इस कानून के तहत प्रत्येक सरकारी विभाग में एक लोक सूचना अधिकारी की नियुक्ति की गर्इ है। इसके उपर उसी विभाग में अपीलीय अधिकारी होता है । राज्य स्तर पर एक राज्य सूचना आयोग होता है जिसका मुखिया मुख्य सूचना आयुक्त होता है। जिसके अधीन कुछ सूचना आयुक्त कार्य करते है। इसी तरह केन्द्रीय स्तर पर एक केन्द्रीय सूचना आयोग होता है जो मुख्य केन्द्रीय सूचना आयुक्त की देखरेख मे काम करता है। उसका काम अपीलों को सुनना, विशेष परिस्थतियों मे सूचना के अधिकार के लिए पैरवी करना और देश में सूचना के अधिकार के प्रभावी क्रियान्वयन पर निगरानी रखना है। कोर्इ भी नागरिक किसी विभाग के बारे में उस विभाग के लोक सूचना अधिकारी से जानकारी मांग सकता है। सूचना समय से उपलब्ध न होने पर अपीलीय अधिकारी से अपील की जा सकती है वहां से भी सूचना न मिलने पर राज्य सूचना आयुक्त (Information Commissioner) से अपील की जा सकती है। यदि वहां से भी सूचना नहीं मिल सके तो केन्द्रीय सूचना आयुक्त (Central Information Commissioner) से अपील किये जाने की भी व्यवस्था है। इस कानून के तहत यदि लोक सूचना अधिकारी अथवा Public Information Officer (PIO) सूचना समय पर नहीं देता या गलत सूचना देता है तो उसके लिये दंड का प्रावधान भी है।
सूचना के अधिकार के प्रमुख प्रावधान
- विभिन्न अभिलेखों, दस्तावेजों, योजनाओं व रिकॉर्ड का निरीक्षण करने का अधिकार।
- ऐसे अभिलेखों, दस्तावेजों, योजनाओं, रिकॉर्ड आदि की अधिकृत प्रतिलिपि प्राप्त करने का अधिकार।
- निर्माण में प्रयुक्त अथवा अन्य सामग्री का नमूना लेने का अधिकार।
लोक सूचना अधिकारी के लिये आवश्यक है कि मांगी गर्इ सूचना, प्रार्थना पत्र के दिये जाने के तीस दिन के भीतर प्रदान की जाय। लेकिन यदि कोर्इ सूचना किसी व्यक्ति के जीवन अथवा उसकी स्वतन्त्रता से सम्बन्धित है तो इसे 48 घंटे के भीतर दिया जाना आवश्यक है। लोक सूचना अधिकारी द्वारा निर्धारित समयावधि के भीतर सूचना न दिये जाने पर इसे सूचना दिये जाने से इंकार करने समान माना जाता है और इसकी शिकायत (अपील) उससे वरिष्ठ अधिकारी (प्रथम अपीलीय अधिकारी) से की जा सकती है। यदि वांछित जानकारी किसी अन्य कार्यालय या लोक सूचना अधिकारी से सम्बन्धित है तो यह लोक सूचना अधिकारी का ही दायित्व है कि वह आवेदन के पांच दिन के भीतर अनुरोध पत्र को उस कार्यालय को अग्रसारित कर दे जिससे इसका सम्बन्ध हो। इसके तहत कुछ सूचनाऐं ऐसी हैं जो कि केन्द्रीय सूचना आयोग की संस्तुति के बाद ही दी जा सकती हैं उदाहरण के लिये मानव अधिकारों के उल्लंघन से सम्बन्धित सूचना। ऐसी सूचना आवेदन के 45 दिन के भीतर दिये जाने का प्राविधान है।
अधिनियम की धारा 8 में उन जानकारियों का उल्लेख है जिन्हें देने से इंकार किया जा सकता है। इसके तहत वर्णित जानकारियों को छोड़कर जो कि राष्ट्र की प्रभुता एवं अखंडता, राष्ट्र की सुरक्षा, रणनीति, वैज्ञानिक या आर्थिक हितों से सम्बन्धित हों या जिससे अन्य राष्ट्रों से मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े या जो किसी अपराध के लिये उकसाती हों अथवा सामाजिक समरसता को प्रभावित करने वाली हों या ऐसी जानकारियां जो संसद या राज्य विधानमंडलों का विशेषाधिकार हनन करती हों या कापीराइट एक्ट का उल्लंघन करती हों, अन्य सभी जानकारियां दिया जाना आवश्यक माना गया है। इस अधिनियम के तहत विकास कायोर्ं से जुड़े विभागों जैसे सार्वजनिक निर्माण विभाग, ग्रामीण अभियंत्रण सेवा, पेयजल, हार्इडिल आदि की गोपनीयता शून्य मानी गर्इ है तथा उन्हें शत प्रतिशत पारदर्शी बनाते हुए उनसे सम्बन्धित प्रत्येक जानकारी दिये जाने की व्यवस्था है। लेकिन इसके तहत यह व्यवस्था भी है कि चूंकि फार्इल या दस्तावेज बहुत लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रखे जा सकते अत: किसी मामले के 20 वर्ष बाद उससे सम्बन्धित जानकारी दिया जाना बाध्यकारी नहीं है। इसके अतिरिक्त इस अधिनियम में ‘तीसरी पार्टी की सूचना’ सम्बन्धी प्राविधान भी है जिसके तहत च्प्व् को ऐसी वाणिज्यिक गुप्त बातों, व्यावसायिक रहस्यों, बौद्धिक संपदा सम्बन्धी जानकारियों के अतिरिक्त ऐसी जानकारियों को भी न देने की छूट है, जिनसे किसी तीसरी पार्टी की प्रतियोगी स्थिति को क्षति पहुंचती हो।
अधिनियम की धारा 8(1)(घ) के तहत सम्बन्धित सूचना अधिकारी यदि आश्वस्त न हो कि ऐसी सूचना का दिया जाना लोक हित में आवश्यक है तो वह सूचना देने से इंकार कर सकता है। यदि वह सूचना देना लोकहित में आवश्यक समझे तो भी उसको इससे पूर्व सम्बन्धित तृतीय पक्ष को भी सूचित कर, उसके पक्ष को सुनकर तथा उससे असहमत होने पर उसे प्रतिवेदन का समय देना आवश्यक है। यदि इसके बाद केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी ऐसी सूचना को दिये जाने का निर्णय लेता है और तृतीय पक्ष इसके विरूद्ध अपील करता है तो तब तक यह सूचना नहीं दी जा सकती जब तक कि इस अपील का निस्तारण न हो जाए।
क्या करें यदि सूचना अधिकार से सूचना न मिले या जानकारी से सन्तुष्ट न हों
यदि कोर्इ सूचना मांगे जाने पर आवेदक को निर्धारित अवधि (तीस दिन) के भीतर सूचना प्राप्त नहीं होती या वह इस सूचना से संतुष्ट नहीं होता है तो वह प्रथम अपीलीय अधिकारी से इसकी अपील कर सकता है। यह अपीलीय अधिकारी पद में लोक सूचना अधिकारी से वरिष्ठ अधिकारी होता है। लेकिन यह अपील निर्धारित (30 दिन) की अवधि समाप्त होने के 30 दिन के भीतर अथवा इस सम्बन्ध में केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी का निर्णय मिलने के 30 दिन के भीतर कर दी जानी चाहिये। ऐसी अपील किये जाने पर लोक प्राधिकरण के अपीलीय अधिकारी का दायित्व है कि अपील किये जाने के तीस दिन के भीतर अथवा विशेष परिस्थितियों में 45 दिन के भीतर वह इस अपील का निस्तारण कर दे। यदि प्रथम अपीलीय अधिकारी निर्धारित अवधि में अपील का निस्तारण नहीं करता अथवा अपीलकर्ता उसके निर्णय से सन्तुष्ट नहीं होता तो वह प्रथम अपीलीय अधिकारी द्वारा निर्णय किये जाने की निर्धारित समय सीमा (अधिकतम 45 दिन) की समाप्ति अथवा निर्णय की प्राप्ति के नब्बे दिन के भीतर केन्द्रीय सूचना आयोग के समक्ष दूसरी अपील कर सकता है।
इस अधिनियम के तहत यह प्रावधान भी है कि यदि केन्द्रीय सूचना आयोग केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी को बगैर समुचित कारण के सूचना का आवेदन अस्वीकार करने, निर्धारित अवधि में सूचना न देने, जानबूझकर गलत, भ्रामक या अपूर्ण सूचना देने, सूचना नष्ट करने या सूचना देने की कार्यवाही में बाधा का दोषी पाता है तो वह आवेदन की प्राप्ति अथवा सूचना दिये जाने तक सम्बन्धित अधिकारी पर दो सौ रुपए प्रतिदिन का जुर्माना लगा सकता है । साथ ही दुर्भावनापूर्वक सूचना का आवेदन अस्वीकार करने या गलत व भ्रामक सूचना देने पर वह सम्बन्धित अधिकारी के विरूद्ध अनुशासनात्मक कार्रवार्इ की सिफारिश भी कर सकता है।
यदि राज्य सूचना आयुक्त किसी लोक अधिकारी को निर्धारित समयावधि पर सूचना न देने का दोषी पाता है तो वह उस पर 250 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से अधिकतम 25,000 रुपये तक का जुर्माना लगा सकता है जो कि सम्बन्धित लोक सूचना अधिकारी को अपनी निजी आय से वहन करना होगा अर्थात वह विभागीय धनराशि से इसका भुगतान नहीं कर सकता।