ऐतिहासिक अनुसंधान किसे कहते हैं ?

जो बीत चुका है, अतीत बन चुका है उसका वर्णन, लेखन एवं अध्ययन इतिहास के नाम से जाना जाता है। शिक्षा
एवं समाजशास्त्र के क्षेत्र में ऐसा बहुत कुछ है जिसकी जड़ें अतीत की घटनाओं तक फैली हैं। अतः उसके वर्तमान
स्वरूप को पूर्णतया समझने के लिए उसके इस अतीत को जानना भी आवश्यक है। ऐसा न भी हो तो भी शैक्षिक
एवं समाजशास्त्रीय प्रक्रियाओं एवं परम्पराओं के अतीत स्वयं में महत्त्वपूर्ण एवं जानने योग्य होते हैं। वे स्वयं मानवीय
जिज्ञासा उत्पन्न करते हैं। अनेक बार अतीत के अध्ययन भविष्य में वांछनीय परिवर्तनों की दिशा की ओर भी संकेत
करते हैं। 

ऐतिहासिक अनुसंधान की परिभाषा इस प्रकार की जाती है-ऐसे अनुसंधान जिनमें उन घटनाओं,
प्रक्रियाओं एवं परम्पराओं का अध्ययन किया जाता है जो अतीत में घटी होती हैं। 
स्मिथ एवं स्मिथ के अनुसार,
ऐतिहासिक अनुसंधान का उद्देश्य अतीत का सही-सही वर्णन करना होता है बीते सत्य की विद्वत्तापूर्ण खोज करना,
अर्थात् जिज्ञासा का वह स्वरूप जिसमें शोधकर्ता जानना चाहता है कि अतीत में इसका रूप, इसकी स्थिति कैसी
थी, क्यों और कैसे ऐसा हुआ। 
मौलि के अनुसार, ऐतिहासिक अनुसंधान का उद्देश्य वर्तमान की घटनाओं को और
अधिक स्पष्ट परिप्रेक्ष्य प्रदान करना होता है।

शिक्षा के क्षेत्र में उसके किसी भी पक्ष को लेकर उसकी विगतकालीन स्थिति का अध्ययन किया जा सकता है।
वैदिक काल में गुरु-शिष्य सम्बन्ध, मुगलकालीन शिक्षा की कुछ विशेषताएँ, प्रथम पंचवर्षीय योजना में शिक्षा-नीति,
वैदिक काल की शिक्षा के उद्देश्य, मध्यकालीन शिक्षा के उद्देश्य, मुस्लिम काल में मदरसों की सामाजिक विकास
में भूमिका आदि अनेक समस्याएँ ऐसी हो सकती हैं जिनका अतीत के संदर्भ में अध्ययन किया जा सकता है। ये
सब अध्ययन ऐतिहासिक अनुसंधान की श्रेणी में आते हैं।

सभी ऐतिहासिक अध्ययन वर्णनात्मक एवं विश्लेषणात्मक प्रकार के होते हैं। उनमें
घटना के अतीत की जानकारी देने वाले प्रलेखों, प्रपत्रों, स्मारकों, पुस्तकों, अभिलेखों, ऐतिहासिक अवशेषों आदि का
अध्ययन किया जाता है। उनके आधार पर भाँति-भाँति के तथ्यों एवं साक्ष्यों को एकत्र किया जाता है तथा उनका
विश्लेषण करके निष्कर्ष निकाले जाते हैं।

ऐतिहासिक अनुसंधान की प्रक्रिया

इस प्रकार के अध्ययनों में भी प्रक्रिया का लगभग वही पदक्रम रहता है जो वर्णनात्मक विधि में अपनाया जाता है।
वान डालेन ने पाँच पदों का उल्लेख किया है-

  1. समस्या का निर्धारण, उसकी परिभाषा एवं विस्तृत व्याख्या करना। 
  2. आधारभूत सामग्री एकत्र करना जिसके आधार पर समस्या संबंधी-शोध-सामग्री
    एकत्र की जानी है, समस्या संबंधी जानकारी एवं सूचनाएँ प्राप्त की जानी हैं। 
  3. आधारभूत सामग्री का आलोचनात्मक मूल्यांकन। 
  4. उपकल्पनाओं का सृजन जिनके आधार पर वस्तु-स्थिति की व्याख्या
    की जानी है। 
  5. सामग्री का विश्लेषण, निष्कर्षों का निरूपण एवं आख्या तैयार करना।
    आंशिक परिवर्तन के साथ एवं कुछ भिन्न शब्दों में इन्हीं पदों का उल्लेख मौलि ने भी किया है। 

हौकेट ने त्रिपदी
प्रक्रिया का वर्णन किया है। ये तीन पद हैं- (i) शोध-सामग्री एकत्र करना।
(ii) उसका मूल्यांकन करना।
(iii) लिखित आख्या तैयार करना।

ऐतिहासिक अनुसंधान की शोध-सामग्री

ऐतिहासिक अनुसंधान की शोध-सामग्री  ऐतिहासिक तत्व एवं घटनाएँ ही होती हैं। अन्य अनुसंधानों में इस
सामग्री का स्रोत मूलतः मनोवैज्ञानिक परीक्षाएँ, प्रश्नावलियाँ, साक्षात्कार आदि होते हैं, परन्तु ऐतिहासिक अनुसंधान
में यह ऐतिहासिक तथ्यों, घटनाओं एवं जानकारी के रूप में होती हैं, जिन्हें अनेक स्रोतों से एकत्र किया जाता है। 

उदाहरण ऐतिहासिक जानकारी के आधार पर ही समस्या से जुड़े प्रश्नों के उत्तर एवं तत्संबंधी उपकल्पनाओं
की जांच हेतु साक्ष्य प्रस्तुत किए जाते हैं।
 

मौलि ने ऐतिहासिक जानकारी अथवा साक्ष्य के स्रोतों को दो श्रेणियों में बाँटा है-(i) ऐतिहासिक प्रलेख।
(ii) ऐतिहासिक अवशेष। 
एक-दूसरे दृष्टिकोण से वान डालेन ने ऐतिहासिक शोध-सामग्री के इन माध्यमों को प्राथमिक एवं
अत्तरज इन दो श्रेणियों में बाँटा है। 
प्राथमिक स्रोत, वान डालेन के अनुसार, ऐतिहासिक
अनुसंधान की मूलभूत सामग्री होती है। मूलभूत सामग्री अथवा गौण स्रोत बन जाता है। उसमें
प्रस्तुतकर्ता के अपने दृष्टिकोण, अपनी धारणाओं का पुट भी रहता है। उस स्थिति में उसे कुछ कम विश्वसनीय माना
जाता है तो भी उसका महत्व कम नहीं हो जाता।

प्रलेखीय स्रोत के अन्तर्गत बहुत से प्रकार के अभिलेख आते हैं, जैसे-

  1. सरकारी अभिलेख।
  2. व्यक्तिगत अभिलेख।
  3. विभिन्न प्रकार के चित्र, नक्शे, ड्राइंग, फोटो आदि।
  4. प्रकाशित सामग्री। 
  5. यांत्रिक सामग्री जैसे-टेप, वीडियो कैसेट आदि। 

अवशेषों के अन्तर्गत भी कई प्रकार की वस्तुएँ आती हैं, जैसे- 

  1. स्थूल वस्तुएँः इमारतें, फर्नीचर, बहुत-से प्रकार के उपकरण, परिधान, औजार, मृत शरीरों के अवशेष
    आदि। 
  2. प्रकाशित सामग्री। 
  3. हस्तलिखित सामग्री आदि।
उपरोक्त सभी स्रोत वह समस्त जानकारी, सूचनाएँ प्रस्तुत करते हैं जिनके आधार पर समस्यागत प्रश्नों के
उत्तर प्राप्त किये जाते हैं एवं उपकल्पनाओं की जांच की जाती है, परन्तु विश्वसनीय एवं वैध निष्कर्ष प्राप्त करने
हेतु यह आवश्यक है कि साक्ष्य के ये आधार भी विश्वसनीय हों। अन्य प्रकार के अनुसंधानों में जिस प्रकार यह
आवश्यक है कि मनोवैज्ञानिक परीक्षण, प्रश्नावली आदि विश्वसनीय तथा वैध हों, उसी प्रकार ऐतिहासिक अध्ययनों
में उपरोक्त-साक्ष्य-स्रोतों का भी विश्वसनीय एवं वैध होना आवश्यक समझा जाता है तथा शोध-सामग्री का विश्लेषण
करने से पहले उसकी विश्वसनीयता एवं वैधता निर्धारित करना महत्त्वपूर्ण समझा जाता है। इसकी प्रमुख विधि
साक्ष्य-समालोचना होती है।

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