अनुक्रम
सर्वोदय ऐसी समाज रचना चाहता है जिसमें वर्ण, वर्ग, धर्म, जाति, भाषा आदि के आधार पर किसी समुदाय का न तो संहार हो, न बहिष्कार हो।
सर्वोदय का अर्थ
सर्वोदय अर्थात् सबका उदय, सभी
का विकास। सर्वोदय भारत का पुराना आदर्श है।
विनोबा जी ने कहा है, सर्वोदय का अर्थ है- सर्वसेवा के माध्यम से समस्त
प्राणियों की उन्नति। सर्वोदय के व्यावहारिक स्वरूप को हम बहुत हद तक
विनोबा जी के भूदान आंदोलन में देख सकते है।
दादा धर्माधिकारी ने अपने सर्वोदय दर्शन में लिखा है, सुबह वाले को
जितना, शामवाले को भी उतना ही, प्रथम व्यक्ति को जितना, अंतिम व्यक्ति को
भी उतना ही, इसमें समानता और अद्वैत का वह तत्व समाया है, जिस पर
सर्वोदय का विशाल प्रसाद खड़ा है।
हक्सले ने कहा- ‘‘जीओ और जीने दो।’’ परंतु सर्वोदय कहता है- ‘‘तुम दूसरों को जिलाने के लिये जीओ।’’ दूसरों को अपना बनाने के लिये प्रेम का विस्तार करना होगा, अहिंसा का विकास करना होगा और शोषण को समाप्त कर आज के सामाजिक मूल्यों में परिवर्तन करना होगा।
‘सर्वोदय’ ऐसे वर्गविहीन, जातिविहीन और शोषण मुक्त समाज की स्थापना करना चाहता है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति और समूह को अपने सर्वांगीण विकास का साधन और अवसर मिले। विनोबा भावे कहते है- जब हम सर्वोदय का विचार करते है, तब ऊँच-नीच भाववाली वर्णव्यवस्था दीवार की तरह सामने खड़ी हो जाती है। उसे तोड़े बिना सर्वोदय स्थापित नहीं होगा। इसे सफल बनाने हेतु जातिभेद मिटाना होगा और आर्थिक विषमता दूर करनी होगी।
सर्वोदय समाज की रचना व्यक्तिगत जीवन की शुद्धि पर ही हो सकती है। जो व्रत नियम व्यक्तिगत जीवन में ‘मुक्ति के साधन’ है वे ही जब सामाजिक जीवन में भी व्यवहृत होंगे, तब सर्वोदय समाज बनेगा। सर्वोदय की दृष्टि से जो समाज रचना होगी, उसका आरंभ हमें अपने जीवन से करना होगा। निजी जीवन में असत्य, हिंसा, परिग्रह आदि हुआ तो सर्वोदय नहीं होगा, क्योंकि सर्वोदय समाज की विषमता को अहिंसा से ही मिटाना चाहता है।
- सबके हित में ही व्यक्ति का हित निहित है।
- एक नाई का कार्य भी वकील के समान ही मूल्यवान है क्योंकि सभी व्यक्तियों को अपने कार्य से स्वयं की आजीविका प्राप्त करने का अधिकार होता है, और
- श्रमिक का जीवन ही एक मात्र जीने योग्य जीवन है।
गांधी जी ने इन तीनों कथन के आधार पर अपनी सर्वोदय की विचारधारा को जन्म दिया। सर्वोदय का अर्थ है सब की समान उन्नति।
सर्वोदय के उद्देश्य
- व्यक्ति में आत्म-संयम की भावना विकसित करना।
- शोषणहीन समाज की स्थापना के प्रयास करना।
- मानव समाज के सर्वांगीण विकास के प्रयास करना।
- लोकनीति के आधार पर शासन संचालन किया जाये।
- सत्ता के विकेन्द्रीकरण के प्रयास सुनिश्चित हो।
सर्वोदय के तत्व
1. पारिश्रमिक की समानता- जितना वेतन नाई को उतना ही वेतन वकील
को। ‘‘अनटू दिस लास्ट’’ का यह तत्व सर्वोदय में पूर्णत: गृहित है।
सर्वोदय संघर्ष नहीं, सहकार को मानता है। सर्वोदय का संपूर्ण भवन ही
अहिंसा की नींव पर खड़ा है।
और साधन भी शुद्ध।
शरीर, बुद्धि और संपत्ति इन तीनों में से जो जिसे प्राप्त हो, उसे यही
समझना चाहिए कि वह सबके हित के लिये ही मिली है। यही ट्रस्टीशिप
का भाव है। अपनी शक्ति और संपत्ति का ट्रस्टी के नाते ही मनुष्य मात्र
के हित के लिए प्रयोग करना चाहिए।
जिससे शोषण और दमन से बचा जा सके। केन्द्रीकृत औद्योगिकीकरण के इस युग में तो यह और भी आवश्यक हो गया है। गाँधीजी ने आदि,
मध्य और अन्त तीनों स्थितियों में विकेन्द्रीकरण और शासनमुक्तता की
बात कही है। यही सर्वोदय का मार्ग है।
सर्वोदय की विशेषताएं
सर्वोदय समाज अपने व्यक्तियों को इस तरह से प्रशिक्षित करता है कि व्यक्ति
बडी से बडी कठिनाइयों में भी अपने साहस व धैर्य कसे त्यागता नहीं है। उसे यह
सिखाया जाता है कि वह कैसे जिये तथा सामाजिक बुराइयों से कैसे बचे। इस तरह
सर्वोदय समाज का व्यक्ति अनुशासित तथा संयमी होता है। यह समाज इस प्रकार की
योजनाएं बनाता है जिससे प्रत्येक व्यक्ति को नौकरी मिल सके अथवा कोई ऐसा कार्य
मिल सके जिससे उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके। इस समाज में प्रत्येक
व्यक्ति को श्रम करना पडता है।
सर्वोदय समाज पाश्चात्य देशों की तरह भौतिक संपन्नता और सुख के पीछे
नहीं भागता है और न उसे प्राप्त करने की इच्छा ही प्रगट करता है, किन्तु यह इस
बात का प्रयत्न करता है कि सर्वोदय समाज में रहने वाले व्यक्तियों जिनमें रोटी, कपडा,
मकान, शिक्षा आदि है कि पूर्ति होती रहे। ये वे सामान्य आवश्यकताओं हैं जो प्रत्येक
व्यक्ति की हैं और जिनकी पूर्ति होना आवश्यक है।
सर्वोदय की विचारधारा है कि सत्ता का विकेन्द्रकीकरण सभी क्षेत्रों में समान रूप्
में करना चाहिए क्योंकि दिल्ली का शासन भारत के प्रत्येक गांव में नहीं पहुंच सकता।
वे आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक क्षेत्रों में सत्ता का विकेन्द्रीकरण करने के पक्षधर
है। इस समाज में किसी भी व्यक्ति का शोषण नही होगा क्योंकि इस समाज में रहने
वाले व्यक्ति आत्म संयमी, धैर्यवान, अनुशासनप्रिय तथा भौतिक सुखों की प्राप्ति से दूर
रहते है। इस समाज के व्यक्ति भौतिक सुखों के पीछे नही भागते, इसलिए इनके
व्यक्तित्व में न तो संद्यर्ष है और ही शोषणता की प्रवृति ही । यह अपने पास उतनी ही
वस्तुओं का संग्रह करते हैं, जितनी इनकी आवश्यकताएं है।
गांधी का मत था कि भारत के गांवों का संचालन दिल्ली की सरकार नहीं कर
सकती। गांव का शासन लोकनीति के आधार पर होना चाहिए क्योंकि लोकनीति गांव
के कण कण में व्यापत है। लोकनीति बचपन से ही व्यक्ति को कुछ कार्य करने के लिए
पे्िररत करती है और कुछ कार्य को करने से रोकती है। इस तरह व्यक्ति स्वत:
अनुशासित बन जाता है। सर्वोदय का उदय किसी एक क्षेत्र में उन्नति करने का नहीहै बल्कि सभी क्षेत्रों में समानरूप से उन्नति करने का है। वह अगर व्यक्ति की
आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कटिबद्व है तो व्यक्ति को सत्य, अहिंसा और पेम्र का
पाठ पढाने के लिए भी दृढसंकल्प है।