अनुक्रम
1688 ई. में इंग्लैण्ड में हुई इस रक्तहीन क्रांति ने अमेरिका (इंग्लैंड का उपनिवेश) में भी स्वतंत्रता की मांग बुलंद की। अमेरिका में शासन ब्रिटिश संसद द्वारा चलाया जाता था जो अमेरिकावासियों को सहन न था। वे स्वतंत्र रूप से शासन करना चाहते थे। अतः अमेरिकी उपनिवेश ने अपनी स्वतंत्रता के लिए जो संघर्ष किया वही अमेरिकी क्रांति कहलाता है। ये क्रांति 1776 ई. में हुई। उपरोक्त दो क्रांतियों के परिणाम एवं प्रभाव स्वरूप यूरोप में भी क्रांति का दौर प्रारंभ हुआ।
इंग्लैंड की क्रांति का परिचय
1685 ई. में चार्ल्स द्वितीय की मृत्यु के बाद उसका लघुभ्राता इंग्लैण्ड के राजसिंहासन पर जेम्स द्वितीय के नाम से आसीन हुआ। जेम्स द्वितीय ने राजा बनने के बाद कैथोलिक धर्म का प्रचार व प्रसार किया। उसने अपनी नीति को सफल बनाने के लिए सेना और लुई चौदहवें से प्राप्त धन को आधार बनाया। जब 1685 ई. से ही फ्रांस में आतंक का वातावरण प्रारंभ हो गया था। तत्पश्चात फ्रांस में असंतोष शरणार्थी आतंक के दमन से बचने के लिए इग्लैण्ड आने लगे। इससे इग्लैण्ड में असंतोष फैला। जेम्स ने विश्वविद्यालय और सरकारी नौकरियों में भी केथोलिक मताबलम्बियों को रखा। जेम्स के अन्य अनुचित और अवैध कार्यों से इंग्लैण्ड में तीव्र रोष और विरोध फैल गया। अंत में जेम्स द्वितीय को इंग्लैण्ड छोड़ना पड़ा और संसद ने उसकी पुत्री मेरी और उसके पति विलियम को इंग्लैण्ड में आमंत्रित किया और मेरी को इंग्लैण्ड की शासिका बनाया। इस घटना को इंग्लैण्ड में महान क्रांति या वैभवपूर्ण क्रांति कहते हैं। इस क्रांति में रक्त की एक बूंद भी नहीं बही और परिवर्तन हो गये। इससे इस क्रांति को गौरवशाली क्रांति भी कहते हैं।
इंग्लैंड की क्रांति के कारण
1. इंग्लैंड की क्रांति के राजनीतिक कारण
1. जेम्स द्वितीय की निरंकुशता – जेम्स द्वितीय निरंकुश एवं स्वेच्छाचारी शासक था। उसने अपनी सेना में वृद्धि की, जिससे कि वह जनता को आतंकित कर सके। निरंकुश शासन और शासन का कटु अनुभव जनता को पहले ही था। फलतः जनता द्वारा जेम्स का विरोध होना स्वाभाविक था।
2. संसद द्वारा अधिकारों के लिये संघर्ष – संसद अपने विशष्ट अधिकारों का उपयोग चाहती थी। वह राजा के अधिकारों को सीमित और नियंत्रित करना चाहती थी। फलतः राजा और संसद के मध्य संघर्ष प्रारंभ हो गया। इस संघर्ष का अंत शानदार क्रांति के रूप में हुआ और अंत में संसद ने राजा पर विजय प्राप्त की।
3. खूनी न्यायालय – चार्ल्स द्वितीय के अवैध पुत्र मन्मथ ने सिंहासन प्राप्ति के लिए जेम्स के विरूद्ध विद्रोह कर दिया और स्वयं को चार्ल्स द्वितीय का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। जेम्स द्वितीय ने मम्मथ को युद्ध में परास्त कर बंदी बना लिया और उसे तथा उसके साथियों को न्यायालय द्वारा मृत्यु दण्ड दिया गया। इस न्यायालय को खूनी न्यायालय कहा गया। स्काटलैण्ड में भी अर्ल ऑफ अरगिल ने व्रिदोह किया। इस विद्रोह का भी कठोरता से दमन किया गया। तीन सौ व्यक्तियों को मृत्यु दण्ड दिया गया और 800 व्यक्तियों को दास बनाकर वेस्टइंडीज द्वीपों में भेजकर बेच दिया गया। स्त्रियों और बच्चों को भी क्षमा नहीं किया गया। इस क्रूरता और निर्दयता से जनता उससे रुष्ट हो गयी।
4. जेम्स द्वितीय की निष्फल विदेश-नीति- जेम्स द्वितीय फ्रांस के केथोलिक राजा लुई चतुर्दश से आर्थिक और सैनिक सहायता प्राप्त कर इंग्लैण्ड में अपना निरंकुश स्वेच्छाकारी शासन स्थापित करना चाहता था। वह लुई चौदहवें के धन और सैनिक सहायता के आधार पर राज करना चाहता था। लुई केथोलिक था और फ्रांस में प्रोटेस्टेंटों पर अत्याचार कर रहा था। इससे ये प्रोटेस्टेंट इंग्लैण्ड में आकर शरण ले रहे थे। ऐसी दश में इंग्लैण्डवासी और संसद सदस्य नहीं चाहते थे कि जेम्स लुई से मित्रता रखे और उससे सहायता प्राप्त करे। अतः वे जेम्स के विरोधी हो गये
2. इंग्लैंड की क्रांति के धार्मिक कारण
1. केथोलिक धर्म के लिए प्रसार – जेम्स केथोलिक मत का अनुयायी था, जबकि इंग्लैण्ड की अधिकांश जनता एंग्लिकन मत की अनुयायी थी। जेम्स केथोलिकों को अधिकाधिक सुविधाएँ प्रदान करना चाहता था। जेम्स ने पोप को इंग्लैण्ड में आमंत्रित किया और उसका अत्याधिक सम्मान किया। उसने लंदन में केथोलिक गिरजाघर भी स्थापित किया। इससे इंग्लैण्ड के प्युरीटन और प्रोटेस्टेंट उसके विरोधी हो गये।
2. टेस्ट अधिनियम को स्थगित करना – टेस्ट अधिनियम के अंतर्गत केवल एंग्लिकन चर्च के अनुयायी ही सरकारी पद पर रह सकते थे। जेम्स ने इस अधिनियम को स्थगित कर अनेक केथोलिकों को राजकीय पदों पर प्रतिष्ठित किया। मंत्री, न्यायाधीश, नगर-निगम के सदस्य तथा सेना में ऊँचे पदों पर केथोलिक नियुक्त किए गए। अतः सांसद इससे रुष्ट हो गये।
3. विश्वविद्यालयों में हस्तक्षेप – केथोलिक मतावलंबी होने से जेम्स ने विश्वविद्यालयों में भी ऊँचे पदों पर केथोलिक नियुक्त कर दिये। क्राइस्ट चर्च कॉलेज में अधिष्ठाता के पद पर और केम्ब्रिज विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर एक केथोलिक को नियुक्त किया। मेकडॉनल्ड विद्यालय के भीशक्षा अधिकारियों को पृथक कर दिया गया, क्योंकि उन्होंने एक केथोलिक को सभापित बनाने से इंकार कर दिया था। इससे प्रोटेस्टेंट सम्प्रदाय के लोग जेम्स विरोधी हो गये।
5. सात पादरियों पर अभियोग और उनको बंदी बनाना – जेम्स ने यह आदेश दिया कि प्रत्येक रविवार को उसकी द्वितीय धार्मिक घोषणा पादरियों द्वारा चर्च में प्रार्थना के अवसर पर पढ़ी जाए। इसका यह परिणाम होता कि या तो पादरी अपने धर्म व मत के विरूद्ध इस घोषणा को पढ़ें, अथवा राजा की आज्ञा का उल्लंघन करें। इस पर केंटरबरी के आर्च बिशप सेनक्राफ्ट ने अपने 6 साथियों सहित जेम्स को एक आवेदन पत्र प्रस्तुत किया। जिसमें जेम्स से निवेदन किया था कि वह अपनी आज्ञा को निरस्त कर दे और पुराने नियमों को भंग करने की नीति को त्याग दें। इससे जेम्स ने कुपित होकर इन पादरियों को बंदी बना कर उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया, पर न्यायाधीशों ने उनको दोष मुक्त कर दिया। इससे जनता और सेना ने पादरियों की मुक्ति पर हर्ष और जेम्स के प्रति विरोध व्यक्त किया।
6. कोर्ट ऑफ हाई कमीशन की स्थापना – 1686 ई. में जेम्स ने गिरजाघरों पर राजकीय श्रेष्ठता पूर्ण रूप से स्थापित करने के लिए ‘‘कोर्ट ऑफ हाई कमीशन’’ को पुनः स्थापित कर लिया। इसमें केथोलिक धर्म की अवहेलना करने वालों पर मुकदमा चलाकर उनको दण्डित किया जाता था।
7. नवीन केथोलिक गिरजाघर, 1686 ई. – जेम्स ने केथोलिक धर्म के अधिक प्रचार और प्रसार के लिए लंदन में एक नवीन केथोलिक गिरजाघर स्थापित किया। जेम्स ने धा र्मिक न्यायालयों की स्थापना करके कानून को भंग किया, गिरजाघरों, विद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों पर आक्रमण कर पादरियों और टोरियों को रुष्ट किया। जेम्स के इन अनुचित और अवैध कार्यों से देश में विरोध और क्रांति की भावनाएँ फैल गयीं।
इंग्लैंड की क्रांति की घटनायें
1. जेम्स द्वितीय के पुत्र का जन्म – जेम्स द्वितीय की पहली पत्नी की मेरी नामक पु़त्री हुई थी। वह प्रोटेस्टेंट मतावलंबी थी और हालैण्ड में ऑरेंज के राजकुमार विलियम को ब्याही गयी थी। वह भी प्रोटेस्टेंट था। इंग्लैण्डवासियों को विश्वास था कि वही इंग्लैण्ड की शासिका बनेगी, इसलिए वे जेम्स के अनाचार और अनुचित कार्यों को सहन करते रहे। जेम्स की दूसरी पत्नी कट्टर केथोलिक थी। जब 10 जून 1688 को उसके पुत्र हुआ तो लोगों की यह धारणा बनी गयी कि उसका लालन-पालन और शिक्षा केथोलिक धर्म के अनुसार होगी और जेम्स की मृत्यु के बाद वही केथोलिक राजा बनेगा। इससे उनमें भय और आतंक छा गया।
इंग्लैंड की क्रांति का महत्व और परिणाम
इस प्रकार 1688 ई. में इंग्लैण्ड में शासकों का परिवर्तन बिना रक्त की बूंद बहाए संपन्न हो गया, इसलिए इस घटना को वैभवपूर्ण महान शानदार क्रांति कहते हैं। इस रक्तहीन राज्य क्रांति का महत्व उसके गर्जन-तर्जन में नहीं, अपितु उसके उद्देश्यों की विवेकशीलता और उपलब्धियों की दूरगामिता में है। यह एक युग निर्माणकारी घटना है। इससे इंग्लैण्ड में लोकप्रिय सरकार का युग प्रारंभ हुआ और सत्ता निरंकुश स्वेच्छाचारी राजाओं के हाथ से निकल कर संसद के हाथों में आ गयी।