अनुक्रम
वस्तुतः उत्तर मध्य काल के नामकरण को लेकर विद्वानों में मतभेद रहे हैं। मिश्रबधुओं ने इसे अलंकृत काल
कहा है तो आचार्य शुक्ल ने इसे रीतिकाल नाम दिया है। पं. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने इसे शृंगार काल कहा। इसी
प्रकार डाॅ. रमाशंकर शुक्ल रसाल ने इसे कला कला कहा है और डाॅ. भगीरथ मिश्र ने इसे रीति शृंगार काल कहा
है। इन सभी नामों में केवल रीतिकाल नाम ही अधिक उपर्युक्त एवं न्याय संगत है, क्योंकि इस काल के अधिकांश
ग्रंथ रीति सम्बन्धी ही थे और कवियों की प्रवृत्ति भी केवल रीति ग्रंथों को रचने की थी।
कवियों ने किसी भी रीतिग्रंथ की रचना नहीं की थी, और इस दृष्टि से वे इस प्रवृति में नहीं आते, फिर भी रीति
कवियों व रीति ग्रंथों का बाहुल्य देखते हुए इसे रीतिकाल कहना सर्वथा उपर्युक्त है।
रीतिकाल के प्रमुख कवि और उनकी रचनाएं
- केशवदास
- बिहारीलाल
- चिन्तामणि त्रिपाठी
- भूषण
- मतिराम
- देव
- भिखारीदास
- पद्माकर
- घनानन्द
केशवदास
परिचय पीछे ‘भक्तिकाल’ के अन्तर्गत दिया जा चुका है। यद्यपि ये अलंकारों को महत्व देने वाले चमत्कारवादी कवि माने जाते हैं, प्रमाणस्वरूप इनकी प्रसिद्ध उक्ति- ‘भूषण बिन न बिराजई कविता बनिता मित्त’ को उद्धृत किया जाता है। किन्तु इनके दो काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ ‘रसिकप्रिय’ और ‘कविप्रिया’ इन्हें अलंकारवादी सिद्ध नहीं करते हैं। ‘रसिकप्रिया’ कविता के श्रृंगार अलंकारों का विवेचन ग्रन्थ है।
बिहारीलाल
इनका जन्म ग्वालियर के पास बहुवा गोविन्दपुर नामक स्थान पर संवत् 1660 (सन् 1603 ई.) में हुआ था। इनका बचपन बुन्देलखण्ड में बीता और युवावस्था में अपनी ससुराल मथुरा में आ बसे थे। ये आमेर (जयपुर) के मिर्जा राजा जयसिंह के दरबार में रहा करते थे। कहा जाता है कि राजा से इन्हें प्रत्येक दोहे पर एक अशर्फी इनाम में मिला करती थी। बिहारी रीतिकाल के प्रसिद्ध कवि हैं। इनका एक मात्र ग्रन्थ ‘बिहारी सतसई’ है।
चिन्तामणि त्रिपाठी
इनका जन्म 1610 ई. में हुआ था। ये कानपुर के निकट तिकवांपुर के रहने वाले थे। कहते हैं ये चार भाई थे. चिन्तामणि, भूषण, मतिराम और जटाशंकर। चारों कवि थे। बहुत विद्वानों ने चिन्तामणि त्रिपाठी को ही रीतिकाल का प्रवर्तक माना है। इनका प्रसिद्ध काव्य.ग्रन्थ ‘कविकुल कल्पतरु’ है।
भूषण
इनका जन्म संवत् 1610 (1613 ई.) में हुआ था। ये चिन्तामणि और मतिराम के भाई थे। चित्रकुट से सोलंकी राजारुद्र ने इन्हें कवि भूषण की उपाधि से विभूषित किया था। उसी नाम से ये प्रसिद्ध हैं। इनका असली नाम क्या था, इसका पता नहीं चला ये महाराज शिवाजी और छत्रसाल के दरबार में रहे थे, दोनों ने इनका बड़ा मान किया था। कहते हैं, शिवाजी ने भूषण के एक-एक छन्द पर लाखों रुपये दिये थे।
मतिराम
ये कानुपर जिले के तिकवापुर नामक स्थान पर संवत् 1678 (1621 ई.) के लगभग उत्पन्न हुए थे। ये चिन्तामणि और भूषण कवि के भाई थे। ये बूंदी के महाराज भाव सिंह के यहाँ रहे थे। इनका रीतिकाल के कवियों में अच्छा स्थान है। ‘रसराज’ आरै ‘ललित ललाम’ इनके बहुत प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं।
देव
देव का जन्म संवत् 1730 (1673 ई.) में हुआ था। इनका पूरा नाम देवदत्त था। कहते हैं कि ये कई रईसों के यहाँ घूमते रहे, इन्हें कोई अच्छा आश्रयदाता नहीं मिला। एक भवानीदत्त वैद्य के नाम पर उन्होंने ‘भवानी विलास’ नामक ग्रन्थ लिखा। कुशलसिंह के नाम पर ‘कुशल विलास’ लिखा।
भिखारीदास
इनका कविता- काल संवत् 1786 से 1806 तक है। ये प्रतापगढ़ के पास ट्योंगा नामक गांव के रहने वाले थे। इनके पिता का नाम कृपालदास था। इन्होंने अपने परिवार का पूरा परिचय दिया है। अपने एक ग्रन्थ में इन्होंने अपने आश्रयदाता बाब ू हिन्दूपति सिंह का उल्लेख किया है।
पद्माकर
पद्माकर का जन्म संवत् 1810 में बांदा में हुआ था। ये रीतिकाल के लोकप्रिय कवि हैं। इनके काव्य रमणीयता की दृष्टि से बहुत प्रसिद्ध हैं। ये पंडित थे। इनका अनेक जगह बहुत सम्मान हुआ था।
घनानन्द
इनका जन्म संवत् 1746 के लगभग हुआ था। ये ब्रजभाषा के बहुत अच्छे कवि थे। घनानन्द स्वच्छन्द काव्यधारा की रीतिमुक्त कवियों में आते हैं। ये दिल्ली के बादशाह मुहम्मदशाह के मीरमुन्शी थे। कहते हैं, एक दिन इन्होंने बादशाह के कहने से ध्रुपद गाया नहीं और अपनी प्रेमिका सुजान नामक वेश्या के कहने से गाना गा दिया। बादशाह ने इन्हें शहर से निकाल दिया। तब वे सुजान के पास गये और अपने साथ चलने को कहा। पर जब सुजान इनके साथ नहीं गई, तो ये निराश होकर मृत्युपर्यन्त वृन्दावन में रहे और ‘सुजान’ छाप देकर प्रेम और भक्ति के गीत गाते रहे। ‘सुजानविनोद’, ‘सुजानसागर’, ‘विहार लीला’ आदि इनकी रचनाएँ हैं।