अनुक्रम
नाटक शब्द की व्युत्पत्ति संण् नट् (नाचना) + घ´ से हुई है जिसका अर्थ नच्च, नाच, नृत, नृत्य, नकल या स्वांग होता है। नाटक
से पूर्व नट् से नाट शब्द व्युत्पन्न हुआ है। इसलिए नाटक से नाट की व्युत्पत्ति देखी।
नाटक शब्द की व्युत्पत्ति
नाटक- संण् नट् + ण्वुल् – अक प्रत्यय से नाटक की व्युत्पत्ति हुई है जिसका अर्थ नाट्य या अभिनय करने वाला या नटों या
अभिनेताओं के द्वारा मंचन। अभिनय इसका अंग्रेजी पर्याय ड्रामा है।
नाटक शब्द की व्युत्पत्ति विवेचन से इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि नाटक शब्द तक पहुंचने से पूर्व – नच्च – नाच – नृत् – नृत्य,
नट – नाट – नाट्य – नाटक शब्द प्रमुख हैं।
नच्च (अंग प्रत्यंग को हिलाना) से क्षतिपूरक दीघ्र्ाीकरण से नाच (वाद्य यंत्रा सहित स्वर,लय, ताल पर नाचना क्रिया की संज्ञा),
नृत् में सांस्कृतिक भाव आ जाता है। नृत् से (नृत्य) बन जाता है। नट से नाट नकल स्वांग का भाव आ जाता है। जिससे नाट्य
शब्द बना है। नाट्य से नाटक की व्युत्पित्ति हुई है।
अंग प्रत्यंग हिलाना, अंग प्रत्यंग वाद्य यंत्रा के साथ, भावाभिव्यक्ति, तथा अभिनय के साथ कथा की अभिव्यक्ति नाटक कहलाती
है।
प्रथम हिंदी नाटक
के नाट्यशास्त्र में घटना का उल्लेख किया गया है जिसके अनुसार देवताओं से प्रार्थना करने पर ब्रह्मा ने ऋग्वेद से पाठ, सामवेद
से गान, यजुर्वेद से अभिनय एवं अथर्ववेद से रस लेकर पांचवें वेद अर्थात् नाटक को जन्म दिया। शिव ने तांडव नृत्य तथा पार्वती
ने लास्य प्रदान किया।
इससे स्पष्ट हो जाता है कि वेदों के बाद ही नाटक का आविर्भाव हुआ। उत्तर-वैदिक युग से पूर्व नाटक का आगमन हो चुका
था। ‘यवनिका’ के आधार पर नाटक को यूनान की देन कहा गया। वह भी सत्य नहीं क्योंकि शब्द यवनिका नहीं ‘जवनिका’
है। जब वेग के अनुसार, जवनिका-वेग से उठने गिरने वाला पर्दा होता है। यूनानी नाटक में पर्दा नहीं होता था, अंक नहीं होते
थे आदि।
पाणिनि (ईसा 400 वर्ष पूर्व) ने नाटक का उल्लेख किया है। रामायण, महाभारत में नाटक का उल्लेख है। उपलब्ध नाटकों
में सबसे प्राचीन महाकवि भास की रचनाएं हैं। कालिदास, शुद्रक, भवभूति, हर्षवर्द्धन, भट्ट नारायण तथा विशाखदत्त आदि
नाटककार थे। उसके बाद नाट्य कला विलुप्त सी हो गई।
डॉ. दशरथ ओझा ने तेरहवीं शताब्दी से नाटक का आविर्भाव माना है। सर्वप्रथम उपलब्ध नाटक “गय सुकुमार रास” है जिसका
रचनाकाल संवत 1289 वि. है। इस की भाषा पर राजस्थानी हिंदी का प्रभाव है। नाटकीय तत्वों पर प्रकाश नहीं पड़ता है।
इसलिए इसे प्रथम नाटक नहीं कहा जा सकता है।
महाकवि विद्यापति द्वारा रचित मैथिली नाटक ‘गोरक्ष विजय’ को प्रथम नाटक कहा गया है। किंतु पद्य भाग मैथिली में है।
मैथिली नाटकों के बाद रास नाटक अर्थात् ब्रजभाषा पद्य के नाटक आये। उसके पश्चात् हिंदी में पद्य वद्य नाटकों की रचना
होती रही जिनमें ‘प्रबोध चंद्रोय’ को प्रथम नाटक कुछ आलोचकों ने माना है। यशवंत सिंह को प्रथम नाटककार माना है। इसका
रचनाकाल सं. 1700 वि. है।
नाटक का विकास
हिंदी में नाटक के स्वरूप का समुचित विकास आधुनिक युग से होता है। सन् 1850 ई. से आज तक के युग को नाट्य रचना
की दृष्टि से तीन खंडों में विभक्त कर सकते हैं।
- भारतेंदु युग (सन् 1850 – 1900 ई.)
- प्रसादयुग (सन् 1901 – 1930 ई.)
- प्रसादोत्तर युग (सन् 1931 – 1950 ई.)
- स्वातंत्रयोत्तर युग (सन् 1951 – अब तक)
भारतेंदु हरिश्चन्द्र ने अपने पिता बाबू गोपाल चन्द्र द्वारा रचित नाटक ‘महुष नाटक’ (सन् 1841 ई.) को हिंदी का प्रथम नाटक
माना है। किंतु यह भी ब्रजभाषा परंपरा के पद्य बद्ध नाटकों में आता है।
भारतेंदु युग (सन् 1850 – 1900 ई.)
किया। भारतेन्दु ने प्रथम नाटक ‘विद्या सुंदर’ सन् 1868 ई में बंगला नाटक से छायानुवाद किया। उसके पश्चात् उनके
अनेक मौलिक एवं अनूदित नाटक प्रकाशित हुए- ‘पाखंड विडम्बनम्’ – 1872, ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’ – 1872,
‘धनंजय’ विजय, ‘मुद्राराक्षस’ – 1875, ‘सत्यहरिश्चन्द्र’ – 1875, ‘प्रेमयोगिनी’ – 1875, ‘विषस्य – विषमौषधम्’ – 1876,
‘कर्पूर मंजरी’ – 1876, ‘चंद्रावली’ – 1876, ‘भारत दुर्दशा’ – 1876, ‘नील देवी’ – 1877, ‘अंधेरी नगरी’ – 1881, तथा
‘सती प्रताप’ – 1884 ई. आदि उल्लेखनीय हैं।
भारतेंदु के नाटक मुख्यत: पौराणिक, सामाजिक, तथा राजनीतिक विषयों पर आधारित है। सत्य हरिश्चन्द्र, ‘धनंजय
विजय’, ‘मुद्राराक्षस’ तथा ‘कर्पूर मंजरी’ अनूदित नाटक हैं। मौलिक नाटकों में उन्होंने सामाजिक कुरीतियों, एवं धर्म के
नाम पर होने वाले कुकृत्यों आदि पर करारा व्यंग्य किया है।
नाटक हैं। विषस्य विषमौषधम् में देशी नरेशों की दुर्दशा पर आंसू बहाए हैं तथा उन्हें चेतावनी दी है कि यदि वे न संभलें
तो धीरे-धीरे अंग्रेज सभी देशी रियासतों को अपने अधिकार में ले लेंगे। ‘भारत दुर्दशा’ में भारतेंदु की राष्ट्र-भक्ति का
स्वर उद्घोषित हुआ है। इसमें ‘अंग्रेज’ को भारत के शासक रूप में चित्रित करते हुए भारत वासियों के दुर्भाग्य की कहानी
को यथार्थ रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसमें स्थान-स्थान पर अंग्रेजों की स्वेच्छाचारिता, अत्याचारी व्यवहार, भारतीय
जनता की मोहकता पर गहरा आघात किया है। 1856 ई. की असफल क्रांति को लोग अभी भूल नहीं पाए थे। भारतेंदु
ने ब्रिटिश शासन एवं उसके विभिन्न अंगों की जैसी स्पष्ट आलोचना अपने साहित्य में ही है वह उनके उज्जवल देश प्रेम
एवं अपूर्व साहस का द्योतन करती है।
से अनुवाद किए थे। नाट्य कला के सिद्धान्तों का उन्होंने सूक्ष्म अध्ययन किया था इसका प्रमाण उनके नाटक देते हैं।
उन्होंने अपने नाटकों के मंचन की भी व्यवस्था की थी। वे मंचन में भी भाग लेते थे।
भारतेंदु के नाटकों में जीवन और कला, सौंदर्य और शिव, मनोरंजन और लोक सेवा का अपूर्व सामंजस्य मिलता है। उनकी
शैली में सरलता, रोचकता, एवं स्वाभाविकता आदि के गुण विद्यमान हैं।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की प्रेरणा तथा उनके प्रभाव से उस युग के अनेक लेखक नाट्य रचना में तत्पर हुए। श्रीनिवास दास
‘रणधीर’ और ‘पे्रम मोहिनी’, राधाकृष्ण दास – ‘दु:खिकी बाला’, महाराणा प्रताप, खंगबहादुर लाल – ‘भारत ललना’, बदरी
नारायण चौधरी प्रेमधन – ‘भारत सौभाग्यम्’, तोताराम वर्मा – ‘विवाह विडंबन’, प्रताप नारायण मिश्र – ‘भारत दुर्दशा’
रूपक, और राधाचरण गोस्वामी ‘तन-मन-धन’ श्री गोसाईं जी के ‘अर्पण’ आदि नाटकों की सृजना की।
इन नाटकों में समाज सुधार, देश-प्रेम, या हास्य विनोद की प्रवृत्ति दृष्टिगोचर होती है। इनमें गद्य खड़ी बोली तथा पद्य
ब्रजभाषा का प्रयोग किया गया है।
पात्रानुकूल है। शैली में सरलता, मधुरता एवं रोचकता दृष्टिगोचर होती है। भारतेंदु युगीन नाट्य साहित्य जन मानस के
निकट था उसमें लोक रंजन एवं लोकरक्षण दोनों भावों का सुंदर समन्वय हुआ है। तत्कालीन नाटक पाठ्य एवं दृश्य
दोनों रूपों में तत्कालीन लोकहृदय का आकर्षक बने हुए थे। इनका दिव्य मंचन भी होता था।
प्रसाद युग (सन् 1901 – 1930 ई.)
जयशंकर प्रसाद हैं। इन्होंने जितनी ख्याति काव्य की विभिन्न विधाओं के सकल सृजन में प्राप्त की। नाटक, कहानी तथा
उपन्यास सभी विधाओं में सफल लेखनी उठाकर हिंदी गद्य साहित्य को समृद्ध बनाया।
से अधिक नाटकों की सृजना की इनके नाटकों में ‘सज्जन’ – 1910 ई., ‘कल्याणी परिणय’ 1912 ई., ‘करुणालय’ –
1913 ई., ‘प्रायश्चित’ 1914 ई., ‘राज्य श्री’ 1915 ई., ‘विशाख’ 1921 ई., ‘अजात शत्राु’ 1922 ई., ‘कामना’ 1923 ई.,
जनमेजय का ‘नाम यज्ञ’ – 1923 ई. ‘स्कंदगुप्त’ 1928 ई., ‘एक घूंट’ 1929 ई., ‘चंद्रगुप्त’ 1931 ई. तथा ‘ध्रुवस्वामिनी’ –
1933 ई. आदि उल्लेखनीय हैं।
भारतेंदु युगीन कवियों ने देश की दुर्दशा का वर्णन बारंबार अपनी रचनाओं में किया, जिससे प्रभावित होकर भारतीयों
में करुणा, ग्लानि, दैन्य, एवं अवसाद की प्रबल भावनाओं का उदय हुआ। ऐसी भावनाओं का भारतीयों में जन्मना अति
स्वाभाविक था। साहित्यिक रचनाओं ने आग में घी का समावेश किया। ऐसे परिवेश एवं ऐसी मन:स्थिति में समाज एवं
राष्ट्र विदेशी शक्तियों से संघर्ष करने की क्षमता खो बैठता है। प्रसाद ने देशवासियों में आत्मगौरव का संचार किया।
जिसके लिए उन्होंने अपने नाटकों में भारत के अतीत के गौरवपूर्ण दृश्यों को प्रतिस्थापित किया। यही कारण है कि उनके
अधिकांश नाटकों का कथानक उस बौद्ध युग से संबंधित है जब भारत अपनी सांस्कृतिक पताका विश्व के अधिकांश देशों
में फहरा रहा था।
को विदेशों में भेजा था। प्राचीन इतिहास एवं संस्कृति को प्रसाद ने अति सूक्ष्मता एवं सुनियोजित ढंग से प्रस्तुत किया
है। उसमें मात्रा तत्युगीन रेखाएं ही नहीं मिलती अपितु तत्कालीन वातावरण के सजीव अंकन की रंगीनी भी मिलती है।
धर्म की बाह्य परिस्थितियों का चित्राण करने की अपेक्षा उन्होंने दार्शनिक आंतरिक गुत्थियों तथा समस्याओं को स्पष्टता
प्रदान करना अधिक उचित समझा है। पात्रों का चरित्र चित्रण करते हुए परिवेशानुसार परिवर्तन एवं विकास का
प्रतिपादन किया है। मानव चरित्रा सत्-असत् दोनों पक्षों का पूर्ण प्रतिनिधित्व उनके नाटकों में मिलता है। नारी रूप को
जैसी महानता, सूक्ष्मता, शालीनता, त्याग, बलिदान, ममता, सौहार्द, दया, माया एवं गंभीरता कवि प्रसाद ने प्रदान की है।
उससे भी अधिक सक्रिय एवं तेजस्वी रूप नारी को नाटककार प्रसाद ने प्रदत्त किया है।
में किसी न किसी ऐसी नारी की अवतारणा की है जो पृथ्वी के दुख पूर्ण, अंधकार पूर्ण मानवता को सुखमय उज्जवल
प्रकाश की प्रदायिनी बनी है। जो पाशविकता, दनुजता और क्रूरता के मध्य क्षमा, करुणा एवं प्रेम के स्थायी रूप की प्रतिष्ठा
करती है और अपने प्रभाव विचारों तथा चरित्र के दुर्जनों को सज्जन दुराचारियों को सदाचारी, नृशंस अत्याचारियों को
उदार लोकसेवी बना देती है।
की दृष्टि से प्रसाद के नाटकों में पूर्वी एवं पश्चिमी तत्वों का अपूर्व सम्मिश्रण दृष्टिगोचर होता है। प्रसाद के नाटकों में
एक ओर भारतीय नाट्यशास्त्रानुसार कथावस्तु, नायक, प्रतिनायक, विदूषक, शील निरूपण, रस, सत्य और न्याय विजय
की परंपरा का पूर्ण सफलता से पालन हुआ है दूसरी ओर पाश्चात्य नाटकों का संघर्ष एवं व्यक्ति वैचित्रय का निरूपण
भी उनकी रचनाओं में उसी तरह हुआ है। भारतीय नाट्य परंपरा की रसात्मकता इनमें प्रचुरता से उपलब्ध है साथ-साथ
पाश्चात्य नाटकों की सी कार्य व्यापार की गतिशीलता भी उनमें विद्यमान है। भारतीय नाटक सुखांत होते हैं। पाश्चात्य
नाटककार दुखांत। नाटकों को श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं।
दुखांत दोनों की संज्ञा दी जाती है क्योंकि उन्होंने सुख दुखांतक नाटकों का सृजन किया है। दूसरी दृष्टि से उन नाटकों
को न सुखांत कहा जा सकता है न दुखांत कहा जा सकता है। वास्तव में नाटकों का अंत एक ऐसी वैराग्य भावना के
साथ होता है जिसमें नायक विजयी हो जाता है किंतु वह फल का उपभोग स्वयं नहीं करता है। उसे वह प्रतिनायक
को ही प्रत्यावर्तित कर देता है।
मंचन की दृष्टि से प्रसाद के नाटकों में आलोचकों को अनेक दोष दृष्टिगोचर होते हैं। कथानक विस्तृत एवं विÜाृंखल सा
है कि उससे उनमें शैथिल्य आ गया है। उन्होंने ऐसी अनेक घटनाओं एवं दृश्यों का आयोजन किया है जो मंचन की दृष्टि
से उपयुक्त एवं उचित नहीं। दीर्घ स्वगत कथन एवं लंबे वार्तालाप, गीतों का आधिक्य, वातावरण की गंभीरता आदि बातें
उनके नाटकों की अभिनेयता में अवरोधक सिद्ध होती हैं। वास्तव में प्रसाद नाटकों में कवि एवं दार्शनिक अधिक हैं,
नाटककार कम हैं। उनके नाटक विद्वानों, ऋषियों, मनीषियों के चिंतन मनन की वस्तु हैं। जन साधारण के समक्ष उनका
सफल प्रदर्शन नहीं किया जा सकता है इस तथ्य को प्रसाद में स्वयं व्यक्त किया है।
प्रसाद युग के अन्य नाटककार माखन लाल चतुर्वेदी, ‘कृष्णार्जुन युद्ध’, पंडित गोविंद वल्लभ पंत – ‘वरमाला’, एवं
‘राजमुकुट’ आदि। पांडेय बेचन शर्मा उग्र – ‘महात्मा ईसा’, मुंशी प्रेम चन्द – ‘कर्बला’ एवं ‘संग्राम’ आदि उल्लेखनीय हैं।
ध्यातव्य है कि विषय एवं शैली की दृष्टि से इन नाटककारों में परस्पर थोड़ा बहुत अंतर अवश्य है। परिणामत: इन्हें
नाटककार स्वरूप विशिष्टता विहीनता के कारण महत्व नहीं दिया जाता है।
प्रसादोत्तर नाटक- प्रसादोत्तर नाटक साहित्य को ऐतिहासिक, पौराणिक, सांस्कृतिक, सामाजिक राजनीतिक कल्पनाश्रित
एवं अन्य वर्गों में विभाजित किया जा सकता है। पुन: कल्पना आश्रित नाटकों को समस्या प्रधान, भावप्रधान तथा
प्रतीकात्मक नाटक तीन उप विभागों में विभक्त किया जा सकता है।
क) ऐतिहासिक- प्रसादोत्तर युग में ऐतिहासिक नाटकों की परंपरा का अत्यधिक विकास हुआ है। ऐतिहासिक
नाटककारों में हरिकृष्ण प्रेमी, वृंदालाल वर्मा, गोविंद वल्लभ पंत, चन्द्रगुप्त विद्यालंकार, उदय शंकर भट्ट तथा
कतिपय अन्य नाटककारों ने अपूर्व योगदान किया है।
हरिकृष्ण प्रेमी- हरिकृष्ण प्रेमी के ऐतिहासिक नाटकों में – ‘रक्षाबंधन’ 1934, ‘शिव साधना’ 1936, ‘प्रतिशोध स्वप्न
भंग’ 1940, ‘आहुति’ 1940, ‘उद्धार’ 1940, ‘शपथ’, ‘कानन प्राचीर प्रकाश स्तंभ’ 1954, ‘कीर्ति स्तंभ’ 1955, ‘विदा’
1958, ‘संवत प्रवर्तन’ 1959 ‘सापों की सृष्टि’ 1959 ‘आन मान’ 1961 आदि नाटकों का उल्लेख किया जा सकता
है। प्रेमी ने अपने नाटकों में अति प्राचीन या सुदूर पूर्व इतिहास को नाटक विषय का चयन न करके मुसलमानों
के इतिहास को चयनित करके उसकें संदर्भ में आधुनिक युग की अनेक राजनीतिक, साम्प्रदायिक एवं राष्ट्रीय
समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करने का सफल प्रयास किया है। उनके नाटकों ने आधुनिक भारतीय भारतीयों में
राष्ट्र भक्ति, आत्मा त्याग, बलिदान, हिंदू मुस्लिम एकता आदि भावों तथा प्रवृत्तियां उदीप्त की तथा प्रबलता भरी
है। ऐतिहासिकता का उपयोग रोमांस के लिए नहीं किया गया है। आदर्शों की स्थापना के लिए ऐतिहासिकता का
ग्रहण किया गया है। प्रेमी की रचनाएं, नाट्य कला एवं शिल्प विधान की दृष्टि से दोष रहित तथा सफल प्रमाणित
हुई है।
वृन्दावन लाल वर्मा- वृन्दावन लाल वर्मा इतिहास वेत्ता है। उनकी इतिहास विज्ञता की अभिव्यक्ति का माध्यम
उपन्यास एवं नाटक दोनों हैं। उनके ऐतिहासिक नाटकों में ‘झांसी की रानी’ – 1948 ‘पूर्व की ओर’ 1950 ‘बीरबल’
1950 ‘ललित विक्रम’ 1953 आदि का विशेष महत्व है। इनके अतिरिक्त वर्मा ने सामाजिक नाटकों की भी सृजना
की। वर्मा के नाटकों में कथावस्तु एवं घटनाओं को विशेष महत्व का विषय बनाया गया है। कही कही उनकी घटना
प्रधानता भी दृष्टिगोचर होती है। दृश्य विधान की सरलता, चरित्र -चित्रण की स्पष्टता, भाषा की उपयुक्तता,
गतिशीलता एवं संवादों की संक्षिप्तता ने उनके नाटकों को मंचन की दृष्टि से पूर्ण सफलता प्रदान की है।
गोविंद
साहित्य में ‘राजमुकुट’ 1935, ‘अंत: पुर का छिद्र’ 1940 आदि प्रमुख हैं। ‘राजमुकुट’ में मेवाड़ की पन्ना धाय के
पुत्रा का बलिदान तथ ‘अंत:पुर का छिद्र’ में वत्सराज उदयन के अंत:पुर की कलह का चित्राण अति प्रभावोत्पादक
ढंग से किया गया है। पंत के नाटकों पर संस्कृत, अंग्रेजी एवं पारसी नाटकों की विभिन्न परंपराओं का प्रभाव
दृष्टिगोचर होता है। नाटकों को अभिनेय बनाने का पूरा प्रयास किया गया है।
कुछ ऐसे नाटककार हैं जिनका ऐतिहासिक क्षेत्रा नहीं है उनका संबंध अन्य क्षेत्रों से है किन्तु कभी-कभी वे इतिहास
को अपने नाटकों का विषय बनाकर साहित्य सृजन करते हैं। ऐसे ऐतिहासिक नाटककारों में प्रमुख नाटककार
एवं उनके नाटक निम्नलिखित हैं-
चंद्रगुप्त विद्यालंकार– ‘अशोक’ 1935, ‘रेवा’ 1938।
सेठ गोविंद दास – ‘हर्ष’ 1942, ‘शशि गुप्त’ 1942.
सियाराम शरण गुप्त- ‘पुण्य पर्व’ 1933।
उदय शंकर भट्ट- ‘मुक्ति पथ’ 1944, ‘दाहर’ 1933, ‘शक विजय’ 1949।
लक्ष्मी नारायण मिश्र- ‘गरुणध्वज’ – 1948, ‘वात्सराज’ 1950, ‘वितस्ता की लहरों’ 1953।
सत्येंद्र- ‘मुक्ति यज्ञ’ 1936।
जगन्नाथ प्रसाद मिलिंद- ‘गौतम नंद’।
उपेन्द्र नाथ अश्क- ‘जय पराजय’ 1936।
सुदर्शन- ‘सिकंदर’ 1947।
बैकुंठ नाथ दुग्गल-
बनारसी दास करुणा- ‘सिद्धार्थ बुद्ध’ 1955।
जगदीश चन्द्र माथुर- ‘कोणार्क’ 1951।
देवराज यशस्वी- भोज, मानव प्रताप 1952।
चतुरसेन शास्त्री- ‘छत्रासाल’।
इनके अतिरिक्त कुछ लेखकों ने जीवनी परक नाटकों की भी रचना की है। जिनमें
- लक्ष्मीनारायण- ‘इंदु’ – 1955।
- सेठ गोविंद दास- ‘भारतेंदु’ – 1955, ‘रहीम’ 1955।
इन्हें भी ऐतिहासिक नाटकों में सम्मिलित किया जा सकता है।
ऐतिहासिक नाटकों की कथित सूची यह स्पष्ट कर देती है कि ऐतिहासिक नाटकों की अत्यधिक प्रगति एवं
अभिवृद्धि हुई है। इनमें इतिहास और कल्पना का सुंदर समन्वय तथा संतुलित संयोग मिलता है। अधिकांश नाटकों
में इतिहास की केवल घटनाओं का ही नहीं अपितु उनके सांस्कृतिक परिवेश का भी प्रस्तुतीकरण किया गया है।
पात्रों का अंतर्द्वन्द्व युगीन चेतना तथा समसामयिक सत्य को उद्घाटित करने का प्रयास भी नाटककारों ने किया
है। पूर्व नाटककारों की तुलना से स्पष्ट हो जाता है कि इनमें कला, शिल्प एवं शैली की दृष्टि से विशेष विकास
किया है। यत्रा-तत्रा ऐतिहासिक ज्ञान, भाव विचार तथा प्रयोगों की नूतनता पर अधिक बल दिए जाने के
परिणामस्वरूप रोचकता एवं प्रभावोत्पादकता कम हो गई है।
(ख) पौराणिक- इस कालावधि में पौराणिक नाटकों की परंपरा भी विकसित हुई। विभिन्न लेखकों ने नाटक का विषय
एवं आधार पौराणिकता को बनाया तथा अनेक श्रेष्ठ नाटकों का सृजन किया जिनका विवरण इस प्रकार है-
सेठ गोविंद दास- ‘कर्त्तव्य’ 1935, ‘कर्ण’ 1946।
चतुर सेन शास्त्री- ‘मेघनाथ’ 1939, ‘राधाकृष्ण’।
रामवृक्ष बेनीपुरी- ‘सीता की मां’।
किशोरी दास वाजपेयी- ‘सुदामा’ – 1939।
गोकुल चन्द्र शर्मा- ‘अभिनय रामायण’।
पृथ्वी नाथ शर्मा- ‘उर्मिला’ 1950।
सद्गुरु शरण अवस्थी- ‘मझली रानी’।
वीरेंन्द्र कुमार गुप्त- ‘सुभद्रा परिणय’।
उदय शंकर भट्ट– ‘विद्रोहिणी अम्बा’ 1935, ‘सागर विजय’ 1937।
कैलाश नाथ भटनागर- ‘भीम प्रतिज्ञा’ 1934, ‘श्री वत्स’ 1941।
पांडेय बेचन शर्मा उग्र- ‘गंगा का बेटा’ -1940।
तारा मिश्र- ‘देवयानी’ 1944।
डॉ. लक्ष्मण स्वरूप – ‘नल दमयंती’ 1941।
प्रभुदत्त ब्रह्मचारी- ‘श्रीशुक’ 1944।
सूर्य नारायण मूर्ति- ‘महानाश की ओर’ 1960।
प्रेमनिधि शास्त्री- ‘प्रणमूर्ति’ 1950।
उमाशंकर बहादुर– ‘मोल’ 1951।
गोविंद वल्लभ पं.- ‘ययाति’ 1951।
डॉ. कृष्ण दत्त भारद्वाज- ‘अज्ञात वास’ 1952।
मोहन लाल जिज्ञासु– ‘पर्वदान’ 1952।
हरिशंकर सिन्हा ‘श्रीनिवास’- ‘मां दुर्गे’ 1953।
लक्ष्मी नारायण मिश्र- ‘नारद की वीणा’ 1946, ‘चक्रव्यूह’ 1954।
रांगेस राघव- ‘स्वर्ग भूमि का यात्राी’ 1951।
गुंजन मुखर्जी– ‘शक्ति पूजा’ 1952।
जगदीश- ‘प्रादुर्भाव’ 1955 आदि।
विशेषताएं- डॉ. देवर्षि सनाढ्य शास्त्री ने अपने शोध प्रबंध में पौराणिक नाटकों की विशेषताओं का विवेचन, विश्लेषण करते हुए कहा
है-
- “इनका कथानक पौराणिक होते हुए भी उसके ब्याज से आधुनिक समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करने का प्रयास
किया गया है। पौराणिक कथाओं के माध्यम से किसी ने कर्त्तव्य के आदर्श को पाठकों के समक्ष रखा है किसी
ने शिक्षित पात्रा के साथ सहानुभूति के दो आंसू बहाएं हैं किसी ने जाति-पांति की समस्याओं के समाधान ढूंढने
का प्रयास किया है। किसी ने नारी के गौरव के प्रति अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किए हैं। अधिकांश नाटककारों ने
इन पौराणिक नाटकों के माध्यम से वर्तमान जीवन को सांत्वना एवं आशा की ज्योति प्रदर्शित की है।” - इन नाटकों की दूसरी विशेषता यह है कि प्राचीन संस्कृत के आधार पर पौराणिक असंबद्ध एवं संगति स्थापित
करने का भरसक यत्न किया है। - पौराणिक नाटक वर्तमान जीवन को संकीर्णता एवं सीमा की प्रतिबद्धता से निकालकर आधुनिक मानव समाज को
व्यापकता एवं विशालता का संदेश देकर उन्हें उन्नति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हुए अग्रसर करते हैं।
रंग मंच एवं नाट्य शिल्प की दृष्टि से इनके अनेक नाटकों में दोष दर्शन किये जा सकते हैं किंतु गोविंद बल्लभ
पंत, सेठ गोविंद दास एवं लक्ष्मी नारायण मिश्र जैसे प्रौढ़ नाटककारों में दोष नहीं है। विषयवस्तु की दृष्टि से ये
नाटक पौराणिक होते हुए भी प्रतिवादन शैली एवं कला के विकास की दृष्टि से आधुनिक तथा वे आज की
सामाजिक रूचि एवं समस्याओं के प्रतिकूल नहीं हैं।
(ग) कल्पनाश्रित- इस युग के कल्पना पर आश्रित नाटकों को उनकी मूल प्रवृत्ति के अनुसार तीन वर्गों में विभाजित
किया जा सकता है।
- समस्याप्रधान नाटक
- भावप्रधान नाटक
- प्रतीकात्मक नाटक।
1. समस्याप्रधान नाटक- समस्या प्रधान नाटकों को प्रचलन में लाने का श्रेय इब्सन, बर्नाडसा आदि पाश्चात्य
नाटककारों को है। पाश्चात्य नाटक के क्षेत्रा में रोमांटिक नाटकों की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप यथार्थवादी
नाटकों का प्रादुर्भाव हुआ, जिनमें सामान्य जीवन की समस्याओं का समाधान विशुद्ध बुद्धि की दृष्टि से खोजा
जाता है। इनमें यौन समस्याओं को ही ग्रहण किया गया है। बाह्य द्वंद्व की अपेक्षा आंतरिक द्वंद्व को अधिक
प्रदर्शित किया गया है। स्वागत-भाषण, गीत, काव्यात्मकता आदि का इनमें त्याग कर दिया गया है।
विषयवस्तु की दृष्टि से इन्हें भी दो उपभेदों में बांटा जा सकता है-
- मनोवैज्ञानिक नाटक- मनोवैज्ञानिक नाटकों में मुख्य रूप से काम संबंधी समस्याओं का विश्लेषण
यौन-विज्ञान तथा मनोविश्लेषण के आधार पर प्रस्तुत किया गया है। लक्ष्मी नारायण मिश्र के नाटक इसी
कोटि के हैं। - सामाजिक नाटक- वर्तमान युग एवं समाज की विभिन्न समस्याओं का समाधान आदर्शवादी दृष्टिकोण
से प्रतिपादित किया गया है। इस वर्ग के नाटककारों में सेठ गोविंद दास, उपेंद्र नाथ अश्क, वृंदावन लाल
शर्मा, हरिकृष्ण प्रेमी तथा गोविंद वल्लभ पंत आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।
लक्ष्मी नारायण मिश्र– लक्ष्मीनारायण मिश्र के अनेक समस्या प्रधान नाटकों में ‘सन्यासी’ 1931, ‘राक्षस मंन्दिर’
1931, ‘मुक्ति का रहस्य’, 1932, ‘राजयोग’ 1934, ‘सिंदूर की होली’ 1934, ‘आधी रात’ 1937 आदि
उन्लेखनीय नाटक हैं। इनके अतिरिक्त इन्होंने कुछ ऐतिहासिक नाटक भी लिखे हैं। मिश्र के इन नाटकों में
बुद्धि, यथार्थ एवं फ्रायड को प्रधानता दी गई है। इब्सन, बर्नाडसा आदि पाश्चात्य नाटककारों की तरह इन्होंने
भी जीवन के प्रति विशुद्ध बौद्धिक दृष्टि अपनाई है तथा पूर्ववर्ती रोमांटिक या रूमानी प्रवृत्ति का विरोध किया
है। इनके अधिकांश नाटकों में यौन समस्याओं एवं काम समस्याओं को ही सबसे अधिक नाटक का विषय
बनाकर उसे महत्व प्रदान किया है।
सामाजिक नाटकों के क्षेत्र में उपेन्द्र नाथ अश्क, वृंदावन लाल वर्मा, हरिकृष्ण प्रेमी, आदि का विशेष स्थान
है। गोविंद दास ने ऐतिहासिक, पौराणिक विषयों के अतिरिक्त सामाजिक समस्याओं का चित्राण अपने अनेक
नाटकों में किया है जिनमें ‘कुलीनता’ 1940 ‘सेवा पथ’ 1940, ‘दुख क्यों?’ 1946 ‘सिद्धांत स्वातंत्रय’ 1938,
‘त्याग या ग्रहण’ 1943 ‘संतोष कहां’ 1945, ‘पाकिस्तान’ 1946, ‘महत्व किसे’ 1946, ‘गरीबी और अमीरी’
1946 तथा ‘बड़ा पापी कौन’ 1948 आदि उल्लेखनीय नाटक हैं। सेठ ने आधुिनक युग की विभिन्न सामाजिक
राजनीतिक राष्ट्रीय समस्याओं का सफलतापूर्वक चित्राण किया है।
उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’- ‘अश्क’ ऐसे नाटककार हैं जिनमें न तो विशुद्ध यथार्थवाद है न ही आदर्शवाद। उनके
नाटक यथार्थ आदर्श के मध्य की कड़ी हैं। प्रेमचंद के सान इन्हें भी आदर्शोन्मुखी यथार्थवादी कहा जा
सकता। इनकी भावभूमि यथार्थ है जो आदर्श अपनाए हुए हैं। उन्होंने व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र की विभिन्न
समस्याओं का चित्राण जहां यथार्थ के स्तर पर किया है वहीं उनकी सुधार या क्रांतिकारी नीति उन्हें
आदर्शवादी बना देती है। उनके नाटकों में प्रमुख नाटक ‘स्वर्ग की झलक’ 1939, ‘कैद’ 1945, ‘उड़ान’ 1949,
‘छठा बेटा’ 1949 तथा ‘अलग अलग रास्ते’ 1955 आदि विशेष उल्लेखनीय हैं।
इन्होंने अपने नाटकों में नारी शिक्षा, नारी स्वतन्त्राता, विवाह समस्या, संयुक्त परिवार आदि से संबंधित विभिन्न
पक्षों पर सामाजिक दृष्टिकोण से करारा व्यंग्य किया है। अनेक नाटकों में उन्होंने समाज की वर्तमान
स्वार्थपरता, धनलोलुपता, कामुकता, अनैतिकता आदि का यथार्थवादी शैली में चित्राण किया है। अश्क की
सर्वप्रमुख नाट्य विशेषता यह है कि वे समस्याओं और समाधानों का प्रस्तुतीकरण उपदेशात्मक प्रणाली या
अति गंभीरता से नहीं करते हैं। अपितु वे इसके लिए हास्य व्यंग्यात्मक शैली का चयन करते हैं। जिससे
उनके प्रभाव में अधिक तीव्रता एव तिखाई आ जाती है। रंगमंच एवं नाट्य शैली की दृष्टि से ‘अश्क’ अतुलनीय
है।
वृंदावन लाल वर्मा- वृंदावन लाल वर्मा का जो स्थान ऐतिहासिक उपन्यासकारों में है वही स्थान सामाजिक
नाटकों में है। इस क्षेत्रा में इनको अपूर्व सफलता मिली है। इस वर्ग के इनके नाटकों में ‘राखी की लाज’ 1943,
‘बांस की फांस’ 1947, ‘खिलौने की खोज’ 1950, ‘नीलकंठ’ 1951, ‘सगुन’ 1951, ‘विस्तार’ 1956 तथा ‘देखा
देखी’ 1956 आदि प्रमुख हैं। वर्मा ने इन नाटकों में छुआछूत, विवाह, जाति पांति, ऊंच नीच, सामाजिक
विषमता तथा नेताओं की स्वार्थ परता आदि से संबंधित विभिन्न प्रवृत्तियों तथा समस्याओं का चित्रांकन किया
है।
गोविंद वल्लभ पंत- गोविंद वल्लभ पंत के सामाजिक नाटकों में ‘अंगूर की बेटी’ 1936 तथा ‘सिंदूर की बिंदी’
आदि प्रमुख नाटक हैं। ‘अंगूर की बेटी’ जैसा कि नाम से ज्ञात हो जाता है अंगूर से जन्मी अर्थात् शराब पीने
की भयंकरता से अवगत कराते हुए इस व्यवसन से मुक्ति पाने की विधि पर प्रकाश डाला गया है। ‘सिंदूर
की बिंदी’ विवाहिता नारी के सुहाग का प्रतीक हैं। परित्यक्ता का यह सौभाग्य छिन जाता है कि उसे अनेक
भयंकर समस्याओं का सामना करना पड़ता है। प्रस्तुत उपन्यास उन्हीं समस्याओं, सहानुभूतिमय ढंगों से
प्रस्तुत किया गया हैं। पंत के नाटकों में सर्वत्रा समाज सुधार की भावना दृष्टिगोचर होती है। कथा की प्रस्तुति
इस ढंग से की जाती है कि उसमें रोचकता या कलात्मकता का अभाव नहीं आने पाता।
पृथ्वी नाथ शर्मा- पृथ्वी नाथ शर्मा के नाटकों में ‘दुविधा’, ‘शाप’, ‘अपराधी’ 1939, तथा ‘साध’ 1944 आदि
नाटकों की प्रमुखता है। जिसमें उन्मुक्त पे्रम, विवाह तथा सामाजिक न्याय से संबंधित विभिन्न प्रश्नों को प्रस्तुत
किया गया है। ‘दुविधा’ की नायिका स्वच्छंद प्रेम एवं विवाह में से किसी एक का चयन की दुविधा से ग्रस्त
दिखाई गई है। यही समस्या ‘साण’ में भी प्रस्तुत की गई है। इस दृष्टि से पृथ्वी नाथ शर्मा लक्ष्मी नारायण
मिश्र के निकटस्थ हो जाते हैं। किन्तु अंतर इतना है कि इनका दृष्टिकोण मिश्र की तरह अति भौतिकतावादी
और अति यथार्थवादी नहीं है।
इस युग के अन्य सामाजिक नाटकों में उदयशंकर भट्ट – ‘कमला’ 1939, ‘मुक्ति पथ’ 1944 तथा ‘क्रांतिकारी’।
हरिकृष्ण प्रेमी – ‘छाया’
प्रेमचंद – ‘प्रेम की वेदी’ 1933।
जगन्नाथ प्रसाद मिलिंद- ‘समर्पण’ 1950।
चतुरसेन शास्त्री- ‘पगन्ध्वनि’ 1952।
दयानाथ झा ‘कर्म पथ’ 1953।
जयनाथ नलिन ‘अवसान’
शंभूनाथ सिंह – ‘धरती और आकाश’ 1954।
अभय कुमार यौधेय- ‘नारी की साधना’ 1954।- रघुवीर शरण मित्र- ‘भारत माता’ 1954।
श्री संतोष- ‘मृत्यु की ओर’
तुलसी भाटिया- ‘मर्यादा’ तथा
रामनरेश- ‘पैसा परमेश्वर’ आदि उल्लेखनीय हैं।
2. भावप्रधान नाटक- कल्पनाश्रित नाटकों का दूसरा वर्ग भाव प्रधान नाटकों का है। शैली की दृष्टि से इस वर्ग को
गीति नाटक नाम से भी अभिहित किया गया है। इस वर्ग के नाटकों के लिए भाव की प्रमुखता के साथ-साथ पद्य
का माध्यम भी अपेक्षित होता है। आधुनिक युग में रचित हिंदी का प्रथम गीति नाटक जय शंकर प्रसाद द्वारा रचित
‘करुणालय’ (सन् 1912 ई.) माना गया है। इसमें पौराणिक आधार पर राजा हरिश्चन्द्र तथा शन: शेष की बलि की
कथा का वर्णन किया गया है।
नहीं हुई। परवर्ती युग में अनेक गीति नाटकों की रचना हुई। जिसमें मैथिलीशरण गुप्त – ‘अनध’ – 1925, हरिकृष्ण
प्रेमी – ‘स्वर्ण विहान’, उदयशंकर भट्ट मत्सयगंधा, विश्वामित्रा तथा राधा आदि, सेठ गोविंद दास स्नेह या स्वर्ग –
1946 भगवती चरण वर्मा ‘तारा’ आदि। भाव प्रधान नाटकों के क्षेत्रा में सबसे अधिक सफल उदयशंकर भट्ट रहे हैं।
किया है। इनमें पात्रों के वार्तालाप भी प्राय: लय और संगीत से परिपूर्ण शब्दों में प्रस्तुत किए गए हैं। इसके
अतिरिक्त सुमित्रानंदन पंत ‘रजत शिखर’ धर्म वीर भारती ‘अंधा युग’ आदि उल्लेखनीय हैं।
3. प्रतीकात्मक नाटक- प्रतीकात्मक या प्रतीकवादी नाटकों का श्रीगणेश जयशंकर प्रसाद के नाटक ‘कामना’ (सन्
1926 ई.) से हुआ। सुमित्रानंदन पंत – ‘ज्योत्सना’ 1934, भगवती प्रसाद वाजपेयी, ‘छलना’ 1939, सेठ गोविंददास
‘नव रस’, कुमार हृदय ‘नक्शे का रंग’ 1941, डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल ‘मादा कैक्टस’, एवं ‘सुंदर रस’ 1959 आदि
सुंदर प्रतीकात्मक नाटक हैं। इस वर्ग के नाटकों में विभिन्न पात्रा विभिन्न विचारों या तत्वों के प्रतीक रूप में प्रस्तुत
किए गए हैं।
क) सांस्कृतिक– सांस्कृतिक चेतना से युक्त नाटकों का निर्माण इस युग में हुआ जिसमें चन्द्रगुप्त विद्यालंकार – ‘अशोक’
एवं ‘रेवा’, ‘सेठ गोविंद दास’ – ‘शशिगुप्त’, उदयशंकर भट्टा ‘मुक्तिपथ’, सियाराम शरण गुप्त – ‘पुण्य पाप’,
लक्ष्मीनारायण मिश्र – ‘गरुण ध्वज’ तथा गोविंद वल्लभ पंत – ‘अंत: पुर का छिद्र’ आदि उल्लेखनीय हैं। इतिहास
के आधार पर इनके कथानक का निर्माण किया गया है। लेकिन सांस्कृतिक पुनरुत्थान की चेतना सब में विद्यमान
है। इनकी सांस्कृतिक पुनरुत्थान चेतना की तुलना करनें में प्रसाद से बहुत अधिक साभ्य दिखलाई पड़ता है। अंतर
इतना है कि प्रसाद में भावुकता, दार्शनिकता भाषागत जटिलता थी किंतु इन नाटकों में जटिलता नहीं है।
ख) समस्यात्मक– पाश्चात्य नाटककारों मुख्य रूप से इब्सन एवं बर्नाडसा की यथार्थवादी चेतना से प्रभावित होकर हिंदी
साहित्य में नाटक लिखने वालों ने समस्यात्मक नाटक लिखने की ओर अपना ध्यान केन्द्रित किया। फ्रायड ने मानों
यह घोषणा कर दी थी कि मानव की व्यापक एवं प्रमुख समस्या काम समस्या है। किंचित इसी घोषणा से प्रभावित
होकर समस्या नाटकों में यौन समस्या को मुख्य रूप से उभारा गया तथा वासना या काम भावना का प्रमुखता
के साथ वर्णन किया गया। वैयक्तिक समस्याओं, उलझनों, मानसिक अंतर्द्वन्द्वों का विवेचन एवं विश्लेषण
मनोवैज्ञानिक ढंग से किया गया है।
नाटकों के अधिष्ठाता एवं संस्थापक हैं। इस प्रकार परंपरा का श्रीगणेश उन्होंने ‘सन्यासी’ नामक समस्या नाटक
लिखकर किया। उनके अन्य समस्य नाटक ‘राक्षस का मन्दिर’, ‘मुक्ति का रहस्य’, ‘राजयोग’, ‘सिंदूर की होली’,
तथा ‘आधी रात’ आदि प्रमुख हैं। इन नाटकों में बौद्धिकता एवं यथार्थवाद का आधिक्य है। प्रेम विवाह एवं काम
समस्याओं का चित्रण निडरता से किया गया है। भावुकतावादी रोमांस के मिश्र विरोधी हैं। मिश्र के प्रयासों से नाटक
विश्व में नवीनता का समावेश एवं व्यापक प्रयोग किया है।
ग) सामाजिक एवं राजनीतिक- इस युग में सामाजिक एवं राजनीतिक समस्याओं को अनेक नाटकों में आधार स्वरूप
ग्रहण किया गया है। इस दृष्टि से सेठ गोविंददास, उपेंद्रनाथ अश्क, वृंदावन लाल वर्मा आदि का योगदान महत्वपूर्ण
है। गोविंददास के नाटकों में सिद्धांत स्वातंत्रय, ‘सेवा पथ’, ‘महत्व किसे’, ‘संतोष कहां’ तथा ‘गरीबी और अमीरी’
आदि में सामाजिक एवं राजनीतिक समस्याओं का चित्राण किया गया है। उपेन्द्रनाथ अश्क के नाटकों में ‘स्वर्ग की
झलक’ ‘कैद’, ‘उड़ान’, ‘छठा बेटा’ आदि उल्लेखनीय हैं। ‘स्वर्ग की झलक’ में नारी-शिक्षा की समस्या को व्यंग्य
के माध्यम से उभारा गया है। ‘छठा बेटा’ स्वप्न नाटक है जिसके द्वारा यह प्रदर्शित करने का यत्न किया गया है
कि मानव अपनी जिन इच्छाओं की पूर्ति जागृतावस्था में पूर्ण नहीं कर पाता स्वप्न अर्थात् अर्द्ध निंद्रा में उन कामनाओं
की पूर्ति की प्रबल कामना करता है। अश्क के नाटकों में नारी शिक्षा, नारी स्वातंत्रय, वैवाहिक समस्या तथा संयुक्त
परिवार सें संबद्ध अनेक सामाजिक समस्याओं का प्रस्तुतीकरण करके मानव को उनसे मुक्ति प्राप्त करने हेतु चिंतन
के लिए बाध्य कर दिया गया है। मंचन की दृष्टि से अश्क के नाटक सफल हैं।
सामाजिक एवं राजनीतिक समस्याओं को आधार रूप में ग्रहण करके कुछ नाटकों की भी रचना हुई है। जिनमें
वृंदावन लाल शर्मा कृत ‘धीरे-धीरे’, ‘राखी लाज’, एवं ‘बांस की फांस’। गोविंद वल्लभ पंत कृत ‘अंगूर की बेटी’,
‘सिंदूर की बिंदी’, पृथ्वी नाथ शर्मा कृत ‘अपराधी एवं साधु’ तथा उदय शंकर भट्ट कृत ‘कमला’ एवं ‘क्रांतिकारी’
आदि उल्लेखनीय हैं। इन नाटकों में भिन्न भिन्न परिवेशों एवं समस्याओं का सफल चित्रांकन हुआ है।
इनके अतिरिक्त इस युग में नीति नाटक, एवं एकांकी नाटक भी लिखे गए हैं। सिने नाटक भी लिखे जाने लगे।
डॉ. राम कुमार वर्मा – ‘स्वप्न चित्रा’ तथा भगवती चरण वर्मा – ‘वासवदत्त’ का चित्रालेख प्रमुख है।
घ) स्वतंत्रयोत्तर- स्वतंत्राता के पश्चात् नाटक लेखन की गति में त्वरा आई। हिंदी नाटक साहित्य को समृद्ध करने वाले
नाटककारों में – नरेश मेहता – ‘सुबह के घंटे’, लक्ष्मीकांत वर्मा – ‘खाली कुर्सी की आत्मा’, शिव प्रसाद सिंह,
‘घंटियां गूंजती हैं’, मन्नू भंडारी – ‘बिना दीवारों का घर’, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना – ‘बकरी’, ‘मुद्राराक्षस’, ‘तिलचट्टा’,
शंकर घोष – ‘एक और द्रोणाचायर्’, भीष्म साहनी – ‘हानूश’ एवं ‘कविरा खड़ा बाजार में’, विमला रैना – ‘तीन
युग’, सर्वदानंद – ‘भूमिजा’, श्रीमती कुसुम कुमार – ‘दिल्ली ऊंचा सुनती है’, सुरेन्द्र वर्मा – ‘सूर्य की अंतिम किरण’
से ‘सूर्य की पहली किरण’ तक, मणि मधुकर – ‘रस गंधर्व’, सुशील कुमार सिंह, ‘सिंहासन खाली है’, ज्ञान देव
अग्निहोत्राी- ‘शुतुरमुर्ग’, गिरिराज किशोर- ‘प्रजा ही रहने दो’, हमीदुल्ला – ‘समय संदर्भ’, तथा प्रभात कुमार
भट्टाचार्य ‘काठ महल’ आदि विशेष उल्लेखनीय नाटक हैं
‘नुक्कड़ नाटक’ आधुनिक काल की देन हैं। टेलीविजन सीरियलों (धारावाहिकों) तथा टेलीविजन नाटक युग की
मांग है। जिससे नाटक का बहु आयामी विकास हो रहा है। आज हिंदी नाटकों का विकास नई दिशाओं एवं विभिन्न
रूपों में होना हिंदी नाटक साहित्य की महत्वपूर्ण उपलब्धि है।