अनुक्रम
हड़प्पा सभ्यता की नगर योजना
वे लोग सुनियोजित नगरों में रहते थे। हड़प्पाई शहरों की एक महत्वपूर्ण विशेषता थी मजबूत नगर-दुर्ग की उपस्थिति। दुर्ग में सार्वजनिक इमारत होती थी। दुर्ग के नीचे नगर का दूसरा हिस्सा था। यहां आम लोगों के मकान थे। नगरों में चौड़ी सड़कें थी, जो समकोण एक दूसरे को काटती थी। मकान ईट के बने थे। ज्यादातर मकान दो मंजिला थे। हरेक घर में कुएं, स्नानगृह, नाली और परनाली थी। साफ-सफाई का स्तर बहुत उन्नत था। खडंजे बिछी सड़कें और सड़कों पर प्रकाश-व्यवस्था अनजानी नहीं थी। मोहंजो-दड़ों के निचले शहर में निवास गृहों के अलावा दुर्ग वाले क्षेत्रा में अनेक खंभों वाले विशाल हाल भी मिले हैं।
हड़प्पा नगरों का अंत
हड़प्पा युग लगभग 700 वर्षों तक रहा। 700 वर्षों की यह अवधि बीच-बीच में उथल-पुथल से भी भरी रही होगी जिसका अनुमान समयसमय पर आने वाली बाढ़ों से लगता है जो मोहनजोदड़ो को नष्ट करती रहीं। तथापि, 1900 बी सी ई के पश्चात हड़प्पा सभ्यता के अधिकतर प्रमुख नगरों का परित्याग कर दिया गया था या वे स्पष्ट रूप से दबाव में थे। हड़प्पा नगरों के उद्गम की भांति ही उनके अंत के कारणों पर भी वादविवाद है। ऐसा नहीं है कि यह क्षेत्र पूरी तरह से निर्जन हो गया था या इसका परित्याग कर दिया गया था, तथ्य यह है कि 1900 बी सी ई के पश्चात् हम यहाँ परिपक्व हड़प्पा संस्कृति से भिन्न भौतिक संस्कृति की बसावटें पाते हैं जिनमें सिरामिक की बनी वस्तुएँ, टेराकोटा केक और आभूषणों के निर्माण में प्रयुक्त मिट्टी के पॉलिशदार टुकड़ों के प्रयोग का नैरन्तर्य पाते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि हड़प्पाकालीन नगरों के प्रादुर्भाव से पूर्व स्थिति एक प्रकार से उलट हो गई जिसमें बसावटों में अब मुख्यत: गांव हैं, जिनमें क्षेत्रीय सम्बद्धता थी। मोहनजोदड़ो जैसे बड़े केन्द्रों में नगरपालिका के कार्यों और नियमों की शिथिलता घरों और भट्टियों द्वारा सड़कों का अतिक्रमण और सार्वजनिक स्थलों पर निर्माण के रूप में देखी जा सकती है।
हड़प्पा सभ्यता का समाज और अर्थव्यवस्था
हड़प्पावासी कृषि, पशुपालन, दस्तकारी, व्यापार और वाणिज्य में माहिर थे। मुख्य फसलें गेहूं, जौ, राई, तिल और मटर थीं। लोथल और रंगपुर में धान मिलें हैं। कालीबंगन में हल की लीक के निशान मिले हैं। उनसे पता चलता है कि वे हल का इस्तेमाल करते थे। फसल काटने के लिए हसुआ का इस्तेमाल होता था। सिंचाई के कई तरीकों का इस्तेमाल होता था। लोगों को कपास और रूई की जानकारी थी। गाय, बकरी, भेड़, सांड, कुत्ते, बिल्ली, ऊंट और गधे जैसे जानवरों को पालतू बनाया जा चुका था। लोग अनाज, मछली, मांस, दूध, अंडे और फल खाते थे। ज्यादातर तांबा और कांस्य के बने औजार और हथियार इस्तेमाल किए जाते थे। जेवरात सोना, चांदी, कीमती पत्थरों, रत्नों, शंख और हाथी के दांत के बने होते थे। दस्तकारों में कुम्हार, बुनकर, राजमिस्त्राी, बढ़ई, लोहार, सूनार, शिल्पकार, संग-तराश, ईंट बनाने वाले और ठठरे शामिल थे।
हड़प्पा सभ्यता की धर्म और संस्कृति
मातृदेवियां हड़प्पावासियों के बीच बेहद लोकप्रिय प्रतीत होती हैं। मातृदेवियों की मिट्टी की बनी मूर्तियां मिली हैं। मोहेंजो-दड़ों में एक पुरूष-देवता भी मिला है, जिसे शिव (पशुपति) का अािदरूप कहा गया है। उसे एक मुहर पर पशुओं से घिरे योग की मुद्रा में बैठे दिखाया गया है। लिंग पूजा, वृक्ष और जड़ात्मवाद भी प्रचलन में थे। विभिन्न स्थलों पर मिले ताबील और जंतर आत्माओं तथा पर उनके विश्वास की ओर इशारा करते हैं। हड़प्पा-वासियों ने उच्च स्तरीय तकनीकी की चीजें हासिल की थी। उन्हें नागर-अभियांित्राकी, चिकित्सा मापतोल और स्वच्छता की जानकारी थी। वे भी जानते थे। वे एक लिपि का प्रयोग करते थे, जिसे अभी तक नहीं समझा जा सका है।
हड़प्पा सभ्यता का अंत कैसे हुआ
- कुछ विद्वानों का सुझाव है कि बाढ़ और भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं ने इस सभ्यता को खत्म किया होगा। ऐसा विश्वास किया जाता है कि भूकंप के परिणामस्वरूप सिंधु नदी के निचले मैदानी, बाढ़ वाले क्षेत्रों का स्तर ऊंचा उठ गया होगा। इससे समुद्र की तरफ जाने को नदी के तल मार्ग में रुकावट आ गई होगी, जिससे मोहनजोदड़ो नगर डूब गया होगा। परन्तु इससे केवल मोहनजोदड़ो के खत्म होने का उल्लेख मिलता है न कि पूरी सभ्यता का।
- कुछ विद्वानों के मतानुसार घग्गर-हाकरा नदी के मार्ग में परिवर्तन आने के कारण शुष्क बंजर धरती बढ़ती गई होगी, जिसकी वजह से पतन हुआ। इस सिद्धांत के अनुसार 2000 ई.पू. के आसपास बंजरता की परिस्थिति बढ़ती गई, इससे कषि उत्पादन पर प्रभाव पड़ा होगा, जिससे इसका लोप हुआ।
- पतन के कारणों में, आर्यों के आक्रमण के सिद्धांत का भी उल्लेख किया गया है, लेकिन आंकड़ों के आलोचनात्मक व गंभीर विश्लेषण के आधार पर अब इस मत को पूरी तरह नकार दिया गया है।
इस प्रकार कोई भी एक अकेला ऐसा कारण नहीं है, जिससे संपूर्ण सभ्यता के विनाश का पता लग सके। ज्यादा से ज्यादा इनसे सिर्फ कुछ शिष्ट स्थलों या क्षेत्रों के नष्ट होने के संबंध में ही पता चल सकता है। अत: प्रत्येक सिद्धांत की आलोचना हुई। फिर भी, पुरातात्विक साक्ष्यों से संकेत मिलता है कि हड़प्पा सभ्यता का पतन अचानक नहीं हुआ, बल्कि धीरे-धीरे हुआ और अंत में ये सभ्यता अन्य सभ्यताओं में घुलती- मिलती चली गई।
हड़प्पा सभ्यता के पतन के मुख्य कारण
इस बात के ठोस प्रमाण तो उपलब्ध नहीं है कि सिन्धु घाटी का वैभवशाली सभ्यता का विनाश कैसे हुआ ? खुदाई के दौरान मिले तथ्यों से ही विद्वानों ने इसके विनाश के कुछ कारण अनुमानों के आधार पर निकाले है