अनुक्रम

अपने प्रवाह मार्ग (नदी, नाला) से न बहकर आस-पास के क्षेत्रों पर फैल जाता है तो उसे बाढ़ कहा
जाता है। अनेकानेक कारणों से बाढ़ क्षेत्रों में भी मानव रहने के लिए विवश
है। साथ ही नगरों का विस्तार भी ऐसे क्षेत्रों में होता चला जा रहा है।
जिनका एक बड़ा भाग प्रतिवर्ष नदी की बाढ़ से प्रभावित होता हैं है।
बाढ़ आपदा के कारण
- वनस्पति विनाश,
- वर्षा की अनिश्चितता,
- नदी तल पर अधिक मलवा का जमाव,
- नदी की धारा में परिवर्तन,
- नदी मार्ग में मान निर्मित व्यवधान
- तटबन्ध और तटीय अधिवास।
वनस्पति विनाश से अधिक बाढ़ की अवधारणा अब पुष्ट होती जा रही है। वनस्पतिविहीन
धरातल वर्षा जल को नियंत्रित करने में असमर्थ होता हैं, फलत: तीव्र बहाव के कारण भूमिक्षरण भी
अधिक होता है। अपनी बढ़ती आवश्यकता और पौधों के प्रति अनुदार व्यवहार के कारण विश्व के सभी
विकसित और विकासशील देशों में तेजी से वन विनाश हुआ है।
है क्योंकि कुछ क्षेत्रों में 10 प्रतिशत भूक्षेत्र से कम भूमि पर प्राकृतिक वनस्पति का विस्तार बच पाया है।
हिमालय का वनस्पति-विहीन होना, उत्तरी भाग में बाढ़ के प्रकोपों का सबसे बड़ा कारण है, क्योंकि
अधिकांश नदियाँ यहीं से निकलती हैं।
में पहुँचता है जिसे प्रवाहित करना, उनके लिए कठिन हो जाता है। बाढ़ एक विश्वव्यापी समस्या है।
जहाँ भी अधिक वर्षा की घटना होती है नदियाँ उफनकर विस्तृत क्षेत्र को जलमग्न कर देती हैं, जिससे
अपार जन-धन की बरबादी होती है।
वर्षा की अनिश्चितता भी बाढ़ का कारण है। अनेक शुष्क एवं अर्द्धशुष्क भागों में वर्षा कम होने
से अपवाह मार्ग अवरूद्ध हो जाते हैं और जब अधिक वर्षा हो जाती है तो उसका निकास कठिन हो
जाता है। राजस्ािान में आने वाली बाढ़ इसी प्रकार की है, जिससे अपार क्षति होती है। पर्यावरण
परिवर्तन के रूप में वर्षा की अनिश्चितता सर्वज्ञान है।
नदियों के अपरदन, परिवहन और निक्षेपण की एक प्राकृतिक व्यवस्था है। नदी अपनी सामान्य
प्रक्रिया में जितना काटती हे उसे ढोती जाती है। लेकिन जब धरातल बंजर हो, धारा में भूस्खलन से
अधिक मलवा आ जाय या मानवीय कारणों से नदी का बोझ बढ़ जाय या छोने की क्षमता घट जाये तो
अधिक मलवा तल पर जमा हो जाता है जो नदी की अपवाह क्षमता को घटा देता है। फलत: थोड़ी भी
अधिक वर्षा होने पर नदी जल फैलकर बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करता है। उत्तर भारत की लगभग सभी
नदियाँ इससे प्रभावित होती हैं।
धरातल में कम ढाल और वर्षा काल में जल दबाव के कारण पहले नदी सर्पाकार बहती है और
बाढ़ में धरा परिवर्तन कर लेती हैं ऐसी दशा में बाढ़ की घटनाएँ बढ़ जाती हैं, क्योंकि सर्पाकार नदी
की बहाव क्षमता घट जाती है, जिससे जल विस्तृत क्षेत्र में फैल जाता है।
बाढ़ रोकने के लिए बनाये गये तटबन्ध बाढ़ के कारण बनते जा रहे है, क्योंकि इससे एक क्षेत्र
या स्थान पर बाढ़ से रहत मिल जाती है, लेकिन अन्य क्षेत्रों को इसका कष्ट भुगतना पड़ता हैं वास्तव
में तटबन्ध एक प्रकार से प्रवाह में अवरोध उत्पन्न करते हैं स्पष्ट है कि बाढ़ को जितना कम किया
जाना चाहिए उससे बहुत कम सफलता मिल पा रही है, क्योंकि पर्यावरण से मानवीय छोड़छाड़ बदलाव
ला रहा है।
बाढ़ नियंत्रण के उपाय
ढालू भूमि पर वृक्षारोपण, नदी तटबंधों का निर्माण, आवासीय स्थलों को ऊँचा करना, जल निकासी का
प्रबन्ध, बाँध और जलाशयों का निर्माण, बाढ़ के आगमन की चेतावनी और अन्य सुरक्षा कार्य। लेकिन यह
सत्य है कि भारत के बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों की नदियाँ तल जमाव, मोड़ और मार्ग संकुचन से आक्रान्त हैं
फलत’ इनमें अधिक जल आ जाने से बाढ़ का आना स्वाभाविक है। बाढ़ को कम करने के लिये यह
आवश्यक है कि इनकी प्रवाह क्षमता में वृद्धि की जाय।
अभी ध्यान नहीं दिया जा रहा है। बाढ़ नियंत्रण के उपाय, बाढ़ नियंत्रण के लिए दो तरह के उपाय किये जाते हैं –
1. संरचनात्मक
गहरा करना तथा बाढ़ से राहत हेतु छमक नालियों का निर्माण करना आदि। बाढ़ के मैदानों को
काल खण्डों में बाँटकर उनका नियोजन करते हैं, जैसे प्रति वर्ष, प्रति पाँचवें वर्ष, प्रति बीस वर्ष
वाले बाढ़ के क्षेत्र आदि। इसे बाढ़ क्षेत्र नियोजन विधि कहते है।
2. व्यवहारजन्य
पड़ता हैं, क्योंकि यह एक प्राकृतिक संकट है। यह संकट मानवजन्य भी हैं इससे निपटने के
लिए त्वरित उपायों के लिये आपदा प्रबन्धन संस्था की स्थापना आवश्यक है। ताकि बचाव और
राहत प्रभावित क्षेत्रों को समय से प्रदान किया जा सके।
पूर्वानुमान करना भी आवश्यक होता हैं बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की आवश्यकता के अनुसार पूर्व
नियोजित उपकरण जैसे नाव, अस्थाई पुल, टेण्ट, प्रशिक्षित कमाण्डों और स्वास्थ्य सेवकों की
व्यवस्था के साथ राहत कार्य के लिये उचित मात्रा में धन की व्यवस्था भी आवश्यक है।