अनुक्रम
राजनीतिक संस्कृति का अर्थ व परिभाषा
राजनीतिक संस्कृति की अवधारणा, संस्कृति के विचार पर आधारित है। संस्कृति में किसी देश के लोगों के व्यवहार, मान्यताएं, विश्वास, घृणा, स्वामिभक्ति, साहित्य, परम्पराएं, कला-कौशल, सामाजिक मूल्य, नैतिकता आदि बातें शामिल होती हैं।
ऑमण्ड व पॉवेल के अनुसार-”राजनीतिक संस्कृति किसी भी राजनीतिक प्रणाली के सदस्यों में राजनीति के प्रति व्यक्तियों के व्यवहारों तथा अभिमुखीकरण की पद्धति है।”
फाईनर के अनुसार-”राजनीतिक संस्कृति मुख्यत: शासकों, राजनीतिक संस्थाओं तथा प्रक्रियाओं की वैधता से सम्बन्धित है।”
ए0आर0 बाल के अनुसार-”राजनीतिक संस्कृति उन अभिवृतियों और विश्वासों, भावनाओं और समाज के मूल्यों से मिलकर बनती है जिनका सम्बन्ध राजनीतिक पद्धति तथा राजनीतिक प्रश्नों से रहता है।”
पारसन्स के अनुसार-”राजनीतिक संस्कृति का सम्बन्ध राजनीतिक उद्देश्यों के प्रति किया गया अनुकूलन है।”
राय मैक्रीडस के अनुसार-”राजनीतिक संस्कृति का अर्थ एक मानव-समूह के द्वारा स्वीकृत सामान्य लक्ष्यों और सामान्य नियमों से होता है।”
सिडनी वर्बा के अनुसार-”राजनीतिक संस्कृति में अनुभववादी विश्वासों, अभिव्यकतात्मक प्रतीकों और मूल्यों की वह व्यवस्था शामिल है जो उस दशा को परिभाषित करती है जिसमें राजनीतिक क्रिया सम्पन्न होती है।”
नेटल के अनुसार-”राजनीतिक संस्कृति का अर्थ राज्यसत्ता से सम्बन्धित ज्ञान मूल्यांकन और संचारण के प्रतिमान या प्रतिमानों से है।”
डेविज व लेविस के अनुसार-”राजनीतिक संस्कृति किसी निर्दिष्ट समाज के अन्दर राजनीतिक कार्यों के प्रति अभिमुखीकरण की पद्धति है।”
रोवे के अनुसार-”राजनीतिक संस्कृति व्यक्तिगत मूल्यों, विश्वासों तथा संवेगात्मक अभिवृतियों का प्रतिमान है।”
रोज एवं डोगन के अनुसार-”राजनीतिक संस्कृति की अवधारणा ऐसे मूल्यों, विश्वासों और मनोभावों को संक्षेप में व्यक्त करने की सुविधाजनक रीति है, जो राजनीतिक जीवन को अर्थ प्रदान करती है।”
बीयर व उलम के अनुसार-”समाज की सामान्य संस्कृति के कई पहलुओं का सम्बन्ध इस बात से होता है कि सरकार किस प्रकार चलाई जानी चाहिए और इसे क्या करने की कोशिश करनी चाहिए। संस्कृति के इस क्षेत्र को हम राजनीतिक संस्कृति कहते हैं।”
राजनीतिक संस्कृति के संघटक
राजनीतिक संस्कृति राजनीतिक समाज के लोगों की राजनीतिक व्यवस्था के प्रति अभिरुचियों, मूल्यों व राजनीतिक समाज के लोगों की राजनीतिक व्यवस्था के प्रति अभिरुचियों, मूल्यों व विश्वासों पर आधारित है। राजनीतिक संस्कृति में आत्मपरकता का गुण होने के कारण यह व्यक्तिगत अभिविकास या अनुकूलन का हिस्सा होती है। यह अनुकूलन ज्ञानात्मक, भावनात्मक तथा मूल्यात्मक होता है। ज्ञानात्मक अनुकूल का सम्बन्ध लोगों की राजनीतिक व्यवस्था के प्रति जानकारी से, भावनात्मक अनुकूलन का सम्बन्ध लोगों के द्वारा राजनीतिक व्यवस्था के मूल्यों व निर्णयों से होता है। इस अनुकूलन की दृष्टि से राजनीतिक व्यवस्था के तीन घटक होते हैं-मूल्य, विश्वास और संवेदनात्मक अभिवृत्तियां। प्रत्येक देश की राजनीतिक संस्कृति का निर्माण इन्हीं घटकों से होता है। इन घटकों की अनुक्रिया ही किसी राजनीतिक व्यवस्था को सामान्य या विशिष्टता की तरह ले जाती है। इसी कारण राजनीतिक संस्कृति को राजनीतिक व्यवस्था की प्रकृति का नियामक कहा जाता है। राजनीतिक संस्कृति के घटकों का मूल्यांकन करके ही राजनीतिक संस्कृति की प्रकृति का भी निर्धारण किया जा सकता है। ये घटक हैें :-
मूल्य अभिवृत्तियां
प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था में राजनीतिक बातों में रुचि रखने वाले सदस्य व्यवस्था के मूल्यों से अवश्य प्रभावित होते हैं। ये अभिवृतियां राजनीतिक समाज के सार्वजनिक लक्ष्यों से सम्बन्धित विश्वास व आस्थाएं होती हैं। प्रत्येक राजनीतिक समाज में कुछ राजनीतिक मूल्य होते हैं, जैसे एक निश्चित अवधि के बाद निर्वाचन होने चाहिए; जनता का विश्वास खो देने पर सरकार को अपना पद छोड़ देना चाहिए, किसी व्यक्ति को कानून के बाहर कोई दण्ड नहीें मिलना चाहिए। लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि सभी लोगों की रुचि इन मूल्यों में समान हो। किसी की रुचि तो सामाजिक न्याय व समानता में हो सकती है, किसी की रुचि राजनीतिक स्थिरता में हो सकती है तथा किसी की कानून के शासन में हो सकती है। इसलिए राजनीति संस्कृति के आधार पर राजनीतिक व्यवस्थाओं की कार्यप्रणाली या व्यवहार में भिन्नता का कारण मूल्य अभिरुचियों में पाया जाने वाला अन्तर है। जब जनता तथा शासक वर्ग की मूल्य अभिवृतियां असमान हो जाती हैं तो राजनीतिक व्यवस्था पर संकट के बादल छा जाते हैं।
विश्वास अभिवृतियां
जनता की राजनीतिक व्यवस्था के प्रति विश्वास की अभिवृतियां राजनीतिक मूल्यों से घनिष्ठ सम्बन्ध रखती हैं। इसके अन्तर्गत वे अभिरुथ्चयां हैं कि लोगों का राजनीतिक व्यवस्था के प्रति विश्वास की मात्रा तथा प्रकृति क्या है। किसी व्यक्ति को वोट डालने में विश्वास हो सकताहै तथा किसी का नहीं। इस विश्वास के आध् ाार पर ही शासक व शासित बने पारस्परिक सम्बन्ध स्थापित होते हैं। इसी विश्वास में अन्तर आ जाने पर राजनीतिक संस्कृतियों में मात्रात्मक अन्तर आ जाता है और जनता का राजनीतिक व्यवस्था के प्रति विश्वास का स्वरूप भी बदल जाता है। इसी से राजनीतिक व्यवस्था का संचालन प्रभावित होता है। अत: राजनीतिक विश्वास ही राजनीतिक संस्कृति के माध्यम से राजनीतिक व्यवस्था का नियामक व संचालन बना रहता है।
संवेदनात्मक अभिवृतियां
इसका सम्बन्ध लोगों की राजनीतिक व्यवस्था के प्रति मनोवृतियों या मनोभावों से होता है। किसी व्यक्ति को तो अपने देश या व्यवस्था पर गर्व हो सेता है तो किसी को घृणा भी हो सकती है। किसी देश में दबाव समूहों को हेय दृष्टि से देखा जाता है तो किसी देश में उसका सम्मान किया जाता है। 1971 में भारत-पाक विभाजन भी संवेदनात्मक मनोवृति का परिणाम था। ब्रिटेन में लोगों का संसदीय शासन प्रणाली में विश्वास है और वे उसको सम्मान की दृष्टि से देखते हैं, जबकि भारत में संसदीय शासन प्रणाली के प्रति लोगों का दृष्टिकोण अधिक अच्छा नहीं है। इसका प्रमुख कारण संवेदनात्मक अभिवृतियों में पाया जाने वाला अन्तर ही है।
इस प्रकार उपरोक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि राजनीति संस्कृति के घटकों में पाया जाने वाला अन्तर राजनीतिक संस्कृति में मात्रात्मक भेद पैदा करता है और यही भेद आगे चलकर राजनीतिक व्यवहार की भिन्नता के रूप में प्रकट होता है।
राजनीतिक संस्कृति की प्रकृति व विशेषताएं
राजनीतिक संस्कृति एक विकासशील व गत्यात्मक अवधारणा है। इसकी प्रकृति परिवर्तनशील तथा विकासोन्मुखी होती है। इसका निर्माण ऐतिहासिक विकास की पृष्ठभूमि में होता है। राजनीतिक व्यवहार और राजनीतिक संस्कृति का आपस में गहरा सम्बन्ध है। इससे व्यक्ति और समूह के राजनीतिक आचरण का बोध होता है। यह प्रगतिशील और समन्वयकारी होने के कारण रुढ़िवादी समाज की सांस्कृतिक विरासत होती है। यह राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाले दबाव समूह व राजनीतिक दलों की गतिविधियों से भी काफी प्रभावित होती रहती है। इसके ऊपर कुछ आन्तरिक तथा बाह्य शक्तियों का भी प्रभाव पड़ता है। राजनीतिक संस्कृति में समयानुसार परिवर्तन, संशोधन, सुधार एवं विकास होता रहता है। राजनीतिक संस्कृति का विशेष स्वभाव इसकी गतिशीलता है, जड़ता नहीं। एक राजनीतिक संस्कृति कई उप-संस्कृतियों को भी समेटे रखती है। इसे राजनीतिक एकता के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है। इसके अनेक रूप होते हैं और यह राजनीतिक व्यवहार को अंगीकार करने में सक्षम होती है। राजनीतिक संस्कृति की इस प्रकृति को इसकी विशेषताओं में भी देखा जा सकता है। इसकी प्रमुख विशेषताएं हैं :-
- राजनीतिक संस्कृति एक व्यक्तिपरक धारणा है, क्योंकि इसमें लोगों के विचारों विश्वासों व मूल्यों का अध्ययन किया जाता है।
- राजनीतिक संस्कृति एक व्यापक धारणा है, क्योंकि यह राजनीतिक व्यवहार के अनेक तत्वों को अपने में समेटे रहती है।
- राजनीतिक संस्कृति सामान्य संस्कृति का ही एक अंश होती है, क्योंकि इसमें लोगों के राजनीतिक मूल्य व विश्वास ही शामिल होते हैं।
- राजनीतिक संस्कृति का स्वरूप प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था में अलग-अलग होता है, क्योंकि राजनीतिक संस्कृति के घटकों को प्रत्येक देश में अन्तर पाया जाता है।
- राजनीतिक संस्कृति एक अमूर्त नैतिक अवधारणा है।
- राजनीतिक संस्कृति एक गत्यात्मक व परिवर्तनशील अवधारणा है।
- राजनीतिक संस्कृति व राजनीतिक विकास में गहरा सम्बन्ध होता है।
- राजनीतिक संस्कृति राजनीतिक समाजीकरण व आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को भी प्रभावित करती है। अड़ियल प्रकार की राजनीतिक संस्कृति राजनीतिक आधुनिकीकरण, समाजीकरण व विकास का मार्ग अवरुद्ध कर देती है।
- भूगोल, परम्पराएं, इतिहास, आदर्श, जीवन मूल्य, जलवायु, सामाजिक तथा आर्थिक तत्व, राष्ट्रीय प्रतीक आदि तत्व राजनीतिक संस्कृति के निर्माण में योगदान देते हैं। ;10द्ध राजनीतिक संस्कृति जन-सामान्य के राजनीतिक व्यवहार को प्रभावित करती है।
राजनीतिक संस्कृति के प्रकार
राजनीतिक संस्कृति में पाई जाने वाली मात्रात्मक विशेषताएं अपने अनेक रूपों का परिचय स्वयं ही दे देती हैं। प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था में लोगों का राजनीतिक व्यवस्था के प्रति लगाव, विश्वास व मूल्य अलग अलग ढंग का होता है। कहीं पर लोग राजनीतिक व्यवस्था के प्रति गहरा लगाव रखते हैं और राजनीतिक प्रक्रिया में सक्रिय सहभागिता रखते हैं तो कहीं पर इसका सर्वथा अभाव पाया जाता है। राजनीतिक समाज के सदस्यों की राजनीतिक सहभागिता ही प्राय: राजनीतिक संस्कृति की प्रतीक का निर्धारण करती है। निरन्तरता या सातत्य की दृष्टि से राजनीतिक संस्कृति परम्परागत व आधुनिक दो प्रकार की हो सकती है। जहां परम्पर व आधुनिकता में संघर्ष चलता रहता है वहां पर राजनीतिक संस्कृति का नवीन रूप भी अस्तित्व में आ जाता है जिसे मिश्रित संस्कृति कहा जा सकता है।
संख्या व शक्ति के आधार पर
इस आधार पर राजनीतिक संस्कृति के दो भेद माने जाते हैं :-
- अभिजनात्मक संस्कृति – यह संस्कृति इस मान्यता का परिणाम है कि प्रत्येक शासन में गिने चुले लोग ही सत्ता के वास्तविक धारक होते हैं और उनका राजनीतिक व्यवस्था तथा लोगों की जीवन शैली पर व्यापक प्रभाव होता है। भारत में नेहरू व गांधी जी ने जिस संस्कृति को जन्म दिया वह अभिजनात्मक होते हुए भी उससे अधिक थी। यह संस्कृति समाज में विशिष्ट वर्ग के हितों की पोषक होने के साथ-साथ जनसामान्य के प्रति अपना दृष्टिकोण ईमानदारी को बनाए रखती है।
- जनसंस्कृति – यह संस्कृति लोकतन्त्रीय अवस्थाओं को समेटे हुए है। यह जन-आस्था एवं रचनात्मक वृत्तियों की द्योतक है। इसमें राजनीतिक प्रक्रिया में जनसाधारण की उपेक्षा नहीं की जा सकती और प्रत्येक स्तर पर जनता की भावनाओं की ख्याल रख जाता है। विकसित देशों में यह अभिन्न संस्कृति के साथ ही मिलकर चलती है। विकासशील देशों में इस प्रकार की संस्कृति का अधिक प्रचलन बढ़ रहा है।
निरन्तरता व सातत्व की दृष्टि से
इस आधार पर राजनीतिक संस्कृति को तीन भागों में बांटा जा सकता है:-
- परम्परागत राजनीतिक संस्कृति (Traditional Political Culture)
- आधुनिक राजनीतिक संस्कृति (Modern Political Culture) :-
- मिश्रित राजनीतिक संस्कृति (Mixed Political Culture)
परम्परावादी संस्कृति का सम्बन्ध जनसामान्य से होता है, जबकि आधुनिक राजनीतिक संस्कृति का सम्बन्ध विशिष्ट वर्गीय शासकों से होता है। ब्रिटेन तथा भारत में मिश्रित संस्कृति पाई जाती है। क्योंकि यहां परम्परा व आधुनिकता का सुन्दर मिश्रण है। ब्रिटेन में कुलीनतन्त्रीय राजनीतिक ढांचे का तादात्म्य ऐसे सामाजिक व आर्थिक ढांचे के साथ किया गया है कि उसमें विशिष्ट वर्ग व जनसाध् ाारण दोनों के हितों का पोषण हो जाता है। विकासशील देशों में इसी प्रकार की संस्कृति है। सर्वाधिकारवादी देशों में विशिष्ट वर्गीय हितों की पोषक आधुनिक व परम्परावादी दोनों संस्कृतियां ही पाई जाती हैं। ऑमण्ड-कोलमैन का मानना है कि सभी राजनीतिक समाजों में राजनीतिक संस्कृति का मिश्रित रूप ही पाया जाता है।
राजनीतिक सहभागिता के आधार पर
इस आधार पर वर्गीकरण करने वाले प्रमुख विद्वान ऑमण्ड व वर्बा हैं। उनका कहना है कि प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था में जनता सहभागिता चाहती है। लेकिन सभी व्यवस्थाओं में पूर्ण व सक्रिय राजनीतिक सहभागिता का होना आवश्यक नहीं है। इसलिए इस आधार पर कि जनसहभागिता का स्तर क्या है। लोग राजनीति के प्रति उदासीन हैं या सक्रिय, राजनीतिक संस्कृति को शुद्ध रूप में तीन भागों में बंट जाता है :-
- संकीर्ण-राजनीतिक संस्कृति – इस प्रकार की राजनीतिक संस्कृति कम विकसित तथा परम्परागत राजनीतिक समाजों मेंं पाई जाती है। इसका प्रमुख कारण यह होता है कि इन समाजों में कम विशेषीकरण के कारण सभी भूमिकाएं शासक-वर्ग द्वारा ही अदा की जाती हैं। इसमें जनता राजनीति के प्रति प्राय: उदासीन ही रहती है। राजनीतिक नेता ही धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक भूमिकाओं का एक साथ निर्वहन करते हैं। इसमें जनता की तरफ से राजनीति के प्रति कोई मांग या निवेश नहीं होता और न ही निर्गतों की तरफ उसका ध्यान रहता है।
- पराधीन-राजनीतिक संस्कृति – इस प्रकार की राजनीतिक संस्कृति का जन्म उन समाजों में होता है, जहां जनता राजनीति के प्रति अर्कमण्य रहती है और वह शासकीय आदेशों को विवशतावश चुपचाप सहन करती है और उनका पालन करती रहती है। यह राजनीतिक संस्कृति आश्रित उपनिवेशों में ही विद्यमान थीं। इस प्रकार की संस्कृति में जनता निवेशों से तो दूर रहती है, लेकिन निर्गतों पर ध्यान रखती है। इस संस्कृति में लोगों का राजनीतिक अभिमुखीकरण व्यवस्था से लेने के स्तर पर ही सक्रिय होता है। सार रूप में इसमें जनता की राजनीतिक सक्रियता प्राय: सीमित प्रकृति की होती है। कई बार इस प्रकार की संस्कृति निर्गतों के परिणामों के रूप में महान् आन्दोलनों की जनक भी बन जाती है। इस संस्कृति को प्रजामूलक संस्कृति भी कहा जाता है।
- सहभागी-राजनीतिक संस्कृति – इस प्रकार की राजनीतिक संस्कृति उन समाजों में पाई जाती है, जहां जनता को राजनीतिक सहकारिता के पूरे अवसर प्रदान किए जाते हैं। इस संस्कृति में जनता निदेशों व निर्गतों पर समान नजर रखती है। इस प्रकार की संस्कृति विकसित देशों में पाई जाती है। इसमें लोगों का राजनीतिक व्यवस्था के प्रति लगाव व विश्वास उच्च स्तर का बना रहता है। इसमें जनता अपने अधिकारों व कर्तव्यों के प्रति जागरूक बनी रहती है। इसे प्रजातन्त्रीय राजनीतिक संस्कृति भी कहा जाता है।
उपरोक्त शुद्ध रूपों के अतिरिक्त भी मिश्रित रूप में ऑमण्ड व वर्बा ने राजनीतिक संस्कृति को तीन भागों में बांटा है :- 1. संकीर्ण-पराधीन राजनीतिक संस्कृति। 2. पराधीन-सहभागी राजनीतिक संस्कृति। 3. संकीर्ण सहभागी राजनीतिक संस्कृति।
- संकीर्ण-पराधीन राजनीतिक संस्कृति – यह संस्कृति मिश्रित प्रकृति की होती है। इसमें दोनों प्रकार की राजनीतिक संस्कृतियों की विशेषता पाई जाती है। इसमें दोनों प्रकार के व्यक्ति पाए जाते हैं। कुछ व्यक्ति तो राजनीति के प्रति लगाव रखते हैं और कुछ दूर रहते हैं।
- पराधीन-सहभागी राजनीतिक संस्कृति – यह संस्कृति पराधीन राजनीतिक संस्कृति तथा सहभागी राजनीतिक संस्कृति के गुणों से परिपूर्ण रहती है। यह संस्कृति उन समाजों मेंं पाई जाती है जहां लोगों का राजनीतिक व्यवस्था के प्रति लगाव होता है। इसमें कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो केवल निवेशों और निर्गतों के प्रति ही रुचि रखते हैं। इस संस्कृति का उदय राजनीतिक व्यवस्था में जनसहभागिता की वृद्धि की शुरुआत के साथ हुआ।
- संकीर्ण-सहभागी राजनीतिक संस्कृति – इस प्रकार की संस्कृति में शासक वर्ग ही जनता को प्रभावित नहीं करता बल्कि जनता भी शासकीय नीतियों को प्रभावित करती है। इसमें जन इच्छा का पूरा सम्मान किया जाता है। यह संस्कृति संकीर्ण व सहभागी राजनीतिक संस्कृति दोनों की विशेषताएं समेटे रहती हैं।
गुणात्मक स्वरूप के आधार पर
- प्रौढ़ राजनीतिक संस्कृति – यह संस्कृति ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया तथा नीदरलैण्ड में पाई जाती है। इसमें राजनीतिक सर्वसम्मति व संगठन की मात्रा बहुत ऊँची होती है। इसमें सैनिक शक्ति का प्रयोग करने से परहेज किया जाता है। इसके अन्तर्गत शासन की सर्वोच्च सत्ता पर नागरिक सरकार का ही अधिकार रहता है। यह संस्कृति राजनीतिक स्थिरता वाले देशों में भी पाई जाती है।
- विकसित राजनीतिक संस्कृति – यह संस्कृति मिस्र, अल्जीरिया और क्यूबा जैसे देशों में पाई जाती है। इस प्रकार की राजनीतिक संस्कृति राजनीतिक स्थिरता के साथ-साथ सैनिक खतरों से भी भयभीत रहती है। ऐसे परिवेश में आम जनता को शक्ति का भय दिखाकर शान्त कराने का प्रयास किया जाता है, लेकिन क्रान्ति या तख्ता पलट की संभावनाएं सदा ही बनी रहती हैं। इसमें नागरिक सरकार पर संकट के बादल मंडराते रहते हैं। ;
- निम्न राजनीतिक संस्कृति – यह सस्कृति उन राजनीतिक समाजों में पाई जाती है, जहां लोकमत सशक्त नहीं होता। इसी कारण इसमें जन-विरोध की भावना का अभाव पाया जाता है। इसकी संस्कृति वाले देशों में राजनीतिक संस्थाएं बहुत ही कमजोर स्थिति में रहती है। इसमें जनता सुशासन की कामना तो रखती है, लेकिन उनका यह स्वप्न पूरा नहीं होता। इस व्यवस्था में लोकतन्त्रीय आस्थाओं पर सैनिक तानाशाही का शिकंजा कसा रहता है। जनाधार के बंटे होने के कारण यह संस्कृति वियतनाम, सीरिया, बर्मा, इन्डोनेशिया, पाकिस्तान आदि देशों में पाई जाती है।
- पूर्व-फ्रांसीसी क्रांति-सम अल्पस्तरीय राजनीतिक संस्कृति – यह संस्कृति उन देशों में पाई जाती है, जहां सरकार जनता के विचारों की मनमानी अवहेलना कर सकती है। फ्रांसीसी क्रांति से पहले फ्रांस में यह संस्कृति विद्यमान थी। आज इस संस्कृति के लिए कोई स्थान नहीं है।
शासन-व्यवस्था जनित संवेगों के आधार
इस आधार पर ऑमण्ड ने राष्ट्रों की राजनीतिक व्यवस्था, भौगोलिक प्रणाली, विकासशील प्रवृति आदि के आधार पर राजनीतिक संस्कृति को चार भागों में बांटा है :-
- आंग्ल-अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था – यह संस्कृति ब्रिटेन और अमेरिका में पाई जाती है। इसमें राजनीतिक साध्यों व साधनों पर आम सहमति पाई जाती है। इसमें आदिकालीन व वर्तमान धर्म-निरपेक्ष मान्यताओं का सुन्दर मेल होता है। इस संस्कृति से सम्बन्धित देशों में वैयक्तिक स्वतन्त्रता, अधिकार व सुरक्षा को विशेष म्ळत्व दिया जाता है। इसमें समाज का स्वरूप बहुलवादी होता है। इसमें सत्तावादी शासन की सम्भावनाएं कम होती हैं और यहां पर भूमिकाओं का स्थायित्व भी रहता है। इसमें विशेषीकरण तथा विभेदीकरण का गुण भी पाया जाता है।
- महाद्वीपीय-यूरोपीय राजनीतिक व्यवस्था – यह राजनीतिक संस्कृति फ्रांस, इटली, स्वीडन, नार्वे, जर्मनी आदि कम विकसित पश्चिमी लोकतन्त्रीय देशों में पाई जाती है। इस राजनीतिक संस्कृति में न तो जनता अपने नेताओं के प्रति पूर्ण आश्वस्त होती है और न ही नेतागण अपने लोगों पर पूर्ण रूप से निर्भर रहते हैं। इस प्रकार की संस्कृति में जनता की बजाय राजनीतिक प्रक्रिया में दबाव समूहों की भूमिका अधिक रहती है। इस प्रकार की संस्कृति कई उप-संस्कृतियों को भी जन्म देती है।
- अपश्चिमी एवं आंशिक रूप से पूर्व-औद्योगिक राजनीतिक व्यवस्था – इस प्रकार की व्यवस्था में शासन प्रणाली पर एक ही दल का प्रभुत्व रहने के कारण राजनीतिक संस्कृति की एकता परिलक्षित होती है। इसमें शक्ति के आधार पर सत्ता व शासन को औचित्यपूर्ण बनाए रखा जाता है। इसमें नौकरशाही का महत्व बहुत अधिक बढ़ जाता है। इसमें जन-सहभागिता के नाम पर जनता के साथ धोखा किया जाता है। इसमें अधिकारों की अपेक्षा कर्तव्यों पर अधिक ध्यान दिया जाता है। इस प्रकार की संस्कृति चीन व अन्य साम्यवादी देशों में पाई जाती है।
इस प्रकार उपरोक्त विवेचन के बाद कहा जा सकता है कि विभिन्न आधारों पर राजनीतिक संस्कृति अनेक प्रकार की होती है। उपरोक्त वर्गीकरण के अतिरिक्त भी कुछ विद्वानों द्वारा राजनीतिक संस्कृति के कुछ अन्य रूप भी बताए हैं। उन्होंने पंथ-निरपेक्ष, नागरिक, सैद्धान्तिक, समरूप, खण्डित आदि राजनीतिक संस्कृतियों का भी वर्णन किया है। लेकिन ये रूप भी उपरोक्त विवरण के अन्तर्गत ही घुलकर रह जाते हैं। इनके पृथक विवेचन की कोई आवश्यकता नहीं है। यह बात तो सत्य है कि प्रत्येक देश किसी न किसी प्रकार की राजनीतिक संस्कृति से जुड़ा हुआ है। आज सभी देशों में राजनीतिक संस्कृति के साथ-साथ उपराजनीतिक संस्कृतियां भी उभर रहीं हैं। अत: ऑमण्ड-कोलमैन का कथन सही है कि आज विश्व में राज-व्यवस्थाओं में राजनीतिक संस्कृति का मिश्रित रूप ही पाया जाता है।
नागरिक संस्कृति की अवधारणा
आज का युग लोकतन्त्रीय-कल्याणकारी राज्यों का युग है। लोकतन्त्र का उदारवादी स्वरूप आधुनिक लोकतन्त्र की प्रमुख विशेषता एवं सच्चाई है, जिससे बचने का जोखिम किसी भी राजनीतिक व्यवस्था को खतरे में डाल सकता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि जनता की शासन-प्रक्रिया में अधिक से अधिक भागीदारी सुनिश्चित हो। आज जनसंचार के साधनों तथा बदलते विश्व परिवेश ने सभी देशों को इस बात के प्रति आगाह कर दिया है कि वे नागरिक संस्कृति से उदासीदन न रहें। आंग्ल-अमेरिकी व्यवस्था में कुछ सीमा तक नागरिक संस्कृति का ही प्रतिबिम्ब है। व्यक्तिगत स्वतन्त्रता, जन-कल्याण, सुरक्षा आदि तत्व नागरिक संस्कृति के निर्माण का आधार हैं। इस प्रकार की संस्कृति साध्यों और साधनों में मतैक्य स्थापित कर सकती है। जिन देशों में नागरिक अपने अधिकार व कर्तव्यों के प्रति जागरूक हैं, वहां इस प्रकार की संस्कृति का निर्माण आसानी से हो सकता है। इस प्रकार की राजनीतिक संस्कृति में भागीदारी और सहनशीलता का स्तर काफी ऊँचा होता है। इसमें निर्णयकारी संरचनाएं ही निर्णयों की प्रभावकारिता के लिए उत्तरदायी होती है। इस प्रकार की राजनीतिक संस्कृति न तो शासक वर्ग को मनमानी करने की अनुमति देती है और न ही उस मनमानी को सहन किया जा सकता है। इस प्रकार की संस्कृति ब्रिटेन तथा अमेरिका में विकसित हो चुकी है और आज विश्व के अन्य देशों में भी इसके विकसित होने की आवश्यकता है।
नागरिक संस्कृति का अर्थ
साधारण अर्थों में उदारवादी लोकतन्त्र की स्थापना करने वाली राजनीतिक संस्कृति को नागरिक संस्कृति कहा जाता है। इस प्रकार की संस्कृति में संकुचित, पराधीन तथा सहभागी सभी राजनीतिक संस्कृतियों के लक्षण पाए जाते हैं। इसलिए इन तीनों के लक्षणों से युक्त संस्कृति ही नागरिक संस्कृति कहलाती है। ऑमण्ड तथा सिडनी वर्बा ने नागरिक संस्कृति को परिभाषित करते हुए कहा है-”उदार लोकतन्त्र को संभालने में उपयुक्त एवं लोकतन्त्रीय आस्थाओं को रखने व लोकतन्त्रीय मूल्यों का दिग्दर्शन कराने व उन्हें महता प्रदान करने वाली संस्कृति नागरिक संस्कृति कहलाती है।”
नागरिक संस्कृति की व्याख्या
अनेक विद्वानों ने नागरिक संस्कृति पर अपना-अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए निष्कर्ष प्रस्तुत किया है कि आज तेजी से परिवर्तनशील अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था एवं समाज मेंं आवश्यकता इस बात की है कि एक आदर्श नागरिक संस्कृति का निर्माण किया जाए। उनका मानना है कि नागरिक संस्कृति शासन की क्षमता एवं राजनीेतिक प्रक्रिया में नागरिकों की सहभागिता के बीच सामंजस्य स्थापित करके ही निर्मित की जा सकती है। इसकी स्थापना से नागरिकों में अधिकार व कर्तव्य बोध का ज्ञान होने के कारण उनकी राजनीतिक प्रक्रिया के प्रति उदासीनता व सक्रियता में सामंजस्य स्थापित हो सकता है। इसलिए इसकी स्थापना के लिए यह आवश्यक है कि नागरिकों को जनहित के मामलों में अधिक जागरूकता व सक्रियता बनाए रखनी चाहिए ताकि शासक वर्ग की निरंकुशता पर रोक लगाई जा सके व जनहित के प्रति राजनीतिक नेतृत्व को उत्तरदायित्व से युक्त बनाया जा सके। यद्यपि इसके निर्माण में कुछ बाधाओं का उत्पन्न होना भी स्वभाविक ही है। लेकिन लोकतन्त्रीय शासन व्यवस्था में लोगों की समर्थ कार्य भावना और राष्ट्रीय निष्ठा के कारण इस पर काफी सीमा तक काबू पाया जा सकता है। इसके लोकतन्त्र में मतैक्य और मतभेद के बीच संतुलन पैदा किया जा सकता है, क्योंकि लोकतन्त्र में ऐसा सामंजस्य व संतुलन थोड़ी बहुत मात्रा में अवश्य पाया जाता है। इसकी स्थापना के लिए केवल इतना ही जरूरी है कि नागरिक समुदाय के राजनीतिक विचार और मूल्य, राजनीतिक समानता और सहभागिता के सिद्धान्तों के अनुकूल ही हों। जनसहमति पर आधारित सरकार द्वारा जनहित में कार्य करके शासक और शासित में सामंजस्यपूर्ण सम्बन्धों की स्थापना के ध्येय के द्वारा इस कार्य को आसान बनाया जा सकता है। इसकी स्थापना के साथ ही नागरिक शासन का जन्म होगा और सभी लोग नागरिक शासन में सहभागिता के उत्तरदायित्व का निर्वहन करेंगे और तानाशाही या बलात राज्य की बलात परिवर्तन द्वारा स्थिति क्षीण हो जाएगी तथा एक आदर्श नागरिक समाज की स्थापना होगी जो अपने पूर्ववर्ती समाजों से व्यापक आधार लिए हुए होगा जिसमें सभी की इच्छाओं का सम्मान किया जाएगा।
राजनीतिक संस्कृति के निर्धारिक तत्व
प्रत्येक देश की राजनीतिक संस्कृति अलग प्रकार की होती है। इसका प्रमुख कारण इसके निर्धारक तत्वों में मिलने वाला अन्तर होता है। राजनीतिक संस्कृति का सामान्य संस्कृति से भी घनिष्ठ सम्बन्ध रहता है। इसी कारण सामान्य संस्कृति के निर्धारक तत्व राजनीतिक संस्कृति को भी प्रभावित करते हैं। ये निर्धारक तत्व ही राजनीतिक संस्कृति की प्रकृति के नियामक होते हैं। ये तत्व हो सकते हैं :-
इतिहास
भूगोल –
सामाजिक तथा आर्थिक विकास –
विचारधाराएं –
सामान्य संस्कृति –
राष्ट्रीय प्रतीक –
धर्म –
राजनीतिक स्थिरता –
राजनीतिक संस्कृति के आयाम
राजनीतिक संस्कृति का स्वरूप बहुआयामी होता है। इसकी स्वयं की गतिशील प्रकृति तथा इसके निर्धारक तत्वों के प्रभाव से इसमें सतत् परिवर्तन होते रहते हैं। प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था की अल ग ही राजनीतिक संस्कृति होती है। सिडनी वर्बा का मानना है कि राजनीतिक संस्कृति के आयाम राजनीतिक व्यवस्था के चारों ओर घूमते हैं। ये आयाम प्रमुख रूप से चार हैं :- ;
राष्ट्रीय पहचान या अभिज्ञान
साथी नागरिकों के साथ ऐकमेकता या तादात्म्य –
शासन निर्गतों के प्रति विश्वास –
निर्णय प्रक्रिया में विश्वास –
राजनीतिक संस्कृति की अवधारणा का महत्व
आधुनिक समय में राजनीतिक संस्कृति की अवधारणा राजनीति-विज्ञान की महत्वपूर्ण अवधारणा मानी जाती है। राजनीतिक संस्कृति के आगमन से राजनीतिक समाजीकरण व राजनीतिक विकास की दिशा व गति का ज्ञान होने लगा है। इसके आगमन से तुलनात्मक अध्ययन मेंं गति आई है। इसने राजनीति-विज्ञान का विषय क्षेत्र भी महान बना दिया है। इससे राजनीतिक व्यवहार को समझना सरल हो गया है। इसके आगमन से द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उत्पन्न राजनीतिक व्यवहार की जटिलताओं का अध्ययन करना आसान हुआ है। इसने राजनीति विज्ञान को औपचारिक संस्थाओं के जटिल अध्ययनों से मुक्ति दिलाई है। अब राजनीतिक व्यवहार को राजनीतिक संरचनाओं, प्रक्रियाओं एवं प्रकार्यों को उनकी अभिवृत्तियों के सन्दर्भ में ही समझा जाने लगा है। लूशियन पाई ने लिखा है-”हर विशिष्ट समाज में एक सीमित और सुस्पष्ट राजनीतिक संस्कृति होती है जो राजनीतिक प्रक्रिया को अर्थ, भविष्यवाणी और ढांचा प्रदान करती है।”