अनुक्रम
18 वीं शताब्दी के आरंभ में 1715 ई. में लुई चतुर्दश की मृत्यु के उपरांत उसको पुत्र
लुई पंद्रहवें के नाम से फ्रांस के राज सिंहासन पर बैठा। उसके शासन काल में दिन प्रतिदिन
देश का पतन होता चला गया जिसके कारण लुई पंद्रहवें का शासनकाल अराजकता,
अव्यवस्था, अशांति का युग कहलाता है। उस समय फ्रांस में सर्व बेकारी, व्यापारिक शिथिलता,
धन-धान्य का अभाव और दरिद्रता का प्रभाव दृष्टिगोचर होता था। राजा, राजमहल और
शासन-संबंघी कार्याें का ऋण लेकर चलाया जा रहा था। राजकोष रिक्त पड़ा था और
राजकीय आय-व्यय से कम हो गई थी
फ्रांस की राज्य क्रांति के कारण स्पष्ट करना लगभग असंभव है क्योंकि इस क्रांति के
मूल में अनेक जटिल समस्याओं का समावेश है। जिस समय किसी समाज अथवा देश की
व्यवस्था में दोष उत्पन्न होने लगते हैं और उन दोषों के कारण उसका स्वरूप विकृत होने
लगता है तब क्रान्ति की संभावनायें प्रबल हो जाती हैं। फ्रांस की राज्य क्रांति जनता के दैनिक
जीवन की कइिनाइयों और बोैद्धिक जागरण के मेल से उत्पन्न हुई थी। उस समय बौद्धिक
जागरण के कारण ही जनता ने सांसारिक जीवन की कठिनाइयों को दूर करने के लिये क्रांति
का विस्फोट किया था।
फ्रांस की क्रांति को प्रभावित करने वाले लेखकों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण माँटेस्क्यू,
वाल्तेयर और रूसों थे। परंतु अन्य लेखकों को भी महत्व प्रदान करते हुए कैटेलबी ने लिखा
है कि ‘‘फ्रांस की क्रांति को सभी लेखकों ने तैयार किया था। इस युग के साहित्य ने राज्य का
ध्वंस करने के लिए अच्छे बारूद का काम किया। इससे पूर्व क्रांति इतने सुंदर शब्दों व मुहावरों
से कभी सुसज्जित नहीं हुई थी‘‘
फ्रांस की क्रांति यूरोप के इतिहास की एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना है। इसके संचालक
वे प्रमुख नेता थे जिन्होंने अपने कार्याें एवं व्यवहार से क्रांति के विभिन्न चरणों का निरूपण
किया। इन नेताओं में मिराबों, लाफायेत, दान्तो, राॅब्सपियर एवं मारा के नाम विशेष रूप से
उल्लेखनीय हैं।
17 जून को पादरी सदन के 12 कनिष्ठ पादरी तीसरे सदन के सदस्यों से आकर मिल
गये। यह क्रांति का प्रथम चरण था।
लुई सोलहवें ने तृतीय सदन के कार्यों में हस्तक्षेप करने और उनकी प्रगति को अवरूद्ध
करने के उद्देश्य से सभा भवन को बंद करवा दिया और सैनिक बिठा दिये। 20 जून को जब
तीसरे सदन के सदस्य वहां पहुंचे और सदन बंद देखा, तब उन्होंने पास ही में टेनिस खेलने के
मैदान में एकत्र होकर अपनी सभा की और यह प्रस्ताव पारित किया कि राष्ट्रीय सभा यह निर्णय
करती है ‘‘कि हम कभी भी अलग नहीं होंगे और जब तक संविधान का निर्माण नहीं हो जाता,
तब तक जब भी और जहां भी परिस्थितियों के अनुसार संभव होगा एकत्रित होते रहेंगे।
पेरिस के पूर्व में कुछ दूरी पर सन 1383 में निर्मित 30 मीटर ऊंची दीवार थी। यहां के
कारावास में अनेक बंदियों को रखकर उनको बर्बर अमानुषिक यातनाएं दी जाती थी। इससे
यह दुर्ग और उसका बंदीगृह अनियंत्रित राजसत्ता और उसके अत्याचारों का घृणित प्रतीक बन
गया था। जनता में इस दुर्ग के प्रति आक्रोश और घृणा थी। इस समय दुर्ग का रक्षक और
दुर्गपाल गर्वनर द लौने था। उसके पास दुर्ग में बंदूकों और बारूद का भंडार और 127 सुरक्षा
सैनिक थे। 14 जुलाई को शस्त्रों की खोज में आयी उत्तेजित भीड़ ने बास्तील दुर्ग पर आक्रमण
कर दिया। लगभग दो घंटे के संघर्ष और गोलाबारी के बाद द लोने ने आत्म-समर्पण कर
दिया। क्रोधित भीड़ ने उसके टुकडे़-टुकड़े कर दिये और वहां बंदी अनेक देशभक्तों को मुक्त
कर दिया और अस्त्र शस्त्रों का भंडार लूट लिया।
एक ओर कुछ विद्वानों ने फ्रांस को विनाशकारी, अप्रगतिशील तथा अराजकतावादी
आंदोलन कहा है, तो दूसरी ओर विद्वानों ने इसे विश्व की महातम घटना कहा है। यह विश्व
क्रांति थी, जिसने समूची मानव जाति के इतिहास पर गहरी छाप छोड़ी। यह क्रांति फ्रांस के
लिए ही नहीं अपितु विश्व के लिए वरदान प्रमाणित हुई और आगे आने वाली पीढियों के लिए
निरंतर प्रेरणा का स्त्रोत बन गई।
यद्यपि क्रांति के प्रारंभ से प्रथम दशक में फ्रांस में भीषण अस्त-व्यस्तता, अस्थिरता, भारी
उथल-पुथल और अमानुषिक रक्तपात हुआ, पर फिर भी उसका तात्कालिक और स्थायी प्रभाव
फ्रांस पर पड़ा।
फ्रांस की क्रांति ने यूरोप को ही नहीं अपितु मानव समाज को भी स्वतंत्रता, समानता
और बंधुत्व के शाश्वत तत्व प्रदान किये। ये सदैव जनता को स्फूर्ति देने वाले रहे। क्रांति से
समाज में आर्थिक और सामाजिक समानता की भावना फैली, धार्मिक स्वतंत्रता और सहनशीलता
का प्रचार बढ़ा, नागरिक स्वतंत्रता प्रदान की गई। व्यक्तिगत अधिकारों को मान्यता मिली।
फ्रांस के क्रांतिकारी अन्य देशों की पीडि़त जनता को अपना बंधु समझते थे। स्वतंत्रता,
समानता, बंधुत्व के सिद्धांत और लोकतंत्र के विचार यूरोप के अन्य देशों में शीघ्र ही फैल गये
और इन विचारों के लिये संसार में तब से संघर्ष चला आ रहा है।
फ्रांस की राज्य क्रांति से जिस लोकतंत्र और राष्ट्रीयता का प्रारंभ हुआ, वह धीरे-धीरे
अधिक विकसित होकर, संसार के सभी देशों की स्थायी विचारधारा बन गई। इस क्रांति ने
नवीन दृष्टिकोण प्रदान किया और आधुनिक युग की उदारवादी, लोकतंत्रीय एवं प्रगतिशील
जीवन की नींव रखी। इसीलिये यह क्रांति एक युग प्रर्वतक घटना है।
फ्रांसीसी क्रांति के पूर्व फ्रांस की दशा
18 वीं शताब्दी के आरंभ में 1715 ई. में लुई चतुर्दश की मृत्यु के बाद उसका पुत्र लुई पंद्रहवें के नाम से फ्रांस के राज सिंहासन पर बैठा। उसके शासन काल में दिन प्रतिदिन देश का पतन होता चला गया जिसके कारण लुई पंद्रहवें का शासनकाल अराजकता, अव्यवस्था, अशांति का युग कहलाता है। उस समय फ्रांस में सर्व बेकारी, व्यापारिक शिथलता, धन-धान्य का अभाव और दरिद्रता का प्रभाव दृष्टिगोचर होता था। राजा, राजमहल और शासन-संबंघी कार्याें को ऋण लेकर चलाया जा रहा था। फ्रांस की सामान्य दशा का वर्णन इस प्रकार है।
1. फ्रांस की राजनीतिक दशा
18 वीं शताब्दी में केवल फ्रांस ही नहीं संपूर्ण यूरोप की राजनीतिक व्यवस्था कुलीनतंत्रात्मक थी। राज्य की संपूर्ण शक्ति कुछ थोडे़ से उच्चवंशीय कुलीनों के हाथ में थी। मंत्री, उच्च पदाधिकारी, सेनापति प्रभावशाली सैनिक अफसर न्यायाधीश, प्रान्तीय शासक सब उच्चवंशीय कुलीनों में से ही नियुक्त किये जाते थे। राजकीय नियम और कायदे कानून बनाते समय कुलीनों के हित का सबसे अधिक ध्यान रखा जाता था। यहाॅं तक कि इग्लेैंड में भी,जहां संसद का शासनतंत्र पर पूरी तरह प्रभाव था, राज्य की शक्ति जनता के हाथ में न होकर कुलीन जमींदारों के हाथ में थी। संसद के दोनों सदनों पर बडे़-बडे़ जमींदारों के नियंत्रण में थी। इसी प्रकार इटली प्रया द्वीप में बोनस की शासन व्यवस्था प्रजातंत्रात्मक होते हुए भी शासन शक्ति कुलीनों के नियंत्रण में थी। कुलीन व्यक्ति जनता के हित की प्रशासनिक कार्यों में कोई चिन्ता नहीं करते थें। वे सदैव अपनी ओर अपने अन्य कुलीनवंशीय साथियों की स्वार्थ पूर्ति में व्यस्त रहते थे। जनसाधारण कों देश के शासन में कोई भाग नहीं लेने दिया जाता था। ऐसे अराजकता के काल में फ्रांस के शासन की बागडोर 18 वीं शताब्दी में हेनरी चतुर्थ ने संभाली। उसने सामन्तों का दमन करके देश में शांति और व्यवस्था की स्थापना की। उसने सैनिक शक्ति में वृद्धि करके देश को विदेशी आक्रमणों से मुक्ति दिलाई। उसने शासन के संचालन का भार अपने मंत्री सली के ड्यूक पर डाला जो राजकाज में चतुर, सुयोग्य और कर्तव्यशील व्यक्ति था। उसने कर वसूल करने की प्रणाली में सुधार किया जिससे आय में वृद्धि होने लगी तथा राज्य की आर्थिक स्थिति में स्थिरता उत्पन्न हुई। उसने कृषि का उत्पादन बढाया और व्यापार का विकास किया। उसने फ्रांस के जहाजी बेडे़ का निर्माण कराया और उनके द्वारा अमेरिका में फ्रांसीसी नागरिकों को बडी संख्या में भेजकर वहाॅं फ्रांसीसी उपनिवेश की स्थापना की। उसने भारत में भी फ्रांसीसी कोठियों का निर्माण कराया। सली की इस प्रकार की नीति से फ्रांस के आदर, मान और प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई। 1610 में हेनरी चतुर्थ की मृत्यू हो गई।
उसके उपरांत 1642 ई. तक लुई तेरहवां और उसके बाद 1715 ई. तक फ्रांस के शासकों में सबसे योग्य शासक लुई चतुर्दश ने शासन किया। उसके समय में फ्रांस को अनेक युद्धों में भाग लेकर धन-जन की महान हानि सहन करनी पड़ी जिससे राजकोष रिक्त हो गया, अतः लुई पंद्रहवे का शसन काल राजसत्तों की शक्ति के ह्रास का काल रहा ।
1774 ई. में लुई पंद्रहवें की मृत्यु हो गई और उसका पुत्र लुई सोलहवें के नाम से फ्रांस का शासक बना। वह साधारण जनता का हित चाहता था, परंतु आत्म-विश्वास, दृढता और स्थिरता की कमी के कारण वह इस दिशा में कुछ नहीं कर सका। वह निरंकुश होते हुए भी सामंतों और पादरियों के हाथ की कठपुतली बना हुआ था। उस समय फ्रांस में कोई विधान नहीं था तथा देश के विभिन्न प्रांतों के शासन में अत्यधिक अन्तर थां। कुछ प्रांतों को अधिक सुविधायें उपलब्ध थीं, जब कि अन्य प्रान्तों को अधिक कर देना पड़ता था और प्रशासनिक कठोरता को भी सहन करना पड़ता था। शासन-प्रबंध भिन्न-भिन्न प्रकार की परम्पराओं, नियमों ओर नीतियों पर आधारित था। चर्च का राज्य पर विशेष रूप ने प्रभाव स्थापित था।
राजा यद्यपि कैथोलिक मतानुयायी था, परंतु अन्य धर्मावलंबियों के साथ भी उसका व्यवहार सहनशीलता से परिपूर्ण था। देश की एकमात्र विधान सभा स्टेटस जनरल थी जिसका 1917 ई. से कोई अधिवेशन नहीं हुआ था। फ्रांसीसी जनता नवीन संविधान की इच्छुक थी और उसके द्वारा सुख, शांति और समृद्धि की अभिलाषिणी थी। फ्रांसीसी व्यक्तियों के विचार में फ्रांस का संविधान इस प्रकार का हलवा था जिसे जब भी इच्छा हो तैयार किया जा सके । राजा ने नेकर नामक दरबारी को अपना अर्थ मंत्री नियुक्त किया हुआ था। उसने आर्थिक सुधारों के लिये एक योजना तैयार की जिसे राजा के दरबारियों और स्वार्थी कुलीनों ने अस्वीकार कर दिया। अतः लुई सोलहवें ने नेकर को उसके पद से पृथक कर दिया। उसके स्टेट्स जनरल में तीन सदन थे। प्रथम सदन में कुलीनों के तीन सौ सदस्यों के लिए स्थान था। दूसरे सदन में पादरी वर्ग के 300 प्रतिनिधि बैठते थे। तृतीय सदन साधारण जनता का प्रतिनिधित्व करता था। इसकी सदस्य संख्या यद्यपि प्रथम सदन और द्वितीय सदनों की सम्मिलित सदस्य संख्या होनी चाहिये थी, परंतु वह केवल 300 ही थी। इस सभा के पास कोई वास्तविक अधिकार नहीं था। वह केवल राजा को प्रशासनिक कार्यों में परामर्श दे सकती थी। राजा उन परामर्शों को स्वीकार अथवा अस्वीकृत कर सकता था। यद्यपि शासक की शक्ति केंद्र में स्थित थी, परंतु कमजोर शासक लुई सोलहवें के कारण उसे दृढता प्राप्त नहीं थी और देश में सर्वत्र असंतोष और अराजकता का प्रसार था।
2. फ्रांस की सामाजिक दशा
16 वीं शताब्दी में फ्रांसीसी समाज तीन वर्गो में विभक्त था। प्रथम वर्ग कुलीन, दुसरा वर्ग पादरियों का और तीसरा वर्ग साधारण जनता का था। तीनों वर्गों में प्रथम दो वर्ग शक्तिसंपन्न और विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग थे इन्हें राजकीय करों की अदायगी नहीं करनी पड़ती थी। तीसरा वर्ग साधारण जनता का था। राजकीय करों का संपूर्ण भार इसी वर्ग को वहन करना पड़ता था। इतिहासकारों ने उस काल की स्थिति का वर्णन इस प्रकार किया है -कुलीन युद्ध करते हैं, पादरी ईश्वर की पूजा करते हैं और जनता करों की अदायगी करती है। जो व्यक्ति जितना अधिक धनवान होता था उसे उतने ही कम कर सरकार को देने पडते थे। इस प्रकार उस समय के समाज के वर्गाें में अमीरों और गरीबों के अधिकारों और स्थिति में बहुत अधिक अंतर था।
3. फ्रांस की आर्थिक दशा
1789 ई. की फ्रांसीसी राज्य क्रांति से पूर्व फ्रांस में आर्थिक दशा अव्यवस्थित और अस्त-व्यस्त थी। करों में समानता नहीं थी। सामंतों और जागीरदारों की संख्या कम होते हुए भी देश की चौथाई भूमि पर उन्हीं का अधिकार था। उन्हें राजकीय कर नहीं देना पड़ते थे। उन्हीं की तरह पादरियों ने भी देश की कुल भूमि के पाँचवें भाग पर अधिकार जमा रखा था। उन्हें भी राजकीय करों से मुक्त रखा गया था। इस प्रकार राज्य की आय बहुत कम रह गयी थी, परंतु राज्य का व्यय बहुत बढ़ा हुआ था। आय से बढ़े व्यय की पूर्ति ऋण लेकर की जाती थी। देश का वाणिज्य व्यवसाय भी उन्नत नहीं था। देश के भिन्न-भिन्न स्थानों पर चुंगी और टोल टैक्स की दरों में बहुत अधिक अंतर था। कारीगरों को जितना कठोर परिश्रम करना पड़ता था उतना पारिश्रमिक उन्हें नहीं मिलता था। कठोर नियमों के बने होने के कारण ये लोग किसी प्रकार का आन्दोलन भी नहीं कर सकते थे। इन्हीं कठिनाइयो के कारण व्यापारिक माल का उत्पादन अधिक नहीं हो पा रहा था। जिससे राष्ट्रीय आय में उद्योग-धंधों और व्यापार तथा व्यवसाय में वृद्धि नहीं हो रही थी।
राजा की आय और राज्य की आय में कोई अंतर नहीं माना जाता था। राजा, राजपरिवार के सदस्य, दरबारी और राजा के मुंह लगे मित्र राजकोष में रुपया आते ही व्यय कर डालते थे। बजट बनाना और आय व्यय का हिसाब रखना कोई नहीं जानता था और न इसके लिये कोई प्रयास ही किया जाता था। अतः राज्य के आय-व्यय और आर्थिक स्थिति का किसी को भी वास्तविक ज्ञान नहीं था। लुई चतुर्दश के समय में लडे़ गये अनेक युद्धों के कारण फ्रांस पर पहले से ही भारी ऋण था। लुई पंद्रहवें के शासन काल में भी ऋण का भार वही था। अपने जीवन भर लुई पंद्रहवां ऋण लेकर ही काम चलाता रहा। अतः लुई सोलहवें के शासन काल में स्थिति इतनी बिगड़ चुकी थी कि अब और आगे ऋण मिलना एक प्रकार से असंभव ही हो गया था।
फ्रांसीसी क्रांति की घटनायें
1. राष्ट्रीय सभा की स्थापना (17 जून 1789) – 17 जून को पादरी सदन के 12 कनिष्ठ पादरी तीसरे सदन के सदस्यों से आकर मिल गये। यह क्रांति का प्रथम चरण था। तृतीय सदन ने अब अधिक इंतजार नहीं किया। 17 जून को लोरेन के एक प्रतिनिधि ने यह प्रस्ताव प्रस्तुत किया कि तीसरे सदन को राष्ट्रीय सभा का नाम धारण करना चाहिए। बहुमत से यह प्रस्ताव पारित हो जाने पर तीसरे सदन के सदस्यों ने 17 जून 1789 को अपने सदन को राष्ट्रीय सभा घोषित कर दिया। एक अन्य प्रस्ताव के अनुसार राष्ट्रीय सभा ने यह निर्णय लिया कि राष्ट्रीय सभा की अनुमति के बिना भविष्य में कोई कर नहीं लगाया जायगा। यह एक महत्वपूर्ण क्रांतिकारी कदम था। फ्रांस में यह क्रांति का प्रारम्भ था।
इस घटना से फ्रांस की क्रांति हिंसा और रक्तपात की ओर मुड़ गयी। जब जनता की भीड़ जनता की महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरी। बास्तील के पतन के बाद सारे फ्रांस में क्रांति की लहर फैल गई और पेरिस, क्रांतिकारियों की सभी गतिविधियों का केंद्र बन गया। इसके बाद कृषकों ने देहातों में सामंतों के गढ़ों को लूटकर विध्वंस कर दिया, उनके दस्तावेज जला दिये, उनकी सम्पत्ति लूट ली और उनकी कृषि भूमि पर बलपूर्वक अधिकार कर लिया परिणामस्वरूप कुलीन वर्ग के लोग अपने जीवन की सुरक्षा के लिये फ्रांस से बाहर पलायन कर गये।
फ्रांसीसी क्रांति के कारण
फ्रांस की राज्य क्रांति के कारण स्पष्ट करना लगभग असंभव है क्योंकि इस क्रांति के
मूल में अनेक जटिल समस्याओं का समावेश है। जिस समय किसी समाज अथवा देश की
व्यवस्था में दोष उत्पन्न होने लगते हैं और उन दोषों के कारण उसका स्वरूप विकृत होने
लगता है तब क्रान्ति की संभावनायें प्रबल हो जाती हैं। फ्रांस की राज्य क्रांति जनता के दैनिक
जीवन की कइिनाइयों और बोैद्धिक जागरण के मेल से उत्पन्न हुई थी। उस समय बौद्धिक
जागरण के कारण ही जनता ने सांसारिक जीवन की कठिनाइयों को दूर करने के लिये क्रांति
का विस्फोट किया था।
फ्रांस की राज्य क्रांति के प्रधान कारणों की व्याख्या निम्न प्रकार से की जा सकती
है:-
1. फ्रांसीसी क्रांति के राजनीतिक कारण
फ्रांस की राज्य क्रांति के राजनीतिक कारणों को नीचे दिये शीर्षकों में व्यक्त किया जा सकता
है।
प्रश््रश््रशासनिक अव्यवस्था
फ्रांस के शासन में व्यवस्था का नाम तक नहीं रहा था। योग्य, अयोग्य का विचार नहीं
करते हुये राज्य के सभी महत्वपूर्ण पदों को नीलाम किया जाता था। पदाधिकारियों और शक्ति
की कोई सीमा नहीं थी। उन्हें अपने अधिकरों का प्रायः ज्ञान तक नहीं रहता था। प्रत्येक प्रान्त
में राज्यपाल तो होता था, परंतु बहुत से ऐसे भी प्रांत थे जिनमें कौसिंले नहीं थीं। सभी नगरों
में नगर सभा बनी थी, परंतु उनमें से कोई भी दो नगर सभाओं के नियम और निर्वाचन प्रणाली
समान नहीं थीं। भिन्न -भिन्न प्रांतों में विभिन्न प्रकार के कानून प्रचलित थे। कानूनों में कोई
समता नहीं थी। एक नगर में जो बात नियमाकूल मानी जाती थी वही बात समीप के किसी
दूसरे नगर में गैर कानूनी समझी जाती थी। फ्रांस के विभिन्न भागों मे लगभग चार सौ प्रकार
के कानून प्रचलित थे। देश के लिए एक संविधान नहीं था।
हुआ जो शक्तिशाली, सुयोग्य और कुशल हो। अतः फ्रांस का राजकोष रिक्त हो गया और
उसका सैनिक गौरव क्षीण हो गया। विदेशों में फ्रांस की जो प्रतिष्ठा लुई चतुर्दश के
शासनकाल में थी वह लुई सोलहवें के काल में स्वप्न बन गई।
स्टेट्स जनरल का अधिवेशन पिछले डेढ़ सौ वर्षों से अधिक समय से नहीं बुलाया गया था।
जन साधारण को किसी प्रकार के अधिकार प्राप्त नहीं थे। साधारण वर्ग के व्यक्तियों को बिना
मुकदमा चलाये ही बन्दीखाने में बंद कर दिया जाता था। राजा के कृपापात्रों के पास छपे हुए
आदेश-पत्र रहते थे जिनमें वे अपने विरोधी का नाम लिख कर पुलिस चैकी पर दे देते थे।
पुलिस उस व्यक्ति को पकड़ कर जेल भेज देती थी। देश में न कोई अपने विचार स्वतंत्रता
के साथ प्रकट कर सकता था और न कोई व्यक्ति भाषण दे सकता था। अतः जनता क्रांति
के लिये उत्सुक हो उठी थी।
रानी ओर दरबारियों की विलासिता पर व्यय कर दी जाती थी। राजमहल में राजा की सेवा के
लिए 1600 सेवक और महारानी की नौकरी में पाॅच सौ दासियां नियुक्त थीं। राजा की
घुड़साल में 18 सौ घोड़े और दो सौ गाडियां थी। राजमहल का वार्षिक व्यय बारह करोड़ रूपये
से अधिक था। राजा और रानी अपने कृपापात्रों को अपार धन राशि पुरूस्कार के रूप में देते
रहते थे। इस प्रकार के भारी अपव्यय ने राजकोष खाली कर दिया।
कुलीनों और पादरियों को विशेषाधिकार प्राप्त थे जिनके कारण उन्हें किसी प्रकार का कर देना
नहीं पड़ता था। कृषकों को राज्य, जमींदारों और चर्च को विभिन्न प्रकार के इतने कर देने पड़ते
थे कि उनकी आय का 85 प्रतिशत् से भी अधिक भाग उन करों के भुगतान में व्यय हो जाता
था। किसानों को आय -कर भी देना पड़ता था जो कृषक के घर बार आदि को देखकर
लगाया जाता था। इन भारी करों के कारण जनता में राजा और राज्य के प्रति असंतोष बढ़ता
जा रहा था। इस असंतोष ने ही आगे चलकर क्रांति का विस्फोट कर डाला।
रजिस्टर कानून लिखने के लिये होता था। राजा के बनाये कानून इस रजिस्टर में लिखे जाते
थे। इसके बाद उन कानूनों पर अमल किया जाता था। फ्रांस के उन न्यायालयों के क्षेत्रों में
लगभग 400 तरह के कानून प्रचलित थे। इन कानूनों के अनुसार जो बात एक स्थान पर
नियमानुकूल थी वही दूसरे क्षेत्र में गैर-कानूनी थी। न्यायाधीश यदि किसी कानून को अनुचित
समझता था तो उसे रजिस्टर में लिख कर उसके विरूद्ध राजा की सेवा में एक प्रार्थना-पत्र
भेज देता था तथा प्रार्थना-पत्र की प्रतियाॅ प्रकाशित करा कर उन्हें जनता में वितरित कर देता
था। राजा प्रार्थना-पत्र मिलने पर कानून में कुछ संशोधन कर देता था या फिर कानून को
वापिस मंगा लेता था या न्यायालयों के अधिकारियों को बुलाकर उन्हें कानून रजिस्टर में दर्ज
कराने का आदेश देता था जिससे यह कानून रजिस्टर में दर्ज करा लिया जाता था। परंतु
न्यायाधीश उस कानून पर अमल नहीं करते थे। इस तरह कानून केवल रजिस्टर में ही रह
जाता था। ऐसी स्थिति में विद्वानों में कानून के दोषों के संबंध में बहस होने लगती थी। जनता
की इस मनोवृत्ति ने भी क्रांति का विस्फोट कराने में पर्याप्त सहयोग प्रदान किया था।
राजा की अस्थिरता
राजा के डरपोक स्वभाव की अस्थिरता के कारण शासन में भ्रष्टाचार और अव्यवस्था
उत्पन्न हो गई थी। राजा का स्तर निम्न कोटि का था। उसमें प्रशासनिक कार्यो के प्रति रूचि
का पूर्ण रूप से अभाव था। शिकार खेलने, तोले बनाने और नाटक खेलने में उसका मन
अधिक लगता था। वह बड़ी आसानी के साथ दरबारियों और रानी के बहकावे में आ जाता था।
अन्तःकरण से जनता की भलाई चाहते हुए भी उपयुक्त सुधारों को लागू करने में राजा असमर्थ
रहता था। अतः उसकी अस्थिरता ने फ्रांस को धीरे-धीरे क्रांति की रक्तपात पूर्ण भट्टी में झोंक
दिया।
विदेशी महिला थी। फ्रांसीसी जनता उसे घृणापूर्वक ‘‘आस्ट्रियन औरत’’ कहा करती थी। वह
अति सुंदर, सुसंस्कृत, सभ्य और सुदृढ़ विचारों की युवती थी। उसके स्वभाव में ऐश्वर्य और
विलास की मात्रा अधिक थी। राजा लुई सोलहवें पर उसका अधिक प्राभाव था। वह अपने हर
प्रकार के कार्य करा लेती थी। राज-काज में अवरोध उत्पन्न करना उसका प्रमुख कार्य बन
गया था। देश की आर्थिक स्थिति बिगड़ने पर भी वह अपने कृपापात्रों को पुरस्कृत करती और
बहुमूल्य आभूषण खरीदती रहती थी। इसलिये फ्रांस की जनता उससे घृणा करती थी।
2. फ्रांसीसी क्रांति के सामाजिक कारण
फ्रांस की राज्य क्रांति का दूसरा प्रधान कारण समाज में फैली हुई असमानता थी।
फ्रांसीसी समाज उस समय दो प्रमुख वर्गो में विभाजित था। प्रथम वर्ग विशेषाधिकार वाले
कुलीनो, सामंतो, और उच्च पादरियों से बना था। इन्हें राजा को किसी प्रकार का कर नहीं देना
पडता था। दूसरा वर्ग श्रमकों, कृषकों, छोटे-छोंटे कर्मचारियों, शिल्पियों, व्यापारियों, दुकानदारों
और वकील, डाॅक्टर, दार्शनिक, लेखक आदि मध्यम स्थिति के व्यक्तियों से निर्मित था। इन
सभी व्यक्तियों को राज्य, चर्च और जमींदारों को भारी कर देने पड़ते थे। इन करों के कारण
उनमें हर समय राज्य के प्रति असंतोष रहता था। यही असंतोष आगे चलकर क्रांति के विस्फोट
का कारण बन गया था।
विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग में कुलीन और उच्च पादरी सम्मिलित थे। दोनों की सम्मिलित
संख्या लगभग 2 लाख 70 हजार थी, जो फ्रांस की संपूर्ण जनसंख्या का एक प्रतिशत से भी
कम था। इतना होते हुए भी राज्य के सभी उच्च पदों और भूमि के अधिकांश भाग पर इन्ही
का अधिकार था। सामंतों ने अपनी-अपनी जागीरों में आटा पीसने की चक्की और शराब की
भट्टियाॅ लगा रखीं थी तथा तंदूर खोल रखे थे। जागीरों में रहने वाले सभी व्यक्तियों को कर
देकर भट्टियों पर अंगूर की शराब बनवानी, चक्की पर आटा पिसवाना और तंदूर पर रोटी
पकवानी पड़ती थी। जागीदार कृषकों से उनके माल पर चुगी तथा पुलों पर रोटी कर वसूल करते
थे। उनकी शिकारगाहों में जंगली जानवर और सामंतों के पालतू पशू रहते थे। जो कृषकों के खेतों
को उजाड़ते रहते थे। कृषकों को यह हानि चुपचाप सहन करनी पडती थी। साधारण वर्ग के
व्यक्तियों को कुलीनों और पादरियों के विशेषाधिकार असहनीय हो गये थे। अतः उनका वह
असंतोष ही धीरे-धीरे क्रांति का विस्फोट करने के लिये चिंगारी का काम करने लगा।
चर्च में भी असमानता और पक्षपात का बोलबाला था। चर्च के तीन उच्च पदों पर
कुलीनों के छोटे पुत्रों की नियुक्ति की जाती थी। वे चर्च के तीस करोड़ रूपये वार्षिक की आय
और लंबी अवधि में एकत्रित की गई संपत्ति का उपभोग करने के लिये पूरी तरह स्वतंत्र थे।
उनहें भी राज्य को किसी प्रकार के कर नहीं देने पड़ते थे। वे अपना अधिकांश समय भोग
-विलास और राजदरबार के षडयंत्रों में व्यतीत करते थे। धार्मिक क्रिया कलाप और पूजा पाठ
में उनकी रूचि नहीं थी। छोटे-छोटे पादरी साधारण वर्ग के कृषकों में से नियुक्त किये जाते
थे। उन्हें चर्च से प्रति व्यक्ति केवल 25 पौंड वार्षिक आय ही मिलता था। अतः साधारण वर्ग
के समान ही छोटे-छोटे पादरियों में भी शासनतंत्र के प्रति भारी असंतोष था। इसीलिये क्रांति
का आरंभ होने पर इन्होंनं साधारण वर्ग को अपना सहयोग प्रदान किया था।
नहीं थे। इसी वर्ग को साधारण वर्ग कहा जाता था। यह भी दो भागों में विभक्त था। इसका
प्रथम भाग मध्यम वर्ग के नाम से प्रसिद्ध था। इसने बहुत अधिक उन्नति कर ली थी। वकील,
डाक्टर, दार्शनिक, लेखक, वैद्य, कलाकार, व्यापारी और निम्न नियुक्त सरकारी कर्मचारी इसी
मध्यम वर्ग की संतान थे। फ्रांस की संपत्ति, बुद्धि, और उद्योग धंधों पर इन्हीं का अधिकार था।
कुलीन और सामंत इनसे ऋण लिया करते थी। इतनी अधिक उन्नति करके भी ये राजनीतिक
अधिकारों से पूर्णतः वंचित थे। इसके अतिरिक्त इन्हें सभी प्रकार के कर अदा करने पड़ते थे।
फ्रांस की प्रशासनिक अवस्था के लचर हो जाने पर सबसे अधिक हानि इस वर्ग को ही उठानी
पड़ी थी। दार्शनिकों की विचारधारा का सबसे अधिक प्रभाव इन्हीं पर पड़ा था जिसके कारण
शासन के विरूद्ध असंतोष की मात्रा भी इसी मध्यम वर्ग के व्यक्तियों में सबसे अधिक थी।
इन्होनें ही क्रांति विस्फोट होने पर क्रांति का संचालन किया था। वास्तविक बात तो यह है कि
क्रांति के कर्णधार भी इसी मध्यम वर्ग के व्यक्ति थे।
साधारण वर्ग के नगरों में काम करने वाले नौकरों, कारीगरों, श्रमिकों, शिल्पकारों और घरों में
काम करने वाले सेवकों की संख्या लगभग 25 लाख थी। इनकी दशा बड़ी ही करूणाजनक
थी। कठोर परिश्रम करने पर भी इन्हें इतना कम पारिश्रमिक दिया जाता था कि उसमे ये लोग
अपना और अपने पारिवारिक जनों का पालन-पोषण तक नहीं कर सकते थे। इन्हें अपने इस
प्रकार के कष्टपूर्ण जीवन के प्रति अत्यधिक असंतोष था। क्रांति का प्रभाव उत्पन्न होने पर
सबसे अधिक क्रियाशीलता इन्हीं में देखी गई। क्रांति का प्रसार होने पर पेरिस की अनियंत्रित
भीड़ में सबसे अधिक संख्या इन्हीं की थी।
समाज के कृषकों की संख्या सबसे अधिक थी। संपूर्ण जनसंख्या का 80 प्रतिशत् इन्हीं
से निर्मित था। इनकी कुल संख्या 2 करोड से भी अधिक थी। करों का संपूर्ण भार इन्हीं पर
था। राज्य के अतिरिक्त इन्हें चर्च को धर्म कर अपनी उपज के दसवें भाग से बीसवें भाग तक
तथा जागीरदारों को तरह-तरह के कर देने पड़ते थे। उसे भेंट, टोल टेक्स, नजराने आदि
के रूप में सदैव कुछ न कुछ देते रहना पड़ता था। इस प्रकार उनकी आय का 85 प्रतिशत्
से भी अधिक करों के रूप में निकल जाता था। शेष 15 प्रतिशत् से भी कम में उन्हें अपना और
अपने परिवार का पालन-पोषण करना पड़ता था। इसी कारण से उस समय की प्रचलित राज्य
व्यवस्था के प्रति असंतोष की गहरी मात्रा साधारण वर्ग के इसी भाग में विद्यमान थी और क्रांति
आरंभ होने पर इन्होंने सबसे अधिक भाग लिया था।
3. फ्रांसीसी क्रांति के बौद्धिक कारण
फ्रांस की इस अव्यवस्था में फ्रांसीसी दार्शनिक और विचारकों के राजनीतिक और
सामाजिक त्रुटियों का जनता को ज्ञान करा कर उसके हृदय में कुलीनों, सामन्तों और उच्च
पादरी वर्ग के विरूद्ध घृणा, असंतोष और विद्रोह की भावनाओं को जागृत करके तीव्रता प्रदान
की थी अतः यह कहना अतिश्योक्ति न होगी कि सभी प्रकार के दार्शनिकों और लेखकों ने
फ्रांसीसी क्रांति के विस्फोट में अपना पूरी तरह सहयोग प्रदान किया था। माॅन्टेस्क्यू ने राजा
के दैवीय अधिकारों की सत्यता को चुनोैती देकर सिद्ध कर दिया कि राजा जनता द्वारा
निर्वाचित व्यक्ति होने के कारण अपनी इच्छा को कानून का रूप प्रदान नहीं कर सकता।
इसलिए फ्रांस में इंग्लैड के समान वैद्य राजसत्ता की स्थापना की जानी चाहिये। वाल्तेयर ने
अपने निंदात्मक लेखों और भाषाओं द्वारा राजा और चर्च की हठधर्मी तथा उच्च पादरियों को
धर्म के प्रति अश्रद्धा का जनता को परिचय करा जनसाधारण की उनके प्रति श्रद्धा कम की।
रूसो ने अपनी पुस्तक सामाजिक समझौता द्वारा सिद्ध कर दिया कि फ्रांस के शासकों ने अपनी
मुर्खता और अत्याचारों द्वारा जनता को क्रांति के लिये उत्तेजना प्रदान की है। उसने मानव
अधिकारों की व्याख्या करते हुए लोकतंत्र प्रणाली को विश्व की सर्वोत्तम प्रणाली घोषित किया।
क्वेसने ने व्यापारिक माल पर चुंगी लेना अनियमित बताते हुए उसे हटाने का परामर्श दिया।
इस तरह दार्शनिकों, लेखकों और विचारकों ने देश की प्राचीन शासन व्यवस्था के दोषों को
जनता को ज्ञान करा कर उन्हें उन बुराइयों को दूर करने के लिये क्रांति का आह्वान करने
की प्रेरणा प्रदान की।
4. फ्रांसीसी क्रांति के आर्थिक कारण
राज्य क्रांति का प्रधान कारण फ्रांस आर्थिक दशा में दोष उत्पन्न होना था। लुई 14 वें के शासन काल में अनेक युद्ध लडे़ गये जिनके कारण देश ऋण के भारी भार सें दब गया था।
उसने तीस करोड़ रूपया व्यय करके पेरिस से 12 मील के अंतर पर वार्साय नाम का एक
राजप्रसाद तैयार करवाया जो शान-शैाकत और सुन्दरता में अनुपम था। इतिहासकारों ने
राजप्रसाद के संबंध में अपने विचार प्रकट करते हुए लिखा है, कि वर्साय का राजमहल बनकर
तैयार हुआ तो उसकी सुंदरता ने विश्व को आश्चर्यचकित कर दियां वह फ्रांस के राजवंश के
सदस्यों के लिये स्वर्ग के समान था। इसकी शान शौकत स्थिर रखने में लगभग 12 करोड़
रूपया वार्षिक व्यय होता रहता था। लुई पंद्रहवें के शासन काल में अपव्यय में वृद्धि होने,
सप्तवर्षिय युद्ध में फ्रांस के सम्मिलित होने और शासन व्यवस्था के बिगड़ जाने से व्यय की
मात्रा आय से अधिक हो गई और प्रतिवर्ष घाटा बढ़ने लगा। इस घाटे को नये ऋण लेकर पूरा
करना पड़ा। लुई 16 वें के शासन के अंतर्गत आर्थिक स्थिति इतनी अधिक विकृत हो चुकी थी
कि उसमें सुधार करना उस समय का सबसे प्रधान कार्य बन गया। आर्थिक दशा उसी समय
सुधर सकती थी जब विशेषाधिकार वर्ग पर कर लगाये जायें तथा अपव्यय को कम किया जाये।
ये दोनों कार्य कुलीनों और उच्च पादरियों के स्वार्थ के विरूद्ध थे। अतः उन्होने महारानी की
आड़ लेकर सुधारों का उग्रता के साथ विरोध किया।
अर्थ मंत्री नियुक्त किया, परंतु स्वार्थी दरबारियों के विरोध के कारण तुर्गो और नेकर के सुधारों
का कोई सुखद परिणाम नहीं निकल सका। अतः लुई सोलहवें को उन्हें एक एक करके मंत्री
पद से पृथक करना पड़ा। उस काल में फ्रांस पर साठ करोड़ डालर का ऋण था। इसके
अतिरिक्त लगभग ढाई करोड़ का घाटा बजट में था। अतः फ्रांस के दिवालिया बनने में कोई
कमी नहीं रह गई थी। लुई ने विवश होकर 1787 ई . में राज्य के प्रमुख व्यक्तियों की सभा
बुलाई। सभा ने कुलीनों और उच्च पादरियों पर कर लगाये जाने का प्रस्ताव सभा में प्रस्तुत
किया। कुलीनों ने प्रस्ताव टालने के लिये प्रयास किया और कहा कि इस प्रस्ताव पर केवल
राज्य परिषद ही निर्णय कर सकती है। अब लुई सोलहवें को राज्य परिषद का अधिवेशन
बुलाना पड़ा। परिषद के तृतीय वर्ग के सदस्यों ने परिषद में आते ही क्रांति की बारूद में
चिंगारी लगा दी।
परंतु पेरिस के न्यायालय ने स्पष्ट किया कि नवीन कर केवल राज्य परिषद ही लगा सकती
है। अतः राजा को राज्य-परिषद को आमंत्रित करना पड़ा। उसे बुलाना क्रांति का स्वागत
करना ही था।
संग्राम का आयोजन किया गया था तो फ्रांस ने धन-जन से अमेरिका को सहायता प्रदान की।
इसका परिणाम फ्रांस के लिये हानिकारक रहा। स्वतंत्रता संग्राम में सहायता प्रदान करने से
फ्रांस की आर्थिक स्थिति और अधिक बिगड़ गयी और क्रांति का विस्फोट अनिवार्य हो गया।
जिन सैनिकों ने अमेरिका के स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था, उन्होंने फ्रांस लौट कर देश
की जनता को क्रांति के लिये उत्तेजित करना आरंभ कर दिया।
की कमी से मरने लगी। वार्साय में राज्य-परिषद का अधिवेशन होते समय वहां भूखे पेरिस
निवासियों की भारी भीड़ एकत्रित हो गयी। उनका विचार था कि राजा ने देश भर का अनाज
खरीद कर सरकारी गोदामों में जमा कर लिया है। अतः उन्होंने वार्साय के राजप्रसाद को चारों
ओर से घेर कर राजा, रानी और उसके पुत्र को अपने साथ पेरिस ले जाने के लिये विवश
कियां। राजा के पेरिस पहुंचते ही क्रांति का बिगुल बज गया और क्रांति का विस्फोट हो गया।
