वित्तीय लेखांकन के अन्तर्गत जर्नल, लेजर, तलपट, लाभ-हानि खाता तथा चिट्ठा तैयार किया जाता है।
वित्तीय लेखांकन के दोष तथा असुविधाएं
1. व्यय सम्बन्धी ज्ञान अपूर्ण होनाः उत्पादन की प्रत्येक विधि पर क्या व्यय
किया गया है, किस स्थान पर आवश्यकता से अधिक व्यय हो रहा है,
प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष व्ययों का उचित वर्गीकरण, आदि जानकारी वित्तीय
लेखांकन से नहीं हो पाती है। उचित सूचना के अभाव में कार्य क्षमता
वृद्धि नहीं होती। एक व्यवसाय का दूसरे व्यवसाय से तुलना नहीं हो
पाता।
2. सामग्री के लेखों पर कम ध्यान दिया जानाः वित्तीय लेखांकन में सामग्री
के लेखों पर कम ध्यान दिया जाता है। अधिकतर रोकड़ की प्राप्ति व
व्यय पर दिया जाता है। प्रति इकाई पर कितनी सामग्री लगी, इसका ज्ञान
प्राप्त नहीं होता है।
3. लाभ की कमी का कारण ज्ञात न होनाः लाभ के घट-बढ़ का उत्तर
वित्तीय लेखांकन नहीं दे पाते है।
4. सही लागत ज्ञात न होनाः वित्तीय लेखांकन लाभ तो बताती है, परन्तु
सही लागतें नहीं। सही लागत का ज्ञान हुए बिना विक्रय मूल्य ठीक से
निश्चित नहीं किया जा सकता है।
5. निविदा के मूल्य निर्धारण में असुविधा: वित्तीय लेखांकन के द्वारा निविदा
मूल्य निर्धारण में असुविधा होती है, किन्तु लागत लेखें में नहीं। लागत
लेखें में प्रति इकाई सामग्री व्यय, श्रम व्यय, प्रत्यक्ष व्यय व अप्रत्यक्ष व्यय
ज्ञात हो जाता है, अतः निविदा मूल्य की गणना सुगमता से हो जाती है।
घटने या बढ़ने की उत्तरदायी कारणों को प्रकट नहीं करते, अतः भविष्य
की योजना बनाने में सहायक नहीं होते।
7. बाहरी एजेन्सियों के वांछित रिपोर्ट नहींः बाहरी एजेन्सियों जैसे बैक,
व्यापारिक संघ और सरकार आदि को वांछित रिपोर्ट व्यापारिक लेखांकन
द्वारा नहीं दी जा सकती है। यह कार्य लागत लेखांकन द्वारा आसानी से
पूर्ण की जा सकती है।
8. अपव्यय में कमी का अभावः विभिन्न उत्पादन विभागों पर किये गये व्ययों
की आपस में तुलना करके अपव्यय में कमी की जा सकती है तथा एक
वर्ष के उत्पादन व्ययों की तुलना अन्य वर्षाें के उत्पादन व्ययों से करके
अपव्यय कम किया जा सकता है।
