अनुक्रम
उद्यान विज्ञान, (Horticulture) कृषि विज्ञान की एक शाखा है जिसमें फल, सब्जी, फूल, मसाले, औषधीय एवं
सुगंधित तथा रोपण फसलों तथा उनके परीक्षण के बारे में अध्ययन करते है।
उद्यान विज्ञान की शाखाएं
1. फल विज्ञान
उत्पादन के सिद्धांत एवं उत्पादन तकनीकों का अध्ययन किया जाता है। Pomology लैटिन के दो शब्दों Pomum,
जिसका शाब्दिक तात्पर्य है फल एवं Logus/Logic जिसका तात्पर्य है सैद्वातिक विवरण। वस्तुतः फल विज्ञान में फल उत्पादन के विभिन्न पहलूओ यथा पौध प्रबंधन एवं नर्सरी प्रबंधन, उत्पादन तकनीक शास्यन क्रियाओं, तुड़ाई एवं उसके उपरांत प्रबंधन एवं विकास के उपायों आदि के सैद्धांतिक एवं व्यवहारिक पहलू का अध्ययन करते है।
वह स्थान जहाॅ फलदार पौधे लगाये जाते है उसे बाग (Orchard) तथा फलों की विधिवत उत्पादन करने वाले को
orchardist या Fruit Grower कहते है। इस शाखा के अंतर्गत हम अमरूद, केला, अनानास, सेब, लीची नारियल,
नाशपाती अंगूर आदि फलों का अध्ययन करते है।
2. सब्जी विज्ञान
वर्गीय फसलों की खेती बारी। चूंकि पहले गोभी वर्गीय सब्जी का ही सुनियोजित एवं अद्यतन विधि से खेती की शुरुआत
की गई। इसमें लतर वाली सब्जियों, टमाटर, आलू, बैंगन, हरी
पत्तियों वाली सबिजयाॅ आदि की उत्पादन तकनीक का अध्ययन किया जाता हैं।
3. पुष्प विज्ञान
सिंद्धान्त एवं तकनीको का अध्ययन किया जाता है। पुष्प विज्ञान यानि Floriculture अंग्रेजी के दो शब्द यानि Flowis
एवं Culturea से बना है जिसका शाब्दिक अर्थ है फूलो का लगाना। पुष्प विज्ञान में सभी तरह के एक वर्षीय, द्विवर्षीय
एवं बहुवर्षीय पुष्पीय एवं शोभाकारी पौधों एवं वृक्षों की खेती करने तथा उनके माध्यम से किसी भी स्थान के सजावट के
बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त करते है। इस पौधों में पुष्प जैसे गुलाब, गेंदा, रजनीगंधा, डहेिलया, शोभाकारी पौधे, हेज,
कैक्टस आदि का अध्ययन करते है।
4. औषधीय एवं सुगंधित पौधे
उत्पाद के प्रसंस्करण की विस्तृत जानकारी प्राप्त करते है। इस शाखा के अंतर्गत सफेद मुसली, सतावर, अश्वगंधा,
इसबगोल पुदीना, सतावर, सिट्रोनेला, तुलसी, खस आदि के प्रसंस्करण की विस्तृत जानकारी प्राप्त करते है।
5. उद्यानिक फसलों का परिरक्षण
मुख्यतः कच्चे उत्पाद के रुप में किया जाता है, जिसमें जल का प्रतिशत ज्यादा होने के कारण तेजी से खराब होता है।
अतः इन फसलों के उत्पादन को खराब होने से बचाने, उनके लम्बे समय तक उपलब्धता सुनिश्चित करने तथा उनसे
विभिन्न प्रकार के खाद्य एवं पेय पदार्थ तैयार करने के मूल सिंद्धान्तो एवं तकनीकों का अध्ययन, इस शाखा के अंतर्गत
किया जाता है। प्रारंभ में इस शाखा के अंतर्गत मुख्यतः फलों का परिरक्षण किया जाता था इसलिए नामकरण की दृष्टि
से इस शाखा को फल परिक्षण भी कहा जाता है।
फसलों जेसे- फल, सब्जी, फूल एवं औषधीय फसलों, मसरुम एवं अन्य रोपण फसलों की तुड़ाई के उपरांत प्रबंधन जैसे श्रेणी करण पैंकिग, भंडारण ट्रान्सपोर्टशन ,प्रसंस्करण एवं मूल्य
संवर्धनका अध्ययन इस शाखा के अंतर्गत किया जाता हैं। आजकल इस विषय का अध्ययन फल
प्रोधोगिकी या सस्येातर प्रौधोगिकी के अंतर्गत भी किया जाता है।
उद्यानिक फसलों के आर्थिक एवं पोषण पहलू को देखते हुए इस शाखा का तेजी से विकास हुआ है तथा आज हमारा
देश फल एवं सब्जी उत्पादन में विश्व में द्वितीय स्थान रखता है।
इसके अलावा उद्यान विज्ञान की शाखा में रोपण फसल जैसे- नारियल, काजू, चाय, काॅफी, रबर,
कहवा, पान, सुपारी आदि का भी अध्ययन किया जाता है। इस फसलों का घरेलू बाजार के साथ-साथ विदेशों में भी
बहुत मांग है। इनके विकास की संभावना को देखते हुए फसल आधारित बोर्ड , एवं संस्थानों की भी स्थापना की गई है
जैसे नारियल विकास बोर्ड, काफी एवं चाय प्राधिकरण, मसाला एवं सुपारी विकास बोर्ड आदि। इनके स्थापना के बाद
इन फसलों में तेजी से विकास हुआ है तथा इनकी उन्नत किस्मे भी विकसित की गई है एवं बजारी करण भी तेजी से
हुआ है। चाय, नारियल एवं काजू, पान, सुपारी के उत्पादन में भारत विश्व का अग्रणी देश है। भारत में इस रोपण
फसल के उत्पादन एवं निर्यात की अपार संभावनाएं मौजूद है।
मसाला फसलें भी बागवानी फसल एक महत्वपूर्ण घटक है। ये फसल उच्च मूल्य वाले होते हैं तथा कम मात्रा
में उत्पादन कर इनसे अधिक धन अर्जित की जा सकती है। भारतवर्ष को को मसाला फसलों के लिए सदियों से जाना
जाता है। मसाला फसलें में मुख्यतः धनिया, जीरा, हींग, सौंफ, मंगरैला, काली मिर्च, मेथी, इलायची, हल्दी अदरक,
दालचीनी, लौंग आदि है। वर्तमान में कुल मसाला उत्पादन का लगभग 10 प्रतिशत भाग निर्यात होता है, जिसे बढ़ाने की
आवश्यकता है। इस प्रकार हम कह सकते है कि उद्यान विज्ञान कृषि विज्ञान की बहुत ही महत्वपूर्ण शाखा है।