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रक्तचाप संबंधी क्रियाएँ मस्तिष्क में स्थित एक विशेष स्नायुकेंद्र के नियंत्रण में होती हैं। हमें इसका आभास नहीं होता। ग्रंथियों से निकलने वाले कुछ रासायनिक पदार्थ भी ऐसा ही प्रभाव ड़ालते है। इस प्रकार शरीर की आवश्यकता के अनुसार रक्तचाप प्रत्येक क्षण घटता बढ़ता रहता है। स्वस्थ अवस्था में यह रक्तचाप के घटने बढ़ने का अन्तर अधिक नहीं होता।
उच्च रक्तचाप प्रारंभिक उच्च रक्तचाप अथवा अज्ञात हेतुक उच्च रक्तचाप एवं द्वितीयक उच्च रक्तचाप अथवा लाक्षणिक उच्च रक्तचाप, दो प्रकार का होता हैं। वह उच्च रक्तचाप जिसमें बाह्यरूप से उसकी उत्पत्ति का कोई स्पष्ट कारण नहीं मिलता है उसे अज्ञात हेतुक उच्च रक्तचाप अथवा प्रारंभिक उच्च रक्तचाप कहा जाता है। 90प्रतिशत व्यक्ति इसी प्रकार के उच्च रक्तचाप से पीडि़त रहते है। इसके विपरीत कुछ ऐसे भी रोगी होते है जिनमें शुरू से ही कुछ न कुछ लक्षण अवश्य मिलते है। ऐसे उच्च रक्तचाप को लाक्षणिक उच्च रक्तचाप अथवा द्वितीयक उच्च रक्तचाप कहते है। यह अन्य रोगों के फलस्वरूप भी होता हैं।
उच्च रक्त चाप के प्रकार
उच्च रक्तचाप के कारण
1. वंशानुगत
2. उम्र
3. धूम्रपान
4. कोलेस्टेराॅल एवं उच्च वसायुक्त भोजन
5. निष्क्रिय जीवनशैली
6. व्यक्तित्व, तनाव एवं मनोभाव
- अल्कोहल का सेवन
- मोटापा
- गर्भकाल में भी रक्त चाप बढ़ने की संभावना रहती है
- कुछ गुर्दा रोग जैसे रेनल वेसक्युलर रोग, पेरेनकाईमल रेनल रोग, ग्लोमेरूलोनेफ्राइटिस, पाॅलिसिसटिक गुर्दा रोग आदि में
- अन्तःस्त्रावी ग्रंथि से संबंधित रोग जैसे कोण्स सिण्ड्रोम, हाइपरथाॅराडिज्म, एक्रोमिगेली, कुसींगस सिण्ड्रोम, थाइरोटाॅक्सिकोसिस आदि में भी उच्च रक्त चाप होने की संभावना रहती है
- कुछ दवा जैसे गर्भनिरोधक गोलियाॅ जिसमें एस्ट्रोजन, एनाबोलिक स्टेराॅइड, काॅरटिकोस्टेराॅइड, नाॅन स्टेराॅइडल ऐन्टी इन्फलामेटरी ड्रग्स आदि के विपरीत प्रभाव से भी रक्त चाप बढ़ने की संभावना रहती है
- महाधमनी के संकुचन के कारण
- अधिक मानसिक श्रम एवं तनावपूर्ण दिनचर्या
- मानसिक तनाव, चिन्ता, क्रोध, असहिष्णुता, उॅंची महत्वाकाॅक्षाए
- अत्यधिक मांसाहार
- नमक का अधिक प्रयोग
उच्च रक्तचाप के लक्षण
- सर के पिछले हिस्से में दर्द, विशेषकर सुबह के समय
- हृदय का तीव्र धड़कना, जिसे आसानी से महसुस कर सकते हैं
- भय या चिन्ताग्रस्त होना
- सर चकराना
- सर में खालीपन या शून्यता महसुस होना।
- शारीरिक एवं मानसिक थकान, उर्जा की कमी
- उदासिनता, विषाद, चिन्ता
- चिडचिड़ापन, भावनात्मक उद्वेग
- असहज महसुस करना एवं उसे व्यक्त न कर पाना
- सरदर्द,
- सांस फूलना
- धड़कन बढ़ना
- दृष्टि में गड़बड़ी
- भूख की कमी
- अनिद्रा
- छाती में खिंचावट महसुस होना
- चक्कर आना
- घबराहट
- याद्दास्त एवं एकाग्रता की कमी
- भावावेग में उत्तेजित होना,
- बात-बात में चिड़चिड़ाहट एवं क्रोध
- कभी-कभी नाक से खून आ जाना
मस्तिष्क संबंधी- उच्च रक्तचाप के75 प्रतिशत रोगियों में प्रायः शिरशूल मिलता है। ये शूल सिर के पश्चिम प्रदेश में रहता है तथा विशेष रूप से सुबह के समय जागकर उठने पर होता है, जो बाद में धीरे-धीरे कम होते जाता है। रोगी के सिर में बार-बार चक्कर आता है और खड़े रहने में इधर-उधर धक्के से लगते है।
मस्तिष्क की धमनियों में कठोरता आने से रोगी की बौद्धिक, मानसिक क्षमताओं में कमी आती है। बुद्धि, स्मृति, एकाग्रता आदि की शक्तियाँ घट जाती है। जिसके फलस्वरूप स्वल्प कारणों से ही रोगी व्याकुल एवं अशान्त हो जाता है। किसी किसी रोगी में बोलने की शक्ति नष्ट हो जाती है तो किसी-किसी रोगी में दृष्टि-मन्दता का लक्षण हो जाता है। किसी-किसी रोगी में थोड़े समय के लिए मूच्र्छा अथवा गहरी निद्रा होने का लक्षण भी मिलता है। अन्त में किसी मस्तिष्क धमनी में अवरोध होकर मूच्र्छा तथा पक्षाघात के लक्षण हो जाते हैं।
हृदय संबंधी- उच्च रक्तचाप के आधे के लगभग रोगियों में हृदय कम्पन एवं श्वास काठिन्य के लक्षण होने लगते हैं। श्वास केन्द्र को रक्त के या आक्सीजन कम मिलने तथा रक्त में एसीडोसिस के बढ़ जाने से श्वास काठिन्य हो जाता है अथवा इसकी उत्पत्ति फुफ्फुसों में ओडिमा होने से होती है। श्वास काठिन्य का उपद्रव रात्रि में सोने के 2 घण्टे पश्चात तीव्र रूप में उत्पन्न हो सकता है, जिसे हृदयजन्य श्वास कहते हैं।
रक्तचाप के बढ़ने पर हृदयशूल के दौरे आने लगते हैं। थोड़े परिश्रम से अथवा बिना परिश्रम के भी दौरे पड़ने लगते हैं। सामान्य हृदयशूल, हृदय धमनी के संकीर्ण होने से होता है परन्तु उच्च रक्तचाप में हृदय धमनी संकीर्णन होते हुए भी दौरा पड़ता हैं। उच्च रक्तचाप से कभी-कभी नासा रक्तस्त्राव भी हो सकता है।
वृक्क संबंधी- वृक्कों की सूक्ष्म धमनियों के कमजोर होने से उनकी ट्यूबूल्स का पोषण कम होता है जिससे उच्च रक्तचाप के आधे के लगभग रोगियों में मूत्र रात्रि
के समय अधिक मात्रा में तथा बार-बार त्याग होने का लक्षण होता है। उच्च रक्तचाप की प्रारम्भिकावस्था से ही यह लक्षण मिलने लगते है। उच्च रक्तचाप के उग्र स्वरूप में मूत्र त्याग की मात्रा और भी अधिक बढ़ जाती है।
- जंघाओं की माँसगत सूक्ष्म धमनियों के कठोर हो जाने से प्रान्त भागों की माँसपेशियों का पोषण कम हो जाता है जिससे रात्रि के समय उनमें वेदना होने लगती है।
- पैरों के धमनी काठिन्य के कारण रक्त कम मिलने से उनकी वसा शुष्क हो जाती है और वे कृश होते जाते हैं।
- पैरों तथा हाथों को रक्त कम मात्रा में मिलने के कारण नाखुन शुष्क तथा कठोर दिखाई देने लगते है।
- त्वचा को रक्त न मिलने से त्वचा भी पतली, शुष्क एवं झुरीदार हो जाती है।
- जब आमाशय की धमनियों मंे क्षीणता आती है तो अजीर्ण सम्बन्धी लक्षण होने लगते हैं।
- कभी-कभी आँत, पित्ताशय तथा प्लीहा की धमनियाँ कठोर हो जाती है तब इनमें तीव्र वेदना होने लगती है।
- फुफ्फुस की किसी धमनी में अवरोध होने से पाश्र्वशूल और रक्त वमन के लक्षण उत्पन्न होते हैं।
- नेत्रों की रेटिना की धमनियों के कठोर एवं संकुचित हो जाने से वह चाँदी के तार के समान तुड़ी-मुड़ी दृष्टिगोचर होती है तथा शिराएँ भरी हुई दीखती है।
उपरोक्त लक्षणों के अतिरिक्त रोगी में निम्न लक्षण भी होते है-
- हमेशा आलस्य बने रहना।
- शारीरिक एवं मानसिक परिश्रम से अनिच्छा।
- समय-समय पर श्वास बन्द होने का भाव।
- रात्रि के समय अच्छी नींद का न आना अथवा बिल्कुल ही न आना।
- बीच-बीच में नाक से रक्तस्त्राव।
- हृदय में दर्द।
- पैरों में झुनझुनी इत्यादि।
उच्च रक्त चाप के संभावित दुष्परिणाम
- योग द्वारा रोगों की चिकित्सा – डाॅ. फुलगेंदा सिन्हा
- योग महाविज्ञान- डाॅ. कामाख्या कुमार
- शरीर-रचना एवं शरीर-क्रिया विज्ञान – श्रीनन्दन बन्सल
- बृहद् प्राकृतिक चिकित्सा -डाॅ. ओमप्रकाश सक्सेना
