अनुक्रम
कहते हैं। इसे निम्नलिखित सूत्र द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। मान लीजिए 5 वस्तुओं की कुल लागत 135 रुपये हैं तथा 6 वस्तुओं की कुल लागत 180 रुपये है। अतएव छठी वस्तु की सीमांत लागत इस प्रकार निकाली जा सकती है।
सीमांत लागत = 180 रुपये – 135 रुपये = 45 रुपये
अतएव छठी इकाई की सीमांत लागत 45 रुपये होगी।
अतिरिक्त लागत के रूप में की जा सकती है’’
सीमांत लागत क्या है?
सीमांत लागत से आशय परिवर्तनशील लागतों अर्थात्, मूल लागत तथा परिवर्तनशील उपरिव्ययों के
योग से है। प्रति इकाई सीमांत लागत उत्पादन के किसी भी स्तर पर राशि में हुए परिवर्तन से है जिससे कुल
लागत में परिवर्तन होता है, यदि उत्पादन मात्रा एक इकाई से बढ़ायी या घटाई जाती है।
सीमांत लागत विधि का अर्थ
इन्स्टीट्यूट ऑफ कास्ट एण्ड मैनेजमेंट एकाउन्टेन्ट्स, इंग्लैण्ड के अनुसार “सीमांत लागत विधि का
आशय स्थायी लागत एवं परिवर्तशील लागत में अन्तर करके सीमांत लागत का निर्धारण करना तथा उत्पादन
की मात्रा अथवा किस्म में परिवर्तन का लाभ पर प्रभाव ज्ञात करने से है।”
सीमांत लागत विधि के अंतर्गत लाभ की गणना
सीमांत लागत विधि के अंतर्गत लाभ ज्ञात करने के लिए कुल लागत को स्थिर लागत व परिवर्तनशील
लागत में विभाजित कर लिया जाता है। तत्पश्चात सीमांत लागत को विक्रय मूल्य में से घटा दिया जाता है।
शेष राशि अंशदान (Contribution) कहलाती है। इस अंशदान में स्थिर लागतों को घटाकर लाभ ज्ञात कर
लिया जाता है। निर्मित माल व चालू कार्य के स्कन्ध का मूल्यांकन सीमांत लागत पर ही किया जाता है जिसमें किसी भी प्रकार के स्थिर व्यय सम्मिलित नहीं होते है
सीमांत लागत विधि के लाभ
सीमांत लागत निर्धारण विधि व्यावसायिक प्रबन्ध के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण एवं उपयोगी तकनीक है।
इसके प्रमुख लाभ, संक्षेप में हैं-
आसान है क्योंकि इसमें स्थायी लागतों को सम्मिलित नहीं किया जाता है, जिससे उनके अनुभाजन एवं
अवशोषण की समस्या उत्पन्न नहीं होती। इसे प्रमाण लागत के साथ जोड़ा जा सकता है।
जाता है। जिससे स्थायी लागतों का एक हिस्सा स्कन्ध के रूप् में अगली अवधि में नहीं ले जाया जाता।
इसलिए लागत एवं लाभ निष्प्रभाव नहीं होते तथा लागतों में तुलना सार्थक हो जीती है।
उत्पादन अथवा विक्रय मात्रा या विक्रय मिश्रण तथा उत्पादन या विक्रय पद्धति में किये जाने वाले
परिवर्तनों का लागतों एवं लाभों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इस विधि द्वारा अध्ययन किया जा सकता है।
इससे प्रबन्ध को नीति-निर्धारण तथा निर्णय लेने में सहायता मिलती है।
मध्य आपसी सम्बन्ध का अध्ययन सम-विच्छेद बिन्दु, लाभ मात्रा अनुपात आदि तकनीकों द्वारा
भली-भांति समझा जा सकता हैं इससे प्रबन्धकों को बजटिंग तथा लाभ नियोजन में सरलता रहती है।
प्रबन्ध इस विधि के कारण भावी लाभ-योजनाएं बना सकते हैं तथा उनका मूल्यांकन किया जा सकता
है।
जाना आवश्यक है। सीमांत लागत विधि में लागतों को स्थिर एवं परिवर्तनशील में वर्गीकृत करके उनके
स्वभाव का सूक्ष्म विश्लेषण किया जाता है। लागतों के इस प्रकार विभाजन से लागत नियंत्रण के लिए
उत्तरदायित्व निश्चित किया जा सकता है। विभिन्न प्रबन्धकों को केवल उन्हीं लागतों की सूचना दी
जाती है जिनके लिए वे उत्तरदायी होते है।
प्रबन्ध के निम्न स्तर का होता है। जबकि स्थिर लागतों में नियंत्रण
का दायित्व उच्च प्रबन्ध का होता है। इस तरह यह विधि उत्पादन एवं बिक्री की परिवर्तित परिस्थितियों
में लागत व्यवहार का अध्ययन करके उनके नियंत्रण में सहयोग देती है।
विक्रय एवं उत्पादन से सम्बन्धित महत्वपूर्ण अनेक निर्णय लेने होते हैं। इन निर्णयों का मुख्य आधार
न्यूनतम प्रयासों से अधिकतम लाभ प्राप्त करना है। सीमांत लागत विधि प्रबन्धकों को इस कार्य
(निर्णयन) में महत्वपूर्ण सहायता प्रदान करती है। इसकी सहायता से इन समस्याओं के सम्बन्ध
में सही एवं उचित निर्णय लिये जा सकते हैं-
- उत्पाद मूल्य निर्धारण
- विभिन्न विभागों या उत्पादों की लाभप्रदता का मूल्यांकन
- क्रियाशीलता के स्तर का नियोजन
- उपयुक्त उत्पाद मिश्रण तथा विक्रय मिश्रण का चुनाव
- नये उत्पाद का निर्माण
- अतिरिक्त क्षमता का उपयोग
- क्रियाओं को बंद करना अथवा स्थगित करना
- सर्वाधिक लाभप्रद वितरण पद्धति का चुनाव
- संयंत्र प्रतिस्थापन
- बनाओ या खरीदो पट्टे पर या खरीदो
- प्रमुख कारक की समस्या तथा
- विक्रय अथवा आगे प्रक्रिया