क्षुद्रग्रह किसे कहते हैं?

क्षुद्रग्रह क्या है ?

पथरीले और धातुओं के ऐसे पिंड हैं जो सूर्य की परिक्रमा करते हैं
लेकिन इतने लघु होते हैं कि इन्हें ग्रह नहीं कहा जा सकता। इन्हें लघु ग्रह का
क्षुद्रग्रह ग्रहिका ग्रहिका भी कहते हैं। हमारी सौर प्रणाली में लगभग 100,000
क्षुद्रग्रह हैं लेकिन उनमें से ज्यादातर इतने छोटे हैं कि उन्हें पृथ्वी से देखा नहीं
जा सकता है।

हर क्षुद्रग्रह की अपनी एक कक्षा होती है जिसमें ये सूर्य के आसपास घूमते रहते
हैं। इनमें से सबसे बड़ा क्षुद्रग्रह है सेरस। इतालवी खगोलवेत्ता पिआज्जी ने इस
क्षुद्रग्रह को जनवरी 1801 में खोजा था। सिर्फ वेस्टाल ही एक ऐसा क्षुद्रग्रह है
जिसे आंखों से देखा जा सकता है यद्यपि इसे सेरस के बाद खोजा गया था।
इनका आकार 1000 किलोमीटर व्यास के सेरस से 1 से 2 इंच के पत्थर के
टुकड़ों तक होता है। ये क्षुद्रग्रह पृथ्वी की कक्षा के अंदर से शनि की कक्षा से
बाहर तक है। इनमें से दो तिहाई क्षुद्रग्रह मंगल और बृहस्पति के बीच में एक
पट्टे में है। हिडाल्गो नामक क्षुद्रग्रह की कक्षा मंगल तथा शनि ग्रहों के बीच
पड़ती है।

हमेंस तथा ऐसोस नामक क्षुद्रग्रह पृथ्वी से कुछ लाख किलोमीटर की ही दूरी पर
है। कुछ ही कक्षा पृथ्वी की कक्षा को काटती है और कुछ ने भूतकाल में पृथ्वी
को टक्कर भी मारी है। क्षुद्रग्रह पथरीले और धातुओं के ऐसे पिंड हैं जो सूर्य की
परिक्रमा करते हैं लेकिन इतने छोटे हैं कि इन्हें ग्रह नहीं कहा जा सकता है।

– क्षुद्रग्रह सौरमण्डल बन जाने के बाद बचे हुए पदार्थ हैं।
एक दूसरी कल्पना के अनुसार ये मंगल और गुरु के बीच में किसी समय में रहे
प्राचीन ग्रह के अवशेष है जो किसी कारण की वजह से टुकड़ों में बंट गए थे।
इस कल्पना की एक वजह से यह भी है कि मंगल और गुरु के बीच का अंतराल
सामान्य से ज्यादा है।

दूसरा कारण यह है कि सूर्य के ग्रह अपनी दूरी के अनुसार द्रव्यमान में बढ़ते
हुए और गुरु के बाद घटते क्रम में है। इस प्रकार मंगल और गुरु के बीच में
गुरु से छोटा लेकिन मंगल से बड़ा एक ग्रह होना चाहिए। लेकिन इस प्राचीन
ग्रह के होने की बात एक कल्पना ही लगती है क्योंकि अगर सभी क्षुद्रग्रहों को
एक साथ मिला भी लिया जाए तब भी इनसे बना संयुक्त ग्रह 1500 किलोमीटर
से कम व्यास का होगा जो कि हमारे चंद्रमा के आधे से भी कम हैं।

क्षुद्रग्रहों के बारे में जानकारी उल्कापात में बचे हुए अवशेषों से है। जो क्षुद्रग्रह
पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से पृथ्वी के वातावरण में आकर पृथ्वी से टकरा जाते हैं
उन्हें उल्का कहा जाता है। अधिकतर उल्काएं वातावरण में ही जल जाती है
लेकिन कुछ उल्काएं वातावरण में ही जल जाती है लेकिन कुछ उल्काएं पृथ्वी
से टकरा भी जाती है। इन उल्काओं का 92 प्रतिशत भाग सीलीकेट का और
5 प्रतिशत भाग लोहे और निकेल का बना हुआ होता है।

उल्का अवशेषों को पहचानना मुश्किल होता है क्योंकि ये सामान्य पत्थरों जैसे
होते है। क्षुद्रग्रह सौरमण्डल के जन्म से ही मौजूद है इस लिए वैज्ञानिक इनके
अध्ययन के लिए उत्सुक रहते है। अंतरिक्षयान जो इनके पट्टे के बीच से गए
है उन्होंने पाया है ये पट्टा सघन नहीं है और इनके बीच में बहुत सारी जगह
खाली है। अब तक हमारों क्षुद्रग्रह देखे जा चुके हैं और उनका नामकरण और
वर्गीकरण हो चुका है। इनमें प्रमुख है टाउटेटीस, कैस्टेलिया, जिओग्राफोस और
वेस्ता।

1. ब् वर्ग- इस श्रेणी में 75 प्रतिशत ज्ञात क्षुद्रग्रह आते हैं। ये बहुत धुंधले होते है।
ये सूर्य के जैसी संरचना रखते है लेकिन इनमें हाइड्रोजन और हीलियम नहीं
होता है। 

2. ड वर्ग- इस श्रेणी में 17 प्रतिशत ज्ञात क्षुद्रग्रह आते है जिनमें से कुछ चमकदार
होते है। ये धातुओं लोहा और निकेल तथा मैग्नीशियम सीलीकेट से बने होते
हैं। 
3. ड वर्ग- ज्यादातर बचे हुए क्षुद्रग्रह इस श्रेणी में आते है। ये चमकदार, निकेल
और लोहे से बने होते हैं।
क्षुद्रग्रहों का वर्गीकरण इनकी सौरमंडल में जगह के आधार पर भी किया गया है। 
1. मुख्य पट्टा- मंगल और गुरु के मध्य कुछ क्षुद्रग्रह होते हैं। ये सूर्य से 2 से
4।न् की दूरी पर होते हैं। इनमें कुछ उपवर्ग भी हैं- हंगे रियास, लोरास,
फोकिया, कोरोनीस, एओस, थेमीस, सायबेलेस और हिडाल्स। हिडाल्स इनमें से
मुख्य है। 
2. एटेंस- ये सूर्य 1.0 AU से ज्यादा दूरी पर लेकिन 1.01 AU से कम दूरी पर है। 
3. अपोलोस- ये सूर्य से 1.0 AU से ज्यादा दूरी पर लेकिन 1.01 AU से कम दूरी
पर है। 
4. अमार्स- ये सूर्य से 1-017 AU से ज्यादा दूरी पर लेकिन 1.3 AU से कम दूरी
पर है। 
5. ट्राजन- ये गुरु के गुरुत्व के पास होते हैं।

क्षुद्र ग्रह घेरा या एस्टरौयड बेल्ट हमारे सौरमण्डल का एक क्षेत्र है जो मंगल ग्रह और
बृहस्पति ग्रह की ग्रहपथाओं के बीच में स्थित है जिससे लाखों-हजारों क्षुद्रग्रह सूरज
की परिक्रमा कर रहे हैं। इनमें एक 150 किलोमीटर के व्यास वाला सेरस नाम का बौना
ग्रह भी है जो अपने स्वयं के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव से गोल आकार पा चुका है।
यहां पर तीन और 400 किलोमीटर के व्यास से बड़े क्षुद्रग्रह पाए जा चुके हैं-
वॅस्टा, पैलस और हाइजिआ। पूरे क्षुद्रग्रह घेरे के कुल द्रव्यमान में से आधे से ज्यादा
इन्हीं चार वस्तुओं में निहित है। बाकी वस्तुओं का आकार भिन्न-भिन्न है कुछ तो
दसियों किलोमीटर बड़े हैं और कुछ धूल कण मात्र हैं।

सन् 2008 के मध्य तक, पांच छोटे पिंडों को बौने ग्रह के रूप में वर्गीकृत किया
जाता है सेरस क्षुद्रग्रह घेरे में है और वरुण से परे चार सूर्य ग्रह पथ- यम, हउमेया,
माके और एरिस। 6 ग्रहों और तीन बौने ग्रहों की परिक्रमा प्राकृतिक उपग्रह करते हैं
जिन्हें आमतौर पर पृथ्वी के चन्द्रमा के नाम के आधार पर चंद्रमा ही पुकारा जाता है।
हर बाहरी ग्रह को धूल और अन्य कणों से निर्मित छल्लों द्वारा परिवृत्त किया जाता है।

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