हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 कब लागू हुआ?

हिंदू विवाह अधिनियम 18 मई 1955 को लागू कर दिया गया। यह जम्मू कश्मीर को
छोड़कर सम्पूर्ण भारत में निवास करने वाले हिन्दुओं जिनमें जैन, बौद्ध, सिक्ख
आदि पर प्रभावी था। किन्तु यह अधिनियम अनुसूचित जनजातियों पर लागू नहीं
होता है। इस अधिनियम के द्वारा विवाह से संबंधित पूर्व में पास किए गए सभी अधिनियमों को रद्द कर दिया गया और इसे सभी हिन्दुओं पर समान रूप से लागू
किया गया। 

इस अधिनियम में हिन्दू विवाह की विभिन्न विधियों को मान्यता प्रदान
की गई। इसके अतिरिक्त सभी जातियों के स्त्री पुरुषों को विवाह एवं तलाक के
अधिकार प्रदान किए गए।

विवाह-संबंध की समाप्ति

इन दशाओं में विवाह होने पर भी उसे रद्द किया जा सकता है- 

  1. विवाह के समय दोनों पक्षों में से किसी एक का भी जीवन-साथी जीवित हो और उससे तलाक नहीं हुआ
    हो। 
  2. विवाह के समय एक पक्ष नपुंसक हो। 
  3. विवाह के समय कोई भी एक पक्ष जड़-बुद्धि या पागल हो। 
  4. विवाह के एक वर्ष के अंदर यह प्रमाणित हो जाए कि प्रार्थी अथवा उसके संरक्षक की स्वीकृति बलपूर्वक
    कपट से ली गई थी। 
  5. विवाह के एक वर्ष के भीतर यह प्रमाणित हो जाए कि विवाह के समय पत्नी किसी अन्य पुरुष से
    गर्भवती थी और प्रार्थी इस बात से अनभिज्ञ था।

न्यायिक पृथक्करण

इस अधिनियम की धारा 10 में कुछ आधारों पर पति-पत्नी को अलग रहने की आज्ञा दी जा सकती है। यदि
वे पृथव्फ रहकर मतभेदों को भुलाने में सफल हो जाते हैं तो वैवाहिक संबंधों की पुनस्र्थापना की जा सकती है।
न्यायिक पृथक्करण के आधार हैं-

  1. बिना कारण बताए प्रार्थी को दूसरे पक्ष ने प्रार्थना-पत्र देने के दो वर्ष से छोड़ रखा हो। 
  2. प्रार्थी के साथ दूसरे पक्ष द्वारा क्रूरता का व्यवहार किया जाता हो। 
  3. प्रार्थना-पत्र देने के बाद एक वर्ष पूर्व से दूसरा पक्ष असाध्य कुष्ठ रोग से पीडि़त हो। 
  4. दूसरे पक्ष को कोई ऐसा संक्रामक यौन रोग हो जो प्रार्थी के संसर्ग से नहीं हुआ हो। 
  5. यदि दूसरा पक्ष प्रार्थना-पत्र देने के एक वर्ष पूर्व से पागल हो। 
  6. यदि दूसरे पक्ष ने विवाह के बाद अन्य व्यक्ति के साथ संभोग किया हो। यदि न्यायिक पृथक्करण की
    आज्ञा मिलने के बाद दो वर्ष के भीतर भी वे अपने संबंधों को सुधारने में असफल रहते हैं तो वे तलाक के लिए प्रार्थना-पत्र दे सकते हैं जो कि धारा 13 के अनुसार स्वीकृत किया जा सकता है। 

विवाह-विच्छेद

इन आधारों पर न्यायालय विवाह-विच्छेद की स्वीकृति दे सकता है- 

  1. दूसरा पक्ष व्यभिचारी हो। 
  2. दूसरे पक्ष ने धर्म-परिवर्तन कर लिया हो और हिंदू न रह गया हो। 
  3. दूसरा पक्ष असाध्य कुष्ठ या संक्रामक रोग से पीडि़त हो। 
  4. दूसरा पक्ष संन्यासी हो गया हो। 
  5. सात वर्षों से दूसरे पक्ष के जीवित होने के बारे में न सुना गया हो। 
  6. पक्ष ने न्यायिक पृथक्करण के एक वर्ष या उससे अधिक अवधि के बाद तक पुनः सहवास न किया
    हो। 
  7. दूसरे पक्ष ने दाम्पत्य अधिकारों की पुनः स्थापना हो जाने के एक वर्ष तक उस पर अमल न
    किया हो। 
  8. पति बलात्कार, गुदा मैथुन अथवा पशुगमन का दोषी हो।

इस अधिनियम से स्पष्ट है कि न्यायिक पृथक्करण और विवाह-विच्छेद दो भिन्न बाते हैं। पृथक्करण की आज्ञा
देकर न्यायालय दोनों पक्षों को समझौते के अवसर प्रदान करता है। यदि पिफर भी वे साथ रहने को सहमत न हों
तो विवाह भंग करने की स्वीकृति प्रदान की जाती है। कुछ परिस्थितियों में ही विवाह-विच्छेद की सीधी अनुमति
दी जा सकती है। 

सामान्य धाराएँ

  1. विवाह-विच्छेद के लिए आवेदन-पत्र विवाह के एक वर्ष बाद ही दिया
    जा सकता है। 
  2. यदि अदालत द्वारा विवाह-विच्छेद की राजाज्ञा मिलने के एक वर्ष के अंदर ही अपील नहीं
    की जाती है तो दोनों पक्षों को पुनर्विवाह करने का अधिकार होगा। 
  3. न्यायालय बच्चों की शिक्षा-दीक्षा, देखभाल
    एवं रहने के संबंध में अंतरिम और स्थायी आदेश दे सकता है। 
  4. इस अधिनियम में पति अथवा पत्नी के लिए
    निर्वास धन की व्यवस्था भी की गयी है। यह राशि उस समय तक दी जाएगी जब तक निर्वास
    धन प्राप्त करने वाला दूसरा विवाह न कर ले। 

1976 में इस विधान में संशोधन कर यह अनुमति प्रदान की
गई है कि पति-पत्नी परस्पर सहमति से भी तलाक ले सकते हैं, किंतु उन्हें यह सिद्ध करना होगा कि
वे पिछले एक वर्ष से अलग-अलग रह रहे हैं और उनमें मेल संभव नहीं हो सका है। तलाक के बाद कोई
भी पक्ष चाहे तो कभी भी दूसरा विवाह कर सकता है, राजाज्ञा प्राप्त होने के तुरंत बाद भी।

क्या हिंदू समाज में तलाक की स्वीकृति प्रदान की जानी चाहिए?

सदियों से हिंदूओं में विवाह को एक पवित्र संस्कार माना जाता रहा है, किंतु वर्तमान में परिस्थितियाँ बदल गई
हैं और कई लोग विवाह को एक सामाजिक एवं वैधानिक समझौता मानते हैं। इसी संदर्भ में तलाक के प्रति
दृष्टिकोण में भी परिवर्तन आया है। कुछ लोग तलाक को उचित बताते हैं तो कुछ अनुचित। क्या हिंदूओं में तलाक
की अनुमति दी जानी चाहिए इसके पक्ष एवं विपक्ष में दो मत हैं। हम यहाँ इन दोनों ही पक्षों पर विचार करेंगे।

तलाक के विपक्ष में तर्क या तलाक के दुष्परिणाम

आज भी अनेक हिंदू विवाह-विच्छेद को परंपरागत भारतीय सामाजिक संगठन एवं परिवार को विघटित करने
वाला मानते हैं। उनके अनुसार विवाह-विच्छेद का सिद्धांत हिंदूओं के सामाजिक प्रतिमान के लिए जिसमें वे
सदियों से रहते आए हैं। प्रतिकूल तथा विदेशी है। वे तलाक के विरोध में तर्क देते हैं- 

1. धर्म विरोधी-हिंदूओं में विवाह को एक पवित्र धार्मिक संस्कार माना गया है, यह पति-पत्नी के बीच नोट
जन्म-जन्मांतर का संबंध है जिसे तोड़ा नहीं जा सकता।
इस तर्क को उचित नहीं माना जा सकता क्योंकि विवाह को पवित्र धार्मिक संस्कार तो पति-पत्नी द्वारा
निभाए जाने वाले दायित्वों द्वारा बनाया जाता है। यह संस्कार तभी तक है जब तक पति-पत्नी परस्पर
सहयोग एवं प्रेम से रहें, बच्चों का लालन-पालन करें एवं सामाजिक कर्तव्यों का निर्वाह करें। विवाह में
तलाक की स्वतंत्रता कुछ भी अनिष्टकारी अथवा संकटपूर्ण नहीं है। 
2. पारिवारिक विघटन की संभावना-एक मत यह है कि तलाक से पारिवारिक विघटन की संभावना बढ़
जाएगी। पति-पत्नी परस्पर एक-दूसरे पर अविश्वास करने लगेंगे, तनावों एवं मनमुटावों में वृद्धि होगी। स्त्री
अन्य पुरुष के बहकावे में आकर अपने पति को छोड़ देगी और पुरुष भी अन्य स्त्री की ओर आकर्षित
होकर उस पर अत्याचार कर सकता है और तलाक के लिए उसे बाध्य कर सकता है जिससे कि उसे
भरण-पोषण हेतु खर्चा न देना पड़े। पारिवारिक विघटन सामाजिक विघटन को भी जन्म देगा, अतः तलाक
की स्वीकृति नहीं दी जानी चाहिए। किंतु इसके विरोध में यह कहा जाता है कि जब पति-पत्नी परस्पर
तनावों से जूझ रहे हों, इनमें विश्वास समाप्त हो गया हो, एक-दूसरे पर अत्याचार करते हों, तब परिवार कैसे संगठित रह सकता है, ऐसी स्थिति में तो तलाक उन्हें इन संकटों से मुक्ति दिलायेगा। 
3. स्त्रियों के भरण-पोषण की समस्या-भारत जैसे पुरुष प्रधान देश में जहाँ अधिकांशतः स्त्रियाँ अशिक्षित
हैं और अपने जीवन निर्वाह के लिए पति पर निर्भर हैं, तलाक होने पर वे बेघर, बेसहारा हो जायेंगी, उनके
सामने जीविका का संकट पैदा हो जायेगा, उन्हें आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। ऐसी स्थिति
में कई बार स्त्रियों को अनैतिक जीवन भी व्यतीत करना पड़ता है। इस तर्क के विरोध में भी लोग कहते
हैं कि अब स्त्रियों में जागरूकता आयी है। वे नौकरी एवं व्यवसाय के द्वारा जीवन-यापन करने में सक्षम
होती जा रही हैं। 
4. बच्चों की समस्या-तलाक के कारण बच्चों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, उनके लालन-पालन, शिक्षा-दीक्षा
की समस्या पैदा हो जायेगी और माता या पिता के अभाव में उनके व्यक्तित्व का भी समुचित विकास
नहीं हो पायेगा। माता-पिता के प्रेम के अभाव में वे जीवन में खालीपन अनुभव करेंगे। कई बार ऐसी
स्थितियाँ बाल-अपराध को भी जन्म देती हैं। इस तर्क के विरोध में भी यह कहा जाता है कि प्रतिदिन
माता-पिता में होने वाले संघर्ष एवं मनमुटाव से वैसे ही बच्चों पर बुरा प्रभाव पड़ता है, तलाक के कारण
तो वे इससे मुक्ति पा सकेंगे।


5. तलाक की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन-
विवाह-विच्छेद की छूट देने से लोग इसके आदी हो जाएंगे और वे
एक के बाद एक तलाक देते जायेंगे एवं पुनर्विवाह करते जायेंगे। इससे जीवन में ठहराव नहीं आयेगा और
अनैतिकता में वृद्धि होगी। इस तर्क के विपरीत यह कहा जाता है कि तलाक की स्वीकृति के अभाव में
व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति से यौन संबंध स्थापित करके भी अनैतिकता को बढ़ावा दे सकता है। 

6. तलाक के दुष्प्रभाव-इनके अतिरिक्त तलाक से संवेगात्मक संकट पैदा होता है। पति-पत्नी की आशाएँ
टूट जाती हैं, उनके सपने चकनाचूर हो जाते हैं, उनके अहं को ठेस लगती है, उनमें हीन भावना पैदा होती
है। अपने पुराने अनुभव के आधार पर जब उसकी काम वासना की तृप्ति नहीं होती है तो वह अनैतिक
तरीके अपनाता है, इससे वेश्यावृत्ति में वृद्धि होती है।

उपर्युक्त सभी कारणों एवं प्रभावों के आधार पर ही लोगों का मत है कि तलाक की स्वीकृति नहीं दी जानी
चाहिए।

तलाक के पक्ष में तर्क या तलाक के लाभ


1. समानता का अधिकार-
वर्तमान में स्त्री-पुरुषों को सभी क्षेत्रों में समान अधिकार प्रदान किए गए हैं, ऐसी
स्थिति में विवाह-विच्छेद का अधिकार केवल पुरुषों को ही नहीं वरन् स्त्रियों को भी प्राप्त होना चाहिए।
उन्हें भी असाधारण परिस्थितियों में अपने पति को त्यागने का अधिकार होना चाहिए। 

2. पारिवारिक संगठन को सुदृढ़ बनाने के लिए-वर्तमान में एकाकी परिवारों में पति के दुराचारी होने या
वैवाहिक दायित्व न निभाने पर पत्नी व बच्चों का कोई सहारा नहीं होता। ऐसी दशा में स्त्री व बच्चों की
रक्षा के लिए एवं परिवार को सुसंगठित बनाने के लिए विशिष्ट परिस्थितियों में विवाह विच्छेद की
स्वीकृति दी जानी चाहिए। 
3. स्त्रियों की दशा सुधारने के लिए-स्त्रियों को विवाह-विच्छेद का अधिकार मिलने पर उनकी पारिवारिक
एवं सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी, साथ ही पुरुषों की मनमानी पर भी अंकुश लगेगा। 
4. वैवाहिक समस्याओं से मुक्ति पाने के लिए-हिंदू विवाह से संबंधित समस्याओं जैसे-बाल-विवाह,
अनमेल विवाह, दहेज, विधवा विवाह निषेध, आदि से छुटकारा पाने के लिए विवाह-विच्छेद का अधिकार
स्त्री-पुरुष को समान रूप से दिया जाना चाहिए। 
5. सामाजिक जीवन को संतुलित बनाने के लिए-स्त्रियों को विवाह के क्षेत्र में पुरुषों के समान अधिकार
न देने से समाज व्यवस्था में असंतुलन पैदा होगा। इस स्थिति से बचने के लिए एवं मानवीय दृष्टिकोण
से भी स्त्रियों को विवाह-विच्छेद का अधिकार प्राप्त होना चाहिए। 
6. स्त्रियों को तलाक का अधिकार देने से भारत की प्राचीन परंपरा व संस्कृति को संरक्षण ही मिलेगा।
वैदिक काल और उसके काफी समय बाद तक दोनों पक्षों को तलाक देने के अधिकार थे। मध्य युग में
इन अधिकारों पर रोक लगी। इस प्रकार तलाक से हमारी भारतीय परंपरा व संस्कृति को कोई खतरा नहीं
है। इससे तो उनका रक्षण ही होगा। 
7. स्त्रियों को तलाक का अधिकार देने से हिंदू विवाह पर लगाया जाने वाला यह आरोप कि वह एक तरफा
व पुरुषों के पक्ष में है, मिट जाएगा। यह दोनों पक्षों को समान रूप से सुदृढ़ बनाएगा। 
1955 में हिंदू विवाह अधिनियम के तहत स्त्री को भी तलाक देने का कानूनी अधिकार मिल
गया। परंतु आज भी हिंदू धर्म में तलाक की प्रक्रिया न्यायिक विलंब के कारण समस्या बनी हुई है।

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