जल चक्र कभी समाप्त न होने वाली आदान प्रदान की वह क्रिया जिसमें जल का आदान-प्रदान वायु
मंडल से समुद्र और फिर वापस उसी की और हो जाता है इसे हम जल चक्र कहते है। नदी, सरोवर, समुद्र व भूमि से जल का वाष्पीकरण होता है जबकि जल जो की पौधों में इकट्ठा है
वाष्पोत्सर्जन होकर बादल बनाता है जिससे की जल वायुमण्डल में सुरक्षित एकत्र रहता है। बादलों में जमी
वाष्प संघनित होकर वाष्पोत्सर्जन की उत्पत्ति करती है।
मंडल से समुद्र और फिर वापस उसी की और हो जाता है इसे हम जल चक्र कहते है। नदी, सरोवर, समुद्र व भूमि से जल का वाष्पीकरण होता है जबकि जल जो की पौधों में इकट्ठा है
वाष्पोत्सर्जन होकर बादल बनाता है जिससे की जल वायुमण्डल में सुरक्षित एकत्र रहता है। बादलों में जमी
वाष्प संघनित होकर वाष्पोत्सर्जन की उत्पत्ति करती है।
सृष्टि की सभी घटनाओं के समान, यह चक्र भी
अपनी ऊर्जा सूर्य से प्राप्त करता है। सभी शब्दों का विवरण नीचे दिया है।
अपनी ऊर्जा सूर्य से प्राप्त करता है। सभी शब्दों का विवरण नीचे दिया है।
1. वाष्पीकरण – सूर्य ऊर्जा जो की पृथ्वी पर पड़ती है उससे सतह के जल अणु गर्म हो जाते है। ये ऊर्जा प्राप्त जल
अणु जल सतह से स्वतंत्र होकर वाष्पित होते है और वायुमण्डल में अदृश्य वाष्प के रूप में वायुमंडल
में ऊपर जाते है।
अणु जल सतह से स्वतंत्र होकर वाष्पित होते है और वायुमण्डल में अदृश्य वाष्प के रूप में वायुमंडल
में ऊपर जाते है।
2. प्रस्वेदन – सभी पौधे अपनी पत्तियों द्वारा जल वाष्प छोड़ते है। इस प्रक्रिया को प्रस्वेदन कहते है। अच्छी गति से
बढ़ते पौधे ज्यादा तीव्र गति से वाष्प उत्सर्जित करते है। यह उनकी जलधारण क्षमता के 5-10 गुणा
होता है। यह पौधों की शारीरिक आवश्यकता है।
बढ़ते पौधे ज्यादा तीव्र गति से वाष्प उत्सर्जित करते है। यह उनकी जलधारण क्षमता के 5-10 गुणा
होता है। यह पौधों की शारीरिक आवश्यकता है।
3. संघनन – जल वाष्प जो की वाष्पीकरण व संघनन से बनता है वो ऊपर उठता है, ज्योंही तापमान ऊपरी ऊँचार्इ
में कम होने लगता है। यह वाष्प ठंडा हो जाती है और इसलिए वायुमण्डल में उपस्थित सूक्ष्म धूल कणों
के साथ जो नाभि कणों का कार्य करते है संघनित होती है। ये नाभी कण धीरे धीरे बड़े होते है और
मिलकर बादल बनाते है। ये बादल एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा सकते है और हवा की गति से
वायुमण्डल में घूमते है।
में कम होने लगता है। यह वाष्प ठंडा हो जाती है और इसलिए वायुमण्डल में उपस्थित सूक्ष्म धूल कणों
के साथ जो नाभि कणों का कार्य करते है संघनित होती है। ये नाभी कण धीरे धीरे बड़े होते है और
मिलकर बादल बनाते है। ये बादल एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा सकते है और हवा की गति से
वायुमण्डल में घूमते है।
4. अवक्षेषण – और अधिक ऊँचा उठने पर बदाल जल से संतृप्त हो जाते है और यह जल वर्षा के रूप में नीचे गिरता
है। अगर वायुमंडल का तापमान कम हो तो यह जल ओला या बर्फ वर्षा के रूप में गिरता है। इन
सभी प्रकार के पानी के संघनित व धरती पर गिरने के प्रकार को अवक्षेपण कहते है। वर्षा पहाड़ों के
पास अधिक होती है क्योंकि ये बादलों को ऊपर उठाने में सहायक है।
है। अगर वायुमंडल का तापमान कम हो तो यह जल ओला या बर्फ वर्षा के रूप में गिरता है। इन
सभी प्रकार के पानी के संघनित व धरती पर गिरने के प्रकार को अवक्षेपण कहते है। वर्षा पहाड़ों के
पास अधिक होती है क्योंकि ये बादलों को ऊपर उठाने में सहायक है।
5. जल अपवाह – अत्यधिक अवक्षेपण या गर्मियों में बर्फ पिघलने से पानी बहता हुआ नदी तालाब या झरनों में जाता
है। ये पानी का बहाव पृथ्वी की सतह पर होना जल संभर की स्थलाकृति पर निर्भर करता है और
इसे वह जाना कहते है।
है। ये पानी का बहाव पृथ्वी की सतह पर होना जल संभर की स्थलाकृति पर निर्भर करता है और
इसे वह जाना कहते है।
6. रिसाव – जैसा कि पृथ्वी की सतह प्रवेश्य सतह है अवक्षेपण या बहाव का एक भाग सतह से नीचे की तरफ रिसता
है। ये रिसाव नीचे भूमिगत जल में मिल जाता है।
है। ये रिसाव नीचे भूमिगत जल में मिल जाता है।
7. भूजल – मिट्टी के नीचे की सतह में रिसा हुआ जल भूमिगत जल के रूप में जमा होगा या नहीं यह भूमि की
भौगोलिक स्थिति पर निर्भर करता है। इस भूमिगत जल को हम कुआं खोदकर अपने काम के लिए
उपयोग में ला सकते है। कभी-कभी, भूमिगत जल नदी या फिर समुद्र में बह जाता है।
भौगोलिक स्थिति पर निर्भर करता है। इस भूमिगत जल को हम कुआं खोदकर अपने काम के लिए
उपयोग में ला सकते है। कभी-कभी, भूमिगत जल नदी या फिर समुद्र में बह जाता है।
जल विज्ञान
वह विज्ञान है जिसमें जल भंडारण तथा भूमिगत जल की प्रक्षोम गति का अध्ययन किया जाता है।
वह विज्ञान है जिसमें जल भंडारण तथा भूमिगत जल की प्रक्षोम गति का अध्ययन किया जाता है।
