ट कहा कि दक्षिण-दक्षिण सहयोग और सामूहिक आत्मनिर्भरता के बिना अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में सुधार नहीं
हो सकता। इसके बाद उत्तरी कोरिया की राजधानी प्योंगयांग में हुई विकासशील देशों के वित्त मंत्रियों की बैठक (1987) में
भी दक्षिण-आयोग का गठन करके विकासशील देशों के आपसी सहयोग को नई दिशा देने का प्रयास किया गया। इसके बाद
1991 में G-15 (विकासशील देशों का समूह) के काराकास सम्मेलन में भी निर्धन राष्ट्रों के आपसी सहयोग को बढ़ाने की
आवश्यकता महसूस की गई। इसके बाद हिमतक्षेस (हिन्द महासागर तटीय क्षेत्रीय सहयोग संगठन) की स्थापना 1997 में हुई।
इसने भी तृतीय विश्व के देशों में आपसी सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया। आज सार्क, आसियान D-8, G-15, G-77 आदि संगठन
भी इस दिशा में कार्य कर रहे हैं और इनके प्रयास निरंतर सफलता की ओर अग्रसर हैं।
दक्षिण-दक्षिण सहयोग के प्रयास
दक्षिण-दक्षिण सहयोग को बढ़ावा देने वाले प्रमुख मंच अंकटाड, ग्रुप-77, NAM, G-15, दक्षिण आयोग, आसियान, सार्क,
हिमतक्षेस तथा D-8 हैं। इनके माध्यम से दक्षिण-दक्षिण संवादों का विकास हुआ और विकासशील देशों के आपसी सहयोग
में वृद्धि हुई। इन संस्थाओं के प्रयासों का वर्णन है-
हुए अधिवेशन से पूर्व विदेशी व्यापार तथा सहायता संबंधी समस्याओं पर प्रशुल्क देशों एवं व्यापार पर हुए सामान्य
समझौते (GATT) के तहत विचार किया जाता था। GATT समझौता विकासशील देशों के हितों के अनुरूप नहीं था।
इसलिए विकासशील देशों की मांग पर आर्थिक सहयोग हेतु नया कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया। इसे अंकटाड कहा जाता
है। इसकी स्थापना संयुक्त राष्ट्र संघ के एक स्थायी अंग के रूप में 30 दिसम्बर, 1964 को हुई। इससे अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक
सम्बन्धों में एक नए अध्याय की शुरुआत हुई। अंकटाड का छठा पेरिस सम्मेलन विकासशील देशों के आपसी सहयोग
का अच्छा प्रयास था।
संसार के 40 विकासशील देशों ने द्विपक्षीय अधीकृत ऋण को माफ करने की अपील की और ऋण मांग व भुगतान सेवाओं
में कटौती के लिए तुरन्त प्रयास करने को कहा गया। इसमें उरुग्वे वाता (GATT) पर असंतोष प्रकट किया। इसमें
विकासशील देशों की बढ़ी हुई संख्या के आधार पर अधिकृत विकास सहयाता में भी वृद्धि करने की बात दोहराई।
नौंवा सम्मेलन मई 1996 में अफ्रीका के मिडरैंड शहर में सम्पन्न हुआ जिसमें 134 देशों के 2000 के लगभग अधिकारियों
ने हिस्सा लिया। इसमें कहा गया कि जो विकासशील देश अधिक विकास को प्राप्त हो चुके हैं, उन्हें कम विकसित देशों
की सहायता करनी चाहिए। इसके दसवें सम्मेलन (2000 में बैंकाक में) में विश्व व्यापार के मुद्दे पर आपसी बातचीत में
गतिरोध उत्पन्न हो गया। इसमें बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली का लाभ अल्पविकसित देशों को उसके साथ जोड़कर पहुंचाने
की बात पर जोर दिया गया। लेकिन विकसित देशों के अड़ियल व्यवहार के कारण इसे अधिक सफलता नहीं मिल सकी।
फिर भी अंकटाड का मंच विकासशील देशों के मध्य आपसी सहयोग बढ़ाने के लिए दक्षिण-दक्षिण संवाद का महत्वपूर्ण
अंग है।
2/3 सदस्य अफ्रीका से थे। इन देशों ने अपने आप को G-77 कहना शुरू कर दिया। इस संगठन की स्थापना U.N.O.
के तत्वाधान में 1964 में ही की गई। इसके अधिकतर सदस्य तृतीय विश्व के देश हैं। अपने समान आर्थिक हितों के कारण
ये देश नई विश्व अर्थव्यवस्था की स्थापना की बात करते हैं। इसकी 1982 की नई दिल्ली में बैठक के अंतर्गत 44
विकासशील राष्ट्रों के सैकड़ों प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इसमें सार्वभौम अर्थव्यवस्था में हो रहे ह्रास पर गहरी चिन्ता
व्यक्त की गई और औद्योगिक देशों के संरक्षणवाद की भी व्यापक निन्दा की गई। इसमें कृषि में आत्म-निर्भरता, विश्व
बैंक (ऊर्जा) में परस्पर सम्बन्ध का निर्माण, तकनीकी सहयोग के लिए बहुराष्ट्रीय वित्तीय सुविधा का निर्माण आदि बातों
पर ध्यान दिया गया। इसमें सामूहिक आत्म-निर्भरता के लिए सहयोग को महत्व दिया गया।
G-77 का एक अंतरंग (Internal) समूह भी है जिसे G-24 के नाम से जाना जाता है। यह विकासशील देशों के विभिन्न
मुद्दों पर बातचीत करता है। इसके वित्त मन्त्रियों की 49वीं बैठक (वॉशिंगटन, 1993) में मुद्रा मामलों में दक्षिण-दक्षिण
सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया गया। यह G-77 के साथ मिलकर ही कार्य करता है। G-77 में 2000 में हुए हवाना
सम्मेलन में विकासशील देशों के विकास मुद्दों को प्राथमिकता देने के लिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की आवश्यकता महसूस
की गई। इसमें अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से प्रार्थना की गई कि उसे ऐसे प्रयास करने चाहिए जिनसे विकासशील देशों के
आर्थिक विकास में आई रुकावटों का निराकरण हो। इन रुकावटों को हटाने के लिए पारस्परिक सांझेदारी व
स्वतन्त्रताओं के आधार पर विकसित तथा विकासशील देशों की वार्ता का आव्हान किया गया। आज G-77 में ऐसे देश
हैं जो साम्राज्यवादी शोषण का शिकार रह चुके हैं। यह संगठन एशिया, अफ्रीका तथा लैटिन अमेरिका के ऐसे देशों की
एकता व सहयोग का प्रतीक है। ये देश समुद्री कानून, शस्त्र नियंत्रण, अणु ऊर्जा, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार आदि मुद्दों पर लिए
जाने वाले अंतर्राष्ट्रीय निर्णयों को विकासशील देशों के हितों की तरफ मोड़ना चाहते हैं ताकि विकासशील देश भी आर्थिक
विकास की धारा में शामिल हो सकें। इस प्रकार कहा जा सकता है कि G-77 दक्षिण-दक्षिण सहयोग को मजबूत बनाने
का अच्छा प्रयास है।
1961 के बैलग्रेड सम्मेलन में हुआ। इसमें अधिकतर नवोदित स्वतन्त्र विकासशील देश शामिल हैं। 1975 में गुटनिरपेक्ष
राष्ट्रों के विदेश मन्त्रियों के लीमा सम्मेलन में विकासशील देशों को आर्थिक तथा सामाजिक विकास के लिए संहति कोष
की स्थापना करने की स्वीकृति हुई। यह दक्षिण-दक्षिण सहयोग का महत्वपूर्ण प्रयास था। 1976 में गुटनिरपेक्ष देशों के
कोलम्बो शिखर सम्मेलन में बहुराष्ट्रीय औषधीय कम्पनियों पर निर्भरता की बजाय परस्पर सहयोग की योजना तैयार
करने पर बल दिया। इसमें कृषि, खाद्यान्न तथा संचार-अवरोधों के मामलों पर भी नए उपाय तलाशने की बात कही
गई। सबसे अधिक महत्वपूर्ण सुझाव तृतीय विश्व बैंक की स्थापना के बारे में दिया गया। इस तरह इस सम्मेलन में
दक्षिण-दक्षिण सहयोग में वृद्धि करने वाले महत्वपूर्ण सूझाव दिए गए। 1986 के हरारे सम्मेलन में भी उत्तर-दक्षिण संवाद
की बजाय दक्षिण-दक्षिण सहयोग पर बल दिया गया। इसमें विकासशील देशों में आपसी सहयोग को बढ़ाने के लिए
एक आयोग गठित करने का निर्णय लिया गया।
बैठक जून, 1987 में भी हुई। इसमें विकासशील देशों के बीच सहयोग को बढ़ाने व गतिशील बनाने के लिए नए ढंग प्रयोग
करने पर जोर दिया गया। इसमें विकासशील राष्ट्रों की सामूहिक आत्म-निर्भरता की भावना को सुदृढ़ बनाने पर बल
दिया गया। सितम्बर 1989 के बेलग्रेड सम्मेलन में भारत के प्रधानमन्त्री श्री राजीव गांधी ने उत्तर-दक्षिण सहयोग में वृद्धि
करने के लिए संस्थागत ढांचे मे बदलाव लाने की बात कही। इस सम्मेलन में आपसी पूंजी निवेश प्रवाह तथा आपस
में प्राथमिकता के आधार पर तकनीकी हस्तांतरण को मुख्य मुद्दा बताया गया। इसके बाद 1992 व 1995 में गुटनिरपेक्ष
देशों के विदेश मंत्रालय की 1996.97 की रिपार्ट में कहा गया कि कुछ के पास पर्याप्त धन राशि है तथा कुछ के पास
अच्छी तकनीक है। इसलिए उनके लिए यही हितकर होगा कि वे उत्तर के देशों की तरफ भागने की अपेक्षा आपस में
ही पूंजी व तकनीक का आदान-प्रदान करें। इससे दक्षिण-दक्षिण सहयोग को बढ़ावा मिलेगा। सम्मेलन में आपसी सहयोग
बढाने पर बल दिया गया और विकसित देशों पर उनकी निर्भरता कम होगी। इस प्रकार गुट-निरपेक्ष आन्दोलन ने भी
दक्षिण-दक्षिण सहयोग को बढ़ाने की दिशा में एक सुदृढ़ मंच का काम किया।
लिए एक आन्दोलन का रूप धारण करता जा रहा है। इसका पहला शिखर सम्मेलन 1 जून, 1990 को कुआलालम्पुर
में हुआ। इसका उद्देश्य दक्षिण-दक्षिण सहयोग की कार्यवाही में गति लाना था। इस सम्मेलन में चिकित्सा और सुगन्धित
पौधों के लिए एक जिंस बैंक की स्थापना तथा सौर ऊर्जा, सिंचाई पम्प, छोटे रेफ्रीजरेटर, कोर्रस और डायर्स के वास्ते
सौर ऊर्जा की कार्यप्रणाली का विकास-इन दो परियोजनाओं पर आपसी सहयोग बढ़ाने पर बल दिया गया। G-15 के
दूसरे शिखर सम्मेलन (काराकास, 1991) में गरीब देशों को अमीर देशों के विरुद्ध एकजुट रहने का आव्हान किया। इसमें
इस बात पर बल दिया गया कि वे ऐसी आर्थिक नीतियां बनाए कि उन्हें अपनी अर्थव्यवस्था का विकास करने के अवसर
प्राप्त हो सकें। इसमें बाहरी ऋणों के विषय में सह-उत्तरदायित्व के सिद्धान्त के आधार पर ठोस उपाय करने पर भी
जोर दिया गया। इसके बाद G-15 के डकार सम्मेलन (1992) में भी नई अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की स्थापना के मुद्दे
पर सामूहिक कार्यवाही पर बल दिया गया।
परियोजनाओं को इस सम्मेलन में शामिल किया गया। भारत ने G-15 को और अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए अफ्रीका
में एक पेशेवर प्रशिक्षण संस्थान स्थापित करने का भी आग्रह किया गया। इसके बाद G-15 का चौथा शिखर सम्मेलन
दिसम्बर, 1993 में नई दिल्ली में हुआ। इसमें अधिकतर शासनाध्यक्ष शामिल नहीं हो सके। इसलिए यह अधिक सफल
नहीं रहा। इसके पश्चात G-15 के अर्जेन्टीना सम्मेलन (1995) में विकासशील देशों के बीच व्यापार और निवेश के
उदारीकरण, सरलीकरण और संवर्द्धन तथा तकनीक के हस्तांतरण का मार्ग प्रशस्त हुआ।
(1996) में भी व्यापारिक मुद्दे ही प्रमुख रहे। इसमें विकसित देशों के श्रम मानकों का विरोध किया गया। G-15 के इस
सम्मेलन की संयुक्त विज्ञप्ति में यह कहा गया कि WTO को विकसित देशों के दबाव में नहीं आना चाहिए। भारत ने
कहा कि श्रम मुद्दे व्यापार से संबंधित न होने के कारण विश्व व्यापार संगठन से बाहर ही रखे जाने चाहिए। विकासशील
देशों के समूह G-15 के सातवें सम्मेलन (कुआलालम्पुर, 1997) में 16वें सदस्य के रूप में केन्या को प्रवेश दिया गया।
इस सम्मेलन में अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक विकास, विकासशील देशों की चिन्ताओं के मसले और उनसे निपटने की नीतियों
पर विचार किया गया। इसमें विशेष रूप से निवेश और तकनीकी सहयोग का विस्तार करके दक्षिण-दक्षिण सहयोग
को मजबूत बनाने पर बल दिया गया।
परिवर्तनों की मांग उठाई गई। इस तरह G-15 के सम्मेलनों द्वारा विकासशील देशों में आपसी सहयोग व समन्वय की
भावना का विकास किया गया है। अपने सीमित समय में ही G-15 एक शक्तिशाली कार्यक्रम के रूप में उभरा है। यह
निरन्तर दक्षिण-दक्षिण संवाद को आगे बढ़ाते हुए विकासशील देशों में आपसी तकनीकी सहयोग व पूंजी निवेश द्वारा
आत्मनिर्भरता की स्थापना के प्रयास करने को कृतसंकल्प है।
में वृद्धि करने के लिए दक्षिण आयोग की स्थापना का प्रस्ताव पास हुआ। इसके बाद 2 अक्तूबर, 1987 को इस अंतर्राष्ट्रीय
संगठन ने जेनेवा में अपना कार्यालय खोला। तंजानिया को इस 28 सदस्यीय आयोग का अध्यक्ष तथा भारत को महासचिव
का पद प्राप्त हुआ। आयोग के उद्घाटन पर इसके अध्यक्ष न्येरे ने कहा कि “अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं और ऋणदाता
देशों द्वारा लागू की गई नीतियों से विकासशील देशों को निराशा ही हुई है।” इसकी दूसरी बैठक मार्च, 1988 को
कुआलालम्पुर में हुई। इस बैठक में सदस्यों ने आत्मनिर्भरता के लिए दक्षिण-दक्षिण सहयोग तथा उत्तर दक्षिण सम्बन्धों
की समस्याओं पर एकजुट होने का वचन लिया। इसकी अध्यक्षता भी तंजानिया के भूतपूर्व राष्ट्रपति जूलियस न्येरेरे ने
की। इस तरह यह आयोग दक्षिण-दक्षिण सहयोग को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण करता आ रहा है।
लाओस, कम्बोडिया, वियतनाम, ब्रनेई, थाईलैंड, सिंगापुर, फिलीपींस, मलेशिया तथा इंडोनेशिया शामिल है। इसका उद्देश्य
दक्षिण-पूर्वी एशिया में आर्थिक, सांस्कृतिक तथा सामाजिक विकास को बढ़ावा देना है। यह कृषि, व्यापार तथा उद्योग
के क्षेत्र में साझे मामलों पर परस्पर सहयोग को बढ़ावा देता है। इसका लक्ष्य 2003 तक इस क्षेत्र को मुफ्त व्यापार क्षेत्र
बनाना है। 1998 में इसकी पांचवीं बैठक मनीला में हुई। इसमें पूंजी निवेश, व्यापारिक, सांस्कृतिक तथा विज्ञान एवं
तकनीकी के क्षेत्रों में सहयोग बनाए रखने तथा बढ़ाने की नीति का अनुसरण किए जाने का समर्थन किया। यह संगठन
निरंतर प्रगति की राह पर कार्य करते हुए दक्षिण पूर्वी क्षेत्र में आर्थिक विकास के लिए सहयोग करने की दिशा में कार्यरत
है।
भारत, नेपाल, पाकिस्तान, भूटान, बंगलादेश, श्रीलंका तथा मालद्वीप हैं। इसका मुख्य उद्देश्य दक्षिण एशिया में विभिन्न
क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा देना है। दक्षिणी एशिया व्यापार समझौता ‘साप्टा’ (SAPTA) स्वीकार करने के बाद दक्षिण
एशिया में आर्थिक सहयोग के नये युग की शुरुअबात हुई। 1987 के काठमाण्डू शिखर सम्मेलन में आर्थिक क्षेत्रों में सहयोग
को बढ़ाने पर विचार हुआ। इसमें दक्षिण-एशिया को परमाणु विहीन क्षेत्र घोषित करने पर विचार हुआ। इसके 1991
में हुए कोलम्बो सम्मेलन में तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में आपसी सहयोग को उचित माना गया। इसका 11वां शिखर सम्मेलन
जनवरी, 2002 को नेपाल की राजधानी काठमाण्डू में सम्पन्न हुआ। इसमें व्यापार, वित्त तथा निवेश में आपसी सहयोग
बढ़ाने पर जोर दिया गया ताकि दक्षिण एशिया अर्थव्यवस्था के एकीकरण की ओर अग्रसर हो सके। इस तरह लगातार
यह संगठन दक्षिण एशिया के देशों में आपसी सहयोग की प्रवृति का विकास करने की दिशा में कार्य कर रहा है।
8. हिमतक्षेस (IORARC) – इसकी स्थापना मार्च, 1987 में हुई। इसका पूरा नाम – हिन्द महासागर तटीय क्षेत्रीय सहयोग
संगठन। इसमें हिन्द महासागर के तट पर बसे हुए देश – इण्डोनेशिया, भारत, आस्टे्रलिया, मोजाम्बिक, मलेशिया, श्रीलंका,
सिंगापुर, केनिया, मॉरीशश आदि देश शामिल हैं। इसका उद्देश्य इन देशों में आपसी सहयोग को बढ़ावा देना है और
आर्थिक एकजुटता के आधार पर हिन्द महासागर के बाजार का निर्माण करना है। यह संगठन क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा
देने की दिशा में सहयोग की भावना का विकास कर रहा है।
देशों में आपसी सहयोग के आधार पर अपनी अर्थव्यवस्थाओं को सुदृढ़ बनाने के लिए कार्य करता है।
इस तरह दक्षिण-दक्षिण संवाद को मजबूत बनाकर दक्षिण के देशों को एकजुट किया जा सकता है। इसी पर इन देशों की
आर्थिक आत्मनिर्भरता का विकास निर्भर करता है। विकासशील देशों में पर्याप्त मात्रा में संसाधन हैं। कुछ देशों के पास तो
पूंजी है और कुछ के पास तकनीकी ज्ञान है। इन देशों को विकसित देशों से मदद लेनी की बजाय आपस में ही तकनीकी ज्ञान
व पूंजी का हस्तांतरण करना चाहिए। लेकिन इसके रास्ते में सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि इन देशों में आपसी मतभेद हैं।
ये आपसी सहयोग की बजाय विकसित राष्ट्रों की तरह अधिक झुकाव रखते हैं। आज एशिया के तेल निर्यातक देश चाहें तो
वे गरीब विकासशील देशों की आर्थिक सहायता कर सकते हैं, लेकिन समन्वित दृष्टिकोण के अभाव में वे ऐसा करने में अयोग्य
हैं। यदि विकासशील देशों को आत्मनिर्भर बनना है तो पारस्परिक मतभेदों को भुलाकर, उन्हें एक मंच पर आना ही होगा।
इसके बिना उनका कल्याण सम्भव नहीं है। यदि वे एकजुट होकर उत्तर के देशों पर अपना दबाव बनाने में सफल होते हैं
तो अवश्य ही वे नई अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के निर्माण के लिए विकसित राष्ट्रों को मना सकेंगे और वर्तमान अन्यायपूर्ण और
असमान आर्थिक सम्बन्धों का अंत करके दक्षिण के देशों में नए युग की शुरुआत करेंगे।