अनुक्रम
मौन वाचन अर्थात् मन-ही -मन का वाचन, इस प्रकार के वाचन में जब लिखित
सामग्री को बिना हौंठ हिलाए, बिना आवाज किये हुए चुपचाप पढ़ते है तो उसे मौन वाचन
कहते है।
गया पठन है।
मौन
वाचन का महत्व
- मौन वाचन में थकान कम होती है, वाग्यंत्रों पर जोर नहीं पड़ता।
- मौन वाचन दूसरों को व्यवधान नहीं पहुँचाता।
- मौन वाचन में समय की बचत होती है।
- मौन वाचन का दैनिक जीवन में बहुत महत्व है- अखबार पढ़ने, साहित्य पढ़ने,
यात्रा समय में पत्र-पत्रिकाएं पढ़ने में इसी वाचन का उपयोग किया जाता है। - मौन वाचन में ध्यान केन्द्रित रहता है।
- मौन वाचन के समय चिन्तन प्रक्रिया चलती रहती है।
- सामूहिक वाचन के लिए मौन वाचन जरूरी है।
- मौन वाचन से स्वाध्याय की आदत पड जाती है, पढ़ने का आनंद प्राप्त करने
के लिए मौन वाचन रूप में पढ़ना नितांत आवश्यक है। - मौन वाचन करना, अधिक हितकर व श्रेयस्कर है।
मौन वाचन के समय बहुत सतर्क रहना चाहिये। वह
देखता रहे कि मौन वाचन रूप में बिना होंठ हिलायें नेत्रों से चुपचाप समझते हुए
पढ़ रहे है या नहीं। कहीं स्वर की फुसफुसाहट अथवा ध्वनि तो नहीं आ रही है। शब्दों पर अंगुली तो नहीं फेरी जा रही है।
मौन वाचन के तत्व
(1) उचित आसन व मुद्रा- मौन पठन करते समय पाठक को सीधा बैठना चाहिये, जिससे
रीढ़ की हड्डी सीधी बनी रहे तथा पैर 900 कोण बनाकर लटके रहे। पाठ्य-पुस्तक
सामने एक फीट की दूरी पर रहनी चाहिये। मौन पाठन में मुंह बंद करके पाठक को
वाचन करना चाहिये, उसके होंठ नहीं हिलने चाहिए। ऐसा नहीं करने पर पाठक
थकान अनुभव करेगा तथा पठन से ऊबने लग जायेगा।
(2) परिस्थिति शब्दाबली- मौन पाठन/वाचन में परिस्थिति शब्दावली का होना आवश्यक
है। इससे मौन पठन में सरलता रहती है और विषयवस्तु को आत्मसात्
करने में कठिनाई नहीं होती है।
(3) एकाग्रता- एक्राग व शान्त चित होकर मौन पाठन/वाचन से किसी भाव को या
विचार को सरलता से हदयगम किया जा सकता है।
अर्थबाध्े ा हेतु प्रयास नहीं करते है।
पठन करते हुए अर्थबोध हेतु प्रयास करना चाहिए।
रहता है, उनके पठन में कोई बाधा नहीं पड़ती है। इससे वे अधिक समय तक मौन
पठन कर सकते है।
मौन वाचन के उद्देश्य
विकास एवं गठित सामग्री का अर्थ ग्रहण। माध्यमिक स्तर तक आते-आते विचारों में परिपक्वता आ जाती है। अतः इस स्तर पर मौन वाचन द्वारा निम्नांकित उद्देश्यों
की प्राप्ति की योग्यता विकसित होनी चाहिये-
- अनावश्यक स्थलों को छोड़ते हुए प्रमुख भावों अथवा केन्द्रीय भावों का अर्थग्रहण करत े
हुए वाचन करना। - पठित सामग्री से तथ्यों, भावों एवं विचारों को गहण करते हुए सारांश बताने की क्षमता
का विकास। - पढी़ हुई सामग्री प्रश्नों का सही उत्तर दे सकना।
- उपयुक्त शीर्षक चयन करने की क्षमता का विकास कर सकना।
- भाषा एवं भाव सम्बंधी कठिनाइयांे का चयन कर प्रसंग के अनुकूल नवीन शब्दांे,
उक्तियों एवं मुहावरों👉 तथा लोकोक्तियों का अर्थ निकाल लेना। - सन्धि, विच्छेद, उपसर्ग, प्रत्यय व शब्द धातुओं से शब्द का अर्थ निकालना।
- शब्दकोश को देखने एवं प्रसंगानुसार अर्थ निकालने की क्षमता का विकास करना।
- शब्द का लक्षणार्थ जान लेना।
- विभिन्न साहित्यिक विधाओं, जैसे-नाटक, निबन्ध, कहानी, उपन्यास, जीवनी, संस्मरण
आदि के प्रमुख तत्वों की पहचान कर लेना। शैली के अनुसार निबन्धों का भेद कर
लेना। - लेखक के व्यक्तित्व की विशेषता उसकी शैली है जो उसकी पहचान भी है।
मौन वाचन के भेद
वाचन की सफलता का मूल आधार है, अतः वाचन की प्रकृति से मौन वाचन के दो भेद
है-
- गम्भीर (गहन) वाचन
- द्रुत वाचन
सस्वर वाचन व मौन वाचन में अंतर
| क्र.स. | सस्वर वाचन | मौन वाचन |
|---|---|---|
| 1. | यह बोलकर किया जाता है। | यह चुपचाप वाचन किया जाता है। |
| 2. | इसमें वातावरण स्वरमय हो जाता है। | इसमें वातावरण शान्तिमय होता है। |
| 3. | इसे उच्चारण शुद्धि के लिए किया जाता है। | इसमें विषयवस्तु ग्रहण के लिए किया जाता है। |
| 4. | इसमें ध्यानपूर्वक सुनना आवश्यक है। | इसमें गहन विचारों को समझना आवश्यक है। |
| 5. | इसमें उच्चारण से अर्थग्रहण होता है। | इसमें बिना उच्चारण अर्थग्रहण होता है। |
| 6. | इसमें पढ़ने व समझने की गति न्यूनतम होती है। | इसमें समझने की तीव्र गति होती है। |
| 7. | इसमें स्थूल व सूक्ष्म अध्ययन संभव है। | इसमें सूक्ष्म व व्यापक अध्ययन संभव है। |