स्तूप किसे कहते हैं ?
स्तूप के लिए चैत्य शब्द का भी प्रयोग साहित्य में मिलता है। चैत्य शब्द ‘चि’ चयने् धातु से निकला है, क्योंकि इसमें प्रस्तर या ईट चिन कर या चुन कर भवन निर्माण किया जाता है ‘चीयते पाषार्णदिना इति चैत्यम्’। अर्थात् चैत्य से उस प्रदेश का संकेत होता है जहाँ चयन-क्रिया सम्पन्न की जाती है। ‘चैत्य’ शब्द का चित तथा चिता शब्द से भी सम्बन्ध है। चिता की राख (अवशेष) को एक पात्र में रखकर स्मारक बनाया जाता है, जिसे स्तूप कहते हैं।
भारत के प्रमुख स्तूप
1. भरहुत – महान सम्राट अशोक द्वारा प्रतिष्ठापित इष्टिकामय स्तूप शुंग नरेश धनभूति के शासन काल में अपने पूर्ण विकास को प्राप्त किया। भरहुत प्रयाग से दक्षिण-पश्चिम की दिशा में 120 मील व मध्यप्रदेश के सतना स्टेशन से 9 मील दक्षिण तथा ऊँचहरा स्टेशन से 6 मील उत्तर-पूर्व दिशा में भरहुत गाँव में स्थित है। भरहुत का महान् स्तूप 67 फुट 8.5 इंच के व्यास में विस्तृत था।
साँची बौद्ध धम्म तथा कला के रूप में विख्यात है। सांची का स्तूप अपने स्थापत्य और मूर्तिकला दोनों के लिए प्रसिद्ध है। ईटों की मूलसंरचना पर इस काल में पत्थर का आवरण चढ़ाया गया । स्तूप का व्यास आधार पर 60 फुट है। पूर्ण अवस्था में इसकी ऊंचाई 77 फीट के लगभग थी । स्तूप लाल रंग के बलुए पत्थर का बना है।
महाजनपद के अधीन तथा वर्तमान में वाराणसी जनपद में स्थित है। सारनाथ की प्राचीनता और धार्मिक महत्व को ध्यान में रखकर महान
सम्राट अशोक ने यहाँ स्तूप-निर्माण किया था। ई0पू0 तीसरी शदी से बारहवीं
शदी तक सारनाथ देश के महत्वपूर्ण स्थानों में से एक था। इसी महत्ता के
कारण प्राचीन भारत के देश के शासकों ने समय-समय पर यहाँ कुछ न कुछ
स्मारकों का निर्माण कर इसे ऐतिहासिकता प्रदान की।
