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समाजशास्त्र एक महत्वपूर्ण सामाजिक विज्ञान है क्योंकि यह लोगों के जीवन से सीधा सरोकार रखता है। सभी मनुष्य सामाजिक प्राणी हैं. सामाजिक संबंधों के बिना न बच्चों का ठीक से विकास हो पाता, न वयस्कों को दिशा मिल पाती। मानव अस्तित्व के लिए समाज का होना जरूरी है। इस प्रकार समाजशास्त्र समाज का सामान्य विज्ञान है।
समाजशास्त्र की उत्पत्ति
उन्नीसवीं शताब्दी में समाजशास्त्र के विकास में ऑगस्ट काॅम्ट, कार्ल मार्क्स तथा हर्बर्ट स्पेन्सर का योगदान महत्त्वपूर्ण है। इस समय समाजशास्त्री समाज के वैज्ञानिक विश्लेषण के प्रति जागरूक थे। इस दिशा में काॅम्ट ने ‘वैज्ञानिक दर्शन का सिद्धांत’ प्रतिपादित किया। मार्क्स ने इसी समय ‘वैज्ञानिक समाजवाद’ नामक सिद्धांत प्रतिपादित किया। इस समय समाजशास्त्र पर एक ओर तो भौतिक विज्ञानों का एवं दूसरी ओर प्राणी-विज्ञानों का प्रभाव पड़ा। इसी समय सामाजिक उद्विकास, उन्नति एवं प्रगति के सिद्धांतों तथा सोपानों का पता लगाने का प्रयत्न किया गया। तीन विचारकों – काॅम्ट, मार्क्स तथा स्पेन्सर ने सामाजिक उद्विकास पर प्रकाश डाला। कार्ल मार्क्स ने आदिम साम्यवाद के स्तर से शुरू करके साम्यवाद तक की सामाजिक स्थिति का विश्लेषण ‘इतिहास की भौतिक व्याख्या’ के सिद्धांत के आधर पर किया। स्पेन्सर ने बताया कि प्राणी-जगत के समान ही समाज का भी उद्विकास हुआ है।
समाजशास्त्र का अर्थ
समाजशास्त्र की परिभाषा
किया गया है।
को एक इकाई मानकर समग्र रूप से इसका अध्ययन करता है।
गिडिंग्स के अनुसार, ‘‘समाजशास्त्र समाज का वैज्ञानिक अध्ययन है।’’
गिन्सबर्ग, सिमेल, हॉब्हाउस तथा ग्रीन आदि समाजशास्त्रियों ने सामाजिक सम्बन्धों की अपेक्षा
सामाजिक अन्तर्क्रियाओं को अधिक महत्वपूर्ण माना है।
संख्या इतनी अधिक होती है कि उनका व्यवस्थित अध्ययन करना कठिन होता है।
हमें समाजशास्त्र की प्रकृति को स्पष्ट रूप से समझना है तो हमें समाजशास्त्र को ‘‘सामाजिक अन्तर्क्रियाओं का अध्ययन करने वाला विज्ञान’’ के रूप में परिभाषित करना होगा।
हेनरी जॉन्सन के अनुसार समाजशास्त्र सामाजिक समूहोंं का अध्ययन है। जान्सन का मानना है
कि समाजशास्त्र विभिन्न सामाजिक समूहों के संगठन, ढ़ाँचे तथा इन्हें बनाने वाले और इनमें
परिवर्तन लाने वाले प्रक्रियाओं तथा समूहों के पारस्पिरिक सम्बन्धों का अध्ययन है।
विचारक मैक्स वेबर के अनुसार सामाजिक सम्बन्धों को केवल सामाजिक अन्तर्क्रियाओं के आधार
पर ही समझना पर्याप्त नहीं हैं। चूंकि समाजशास्त्र अन्तर्क्रियाओं का निर्माण सामाजिक क्रियाओं
से होता है अत: इनको कर्ता के दृष्टिकोण से ही समझना चाहिए।
करता है।’’
समाजशास्त्र की प्रमुख विशेषताएं
सामाजिक विज्ञान विषय बन चुका है। अब इसे इतिहास, राजनैतिक विज्ञान अथवा
दर्शनशास्त्र की तरह ही किसी सामाजिक विज्ञान की शाखा के रूप में नहीं जाना
जाता है। एक स्वतंत्र सामाजिक विज्ञान के रूप में समाजशास्त्र का अपना अध्ययन
क्षेत्र, सीमा तथा विधि विकसित हुई है।
रसायन विज्ञान या जीव विज्ञान से बिलकुल अलग एक स्वतंत्र सामाजिक विज्ञान है।
इसके अंतर्गत मनुष्य, उसका सामाजिक व्यवहार, सामाजिक क्रिया-कलाप तथा पूरा
सामाजिक जीवन आता है।
- समाजशास्त्र सामाजिक दर्शन से उत्पन्न होकर स्वतंत्र व समग्र रूप से विकसित
हुआ है। - समाजशास्त्र का विकास सामाजिक दर्शन से उस दौर में हुआ जब यह महसूस
किया गया कि समाज एक रचनात्मक संस्थान है और उसमें भी बदलाव आते
हैं जैसा कि फ्रांसीसी तथा अमेरिकी क्रांति के दौरान हुआ।