अनुक्रम
ग्रीक, लैटिन,जर्मन और हिबू भाषाऐं भी सीखी। राजा
राममोहन का जब जन्म हुआ तब बंगाल आर्थिक, सामाजिक, और सांस्कृतिक
दृष्टि से आडंबरों से ग्रसित था। हिन्दू धर्म के प्रमुख ग्रंथों का उन्होंने अध्ययन
किया और भारत को पतन के गर्त से निकालने के लिये वे प्रयत्नशील हो गये।
समाज में व्याप्त बुराईयों के कारणों पर उन्होंने गहन चिंतन किया और उसे दूर
करने का बीडा उठा लिया।
स्थापना की उन्होंने मूर्तिपूजा का खण्डन करते हुए यह विचार समाज के समक्ष
रखे कि -‘‘ सभी प्राचीन मौलिक ग्रंथों ने एक ब्रहम का उपदेश दिया है।’’ उन्होंने
वेदो और पांच मुख्य उपनिषदों का बंगला भाषा में अनुवाद प्रकाशित किया और
समाज के सामने निरर्थक धार्मिक अनुष्ठानों का विरोध किया तथा पंडित पुरोहितों
के द्वारा बनाये और अपनाये गये आडंबरों का खुलकर विरोध किया ।
उन्होंने ’प्रीसेप्टस् आफ जीसस’ नामक पुस्तक प्रकाशित की, इस पुस्तक में
उन्होंने न्यू टेस्टामेंट के नैतिक एवं दार्शनिक संदेश को उसकी चमत्कारी
कहानियों से अलग करने की कोशिश की । उनका मानना था कि ’’संसार के
सभी धर्मो का मौलिक उद्देश्य एक ही है और सभी धर्मावलंबी भाई भाई है।’’
1828 ई. में उन्होंने ’ब्रह्म सभा’ के नाम से एक नए समाज की स्थापना की
जो ब्रह्म समाज के नाम से जाना जाने लगा। इस सभा का मुख्य उद्देश्य था
– हिन्दू धर्म में सुधार लाना। मूर्तिपूजा का विरोध करते हुए उन्होंने एक ब्रह्म की
उपासना और सभी धर्माे की समानता पर बल दिया।
राजा राममोहनराय ने समाज में फैली कुरीतियों और आडंबरों का
विरोध करते हुए जाति प्रथा, सती प्रथा और विधवा विवाह जैसे कार्यो में
सामाजिक सुधार करने का प्रयास किया। वे स्त्रियों के अधिकार के समर्थक थे।
आधुनिक और अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार के लिये उन्होंने 1817 में कलकत्ता में एक
इंग्लिश स्कूल चलाया । 1811 ई. में उनके बडे भाई की मृत्यु हो जाने के कारण
उनकी भाभी को सती प्रथा की धधकती ज्वाला में भेट होना था। इस स्थिति को
देखकर वे सती प्रथा के कट्टर विरोधी हो गये थे। इस संबंध में यह उल्लेख
प्राप्त होता है कि -’’राजा रामामोहन राय ने 1818 में दो व्यक्तियों सती प्रथा के
समर्थक तथा विरोधी के मध्य एक वार्तालाप प्रकाशित किया जिसमें स्त्री जाति के
पक्ष में तर्क देते हुए मानवता के आधार पर लोगों से अपील की गई कि उन्हें
जीवित जलाया जाना अनुचित है।’’ गृह सरकार से अनुमति प्राप्त होने पर 1829
ई. को बंगाल में सतीप्रथा को आत्महत्या के समान अपराध घोषित किया। इस
कानून के तहत सती होने वाली स्त्री और उसको सहयोग देने वाले व्यक्तियों के
लिये दण्ड का प्रावधान किया गया।
लागू कर दिया गया। इससे प्रसन्न होकर राजा राममोहन राय ने 16 जनवरी
1830 ई. को कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों और ईसाई मिशनरियों के साथ अंग्रेजी
गर्वनर जनरल को बधाई दी।
राजा मोहनराय ने जात-पांत के भेदभाव को दूर करने, आधुनिक और
अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार करने के लिये – 1825 ई. में वेदांत कालेज मे
सामाजिक और भौतिक विज्ञानों की पढाई की व्यवस्था की । समाचार पत्रों की
स्वतंत्रता के लिये भी उन्होंने 1833 ई. में एक आन्दोलन किया।
सिन्हा के अनुसार -‘‘राममोहन का दृष्टिकोण उदार, व्यापक एवं अपेक्षाकृत
आधुनिक था। उनके विचारों एवं व्यक्तित्व की स्पष्ट छाप उनके सुधारों पर पड़ी।
लेकिन इसी बीच 1833 में इंग्लैण्ड में उनकी अकाल मृत्यु हो गई । उसके बाद
ब्रह्म समाज का संगठन एवं काम ढीला पड़ने लगा।’’
राजा राममोहन राय द्वारा किये गये सामाजिक और धार्मिक सुधारों का
मूल्यांकन करते हुए ताराचंद के शब्दों में यह कहना उचित प्रतीत होता है कि -‘‘
राममोहन ने यह समझ लिया कि स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व के सिद्धान्त पर
आधारित लोकतांत्रिक समाज तभी बन सकता है कि जब जात-पांत का अंत कर
दिया जाए। उन्होंने लिखा जांत-पांत के भेदभाव से हिन्दू समाज के असंख्य
टुकड़े पैदा हुए है। इससे हिन्दू, देश भक्ति की भावना से वंचित हो गए है। हम
लोग लगभग 9 शताब्दियों से पराधीनता के शिकार रहे हैं और इसका कारण यह
रहा है कि हम जांत पांत में बटें हैं जो हममें आपसी एकता के अभाव का कारण
रहा है।’’
राजा राममोहन राय का विवाह
राजा राममोहन राय का विवाह बाल्यावस्था में ही 9 वर्ष की आयु में ही कर दिया गया। उनकी पत्नी का जल्द ही निधन हो गया। इसके बाद 10 वर्ष की आयु में उनका दूसरा विवाह किया गया जिससे उनके दो पुत्र हुए। लेकिन 1826 में उस पत्नी का भी निधन हो गया और इसके बाद उसका तीसरा विवाह किया गया। लेकिन तीसरी पत्नी भी ज्यादा समय जीवित नहीं रह सकी। इस प्रकार राजा राममोहन राय के तीन विवाह हुए थे|
राजा राममोहन राय की शिक्षा-दीक्षा/नौकरी पेशा
राजा राममोहन राय ने प्रारम्भिक शिक्षा संस्कृत और बंगाली भाषा में गाँव के स्कूल से ही हुई। बाद में उन्हें उच्च शिक्षा के लिए पटना के मदरसे में भेजा गया जहाँ उन्होंने अरेबिक और पर्शियन भाषा सीखी। उन्होने 22 की आयु में अंग्रेजी भाषा सीख ली थी। संस्कृत की शिक्षा के लिए वे काशी गए, जहाँ उन्होंने वेदों और उपनिषदों का अध्ययन किया।
राजा राममोहन राय ने ईस्ट इंडिया कंपनी के राजस्व विभाग में नौकरी शुरू की। वे 1805 में ईस्ट इंडिया कंपनी के एक पदाधिकारी जॉन डिग्बी के सहायक के रूप में काम करना शुरू किया। वहां वे पश्चिमी संस्कृति एवं साहित्य के संपर्क में आए। 1809 से लेकर 1814 तक उन्होंने ईस्ट इंडिया कम्पनी के राजस्व विभाग में काम किया।
राजा राममोहन राय की मृत्यु
नवंबर 1830 में राजा राममोहन राय अपनी पेंशन और भत्ते के लिए मुगल सम्राट अकबर द्वितीय के राजदूत बनकर यूनाइटेड किंगडम (United Kingdom) गए। वहां 27 सितम्बर 1833 को ब्रिस्टल (Bristol) के पास स्टाप्लेटोन (Stapleton) में मस्तिष्क ज्वर (Meningitis) के कारण उनका निधन हो गया।
राजा राममोहन राय द्वारा लिखित पुस्तकें
- सती: अ राइटअप ऑफ राजा राम मोहन राय अबाउट बर्निंग विडोज़ अलाइव
- The Precepts of Jesus
- The English Works of Raja Rammohun Roy
- Translation of Several Principal Books, Passages and Texts of the Veds and of Some Controversial Works on Brahmunical Theology
- The Complete Songs of Rammohun Roy
- Brief Remarks Regarding Modern Encroachments on the Ancient Rights of Females: According to the Hindoo Law of Inheritance
- Is Postcolonial Theory Bla-Boring? a Return to Primary Texts: Selections from the Writings of Raja Rammohun Roy (1772-1833)
- A Treatise on Christian Doctrine: Being the Second Appeal to the Christian Public, in Defence of the “precepts of Jesus”
- Why Has Postcolonial Theory Forgotten India’s Islamic Past? Selected Writings of Raja Rammohun Roy (1772-1833).: Recuperating a Hindu-Islamic Metissage Identity
राजा राममोहन राय द्वारा संगठनों की स्थापना
आत्मीय सभा (1814) – समाज में सामाजिक और धार्मिक सुधार शुरू करने हेतु। वास्तव में आत्मीय सभा का उद्देश्य समाज में सामजिक और धार्मिक मुद्दों पर पुन: विचार कर परिवर्तन करना था।
ब्रह्म समाज का उद्देश्य हिन्दू समाज में फैली बुराईयों, जैसे सती प्रथा, बहु-विवाह, वेश्यागमन, जातिवाद, अस्पृश्यता आदि को समाप्त करना था।
राजा राममोहन राय को प्राप्त सम्मान और पुरस्कार
राजा राममोहन राय को दिल्ली के मुगल सम्राट अकबर द्वितीय के द्वारा 1829 में ‘राजा’ की उपाधि दी गयी थी। जब अकबर द्वितीय का राजदूत बनकर राजा राममोहन राय यूनाइटेड किंगडम गए तो वहां के सम्राट विलियम ४ ने भी उनका अभिनंदन किया।
राजा राममोहन राय के धार्मिक विचार
मोनियर विलियम्स के अनुसार, “वे दुनिया के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने पूरी गंभीरता, निष्ठा और लगन से दुनिया के धर्मों का तुलनात्मक अध्यन किया और उनमें निहित सत्य को समझा।”
राजा राममोहन राय ने धर्म को आडंबर से मुक्त करके उसे लौकिक बनाने का प्रयास किया। धर्म को मंदिर की दीवारों से मुक्त कर, उसे मानव-मात्र की सेवा के लिए अग्रसर किया।
राजा राममोहन का सामाजिक क्षेत्र में योगदान
- परंपरावादिता का विरोध – सामाजिक जीवन में किसी स्थिति को मात्र इस कारण श्रेष्ठ नहीं माना जा सकता कि वह लंबे समय से चली आ रही है। अतः परंपराओं के संदर्भ में विवेकसंगत मार्ग अपनाना चाहिए।
- सती प्रथा का उन्मूलन – हिंदू धर्म ग्रंथों के अपने ज्ञान के आधार पर उन्होंने प्रमाणित किया कि सती प्रथा धर्मसंगत नहीं थी। उनके द्वारा चलाए गए आंदोलनों के कारण लॉर्ड विलियम बैंटिक के समय में सन् 1829 में अधिनियम 17 के अंतर्गत सती प्रथा को अवैध घोषित किया गया।
- नारी स्वतंत्रता – वे विधवा विवाह और अंतर्जातीय विवाह के समर्थक तथा बहुपत्नी विवाह के विरोधी थे। स्त्रियों को शैक्षणिक, सामाजिक और आर्थिक अधिकारों के प्रति राय के प्रगतिशील विचारों के कारण उन्हें आधुनिक भारत में स्त्री स्वतंत्रता का सूत्रधार माना जाता है।
- शिक्षा एवं विज्ञान का समर्थन – शिक्षा मनुष्य को ज्ञान से मुक्त करके सामाजिक कुरीतियों को त्यागने की प्रेरणा और साहस प्रदान करती है। राजा राममोहन राय ने 1823 में लॉर्ड एम्हर्स्ट को लिखे ऐतिहासिक पत्र में भारतीयों के लिए आधुनिक वैज्ञानिक एवं अंग्रेजी शिक्षा का समर्थन किया।
राज्य द्वारा कानून निर्माण से अमानवीय सामाजिक प्रथाओं पर प्रतिबंध लगाने का उन्होंने समर्थन किया, जिससे समाज सुधार की गति को त्वरित किया जा सके।
