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रोगी और निरोगी व्यक्ति के बीच कैसे अन्तर कर सकते है अर्थात हम किस व्यक्ति को रोगी व्यक्ति कह सकते हैं और किस व्यक्ति को निरोगी व्यक्ति कह सकते हैं। शारीरिक रोग, मानसिक रोग एवं आध्यात्मिक रोगों के विषय में जानने के उपरान्त अब यह जानना भी अनिवार्य हो जाता है कि इन रोगों से ग्रस्त व्यक्ति के लक्षण क्या क्या होते हैं और किन लक्षणों के आधार पर हम किसी मनुष्य को रोगी और निरोगी सिद्ध कर सकते हैं।
शारीरिक रोगी व्यक्ति के लक्षण
मानसिक रोगी व्यक्ति के लक्षण
आध्यात्मिक रोगी व्यक्ति के लक्षण
- ईश्वर के प्रति नास्तिकता के भाव रखते हुए स्वंम को पूजा-पाठ, हवन, यज्ञ, प्रार्थना आदि कर्मकाण्डों एवं सत्कार्यों से दूर कर लेना एवं स्वंम को बुरे रास्ते पर बुराईयों के साथ जोडकर अपना जीवन यापन करना एक आध्यात्मिक रोगी व्यक्ति के लक्षण हैं।
- शारीरिक एवं मानसिक कार्यो पर नियंत्रण का अभाव होना एक आध्यात्मिक रोगी व्यक्ति का सबसे प्रमुख लक्षण है। इस व्यक्ति को अपने द्वारा किए जाने वाले कार्यों का भलि भांति ज्ञान अथवा अनुभूति नही होती है। ऐसा व्यक्ति स्वंम में ही खोया-खोया सा रहता है एवं दूसरों के साथ अपने दुख, पीड़ा अथवा कष्टों को नही बांटता हैं।
- किसी भी छोटे-बडे दुख अथवा समस्या के आने स्वमं को दुख एवं पीडा में डूबा अनुभव करना तथा हीनता के भावों से ग्रस्त होकर जीवन के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण को अपना लेना आध्यात्मिक रोगी व्यक्ति के लक्षण हैं।
- जीवन में प्रेम, विनम्रता, परिश्रम, ईमानदारी, उत्साह, उमंग, हर्ष, उल्लास एवं सकारात्मक भावों के स्थान पर घृणा, द्वेष, शोक, निराशा, हताशा, चिन्ता एवं नकारात्मक भावों को अपनाते हुए नीरस रुप में जीवनयापन करना आध्यात्मिक रोगी व्यक्ति के लक्षण हैं।
- कभी भी दूसरों के काम नही आना तथा दूसरों के जीवन व कार्यों में व्यवधान उत्पन्न करना एक आध्यात्मिक रोगी व्यक्ति के लक्षण हैं।
निरोगी व्यक्ति के लक्षण
- सही समय पर अच्छी प्रकार से भूख लगनी चाहिए।
- ग्रहण किए भोजन का भलि प्रकार पाचन होना चाहिए।
- समय पर पेट साफ (शौच) होना चाहिए।
- मुख से दुर्गन्ध नही आनी चाहिए तथा शुद्ध डकार आनी चाहिए।
- अपान वायु शब्द एवं दुर्गन्ध रहित होनी चाहिए।
1. मानसिक निरोगी व्यक्ति के लक्षण
मन में सकारात्मक ऊर्जा की पूर्णता एक मानसिक निरोगी व्यक्ति की पहचान है। इस ऊर्जा की प्रबलता के परिणामस्वरुप वह व्यक्ति सुव्यवस्थित दिनचर्या का पालन करता है। इस व्यक्ति में मानसिक स्थिरता पायी जाती है। इस मानसिक स्थिरता के कारण उसके शारीरिक एवं मानसिक कार्यों में समता पायी जाती है, ऐसा व्यक्ति सुख-दुख, लाभ-हानि, मान-अपमान, जय-पराजय आदि द्वन्दों एवं जीवन की विषम परिस्थितियों को सम भाव से सहन करता हुआ इनका सामना सहजता एवं सरलता के साथ करता है। एक मानसिक निरोगी व्यक्ति अपने जीवन में नकारात्मकता को स्थान नही देता है अपितु वह सकारात्मक दृष्टिकोण को अपनाता है।
- मन में सकारात्मकता एवं प्रसन्नता के भावों का होना मानसिक निरोगी व्यक्ति के लक्षण हैं। ऐसे व्यक्ति में सन्मार्ग एवं कुमार्ग में अन्तर करने ही क्षमता विकसित रुप में पायी जाती है तथा यह व्यक्ति सदैव सन्मार्ग का चयन करता हुआ अपने जीवन में सत्कार्यों को हर्षोंल्लास के साथ करता है।
- स्वंम पर नियंत्रण रखते हुए मानसिक स्तर पर सांवेगिक स्थिरता के भाव मानसिक निरोगी व्यक्ति के लक्षण हैं। अपने समस्त कार्यों को बुद्धिपूर्ण ढगं से करने के साथ साथ अनुशासन को अपनाना तथा प्रात: काल से लेकर रात्रिकाल तक सुनिश्चित दिनचर्या का पालन करना एक मानसिक निरोगी व्यक्ति के लक्षण हैं। निश्चित समय पर जागरण एवं निश्चित समय पर शयन के साथ साथ शुद्ध सात्विक आहार विहार करना एक मानसिक निरोगी व्यक्ति के लक्षण हैं।
- जीवन की कठिन तथा प्रतिकूल परिस्थितियों में दूसरों पर गुस्सा करने के स्थान पर धैर्य के साथ अर्थात स्थिर मनोभाव के साथ उस कठिन उवं प्रतिकूल परिस्थिति का सामना करना मानसिक निरोगी व्यक्ति के लक्षण हैं।
- मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है तथा मनुष्य का अपने आसपास के वातावरण, परिवार एवं समाज के अन्य व्यिक्यों के साथ अच्छा आपसी तालमेल होना एक मानसिक निरोगी व्यक्ति का लक्षण हैं। एक मानसिक निरोगी व्यक्ति अत्यन्त संवेदनशीलता के साथ व्यवहार करता हुआ दूसरों के सुख-दुख को बाटंता है। वह अन्य व्यक्तियों के साथ श्रेष्ठता, शालीनता, सभ्यता एवं शिष्टाचार का व्यवहार करता है इस कारण उसकी आस पास के लोगों से घनिष्टता पायी जाती है अर्थात व्यवहार में सामाजिकता, शालीनता, सभ्यता व श्रेष्ठता आदि गुणों का होना एक मानसिक निरोगी व्यक्ति के लक्षण हैं।
2. आध्यात्मिक निरोगी व्यक्ति के लक्षण
जिस प्रकार पौष्टिक भोजन शरीर को पोषण प्रदान करता है, सद्विचार मन को ऊर्जा प्रदान करते हैं, ठीक इसी प्रकार सत्कार्य आत्मा को बल (आत्मबल) प्रदान करते है। अपने जीवन में सत्कार्य करने वाला
व्यक्ति उच्च आत्मबल को प्राप्त करता हुआ आध्यात्मिक स्तर पर निरोगी जीवन यापन करता है। एक आध्यात्मिक निरोगी व्यक्ति के लक्षण होते हैं-
- एक आध्यात्मिक निरोगी व्यक्ति ईश्वर में पूर्ण निष्ठा रखते हुए स्वंम को निमित्त मात्र मानकर अपने समस्त कार्यों को ईश्वर को समर्र्पित करते हुए करता है अर्थात वह अपने जीवन को ईश्वर समर्पण के भावों से युक्त होकर जीता है।
- एक आध्यात्मिक निरोगी व्यक्ति हवन, सन्धा, पूजा-पाठ, दान-दक्षिणा आदि कार्यों को पूर्ण निष्ठा के साथ करता है। वह जीवन में सत्कार्यों एवं परोपकार को स्थान देता हुआ दूसरो के दुखों, कष्टों व पीडाओं को दूर करने के लिए प्रयासरत रहता है।
- एक आध्यात्मिक निरोगी व्यक्ति सुख, शान्ति एवं आनन्द के साथ सुव्यवस्थित रुप में अपना जीवन यापन करता है। वह अपने प्रत्येक कार्य शुभ संकल्प से प्ररित होकर सुव्यवस्थित रुप से करता है।
- एक आध्यात्मिक निरोगी व्यक्ति की समस्त शारीरिक एवं मानसिक क्रियाएं सुव्यवस्थित होती हैं। इसका अपने शरीर एवं मन पर पूर्ण नियंत्रण रहता है।
- एक आध्यात्मिक निरोगी व्यक्ति अहिंसा, सत्य, आदि योगांगों का पालन करता हुआ स्थिर मनोभाव से ब्रम में लीन रहता है, वह स्वर्ण तथा लौह में समान दृष्टि (समभाव) रखता है।
- ऐसा व्यक्ति उच्च आत्मबल एवं बहुमखी व्यक्तित्व का धनी होता है। इसके कार्यों में दिव्यता पायी जाती है। वह स्वार्थ एवं संर्कीणता की भावना से उपर उठकर अपने जीवन को आर्दश रुप में जीते हुए समाज में प्रेरणा का स्रोत बनता है।
एक रोगी व्यक्ति शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक स्तर पर अपने सामान्य कार्यों को भली- भांति नही कर पाता है अर्थात उस व्यक्ति के शारीरिक कार्य जैसे भोजन का पाचन, श्वसन, उत्र्सजन व रक्त परिभ्रमण आदि कार्य अव्यवस्थित हो जाते हैं। मानसिक स्तर पर उसे निरसता, उदासी, तनाव, क्रोध, ईष्या, घबराहट एवं बैचेनी आदि उद्वेगों की अनुभूति होने लगती है। आध्यात्मिक स्तर पर भी ऊर्जा की कमी होने पर रोगी व्यक्ति के अन्दर आत्महीनता के भाव उत्पन्न हो जाते है।