अनुक्रम
संचार कलाओं का अस्तित्व संभवतः मानव जाति के उदय काल से ही है क्योंकि
विचारों, और अनुभवों के आदान-प्रदान के अभाव में जीवन का अस्तित्व नहीं हो
सकता। हो सकता है संचार का आरंभिक रूप आवाज हो। एक दूरी तक अपने
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अनुभव और सूचना संप्रेषण के लिए चिल्लाने का प्रयोग किया जाता था। उस
समय अधिकांश सूचनाएँ मौखिक रूप से संप्रेषित की जाती थीं। आने वाली पीढ़ी
को कहानियाँ और गाने मौखिक रूप से ही सिखाए जाते थे। जब अत्यधिक
व्यापक क्षेत्र में फैले लोगों पर शासन करने तथा राजनीतिक रूप से नियंत्रण
करने में मौखिक संप्रेषण अपर्याप्त रहने पर ही लिखित रूप का विकास’ हुआ
होगा।
संचार का उद्भव और विकास
लिखित संप्रेषण के प्राचीनतम रिकार्ड का समय दखने पर हमें दक्षिण यूरोप में
लास्कोक्स और आल्टीमीरा की गुफाओं में चित्रकारियाँ मिलती हैं। विश्वास किया
जाता है कि करीब 35,000 वर्ष पूर्व अज्ञात कलाकारों ने गवल, लगाम वाले हिरण,
जंगली अश्व यहाँ तक कि अज्ञात पशुओं और शिकारी व्यक्तियों के अद्भुत भित्ति
चित्र बनाए हुए हैं।
ये चित्रकारियाँ शिकार से संबंधित हैं। संभवत: ये प्रतीकात्मक चित्रकारियाँ उन
घटनाओं को अच्छी तरह याद रखने तथा आने वाली पीढ़ी की जानकारी के लिए
सहायता प्रदान करती थी। इनसे याददाश्त में वृद्धि होती थी। समय के अंतराल
में इन प्रतीकात्मक प्रदर्शनों में मानक रूपों का प्रवेश होने लगा।
पृथ्वी पर ऐसे अनेक चित्र बर्तनों, टोकरियों, छड़ियों, वस्त्रों, दीवारों, पशुओं की
खचाओं (खालों), छाल, पत्थरों और यहाँ तक की पत्तियों पर भी देखने को मिलते
हैं। इनमें से संकेतों और चित्रो के साथ चित्रकला और कलात्मक भाव भी होता है।
प्राचीन लोग अनेक प्रकार के साधन, जैसे : गोदना, दागना, आभूषण, मुकुट, वस्त्रों
आदि का प्रयोग अपने स्तर, हैसियत, शक्ति, संपन्नता, उपलब्धि, व्यवसाय और
पारिवारिक सदस्यता दर्शाने के लिए करते थे।
मुद्रण/छपाई (Printing)
मुद्रण का आविष्कार कागज निर्माण के बाद आरंभ हुआ। विश्वास किया जाता है
कि 105 ई.पू. तक चीनी मंत्री तसई लूम ने पहली बार कागज का आविष्कार
किया। अरबवासियों के पास 751 में कागज था लेकिन यह यूरोप में लगभग 1100
ई. में मूर्स के माध्यम से स्पेन होकर पहुँचा। कागज का इतना व्यापक प्रयोग हुआ
कि 100 वषोर्ं में ही यूरोप के अनेक भागों में कागज का निर्माण होने लगा।
चीन में पहली बार 846 ई.पू. मुद्रण का आविष्कार हुआ। चीनवासियों ने मुद्रण के
लिए लकड़ी की प्लेटों का इस्तेमाल किया। सजावट एवं आभूषणों में मुद्रण
प्रणाली का प्रयोग पहले से ही 200 ई. पू. विद्यमान था। लेकिन एक जर्मन
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स्वर्णकार गुटनबर्ग ने मैंज में पहली बार लगभग 1450 में सचल टाइपों (अक्षरों)
का प्रयोग कर आधुनिक मुद्रण का आविष्कार किया। उसके द्वारा मुद्रित पहली
पुस्तक बाईबल का एक भाग था। इस पुस्तक को गुटनबर्ग की बाईबल कहा
जाता है।
14वीं शताब्दी की समाप्ति तक मुद्रण विश्व के विभिन्न भागों में फैल चुका था।
विलियम कैक्सटोन ने जर्मनी में मुद्रण कला लिखी और उसने 1476 में इंग्लैंड में
अपना मुद्रणालय (प्रिटिंग प्रेस) स्थापित किया। अमेरिका में पहली प्रिटिंग प्रेस जॉन
पाबलों द्वारा 1539 में मैक्सिको शहर में लगाई गई। भारत में पहली प्रिटिंग प्रेस
1556 में पुर्तगाली जेसुट्स द्वारा गोवा में स्थापित की गई। सबसे पहली प्रिटिंग
प्रेस ईसाई पादरियों द्वारा लगाई गई। गोवा में पहली प्रिटिंग प्रेस की स्थापना के
बाद 250 वषोर्ं में संपूर्ण भारत में मुद्रण का प्रसार हो गया। इसके अतिरिक्त
पुर्तगाल, ब्रिटेन, स्पेन तथा दानिस वासियों ने मुद्रण तकनीक के प्रसार में योगदान
दिया।
भारत मे मुद्रण के आगमन से अनेक भारतीय भाषाओं की उत्पत्ति में सहायता
मिली। भाषाएँ अपनी लिपि मे लिखी जाने लगी तथा शब्दावली और व्याकरण का
विकास हुआ। पहले से मुद्रित अनेक पुस्तकों के अनुवाद किए गए।
गुटनबर्ग के आविष्कार से विश्व में वास्तविक रूप से परिवर्तन हुआ। पूरे विश्व में
मुद्रण के विस्तार से भाषाओं की उत्पत्ति हुई और विकास हुआ तथा स्कूलों और
शैक्षिक कायोर्ं की आवश्यकता बढ़ गई। विज्ञान, मनोविज्ञान तथा धर्म में हुए
विकास जनता तक पहुंचने लगे। संक्षेप में कहा जाए तो मुद्रण ने ज्ञान को
संरक्षित रखने तथा विस्तार में बहुत सहायता प्रदान की। मुद्रण तकनीकों में
विकास तथा वृद्धि, कागज की उपलब्धता तथा पढ़ने की चाह न े प्रेसों को बहुत
बढ़ावा दिया।
पुस्तकें और समाचार पत्र (Books & Newspapers)
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आज बिना पुस्तकों के जीवन के बारे में सोचना असंभव है। पुस्तकों के मुद्रण और
उनके फैलाव से ज्ञान की वृद्धि और संरक्षण में प्रोत्साहन मिलता है। पुस्तकों के
छपने से विचारों का विस्तार सरल हो गया तथा सामाजिक बाधाओं को तोड़ने में
सहायता मिली। इसने नए सामाजिक संबंधों की स्थापना का मार्ग खोल दिया,
क्रांतियों के होने में सहायता प्रदान की तथा वैज्ञानिक विकास ने खोजो को बढा़वा
दिया। यद्यपि पुस्तकों के अनेक कार्य अन्य माध्यमों से भी किए जाते हैं तो भी
पुस्तक निर्माण निरतंर एक समृद्ध उद्योग बना हुआ है। जब तक मानव सभ्यता
का अस्तित्व रहेगा, पुस्तकें कभी समाप्त नहीं होंगी।
समाचार पत्र जनता का सबसे पुराना माध्यम था। यह अधिकांश जनता तक पहल े
तथा सबसे शीघ्र पहुँचने वाला संचार का एक प्रकार था। पहला समाचार पत्र
1609 में जर्मनी में प्रकाशित हुआ। एक दशक के अंदर ही बेल्जियम, नीदरलैंड
तथा ब्रिटेन से भी समाचार पत्र छपने लगे। रेडियो और टेलीविजन के आन े तक
समाचार पत्र शीघ्रतम सार्वजनिक माध्यम बना रहा। गति के संदर्भ में रेडियो और
टेलीविजन ने समाचार पत्र को पीछे छोड़ दिया लेकिन समाचारों और घटनाओं के
गहन विश्लेषण में समाचार पत्र ही पाठकों का उद्देश्य पूरा करता है।
भारत में प्रथम समाचार पत्र 1780 मे जेम्स ओगस्तस हीके द्वारा आरंभ किया
गया। इसे बंगाल गजट कहा गया। हीके को गिरफ्तार कर जेल में डाला गया
तथा प्रेस की आजादी का निडर अगुवा होने और अंग्रेजी शासकों की भ्रष्ट
परंपराओं का खुलासा करने के कारण उसे वापस ब्रिटेन भेज दिया गया। हीके
का समाचार पत्र बंद होने के छह साल के अंदर मद्रास (मद्रास कूरियर) और
बंबई (द बाम्बे हेराल्ड) नामक कई समाचार पत्र आरंभ हुए। भारतीय भाषा
पत्रकारिता के संस्थापक शेरामपोर के पादरी थे। समाचार दर्पण प्रथम भारतीय
भाषा की पत्रिका थी। तब से अंग्रेजी भाषा और स्वदेशी भाषा प्रेस धीरे-धीरे बढ़ती
गई। भारत में प्रेस ने आजादी के संघर्ष में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वतंत्रता
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आंदोलन के कुछ नेता तिलक, गांधी आदि संपादक और लेखक भी थे। भारत में
प्रेस को काफी आजादी है। आंतरिक आपात काल के दौरान कुछ अवधि को छोड़
कर यह भारत में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था को शक्तिशाली बनाने का साधन भी
प्रेस है।
सिनेमा (Cinema)
सिनेमा या चलचित्रों का इतिहास जैसा कि हम जानते हैं करीब एक शताब्दी
पुराना है। चलचित्र स्थिर चित्रों की एक श्रृंखला होती है, जिसे पर्दे पर इतनी
तेजी से प्रदर्शित किया जाता है कि देखने वालों को गति का अनुभव होता है।
वास्तव में सिनेमा शब्द यनू ानी शब्द ‘किनेमा’ से आया है, जिसका अर्थ, गति होता
है। सिनेमा के विकास के तीन चरण हैं:
- चित्रों को रिकार्ड करना
- आवाज आना
- रंगीन होना
जैसा कि हम जानते हैं कि सिनेमा के आविष्कार के पहले कई विकास हो चुके
थे। पहला प्रयास था फोटोग्राफी का आविष्कार जो उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में
हुआ। जॉर्ज ईस्टमैन, 1884 तथा एडिसन और डिक्सन ऐसे पथप्रदर्शक थे, जिनके
कायोर्ं ने फ्रांस के लियोन शहर में लूि मयर भाइयों द्वारा किए गए सिनेमा के
आविष्कार मं े बहुत मदद की। लूमियर भाइयों ने 1895 में पहली फिल्म का निर्माण
किया। इन्होंने 35 मिनी फिल्म सामग्री का प्रयोग किया। यह मूक फिल्म थी,
जिसमें संगीत उपकरणों या व्यक्तियों द्वारा मौखिक संवाद संप्रेषित किया गया। चित्र के साथ आवाज वाली फिल्मों के आविष्कार से बोलने वाली फिल्में बन गई। 1920 के दशक तक फिल्मों में साउंड ट्रैक बन गए थे।
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अनेक आरंभिक फिल्मों की अवधि केवल एक या दो मिनट की होती थी। बाद मे
विचारों और कहानियों के साथ लम्बी अवधि की फिल्में बनी, जिन्होंने लोगों में
रुचि पैदा की। ये फिल्में काफी हाऊस और सैलूनों से निकल कर सुसज्जित
सिनेमाघरों में पहुंच गई। फिल्मोद्योग संपन्न और बड़ा व्यवसाय बन गया।
भारत में सिनेमा 1896 में बंबई में लूमियर भाइयों की एक प्रदर्शनी से आरंभ हुआ
एच.एस. भटवाडेकर जिन्होंने प्रदर्शनी देखी थी प्रथम भारतीय न्यजू रील रिटर्न अॉफ
रैंग्लर पराजेपे बनाई। बंबई के एक मुद्रक दादा साहब फाल्के ने अपनी प्रथम
फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ 1913 में बनाई। फाल्के ने सौ अन्य फिल्में भी बनाई।
सिनेमा जन संचार का एक माध्यम है, जिसका भारत मं े काफी प्रभाव है। भारत
बड़े फिल्म निर्माताओं में से एक है। फिल्में मुख्य रूप से भारत में मनोरंजन का
साधन रही हैं लेकिन इन्होंने जन समहू को शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन के
संदेश प्रदान करने की भी भूमिका निभाई है। डाक्यूमेंट्री फिल्में भी विभिन्न राष्ट्रीय
विषयों के बारे में सूचनाएं प्रदान करती थी। फिल्में अपने गुणों के कारण विभिन्न
तत्त्वों जैसे चित्र, आवाज, गति और नाटक का संयोजन करके प्रभाव उत्पन्न
करती है और परिवर्तन का एक सशक्त माध्यम बन गई है। भारत में फिल्मी
माध्यम ने सांस्कृतिक बाधाओं को तोड़ दिया है क्योंकि –श्य का सार्वभौमिक प्रभाव
पड़ता है।
प्रसारण और रेडियो (Broadcast and radio)
प्रसारण अत्यधिक दूरी तक आवाज और तस्वीर के संप्रेषण को संभव बनाता है। टेलीग्राफ और टेलीफोन महत्त्वपूर्ण आविष्कार थे, जिनसे संचार तकनीक में बाद
के विकासों को और सरल बना दिया। सैमुअल मॉर्स ने 1835 में विद्युत के प्रयोग
से कूट संदेश संप्रेषित करने के लिए टेलीग्राफ का आविष्कार किया। एक जर्मन
वैज्ञानिक हेनरिच हर्टज ने रेडियो तरंगों की उपस्थिति का प्रदर्शन किया। 1897 में
गुग्लील्मो मारकोनी ने 22 वर्ष की आयु में अत्यधिक दूरी तक प्रथम बेतार संदेश
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प्रेषित किया। इस प्रकार रेडियो का जन्म हुआ। यह अत्यधिक दूरी तक संदेश
प्रेषण का सशक्त माध्यम बन गया।
दो दशकों के अंदर रेडियो ने प्रायोगिक अवस्था पार कर ली और जन संचार का
महत्त्वपूर्ण साधन बन गया। रेडियो मनोरंजन और सूचना का सशक्त माध्यम बन
गया। इससे विचारों के प्रसारण में सहायता मिली। युद्ध के दौरान महत्त्वपूर्ण
भूमिका निभाई तथा औपनिवेशिक शक्तियों को समुद्र में जहाज के सार्थक संपर्क
बनाने में समर्थ बना दिया। राजनैतिक नेताओं ने राष्ट्रों को संदेश देने के लिए
रेडियो का प्रयोग किया।
टेलीविजन (Television)
दूसरे विश्व युद्ध के तुरंत बाद रेडियो का शक्तिशाली माध्यम टेलीविजन द्वारा
पीछे छोड़ दिया गया। टेलीविजन प्रसारण के प्रयोग 1920 के दशक के आरंभ में
शुरू हो गए थे। पिक्चर टîबू , विद्युत कैमरा तथा टी वी पर ग्रहणकर्त्त्ाा सहित
अनुसंधानों की श्रृंखला अगले दशक में जाती थी। एन बी सी तथा बी बी सी ने
क्रमश: न्यूयार्क तथा लदं न में अपने टेलीविजन केंद्र स्थापित कर लिए थे। दूसरे विश्वयुद्ध ने टेलीविजन की उत्पत्ति को बाधित कर दिया था। 1960 के दशक तक
रंगीन टेलीविजन का प्रचलन हो गया था।
1962 में प्रथम संचार उपग्रह अर्ली बोर्ड के छोड़े जाने से उपग्रह संचार क्षेत्र आरंम
हो गया। उपग्रह न े भूमि स्थित केंद्र से अंतरिक्ष में स्थित उपग्रह से तथा पुन:
पृथ्वी पर संपर्क करने के लिए सिगनलों को ऊपर भेजना तथा फिर नीचे प्राप्त
करना संभव बना दिया। अप लिंक करना एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके द्वारा भूमि
स्थित केंद्र से सिगनल भौगोलिक स्थिर संचार उपग्रहों को भेजे जाते हैं। इन
सिगनलों को डाउन लिंक कर केबलों या डिश एंटीना के माध्यम से घर स्थित
टेलीविजन द्वारा गह्र ण किया जा सकता है।
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टेलीविजन प्रसारण की सीमाओं ने केबल टेलीविजन के आविष्कार को जन्म
दिया। केबल टी वी केंद्र से प्राप्त कार्यक्रमों को वायुमडं ल के माध्यम की अपेक्षा
तार के द्वारा वितरण करने की प्रक्रिया थी। यह एक ऐसी प्रणाली है, जिसमें
नियत्रं क या डिश एंटीना इलेक्ट्रॉनी सिगनलों को प्राप्त करता है तथा केबल के
माध्यम से अनेक घरों को प्रेषित करता है। उपग्रह संचार प्रणाली ने आज विश्व
को एक वैश्विक गाँव में परिवर्तित कर दिया है। आज हमारे पास विभिन्न प्रकार
के कार्यक्रमों सहित अनेक राष्ट्रीय और क्षेत्रीय चैनल मौजूद हैं। हमारे घरों में
सीधे ही (डी.टी.एच.) टेलीविजन, बहुमाध्यम तथा घरेल ू सिनेमा, डी वी डी और वी
सी डी इत्यादि की पहुँच के कारण तथा मीडिया के इस प्रयोग से लोगों के
जीवन मं े क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ, जिसे स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
भारत में टेलीविजन 1959 में आरंभ में हुआ। फिर भी भारत में टले ीविजन सेटों
का उत्पादन 70 के दशक में ही आरंभ हो सका। 1976 में रेडियो और टेलीविजन
एक ही इकाई के अंतर्गत् संचालित होते थे, जिनमें विभाजन किया गया और
अलग से दूरदर्शन की स्थापना हुई।
1967 में भारत में टेलीविजन को उपग्रह शिक्षा टेलीविजन प्रयोग (एस.आई टी. ई.)
कार्यक्रम के माध्यम से शिक्षा के लिए सार्वजनिक माध्यम के रूप में प्रयोग किया
जाने लगा था।
टेलीविजन, भारत में परिवर्तन के लिए, राष्ट्रीय निष्ठा संवर्धन के लिए, लोगों में
वैज्ञानिक प्रवृत्ति बढ़ाने के लिए, परिवार नियोजन एवं जनसंख्या नियंत्रण में प्रगति
के लिए, कृषि विकास के लिए, ग्रामीण विकास के लिए, खेलों और क्रीड़ा जगत
को बढ़ावा देने के लिए, महिला और बाल कल्याण को बढ़ावा देने के लिए,
राष्ट्रीय भावना पैदा करने के लिए तथा दश्े ा को कलात्मक और सांस्कृतिक धरोहर
को बढ़ावा देने के लिए, प्रेरक के रूप में प्रयोग किया जाता है।
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टेलीविजन के अनियंत्रित प्रयोग में कुछ जोखिम भी देखे गए हैं। विकासशील
देशों में अधिकांश टले ीविजन कार्यक्रम पश्चिम विशष कर अमेरिका से आयात किए
जाते हैं।
अनुमान है कि 1970 के दशक में अमेरिका से प्रतिवर्ष 150,000 घंटे के टेलीविजन
कार्यक्रमों का निर्यात किया गया। 1983 में 69 देशों में किए गए एक अध्ययन से
पता चला कि उन्होंने एक तिहाई या इससे अधिक कार्यक्रमों को अन्य देशों से
आयात किया अफ्रीका में 40 से 60 प्रतिशत तक टेलीविजन कार्यक्रम आयात किए
जाते हैं। संस्कार विश्व दृष्टि और सामाजिक मूल्यों के साथ जुड़े हुए गंभीर
परिणामों के कारण यह पता अनुचित है। टेलीविजन स्वदेशी संस्कृतियों की वृद्धि
को क्षति पहुँचा कर सार्वभौमिक संस्कृति का मुख्य एजेंट बन गया है।
टेलीविजन एक व्यसनकारी माध्यम भी है, जो लोगों को स्वापक भी बना सकता
है। शिक्षकों ने बताया कि टेलीविजन देखने से शिक्षा प्रक्रिया में बाधा आती है।
टेलीविजन अन्य सामाजिक गतिविधियों को भी प्रभावित करता है जैसे अवकाश
और मनोरंजन, खेल संगीत, मनोरंजन, धर्म आदि। टेलीविजन कार्यक्रमों से चित्रित
हिंसा और समाज में वास्तविक हिंसा का परस्पर संबंध होने का अनेक सामाजिक
वैज्ञानिकों और संचार विशेषज्ञों द्वारा अध्ययन किया गया है।
इंटरनेट (Internet)
टेलीफोन की सहायता से दूर स्थित रखे दो कम्प्यूटरों को जोड़ा जा सकता है
तथा डाटा शीघ्रता से स्थानांतरित किया जा सकता है। इस प्रकार डाटा
स्थानांतरण प्रक्रिया को इलेक्ट्रॉनिक मेल (ई-मेल) कहा जाता है। यह इंटरनेट का
आधार है। इंटरनेट एक सार्वभौमिक प्रणाली है, जिसके द्वारा डाटा स्थानांतरण के
लिए, एक कम्प्यूटर को दूसरे कम्प्यूटर से जोड़ा जा सकता हैं। इस प्रणाली को
मोडमो के माध्यमों से कम्प्यूटरों को जोड कर विश्व संबद्धता को प्राप्त करने के
लिए संपूर्ण बनाया गया है। इस प्रणाली में एक कम्प्यूटर से दूर स्थित कम्प्यूटर
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से शीघ्र सूचना स्थानांतरण को सरल बना दिया है। इस क्षेत्र में और अधिक
विकासों ने वेब साइटों की उत्पत्ति को जन्म दिया।
प्राप्त किया जा सकता है। आज विभिन्न वेबसाइटों पर पर्याप्त मात्रा मे सूचना
और डाटा उपलब्ध हैं और कम्प्यूटर के की-बोर्ड पर कुछ स्ट्रोक लगाकर कोई भी
उन्हें आसानी से प्राप्त कर सकता है। भारत में इंटरनेट की उपलब्धि पहली बार
1995 में विदेश संचार निगम लिमिटडे (वी.एस.एन.एल.) द्वारा प्रदान की गई।