अनुक्रम
घराना का अर्थ
घराना का अर्थ कुछ विशेषताओं का पीढ़ी दर पीढ़ी चले आना अर्थात गुरु शिष्य परंपरा को घराना कहा जाता है। गायकी से घराने का निर्माण माना है जैसे एक गायक ने कुछ शिष्य बनाए और उन्होंने कुछ और शिष्य तैयार किए, इस तरह शिष्यों की पीढ़ी चलती गई, जिसे घराना कहा गया।
तानसेन के वंशजों से घराने का निर्माण माना जाता है। तानसेन के पुत्रों के वंशज सेनिए कहलाए, जो ध्रुपद गाते थे व बीन बजाते थे। तानसेन की पुत्री के वंशज बानिए कहलाए, जो ध्रुपद गाते थे व रबाब बजाते थे। प्रत्येक घराने का आवाज लगाने का ढंग, उतार-चढ़ाव का अपना अलग ही ढंग होता है, आवाज का फैलाव भी विशेष ढंग का ही होता है।
घराने का इतिहास
रहा है –
1. ग्वालियर घराने का इतिहास
घराना, जो ख़्याल का सर्व प्रसिद्ध घराना है, वास्तव में लखनऊ घराने से निकला
हुआ है।
ग्वालियर घराने की विशेषताएँ – ध्रुपद अंग के ख़्याल, गमक का प्रयोग, जोरदार तथा खुली आवाज, सीधी तथा सपाट तानों का प्रयोग, लयकारी, ठुमरी के स्थान पर तराना गायन, तैयारी पर विशेष बल।
2. आगरा घराने का इतिहास
है। यह घराना मूलत: ध्रुपद तथा धमार गायकों का रहा। इसलिए इसके ख़्याल गायन
पर भी ध्रुपद धमार की तरह नोमतोम व लयकारी का प्रभाव स्पष्ट नजर आता है।
आगरा घराने की उत्पत्ति अलख दास तथा मलूक दास द्वारा मानी जाती है।
3. दिल्ली घराने का इतिहास
मोहम्मद शाह रंगीले (1719 ई.) के दरबार में ख़्याल गायकी का प्रचार हुआ।
इनके दरबार में नियामत खां (सदारंगद) तथा फिरोज खां (अदारंगद) ख़्याल गीतों व
गायकी के निर्माता रहे हैं। मोहम्मद शाह रंगीले के नाम से जितने भी ख़्याल गीत पाए
जाते हैं वे इन्हीं दोनों गायकों की कृतियां हैं।’
4. किराना घराने का इतिहास
उद्गम प्रसिद्ध बीनकार उस्ताद बंदे अली खां से माना जाता है जो अच्छे ध्रुपद गायक
व ग्वालियर के प्रसिद्ध ख़्याल गायक उस्ताद हद्दू खां के दामाद थे। इस घराने का
विस्तार कर उसका प्रचार-प्रसार उस्ताद बेहेरे वहीद खां तथा मुख्यत: उस्ताद
अब्दुल करीम खां ने किया। उस्ताद अब्दुल करीम खां ने अपनी विलक्षण प्रतिभा से
स्वतंत्र गायकी का निर्माण किया, इनकी गायकी पर बीन का प्रभाव था इनकी आवाज
पतली, सुरीली तथा नोकदार थी, इनकी गायकी स्वर प्रधान थी इसलिए किराना
घराने की गायकी में स्वर की सूक्ष्मता व सच्चाई साफ दिखाई देती है।
5. जयपुर घराने का इतिहास
जयपुर दरबार में भारतवर्ष के मशहूर गायक एवं वादक नियुक्त थे। संगीत की
गायन एवं वादन दोनों विधाओं को इस घराने से प्रेरणा मिली। ध्रुपद शैली, कव्वाली
शैली, एवं वीणा वादन की वाद्य शैलियों एवं सितार वादन की शैली इन सबका
मिश्रित रूप जयपुर घराने की छटा को निखारता है, जितनी मधुर यहाँ की वादन
शैली है उतना ही सुरीला यहाँ का कंठ संगीत है। जयपुर नरेश माधोसिंह के
दरबार में सावल खां नामक प्रसिद्ध बीनकार थे।
6. पटियाला घराने का इतिहास
है। पटियाला घराना वास्तव में दिल्ली घराना ही रहा है, पंजाब की स्थानीय शैलियों
से प्रभावित होने के कारण यह पंजाब का घराना बन गया और पटियाला रियासत
में पनपने के कारण यही पटियाला घराना कहलाया। यह घराना अपनी तैयारी और
विविधतापूर्ण गायकी के लिए प्रसिद्ध है। पटियाला घराने की ठुमरियाँ अपनी
कोमलता, रसीलेपन, टप्पे वाली तानों के कारण श्रोताओं के मन पर एक अनिवर्चनीय
प्रभाव डालती हैं। इस घराने की गायकी अनेक घरानों से पोषित होकर एक नई
रंगीनी से गर्भित है।
7. बनारस घराने का इतिहास
जीवन पर्यन्त संगीत की साधना करते हुए गायकी में विशिष्ट विशेषताओं का समावेश
करके बनारस घराने को जन्म दिया, आपने गायन के क्षेत्र में नवीन प्रयोगों द्वारा
छोटी-छोटी हरकतों के अलावा खटके, मुर्कियों, स्वर के संकोच तथा विस्तार की
प्रचलित शैलियों में प्रयत्न करके बनारस घराने के रूप में संगीत के क्षेत्र में अपनी एक
अलग पहचान बनाई। बनारस घराना एक ऐसा घराना है, जिसमें
ख़्याल, टप्पा, ठुमरी, ध्रुपद, धमार, तराने आदि संगीत के सभी अंगों के रूपों का
समावेश पाया जाता है।
बनारस घराने की विशेषताएँ – इस घराने की गायकी में भाव व भावपूर्ण गायकी का समावेश पाया जाता है। ख़्याल की बंदिशों में शब्दों के उच्चारण पर विशेष बल दिया जाता है। स्वर के साथ लय पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है। बनारस घराने की गायकी में खटका, मुर्की, व हरकतों का विशेषकर प्रयोग किया जाता है।
