समास करते समय परस्पर मेल होने वाले शब्दों के बीच की विभक्तियों या योजक शब्दों का लोप होकर जो शब्द बनते हैं, उन्हें ‘समस्त पद’ या सामाजिक शब्द कहते हैं। जैसे-
चक्र है पाणि (हाथ) में जिसके = चक्रपाणि
1- हिन्दी में समास प्रायः दो शब्दों से ही बनते हैं जबकि संस्कृत में अनेक शब्दों से बनते हैं। हिन्दी मे ‘सुत-वित-नारी-भवन-परिवारा’ ही सबसे लम्बा समास है। इसके अतिरिक्त तन-मन-धन, जन-मन-गण, धूप-दीप-नैवैध आदि बहुत थोड़े शब्द हैं, जो दो से अधिक शब्दों के मेल से बने हैं।
समास के भेद
- द्वन्द्व समास
- कर्मधारय समास
- द्विगु समास
- बहुब्रीहि समास
- अव्ययी भाव समास
- तत्पुरूष समास
उपरोक्त समासों का विस्तृत वर्णन है-
हो जाता है। जिस समास में पूर्वपद और उत्तरपद दोनों ही प्रधान हों अर्थात अर्थ की दृष्टि से
दोनों का स्वतंत्र अस्तित्व हो और उनके मध्य संयोजक शब्द का लोप हो तो द्वन्द्व समास
कहलाता है।
जैसेःमाता-पिता व माता और पिता,राम-कृष्ण = राम और कृष्ण,भाई-बहन = भाई
और बहन,पाप-पुण्य = पाप और पुण्य।
2. कर्मधारय समासः जब समास में दूसरा पद प्रधान हो और दोनों में विशेषण.विशेष्य का या
उपमान-उपमेय का संबंध हो, तो वह कर्मधारय समास कहलाता है।
जैसेःमहापुरूष = जो पुरुष
महान है,नीलागगन = गगन, जो नीला है,परमानन्द = आनन्द, जो परम है,मुख कमल = कमल
के समान मुख,वचनामृत = वचन रूपी अमृत।
3. द्विगु समासः जब समास में पहला पद संख्यावाचक हो और दूसरा प्रधान हो, तो यह द्विगु
समास कहलाता है।
जैसेःनवरात्रों = नौ रातों का समाहार (समूह),चौराहा = चार राहों का
समाहार,त्रिभुज = तीन भुजाओं का समूह।
4. बहुब्रीहि समासः जब समास में दोनों पद प्रधान हों परन्तु समस्त पद का अर्थ विशेष हो, तो
उसे बहुब्रीहि समास कहते है।
जैसेःदशानन = जिसके (रावण) आनन (मुख) दस है,त्रिलोकी
= तीनों लोकों का स्वामी (विष्णु),चतुर्भुज = जिसकी (विष्णु) चार हैं भुजाएं,पीताम्बर = जिसका
(कृष्ण) अम्बर पीला है।
5. अव्ययीभाव समासः जब समास में पहला पद प्रधान हो और समस्त पद अव्यय (अविकारी),
उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं। यह वाक्य में क्रिया विशेष का कार्य करता है।
जैसेःप्रतिवर्ष
= हरवर्ष, प्रत्येक = हर एक,प्रतिक्षण = हर क्षण,आजीवन = जीवन तक,आमरण = मरण
तक,यथा शक्ति = शक्ति के अनुसार,रातों रात = रात ही रात में।
दोनों पदों के बीच परासर्ग का लोप रहता है। परासर्ग लोप के आधार पर तत्पुरुष समास के
छः भेद हैंः
(क) कर्म तत्पुरूष (‘को’ का लोप)ः जैसेः मतदाता = मत को देने वाला, गिरहकट = गिरह
को काटने वाला, कमलनयन = कमल के समान नयन ।
(ख) करण तत्पुरूषः जहाँ करण-कारण चिन्ह का लोप हो, जैसेः जन्मजात = जन्म से उत्पन्न,
मुंहमांगा = मुंह से मांगा, गुणहीन = गुणों से हीन।
(ग) सम्प्रदान तत्पुरुषः जहाँ सम्प्रदान कारक चिन्ह का लोप हो, जैसेः हथकड़ी = हाथ के लिए
कड़ी, सत्याग्रह = सत्य के लिए आग्रह, युद्धभूमि = युद्ध के लिए भूमि।
भयभीत = भय से भीत, जन्मान्ध = जन्म से अंधा।
(ड़) सम्बन्ध तत्पुरुषः जहाँ सम्बन्ध कारक चिन्ह का लोप, जैसेः प्रेमसागर = प्रेम का सागर,
दिनचर्या = दिन को चर्या, भारतरत्न = भारत का रत्न।
(च) अधिकरण तत्पुरुषः जहाँ अधिकरण कारक चिन्ह का लोप हो, जैसेः नीतिनिपुण = नीति
में निपुण, आत्मविश्वास = आत्मा पर विश्वास, घुड़सवार = घोड़े पर सवार।