अनुक्रम
आर्थिक विकास एवं आर्थिक वृद्धि का आशय, आर्थिक विकास तथा आर्थिक वृद्धि में अंतर और आर्थिक विकास की
प्रकृति को जान सकेगें।
आर्थिक वृद्धि एवं विकास का विश्लेषण
विकास का अर्थशास्त्र अल्पविकसित देशों के आर्थिक विकास की समस्याओं से सम्बन्ध
रखता है। यद्यपि आर्थिक विकास के अध्ययन ने वाणिज्यवादियों तथा एड्म स्मिथ से लेकर
मार्क्स और केन्ज तक सभी अर्थशास्त्रियों का ध्यान आकर्षित किया था, फिर भी, उनकी
दिलचस्पी प्रमुख रूप से ऐसी समस्याओं में रही जिनकी प्रकृति विशेषतया स्थैतिक थी और
जो अधिकतर सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाओं के पश्चिम यूरोपीय ढांचे से संबंध रखती
थी। वर्तमान शताब्दी के पांचवे दशक में और विशेष रूप से दूसरे विश्व युद्ध के बाद ही
अर्थशास्त्रियों ने अल्पविकसित देशों की समस्याओं के विश्लेषण की ओर ध्यान देना शुरू
किया।
द्वारा और भी बढ़ी, जो दूसरे विश्व युद्ध के बाद एशिया तथा अफ्रीका के राष्ट्रों में फैल गई
थी। इन देशों के नेता शीघ्रता से आर्थिक विकास को बढ़ावा देना चाहते थे और साथ ही
विकसित राष्ट्र भी यह महसूस करने लगे थे कि ‘‘किसी एक स्थान की दरिद्रता प्रत्येक
सम्पन्न स्थानों की समृद्धि के लिए खतरा है।’’ इन दोनों बातों से अर्थशास्त्रियों की रूचि
इस विषय में और सजग हुई। इस सन्दर्भ में मायर तथा बाल्डविन ने कहा है कि ‘राष्ट्रों के
धन के अध्ययन की अपेक्षा राष्ट्रों की दरिद्रता के अध्ययन की अधिक आवश्यकता है।’
क्रम में अल्पविकसित देशों की विशाल दरिद्रता को दूर करने में धनी राष्ट्रों की रूचि
किसी मानवहितवादी उद्देश्य को लेकर नहीं जागृत हुई है बल्कि धनी विकसित देशों द्वारा
इन गरीब राट्रों को अन्य गरीब देशों के मुकाबले में अधिक सहायता देने का वचन देकर
प्रत्येक दषा में अल्पविकसित देशों का समर्थन तथा वफादारी प्राप्त करने का प्रयत्न करता
है। आज के इस प्रगतिशील युग की मुख्य समस्या आर्थिक विकास की समस्या है।
आर्थिक जगत् में, आर्थिक विकास का विचार एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है तथा अधिकांश
अर्थशास्त्रियों द्वारा किये जाने वाले चिन्तन का यह एक केन्द्र बिन्दु बना हुआ है। आर्थिक
विकास जैसा कि इस शब्द से स्पष्ट होता है, का अर्थ है- ‘अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में
उत्पादकता के स्तर को बढ़ाना।’
में वृद्धि करके, निर्धनता को दूर करना तथा सामान्य जीवन स्तर में सुधार करना है।
अपनाया है। अर्थशास्त्रियों के एक समूह नें आर्थिक विकास का अर्थ, कुल राष्ट्रीय
वास्तविक आय में वृद्धि करना बताया है, तो दूसरी विचारधारा के लोगों ने प्रति-व्यक्ति
वास्तविक आय में की जाने वाली वृद्धि को आर्थिक विकास की संज्ञा दी है।
प्रथम सम्प्रदाय में प्रो0 साइमन कुजनेट्स, मायर एवं बाल्डविन तथा ए0जे0 यंगसन, आदि को सम्मिलित किया जाता है।
द्वितीय सम्प्रदाय में प्रति व्यक्ति की आय में वृद्धि को, आर्थिक विकास मानने वाले
अर्थशास्त्रियों में डा0 बैंजमीन, हिगीन्स, हार्वे लिवेस्टीन, डब्लू0 आर्थर लुईस, प्रो0
विलियमसन तथा जैकब बॉइनर आदि प्रमुख रूप से हेै।
आर्थिक विकास की परिभाषा
मायर एवं वाल्डविन के मतानुसार :-’आर्थिक विकास एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें दीर्घकाल में किसी अर्थव्यवस्था की वास्तविक राष्ट्रीय आय में वृद्धि होती है।’
प्रो0 लुईस के शब्दों में :-’आर्थिक विकास का अर्थ, प्रति-व्यक्ति उत्पादन में वृद्धि से लगाया जाता है।’
प्रो0 यंगसन के विचारानुसार :-’आर्थिक प्रगति से आशय किसी समाज से सम्बन्धित आर्थिक उद्देश्यों को प्राप्त करने की शक्ति में वृद्धि करना है।’
प्रो0 डी0 ब्राइट सिंह की दृष्टि में :- ‘आर्थिक वृद्धि से अभिप्राय, एक देश के समाज में होने वाले उस परिवर्तन से लगाया जाता है जो अल्प-विकसित स्तर से उच्च आर्थिक उपलब्धियों की ओर अग्रसर होता है।’
विकास में वास्तविक राष्ट्रीय आय में वृद्धि करने की बात कही है वहीं विलियमसन तथा
लुईस द्वारा प्रति व्यक्ति उत्पादन अथवा आय में वृद्धि का समर्थन किया गया है लेकिन
उपर वर्णित सभी परिभाषाओं में तीन महत्वपूर्ण बातें समान रूप से परिलक्षित होती हैं :-
विशेष प्रकार की शक्तियों के कार्यशील रहने के रूप में, लगाया जाता है। इन शक्तियों के
एक अवधि तक निरन्तर कार्यशील रहने के कारण आर्थिक घटकों में सदैव परिवर्तन होते
रहते हैं। यद्यपि इस प्रक्रिया के फलस्वरूप किसी अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में परिवर्तन
तो होता है किन्तु इस प्रक्रिया का सामान्य परिणाम, राष्ट्रीय आय में वृद्धि होना है।
से है। ध्यान रहे, वास्तविक राष्ट्रीय आय की वृद्धि से अभिप्राय किसी राष्ट्र द्वारा एक
निश्चित काल में उत्पादित समस्त वस्तुओं एवं सेवाओं के विशुद्ध मूल्य में होने वाली वृद्धि
से लगाया जाता है, न कि मौद्रिक आय की वृद्धि से। चूंकि आर्थिक विकास को मापने के
लिये राष्ट्रीय आय को ही आधार माना जाता है इसलिये किसी देश का आर्थिक विकास
तभी माना जाएगा जब उस देश में ‘वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन निरन्तर बढ़ता रहे।
कुल राष्ट्रीय उत्पादन में से मूल्य ह्रास अथवा मूल्य स्तर में हुए परिवर्तनों को समायोजित
करने पर विशुद्ध राष्ट्रीय उत्पादन प्राप्त हो जाता है।
दीर्घकाल से होता है। दूसरे शब्दों में, विकास की यह प्रक्रिया एक या दो वर्षों में होने वाले
अल्पकालीन परिवर्तनों से सम्बन्धित नहीं होती बल्कि 15 से 20 वर्षों के बीच दीर्घकालीन
परिवर्तनों से सम्बन्धित होती है। इसलिये अगर किसी अर्थ व्यवस्था में किन्हीं अस्थायी
कारणों से देश की आर्थिक स्थिति में सुधार हो जाता है, जैसे अच्छी फसल अथवा
अप्रत्याशित निर्यात होना, तो इसे आर्थिक विकास नहीं समझना चाहिए, क्योंकि आर्थिक
विकास विशेष घटकों से प्रभावित होने वाला विकास है।
आर्थिक विकास तथा आर्थिक वृद्धि में अंतर
अल्पविकसित देशों की समस्यायें उपयोग में न लाये गये साधानों के विकास से सम्बन्ध
रखती है, भले ही उनके उपभोग भली-भांति ज्ञात न हों, जबकि उन्नत देशों की समस्यायें
वृद्धि से सम्बन्धित रहती है, जिनके बहुत सारे साधन पहले से ज्ञात और किसी सीमा तक
विकसित रहते हैं। प्राय: आर्थिक विकास तथा आर्थिक वृद्धि में कोई अंतर नहीं किया
जाता है किन्तु प्रो0 शुम्पीटर तथा श्रीमती उर्सला हिक्स ने इन दोनों शब्दों में भेद करने का
प्रयास किया है। आर्थिक वृद्धि एक स्वाभाविक एवं सामान्य प्रक्रिया है जिसके लिए समाज
को कोई विशेष प्रयत्न नहीं करना पडता है, इसके विपरीत आर्थिक विकास के लिये विशेष
प्रयत्नों का किया जाना जरूरी है अर्थात आर्थिक विकास की प्रक्रिया के अंतर्गत
अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक परिवर्तनों का होना आवश्यक है ताकि विद्यमान आर्थिक
व्यवस्था के पूरे स्वरूप को परिवर्तित किया जा सके।
स्थिर अवस्था में होने वाला एक ऐसा असतत एवं स्वत: परिवर्तन है जो पहले से स्थापित
संतुलन की अवस्था (अर्थात विद्यमान स्थिति) को हमेशा के लिये बदल देता है, जबकि
इसके विपरीत ‘वृद्धि’ दीर्घकाल में घटित होने वाला एक क्रमिक तथा स्थिर गति वाला
परिवर्तन है जो बचत और जनसंख्या की दर में होने वाली सामान्य वृद्धि का परिणाम होता
है।’’
इस प्रकार जो उन्नति धीरे-धीरे आर्थिक व सामाजिक तत्वों में होने वाले परितर्वतनों के
कारण होती है। उसे आर्थिक वृद्धि कहते हैं, परन्तु जब अर्थव्यवस्था में उन्नति की प्रबल
इच्छा के तदन्तर, कुछ विशेष प्रयत्नों व क्रियाओं द्वारा क्रान्तिकारी परिवर्तन लाये जाते हैं
तो उसके फलस्वरूप होने वाली उन्नति को, आर्थिक विकास कहा जाता है। इस सन्दर्भ में
यह बात ध्यान योग्य है कि उन्नति के यह दोनों स्वरूप दीर्घकालीन तथ्य हैं। प्रो0 शुम्पीटर
ने आर्थिक विकास को आर्थिक वृद्धि की अपेक्षा अधिक उपयुक्त माना है।
इस सम्बन्ध में श्रीमती उर्सला हिक्स का कहना है कि आर्थिक वृद्धि शब्द का
प्रयोग विकसित देशों के लिये किया जाता है क्योंकि इन देशों में उत्पादन के साधन पहले
से ही ज्ञात एवं विकसित होते हैं। इसके विपरीत ‘विकास’ का सम्बन्ध अल्प-विकसित देशों
से है जहां अशोषित व अर्द्ध शोषित साधनों के पूर्ण उपयोग व विकास की सम्भावनाएं
विद्यमान होती हैं। इसी प्रकार प्रो0 बोन ने भी आर्थिक विकास तथा आर्थिक वृद्धि में अन्तर
स्थापित किया है। उनके मतानुसार ‘विकास के लिए विशेष निर्देशन, नियंत्रण, प्रयास व
मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है और यह बात अल्प विकसित देशों के सम्बन्ध में ही ठीक बैठती है।
आर्थिक विकास तथा आर्थिक वृद्धि में अंतर
| क्र0सं0 | आर्थिक वृद्धि | आर्थिक विकास |
|---|---|---|
| 1. | स्वाभाविक क्रमिक व स्थिर गति वाला परिवर्तन |
प्रेरित एवं असंगत प्रकृति का परिवर्तन |
| 2. | केवल उत्पादन में वृद्धि का होना | उत्पादन-वृद्धि+प्राविधिक एवं संस्थागत परिवर्तनों का होना। |
| 3. | आर्थिक व संस्थागत घटकों में परिवर्तन होने पर स्वत: ही घटित होती रहती है |
विकास के लिए संरचनात्मक परिवर्तनों का किया जाना आवश्यक है। |
| 4. | वर्तमान साम्य की अवस्था में कोई आधारभूत परिवर्तन नहीं होता। |
नई शक्तियों से नये मूल्यों का निर्माण किया जाता है तथा प्रचलित साम्य में सुधार लाये जाते हैं। |
| 5. | आर्थिक उन्नति नियमित घटनाओं का परिणाम है। |
आर्थिक विकास उन्नति इच्छा, विशेष निर्देशन व सृजनात्मक शक्तियों का परिणाम है। |
| 6. | यह उन्नत देशों की समस्याओं का समाधान है। |
यह अल्प विकसित देशों की समस्याओं को हल करनें का एक नारा है। |
| 7. | आर्थिक वृद्धि स्थैतिक साम्य की स्थिति है। |
आर्थिक विकास गतिशील साम्य का एक रूप है। |
इसके विपरीत आर्थिक वृद्धि का स्वभाव स्वेच्छानुसार होता है जो कि एक
उन्नत स्वतंत्र उपक्रम वाली अर्थव्यवस्था का लक्षण है।’ प्रो0 किण्डले बर्जर के मतानुसार
‘आर्थिक वृद्धि का अर्थ केवल उत्पादन वृद्धि से है जबकि आर्थिक विकास का अर्थ है
उत्पादन वृद्धि के साथ प्राविधिक एवं संस्थागत परिवर्तन का होना है।
उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि आर्थिक वृद्धि की दशा में आर्थिक जीवन
प्रत्येक वर्ष उन्हीं आर्थिक धाराओं से होकर इस प्रकार बहता चला जाता है जिस प्रकार
एक प्राणी की धमनियों में रक्त का संचालन होता है। दूसरे शब्दों में आर्थिक वृद्धि के
अंतर्गत ज्यादा नवीनता का सृजन नहीं होता है बल्कि जो कुछ भी उन्नति होती है वह
परम्परागत एवं नियमित घटनाओं का परिणाम होती है। इसके विपरीत आर्थिक विकास में
नई शक्तियों को जन्म दिया जाता है और प्रचलित संतुलन में निरन्तर सुधार लाने के
प्रयत्न किये जाते हैं आर्थिक वृद्धि एवं आर्थिक विकास में पाये जाने वाले प्रमुख अन्तरों की
विवेचना है –
प्रो0 एलन बरेरी ने आर्थिक वृद्धि तथा प्रगति में अंतर करने का प्रयत्न किया है। उनके
मतानुसार ‘प्रगति’ से अभिप्राय प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि से है। जबकि ‘आर्थिक वृद्धि’ का
अर्थ, जनसंख्या एवं कुल वास्तविक आय (राष्ट्रीय तथा प्रति व्यक्ति आय) दोनों में होने
वाली बढ़ोत्तरी से लगाया जाता है। आर्थिक प्रगति, आर्थिक ‘वृद्धि’ के बिना भी सम्भव हो
सकती है अर्थात जब ( i ) कुल आय के स्थिर रहने पर जनसंख्या में कमी हो जाये
अथवा ( i i ) कुल आय में कमी होने पर जनसंख्या में अपेक्षाकृत और अधिक कमी
हो जाये तो यह ‘प्रगति’ बिना ‘वृद्धि’ के मानी जायेगी। ठीक इसी प्रकार आर्थिक वृद्धि
आर्थिक प्रगति के बिना भी संभव हो सकती है।
प्रो0 बरेरी महोदय द्वारा आर्थिक वृद्धि के स्वरूप बताये गये हैं-
- प्रगतिशील वृद्धि :- जब कुल आय में वृद्धि जनसंख्या मे होने वाली वृद्धि से अधिक हो।
अधोगामी वृद्धि:-जब कुल आय में वृद्धि की अपेक्षा जनसंख्या मे होने वाली वृद्धि अधिक
हो। - स्थिर उन्नति :- जब कुल आय में वृद्धि व जनसंख्या में होने वाली वृद्धि दोनों समान दर से
बढ़ रही हों।
उपयुर्क्त विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि यद्यपि आर्थिक वृद्धि तथा
आर्थिक विकास में भेद करना सम्भव है किन्तु इस प्रकार का भेद व्यावहारिक दृष्टि से
अधिक उपयोगी नहीं कहा जा सकता। अत: ‘विकास’ एवं वृद्धि शब्द को पर्यायवाची मानते
हुए इन्हें एक ही अर्थ में प्रयोग किया जाता है। प्रो0 पॉल ए बरन का भी यह मत है।
आर्थिक विकास की प्रकृति
आर्थिक विकास का अर्थ व परिभाषा जान लेने के बाद एक स्वाभाविक प्रश्न यह उठता है
कि आर्थिक विकास की प्रकृति क्या है ? चूंकि आर्थिक विकास का स्वभाव अर्थशास्त्र के
स्थैतिक एवं गत्यात्मक स्वरूपों पर आधारित है इसलिये यह अधिक उपयुक्त होगा कि
पहले संक्षेप में इन दोनों शब्दों का अर्थ स्पष्ट कर लिया जाये।
शब्द का अर्थ है ‘गतिमान’ होना। इसी प्रकार भौतिक शास्त्र में भी स्थैतिक शब्द से
अभिप्राय ‘विश्राम की अवस्था’ से होता है। इसके विपरीत अर्थशास्त्र में स्थैतिक शब्द का
आशय गतिहीन अवस्था से नहीं होता बल्कि उस अवस्था से होता है जिसमें परिवर्तन तो
हों परन्तु इन परिवर्तनों की गति अत्यन्त कम हो।
प्रो0 हैराड ने स्थैतिक शब्द की परिभाषा इस प्रकार दी है- ‘एक स्थैतिक संतुलन कर अर्थ,
विश्राम की अवस्था से नहीं होता बल्कि उस अवस्था से होता है जिसमें कार्य निरन्तर रूप
से दिन-प्रतिदिन अथवा वर्ष-प्रति वर्ष हो रहा हो परन्तु उसमें वृद्धि अथवा कमी न हो रही
हो। इस सक्रिय अपरिवर्तनीय प्रक्रिया को ‘स्थैतिक अर्थशास्त्र‘ कहा जाता है।’
उपर्युक्त परिभाषा से स्पष्ट है कि स्थैतिक अवस्था कोई विश्राम या गतिहीनता की अवस्था
नहीं है। इसमें क्षण प्रति क्षण परिवर्तन होते हैं। यह परिवर्तन इतनी कम गति से होते हैं
कि सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन दृष्टिगोचर नहीं हो पाता। स्थैतिक
अवस्था ‘गति मे स्थिरता’ की द्योतक है।
छांव तथा जन्म के बाद मृत्यु होना अवश्यम्भावी है। सत्यता तो यह है कि वास्तविक जीवन
में पूर्ण स्थैतिक अवस्था कहीं देखने को नहीं मिलती है। परिवर्तनशीलता की इस प्रवृत्ति
को ही गत्यात्मक अर्थशास्त्र कहते हैं।
जाने वाले मूल्यों मे परिवर्तन की दरों से होता है।’ आपको स्पष्ट करना है कि प्रो0 जे0बी0 क्लार्क ने गत्यात्मक अर्थशास्त्र के पांच प्रमुख
लक्षणों की ओर संकेत किया है। जो कि है:-
- जनसंख्या में वृद्धि
- पूंजी व पूंजी निर्माण में वृद्धि,
- उत्पादन विधियों में सुधार,
- औद्योगिक संगठनों के स्वरूपों में परिवर्तन
- उपभोक्ता की आवश्यकताओं में वृद्धि।
3. आर्थिक विकास की प्रकृति मूलत: गत्यात्मक है –
स्थैतिक एवं गत्यात्मक अर्थशास्त्र के उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि आर्थिक विकास
मूलत: गत्यात्मक प्रकृति का है। जिस प्रकार गत्यात्मक अवस्था में पुराने साम्य टूट कर नये
साम्य निर्मित होते रहते हैं ठीक उसी प्रकार विकास की पुरानी अवस्थाओं में परिवर्तन होने
पर नई अवस्थाओं का निर्माण होता रहता है। आर्थिक विकास का उद्देश्य जहां एक ओर
आर्थिक प्रगति की विभिन्न स्थितियों का अध्ययन करना है वहीं दूसरी ओर दीर्घकाल में
आर्थिक गति-विधियों का विश्लेषण करना भी है। ध्यान रहे आर्थिक विकास का मुख्य
उद्देश्य अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में उत्पादकता के ऊंचे स्तर को प्राप्त करना होता है
जिसके लिये ‘विकास प्रक्रिया’ अर्थव्यवस्था को प्रगति के एक निचले साम्य से ऊपर
उठाकर किसी अन्य उच्चस्तरीय साम्य के धरातल पर लाकर खड़ा कर देती है और यह
आवश्यक भी है, अन्यथा आर्थिक विकास एक महत्वहीन विचारधारा बनकर रह जायेगा।
यहां यह लिखना आवश्यक होगा कि प्रो0 शुम्पीटर द्वारा वर्णित ‘आर्थिक वृद्धि की प्रकृति भी
मूलरूप से गत्यात्मक ही है, परन्तु इसका झुकाव स्थैतिकता की ओर अधिक होता है।
इसका कारण यह है कि आर्थिक वृद्धि के तद्न्तर होने वाले विकासमयी परिवर्तन बहुत
धीमी गति से होते हैं, और इनमें किसी भी प्रकार की नवीनता का सृजन नहीं हो पाता है।