रोग क्या है इसके कारण

जब हमारा खान-पान, रहन-सहन, आहार-विहार अप्राकृतिक एवं दूषित हो जाता है तब हमारे शरीर में दोष जिसे विजातीय द्रव्य कहते हैं, एकत्रित हो जाता है। शरीर में संचित विष ही रोग है। शरीर से मल और दूषित पदार्थों के हटाने के प्रयत्न को रोग कहते हैं।

रोगों के प्रकार

मानव शरीर के तीन पहलू बताये हें- 
1. आध्यात्मिक रोग – जसकी आत्मा जितनी मलिन, पतित होगी उसे उतना ही आध्यात्मिक रोग होगा। ऐसे व्यक्ति में तामसिक गुण अधिक होगा, वह गलत कार्यों व अपराधों में रूचि लेगा। वह व्यक्ति असुंदर, अशिव, अपकर्मों और अपवित्रताओं में अरूचि न रखकर उसमें विशेषता देखता है, जैसे किसी के व्यसनों से प्रभावित होता है, किसी अपराधी के प्रति सहानुभूति रखता है, लोभी और स्वार्थी की नीति में चतुरता देखता है। डाकू, चोर और अत्याचारियों की कथाओं में रूचि लेता है, अदर्शनीय दृश्य देखने को उत्सुक होता है और पापियों की संगति से घृणा नहीं करता तो मानना चाहिए कि उसकी आत्मा प्रसुप्त है, जागृत नहीं है, बल्कि पतित है, उसे आध्यात्मिक रोग हो गया है। ऐसा व्यक्ति आत्महीनता का शिकार होता है। उसके अंदर आत्मा का प्रकाश नहीं फैलता, आत्मा का गुण विकसित नहीं होता, वह नास्तिक, हृदयहीन और ईश्वर पर भी विश्वास नहीं करता। इसके विपरीत जिसके हृदय में दया, करूणा, प्रेम, उमंग, उत्साह, आत्मविश्वास व लोककल्याण की भावना होती है उसकी आत्मा स्वस्थ, विकसित मानी जाती है। 
आध्यात्मिक रोगों से मुक्ति पाने के लिए हमें दैवीय गुणों को विकसित करना चाहिए। आत्मज्ञान, आत्मविश्वास,
आत्मविकास, ईश्वरविश्वास, विश्वप्रेम के साथ ईश्वर की भक्ति, नाम जप, उपासना, साधना व आराधना का सहारा लेना चाहिए तभी आध्यात्मिक रोगों से छुटकारा मिल सकता है। अर्थात् उसे शरीर से अधिक आत्मा प्यारा लगने लगे तथा आत्मा के विकास में जब व्यक्ति प्रयत्नशील होता है तब वह आध्यात्मिक रोग से मुक्त हो जाता है।
2. मानसिक रोग – मानसिक रोग मन के विकारग्रस्त होने से होता है और यह शारीरिक व्याधियों से भी भयानक व अनिष्टकारी होता है। जब मन में भय, घृणा, लोभ, द्वेष, काम, क्रोध, निराशा, अहंकार आदि दुश्चिंतन व विकार उत्पन्न होते हैं तो हम मनोरोगी हो जाते हैं। रोग पहले मन में उपजते हैं फिर शरीर में प्रकट होते हैं। स्वाध्याय, ध्यान, सत्संग आदि से भी मानसिक रोग दूर होते हैं।
 3. शारीरिक रोग – विभिन्न प्रकार की व्याधियाँ जब शरीर में प्रकट होने लगे तो उसे शारीरिक रोग कहते हैं। 
जैसे- ज्वर, हैजा, दस्त, चेचक, दमा, कैंसर आदि विभिन्न रोग आदि। चोट, दुर्घटना आदि से जो पीड़ायें होती हैं, उन्हें ‘आगंतुक रोग’ कहते हैं। 

रोग होने के कारण

रोग होने के कई कारण बताये
गए हैं। प्रत्येक कार्य के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है तो रोग होने के पीछे भी
कोई कारण तो अवश्य ही है। 

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, रोग होने का कारण ग्रह नक्षत्रों के
प्रभाव को माना गया है। तांत्रिक ओझा आदि भूत-प्रेत बाधा को रोग होने का कारण मानते हैं। 
एलोपैथी जिसे आधुनिक चिकित्सा कहते हैं, में रोग होने का कारण जीवाणुओं
को माना जाता है। 
आयुर्वेद के अनुसार, त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) के कुपित होने को रोग होने का कारण माना गया है। 

लेकिन प्राकृतिक चिकित्साचार्यों का मत इन विद्वानों से अलग है। प्राकृतिक चिकित्सक रोग होने का मूल कारण विजातीय द्रव्य को मानते हैं। विजातीय द्रव्य शरीर में दो रास्तों से पहुँचता
है। नाक द्वारा फेफड़ों से तथा मुँह द्वारा पेट में। वायु तथा पर्यावरण प्रदूषण के कारण
फेफड़ों में, पर्याप्त आवश्यक वायु न मिलने के कारण नाना प्रकार के रोग हो जाता हैं। इसी
प्रकार अस्वाभाविक भोजन से शरीर की पाचन शक्ति कमजोर होती है। जब हम खान-पान
की गड़बड़ी करते हैं। आवश्यकता से अधिक खाते हैं और बहुत ही चटपटा, मिर्च-मसाले
वाला खाते हैं तो शरीर इसको स्वभावतः पखाना, पेशाब तथा पसीना आदि के द्वारा बाहर
निकाल नहीं पाता है और ये विजातीय द्रव्य भीतर जमा होते रहते हैं। रक्त में मिलकर
रक्त प्रवाह में विघ्न डालते हैं तथा पाचन तंत्र अव्यवस्थित हो जाता है। ये विजातीय द्रव्य
चुपचाप शरीर के भीतर पड़ा रहता है और अवसर पाकर रोग के रूप में बाहर फूट
निकलता है।

 
रोग होने के मुख्यतः दो कारण होते हैं- 1. बाह्य 2. आन्तरिक । शारीरिक धर्म
अथवा स्वास्थ्य सिद्धान्त के विरूद्ध आचरण करना रोग होने का बाह्य कारण और अनिष्टकारी
मनोवृत्तियों का असंगत प्रयोग तथा अहितकर चिन्तन, कुकल्पना, भय, अवसाद, निराशा
आदि उसके आन्तरिक कारण माने जाते हैं। शारीरिक व मानसिक सभी रोग इन्हीं कारणों
से होते हैं। स्वस्थ रहने के लिए सप्राण भोजन, व्यायाम, उचित परिश्रम, समुचित निद्रा,
संयम, ब्रह्मचर्य तथा स्वास्थ्य संबंधी नियमों की आवश्यकता होती है और इन नियमों को
भंग करना ही रोग को निमंत्रण देना है। उसी प्रकार काम, क्रोध, लोभ, हिंसा, द्वेष, ईर्ष्या
आदि मलिन मनोवृत्तियों के व्यवहार से शरीर और मन में तरह-तरह के रोग उत्पन्न होते
हैं। रोग का बाह्य कारण स्थूल भाव से शरीर पर और आन्तरिक कारण सूक्ष्म रूप से मन
पर प्रभाव डालते हैं। सभी रोगी पहले मन में उपजते हैं फिर शरीर पर प्रकट होते हैं। यदि
हम रोगी हैं तो इसका मुख्य कारण यह है कि हम प्राकृतिक जीवन नहीं व्यतीत करते हैं। रोग होने के मुख्य कारण हैं-

1. अप्राकृतिक जीवनशैली

रोगीग्रस्त होने का सबसे मुख्य व प्रथम कारण है कि हम
प्राकृतिक जीवनशैली को न अपनाकर इसके विपरीत जीवनयापन करते हैं,
फलस्वरूप हम रोगी हो जाते हैं। प्राकृतिक
जीवन ही आजकल फैली हुई असंख्य रोगियों और स्वास्थ्य संबंधी समस्त दोषों की
एकमात्र दवा है। अप्राकृतिक जीवनशैली में हम अपने अंदर कुछ ऐसी बुरी आदतें डाल लेते
हैं जो हमें रोगी बना देता है। अगर हम इन बुरी आदतों को छोड़ दें तो हम स्वस्थ हो
सकते हैं। ऐसी आदतों में कुछ निम्नलिखित हैं-

  1. आहार संबंधी बुरी आदतें
  2. आलस्य
  3. प्रकृति के पंचतत्वों का कम से कम उपयोग
  4. प्रकृति से दूर कृत्रिम पदार्थों से लगाव
  5. अनियमित भोग-विलास
  6. गलत उपचार या चिकित्सा
  7. मानसिक कुविचार या नकारात्मक चिन्तन (जैसे ईर्ष्या, द्वेष, कुढ़न, भय,
    आशंका, काम, क्रोध आदि)

2. विजातीय द्रव्य

रोग होने का दूसरा प्रमुख कारण विजातीय द्रव्य है। यह रोग होने का दूसरा सबसे बड़ा
कारण है शरीर के अंदर जो बेकार की फालतू चीजें होती हैं जिसकी शरीर को कोई
आवश्यकता नहीं है जिसे शरीर मल मार्गों द्वारा बाहर निकालती रहती है, जैसे- मल,
मूत्र, पसीना, कफ, दूषित रक्त, दूषित वायु, दूषित सांस, दूषित मांस या इसी प्रकार की
कोई अन्य वस्तु जो स्वस्थ खून और मांस के साथ मिलकर स्वस्थ शरीर का भाग नहीं
बन सकती है जो उसे पोषण नहीं दे सकती, उल्टे उसके विनाश का कारण बन
सकती है। उसे ही विजातीय द्रव्य —, तीनों रूप में अर्थात् ठोस, तरल या गैस में
से किसी भी रूप में हो सकता है।

विजातीय द्रव्य में उद्वेग होने के कारण हमारे रक्त में गर्मी बढ़ जाती है। इसी स्थिति या
दशा का नाम ज्वर है। ज्वर तभी होता है, जब शरीर में विजातीय द्रव्य मौजूद हों और
उसके निकलने के सभी मार्ग प्रायः रूक गए हों। अतः शरीर में स्थित विजातीय पदार्थ में
चालू उद्वेग क्रिया को ज्वर कहेंगे। आयुर्वेद में विजातीय द्रव्यों को दोष कहा जाता है और इसे ही रोग होने का कारण माना
गया है। 

शरीर के जिस
अवयव पर विजातीय द्रव्य का आघात होता है, वह आघात उस अवयव के रोग के नाम से
जाना जाता है। न केवल खान-पान की गलतियों से शरीर में विजातीय द्रव्य इकट्ठा होता
है बल्कि छोटे-छोटे कीटाणु, धूलकण, धुंआ आदि श्वांस द्वारा, जल के साथ मिश्रित कीटाणु
व गंदगी मुख द्वारा, विषैले जंतुओं (सांप, बिच्छू आदि) के काटने से उनका विष का शरीर
में पहुँचना, सुइयों द्वारा विजातीय द्रव्य चिकित्सा से शरीर में पहुँचना एवं नशीली वस्तुएँ
जैसे- बीड़ी, सिगरेट, तंबाकू, मांजा, भांग, चरस व शराब आदि से भी शरीर में विजातीय
द्रव्य की वृद्धि होती है।

3. जीवनीशक्ति का हृास

जीवनीशक्ति वह शक्ति है जो शरीर में रोगी से लड़ती है
और शरीर को रोगी बनाती है। यदि इसकी शरीर में कमी हो जाय तो हमारे
शरीर में रोग होने लगता है, जीवनीशक्ति की कमी रोग होने का
तीसरा मुख्य कारण है। दुर्बल अंगों और दुर्बल व्यक्तियों में ही प्रायः रेाग उत्पन्न
होते हैं और पनपते हैं। शक्तिहीन शरीर में पड़े हुए कूड़े-कचरे को बाहर
निकालकर उसे निर्मल बनाने की शक्ति नहीं होती, उसका सारा सौन्दर्य एवं
आकर्षण नष्ट हो जाता है, भूख मर जाती है, स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है, नींद
खत्म हो जाती है। शरीर का विकास रूक जाता है तथा शरीर में हमेशा एक न
एक रोग बना ही रहता है। जीवनीशक्ति के हृास का प्रमुख कारण
निम्नलिखित है-

  1. शक्ति से अधिक श्रम करना।
  2. रात्रि में जगकर अधिक कार्य करना।
  3. चिन्ता और मानसिक व्याधियाँ।
  4. अप्राकृतिक औषधियों का सेवन आदि गलत उपचार या चिकित्सा।

4. वंश परम्परा

वंश परम्परा भी रोग होने का मुख्य कारण है। रोगी और कमजोर माता-पिता की संतान भी रोगी और कमजोर होती है, यह एक प्राकृतिक
नियम है कि जैसा बीज बोया जाएगा, वैसा ही फल आएगा। ऐसी स्थिति में भी रोग होने का
मुख्य कारण रोग के शरीर में वंशपरम्पराजन्य होता
है क्योंकि विकार द्वारा गंभीर रूप से आक्रान्त माता-पिता से संतान में रक्त के प्रभाव से
विकार आना स्वाभाविक ही है, भले ही वह सूक्ष्म या अतिसूक्ष्म रूप से हो अथवा विष के
रूप में हो।

5. गलत उपचार या उपचार का गलत तरीका

गलत उपचार या उपचार का
गलत तरीका अपनाना जिससे रोग समाप्त होने की जगह और बढ़ता ही चला
जाता है या भविष्य में और अधिक परेशान हो जाता है। शरीर में एकत्रित
अनावश्यक मल ही असल रोगी है। हैजा, प्लग आदि रोग से बचाव हेतु स्वस्थ शरीर में विषों की सुईयाँ
जबरदस्ती देना, इसके उदाहरण हैं। 

6. आकस्मिक दुर्घटना

स्वस्थ व्यक्ति आकस्मिक दुर्घटना जैसे,
अकस्मात चोट लगने, गाड़ी मोटर के दुर्घटनाग्रस्त होने, पेड़, पहाड़ या ऊँचाई से
गिरने से घायल हो जाता है तथा उसके त्वचा, मांस, नस, अस्थि आदि के
टूटने-फूटने से अभिघातज रोग की उत्पत्ति होती है। 

7. जीवाणु- 

जीवाणु जो रोग उत्पन्न करने में सहायक हो
रोगत्पादक जीवाणु कहलाते हैं और ये जीवाणु केवल मल भरे शरीर में उत्पन्न
होते हैं क्योंकि एक स्वस्थ और निर्मल शरीर में संसार भर के कीटाणु भी किसी
रोगी को प्रारंभ नहीं कर सकते। लेकिन एक मल भरे शरीर में कोई भी जीवाणु उद्रेक उत्पन्न करके रोगी के लक्षण उत्पन्न कर सकता है क्योंकि जीवाणु मल से
ही जीते हैं और निर्मलता से वे नष्ट हो जाते हैं। 

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