अनुक्रम
दुर्खीम के आत्महत्या का सिद्धांत
परन्तु दुर्खीम आत्महत्या की इन परिभाषाओं से संतुष्ट नहीं हुआ है। उसका अपने इस सिद्धांत का प्रथम यही प्रयास रहा कि अन्य मृत्युओं में आत्महत्या द्वारा हुई मृत्यु में अन्तर किया जाए। उसने आत्महत्या की अपनी अवधारणा को स्पष्ट करने के लिए यह प्रस्तावित किया है कि आत्महत्या की बाहरी दशाएँ उल्लेखनीय स्थान रखती हैं। ये बाह्य दशाएँ इस दृष्टि से तब ही प्रभावशाली होती हैं जब हम उनमें हस्तक्षेप करते हैं। क्योंकि हम आत्मघात करने वाले व्यक्ति की भावनाओं व उद्देश्यों की खोज नहीं कर सकते हैं।
अपने इस महान ग्रन्थ में दुर्खीम ने आगे आत्महत्या और भौगोलिक कारकों पर विचार किया है। इस दृष्टि से उसने जलवायु, तापमान, समय, दिन व रात, आदि कारणों पर विचार किया है। अपने प्रमुख सिद्धांत को पारित करने से पूर्व दुर्खीम ने आत्महत्या और अनुकरण के सम्बन्धों की चर्चा की है। इन सभी कारकों को दुर्खीम ने अप्रभावहीन बनाया है।
आत्महत्या विषय पर अपने इस सिद्धांत में भी दुर्खीम ने समाजशास्त्रीयवाद के अपने मूल सिद्धांत का पूर्णत: पालन
किया है। इसके अन्तर्गत उसने व्यापक आंकड़ों के आधार पर व्याख्या और विश्लेषण के द्वारा ही अपने इस सिद्धांत
को प्रस्तुत किया है। उसका मत है कि प्राणिशास्त्रीय, मनोवैज्ञानिक एवं भौगोलिक तथ्यों अथवा कारकों द्वारा इन
आत्महत्या का समाजशास्त्रीय विश्लेषण नहीं कर सकते हैं।
वाले व्यक्ति के व्यक्तिगत उद्देश्यों के आधार पर उसके इस कार्य की व्याख्या की जा सकती है। इसी प्रकार
भौगोलिक कारक या चिन्ता, भय, गरीबी, असफल प्रेम, आदि तत्वों के आधार पर भी हम आत्महत्या का विश्लेषण
नहीं कर सकते हैं। इस प्रकार दुर्खीम ने बताया कि आत्महत्या के लिए तो केवल सामाजिक कारक ही उत्तरदायी
ठहराये जा सकते हैं। दुर्खीम ने लिखा है कि आत्महत्या एक सामाजिक तथ्य है। इसलिए आत्महत्या की व्याख्या भी
सामाजिक तथ्य के रूप में ही की जा सकती है।
पर्यावरण की कुछ अवस्थाओं से आत्महत्या का सम्बन्ध उतना ही प्रत्यक्ष एवं स्थिर है जितना की प्राणीशास्त्रीय एवं
भौतिक लक्षणों वाले तथ्यों से इसका सम्बन्ध अनिश्चित एवं अस्पष्ट देखा गया है।
- आत्महत्या की दर प्रत्येक साल लगभग समान रहती है।
- सर्दी की अपेक्षा गर्मी में आत्महत्या की दर ऊँची होती है।
- पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों में अधिक आत्महत्या पाई गई है।
- बड़ों में छोटों की अपेक्षा अधिक आत्महत्याएँ पाई जाती हैं।
- नागरिकों की अपेक्षा सैनिकों में आत्महत्याएँ पाई जाती हैं।
- विवाहितों की अपेक्षा अकेले, अविवाहितों, विधवा, विधुरों एवं तलाक दिये हुए व्यक्तियों में अधिक
आत्महत्याएँ पाई जाती हैं। - विवाहितों में संतानहीन व्यक्ति संतानयुक्त व्यक्तियों की अपेक्षा आत्महत्या अधिक पाई जाती हैं।
- आत्महत्या के प्रमुख कारण सामाजिक प्रकृति के हैं।
दुर्खीम के आत्महत्या के प्रकार
दुर्खीम ने आत्महत्या की समाज में प्रकृति को ध्यान में रखकर तीन प्रकार की आत्महत्या अर्थात अहंवादी, परार्थवादी व असामान्य (आदर्शहीन) आत्महत्या की व्याख्या समाज में उदाहरण देकर जैसे-सैनिकों द्वारा की जाने वाली आत्महत्या, गुस्से में आकर की जाने वाली आत्महत्या, जौहर, परीक्षा में फेल होने पर विद्यार्थी की आत्महत्या आदि की व्याख्या की। जिसे अनेक उदाहरण द्वारा समझाया उनके विचारानुसार सार यही है कि आत्महत्या एक सामाजिक तथ्य है जिसमें समाज ऐसी परिस्थितियां आदि घटित करता है कि व्यक्ति आत्महत्या का सहारा ले बैठता है इसलिए आत्महत्या की प्रकृति को समझने के लिए उसकी व्याख्या सामाजिक सन्दर्भ में की जानी चाहिए।
1. अहंवादी आत्महत्या
अनुभव करता है। व्यक्ति अपने स्वार्थ में इतना डूब जाता है कि उसे ऐसा
अनुभव होने लगता है कि सभी उसकी उपेक्षा कर रहे हैं। वह अपने को कटा
हुआ महसूस करने लगता है। जिसके परिणामस्वरूप उसके अहं को ठेस लगती
है और वह अपनी जीवन-लीला समाप्त कर देता है।
2. परार्थवादी आत्महत्या
परार्थवादी आत्महत्या में व्यक्ति समाज में अपने को बहुत घुला-मिला महसूस
करता है, व्यक्तिगत हित सामूहिक हित में विलीन हो जाते हैं। व्यक्ति और
समाज के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है और सामूहिक हित से प्रेरित होकर
वह अपने जीवन का बलिदान कर देता है। अतः परार्थवादी आत्महत्या तब घटित
होती है जब समाज में अत्यधिक एकता व संगठन देखने को मिलता है और
ऐसी स्थिति में समाज या समूह में आत्महत्या को एक कर्तव्य के रूप में स्वीकार
किया जाता है, जैसे- सैनिकों द्वारा की जाने वाली आत्महत्या व जौहर आदि
आत्महत्या इसी श्रेणी के अन्तर्गत आती है।
2. असामान्य आत्महत्या
की जाती है जब व्यक्ति के जीवन में आकस्मिक उतार-चढ़ाव आते हैं, अत्यधिक
निराशा व अचानक प्राप्त होने वाली खुशी की स्थिति में भी व्यक्ति आत्महत्या
कर बैठता है।
