अनुक्रम
मन की परिभाषा
1. फ्रायड के अनुसार- ‘‘मन से तात्पर्य व्यक्तित्व के उन कारकों से होता है जिसे हम अन्तरात्मा कहते है। तथा जो हमारे व्यक्तित्व में संगठन पैदा करके हमारे व्यवहारों को वातावरण के साथ समायोजन करने में मदद करता है।’’
मन की अवस्थाएँ
मन की अवस्थाओं से तात्पर्य इसके विभिन्न पहलुओं से है। मन आत्मा या व्यक्तित्व के दो पक्ष होते है- जिन्हें आकारात्मक पक्ष और गत्यात्मक पक्ष कहते हैं-
- मन के आकारात्मक पक्ष से तात्पर्य जहाँ संघर्षमय परिस्थिति की गत्यात्मकता उत्पन्न होती है मन का यह पहलू वास्तव में व्यक्तित्व के गत्यात्मक शक्तियों के बीच होने वाले संघर्षों का एक कार्यस्थल होता है।
- मन के गत्यात्मक पक्ष से तात्पर्य उन साधनों से होता है जिसके द्वारा मूल-प्रवृत्तियों से उत्पन्न मानसिक संघर्षों का समाधान होता है।
1. मन के आकारात्मक पक्ष
आकारात्मक पक्ष का अध्ययन हम तीन भागों में बाँट कर करेंगे।
- चेतन मन
- अर्द्ध चेतन मन
- अचेतन मन
1. चेतन मन – मन का वह भाग जिसका सम्बन्ध तुरन्त ज्ञान से होता है, या जिसका सम्बन्ध वर्तमान से होता है। जैसे- कोई व्यक्ति लिख रहा है तो लिखने की चेतना है, पढ़ रहा है तो पढ़ने की चेतना है। व्यक्ति जिन शारीरिक और मानसिक क्रियाओं के प्रति जागरूक रहता है वह चेतन स्तर पर घटित होती है। इस स्तर पर घटित होने वाली सभी क्रियाओं की जानकारी व्यक्ति को रहती है। यद्यपि चेतना में लगातार परिवर्तन होते रहते हैं परन्तु इसमें निरन्तरता होती है अर्थात् यह कभी खत्म नहीं होती है।
- यह मन का सबसे छोटा भाग है।
- चेतन मन का वाºय जगत की वास्तविकता के साथ सीधा सम्बन्ध होता है।
- चेतन मन व्यक्तिगत, नैतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक आदर्शों से भरा होता है।
- यह अचेतन और अर्द्धचेतन पर प्रतिबन्ध का कार्य करता है।
- चेतन मन में वर्तमान विचारों एवं घटनाओं के जीवित स्मृति चिºन होते हैं।
2. अर्द्ध चेतन मन – अर्द्धचेतन का तात्पर्य वैसे मानसिक स्तर से होता है। जो वास्तव में में न तो पूरी तरह से चेतन हैं और ही पूरी तरह से अचेतन। इसमें वैसी इच्छाएँ, विचार, भाव आदि होते हैं। जो हमारे वर्तमान चेतन या अनुभव में नहीं होते हैं परन्तु प्रयास करने पर वे हमारे चेतन मन में आ जाती है।
अर्द्ध चेतन मन की विशेषताएँ
- मन का वह भाग जो चेतन से बड़ा व अचेतन से छोटा होता है।
- अचेतन से चेतन में जाने वाले विचार या भाव अर्द्धचेतन से होकर गुजरते हैं।
- अर्द्धचेतन में किसी चीज को याद करने के लिए कभी-कभी थोड़ा प्रयास करना पड़ता है।
3. अचेतन मन – हमारे कुछ अनुभव इस तरह के होते हैं जो न तो हमारी चेतना में होते हैं और न ही अर्द्धचेतना में। ऐसे अनुभव अचेतन होते हैं। अर्थात् यह मन का वह भाग है जिसका सम्बन्ध ऐसी विषय वस्तु से होता है जिसे व्यक्ति इच्छानुसार याद करके चेतना में लाना चाहे, तो भी नहीं ला सकता है।
अचेतन में रहने वाले विचार एवं इच्छाओं का स्वरूप कामुक, असामाजिक, अनैतिक तथा घृणित होता है। ऐसी इच्छाओं को दिन-प्रतिदिन के जीवन में पूरा कर पाना सम्भव नहीं है। अत: इन इच्छाओं को चेतना से हटाकर अचेतन में दबा दिया जाता है और वहाँ पर ऐसी इच्छाएँ समाप्त नहीं होती है। बल्कि समय-समय पर ये इच्छाएँ चेतन स्तर पर आने का प्रयास करती रहती है।
फ्रायड ने इस सिद्धान्त की तुलना आइसबर्ग से की है। जिसका 9/10 भाग पानी के अन्दर और 1/10 भाग पानी के बाहर रहता है। पानी के अन्दर वाला भाग अचेतन तथा पानी के बाहर वाला भाग चेतन होता है तथा जो भाग पानी के ऊपरी सतह से स्पर्श करता हुआ होता है वह अर्द्धचेतन कहलाता है।
अचेतन मन की विशेषताएँ
- अचेतन मन अर्द्धचेतन व चेतन से बड़ा होता है।
- अचेतन में कामुक, अनैतिक, असामाजिक इच्छाओं की प्रधानता होती है।
- अचेतन का स्वरूप गत्यात्मक होता है। अर्थात् अचेतन मन में जाने पर इच्छाएँ समाप्त नहीं होती है। बल्कि सक्रिय होकर ये चेतन में लाटै आना चाहती है। परन्तु चेतन मन के रोक के कारण ये चेतन में नहीं आ पाती है और रूप बदलकर स्वप्न व दैनिक जीवन की छोटी-मोटी गलतियों के रूप में व्यक्त होती है और जो अचेतन के रूप को गत्यात्मक बना देती है।
- अचेतन के बारे में व्यक्ति पूरी तरह से अनभिज्ञ रहता है क्योंकि अचेतन का सम्बन्ध वास्तविकता से नहीं होता है।
- अचेतन मन का छिपा हुआ भाग होता है। यह एक बिजली के प्रवाह की भाँति होता है। जिसे सीधे देखा नहीं जा सकता है परन्तु इसके प्रभावों के आधार पर इसको समझा जा सकता है।
स्पष्ट है कि अचेतन अनुभूतियों एवं विचारों का प्रभाव हमारे व्यवहार पर चेतन, अर्द्धचेतन अनुभूतियों एवं विचारों से अधिक होता है। इसी कारण चेतन व अर्द्धचेतन का आकार चेतन की अपेक्षा बड़ा होता है।
- चेतन मन का वह भाग है जिसका सम्बन्ध तुरन्त ज्ञान से होता है। अर्द्धचेतन मन का वह भाग है जिसका सम्बन्ध ऐसी विषय-सामग्री से होता है, जिसे व्यक्ति इच्छानुसार कभी भी याद कर सकता है।
- चेतन मन का आकार छोटा अर्द्धचेतन मन का आकार उससे बड़ा और अचेतन मन का आकार सबसे बड़ा होता है।
- चेतन मन में केवल वर्तमान अनुभव की स्मृतियाँ रहती है। परन्तु अचेतन का सम्बन्ध पिछले अनुभव से होता है और अर्द्धचेतन में ऐसे अनुभव से होता है जो पिछली अनुभूतियाँ (अनुभव) तो होती है। परन्तु आवश्यकता पड़ने पर हम उनका प्रत्यावहन कर सकते हैं।
- चेतन मन का विषय व्यक्त एवं स्पष्ट होता है। अचेतन मन में विषय पूरी तरह से दमित होते हैं और अर्द्धचेतन मन में विषय आंशिक रूप से दमित होते हैं।
2. मन के गत्यात्मक पक्ष
मन के गत्यात्मक पक्ष से तात्पर्य उन साधनों से होता है जिसके द्वारा मूल प्रवृत्तियों से उत्पन्न मानसिक संघर्षों का समाधान होता है। मूल प्रवृत्तियों से तात्पर्य वैसे जन्मजात और शारीरिक उत्तेजन से होता है जिसके द्वारा व्यक्ति के सभी तरह के व्यवहार निर्धारित किये जाते हैं। मूल प्रवृत्तियाँ दो तरह की होती हैं-
- जीवन मूल प्रवृत्ति
- मृत्यु मूल प्रवृत्ति।
उपाहं के कार्य – इसका मुख्य कार्य शारीरिक इच्छाओं की सन्तुष्टि से है। यह किसी भी प्रकार के तनाव से तुरन्त छुटकारा पाना चाहता है। तुरन्त तनाव को दूर करना ही सुखवाद नियम कहा गया है। दूसरे शब्दों में उपाहं अपने उद्देश्यों की पूर्ति सुखवाद नियम के आधार पर करता है। सुख की प्राप्ति और दु:ख को दूर करने के लिए उपाहं के दो मुख्य कार्य हैं-
- ये जन्मजात और स्वयं चलने वाली होती है। जैसे पलक झपकना, छींकना आदि। सभी व्यक्ति इन क्रियाओं को करने के बाद संतोष का अनुभव करते हैं।
- तनाव को दूर करने के लिए प्राथमिक क्रियाएँ व्यक्ति के सामने उस वस्तु की प्रतिभा बनाती है। जैसे- एक प्यासे व्यक्ति के सामने पानी की प्रतिमा प्रस्तुत कर उसकी प्यास की सन्तुष्टि करना। यहाँ पानी की प्रतिमा उपस्थित करना एक प्राथमिक प्रक्रिया का कार्य है।
2. अहम् – यह मन के गत्यात्मक पहलू का दूसरा भाग है। यह जन्म के समय बच्चे में मौजूद नहीं होता है बल्कि बाद में विकसित होता है। बालक की आयु बढ़ने के साथ-साथ वह वातावरण की वास्तविकता की ओर बढ़ने लगता है। आयु बढ़ने के साथ-साथ वह ‘मेरा’ और ‘मुझे’ जैसे शब्दों का अर्थ समझने लगता है। धीरे-धीरे वह समझने लगता है कि कौन सी वस्तु उसकी है और कौन सी वस्तु दूसरों की। यह उपाहं का एक मुख्य भाग है।
अहम् के कार्य – अहम का मुख्य कार्य वाºय वातावरण के खतरों से जीवन की रक्षा करना है। यह अपने लक्ष्य को वास्तविकता के नियम के आधार पर पूरा करता है। यह सुखवादी नियम का विरोधी नहीं है बल्कि उपयुक्त परिस्थिति के आते ही तात्कालिक सन्तुष्टि में सहायता करता है क्योंकि यह व्यक्तित्व का बौद्धिक पक्ष है। अत: तुरन्त सन्तुष्टि के लिए उपयुक्त परिस्थिति को खोजने या उत्पन्न करने का कार्य भी करता है। यह थोड़ा चेतन, थोड़ा अर्द्धचेतन और थोड़ा अचेतन होता है। इसके द्वारा इन तीनों स्तरों पर निर्णय लिया जाता है।
नैतिक मन से तात्पर्य
यह मन के गत्यात्मक पक्ष का सबसे अन्तिम भाग है और यह व्यक्तित्व का नैतिक पक्ष है। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता जाता है, वह अपना तादात्म्य माता-पिता के साथ स्थापित करने लगता है और बच्चा यह सीख लेता है कि क्या उचित है और क्या अनुचित है, क्या नैतिक है और क्या अनैतिक। नैतिक मन के मुख्य कार्य है-
- उपाहं के अनैतिक, असामाजिक और कामुक संवेगों पर रोक लगाना।
- अहमं के आवेगों को नैतिक और सामाजिक लक्ष्यों की ओर ले जाने की कोशिश करना।
- पूर्ण सामाजिक और आदर्श प्राणी बनाने के लिए प्राणी बनाने के लिए प्रयास करना।