अनुक्रम
की जा रही हैं। ये परिभाषाएँ शैक्षिक तकनीकी के अर्थ एवं स्वरूप को समझने में सहायता प्रदान करती हैं –
शैक्षिक तकनीकी की परिभाषा
1. शैक्षिक तकनीकी की एकांगी परिभाषाएँ
1. जैकोटा ब्लूमर (Jacquetta Bloomer, 1973) – शैक्षिक तकनीकी को व्यावहारिक अधिगम की परिस्थितियों में वैज्ञानिक एवं तकनीकी ज्ञान का विनियोग कहा जाता है।
उपर्युक्त सभी परिभाषाओं की विवेचना करने पर स्पष्ट होता है कि ये सभी परिभाषायें एकांगी हैं। कोई परिभाषा
शैक्षिक तकनीकी के किसी पहलू पर प्रकाश डालती है और कोई परिभाषा किसी दूसरे पहलू को उजागर करती है।
अत: इन परिभाषाओं में व्यापकता (Comprehensiveness) के गुण का अभाव है।
2. शैक्षिक तकनीकी की ग्राह्य परिभाषाएँ
इस श्रेणी में लीथ, साकामाटो तथा शिव के. मित्र की परिभाषाएँ वर्गीकृत की जा सकती हैं
ज्ञान का प्रयोग है, जिसके द्वारा शिक्षण एवं प्रशिक्षण की प्रक्रिया की प्रभावपूर्णता एवं दक्षता का विकास
कर उसमें सुधार लाया जाता है।¸
अध्ययन है जिसका उद्देश्य कुछ आवश्यक तत्वों जैसे शैक्षिक उद्देश्य, पाठ्य-वस्तु, शिक्षण सामग्री, शिक्षण
विधि, वातावरण, विद्यार्थीयों व निर्देशकों का व्यवहार तथा उनके मध्य होने वाली अंत:प्रक्रिया को नियंत्रित
करके अधिकतम शैक्षिक प्रभाव उत्पन्न करना है।
जा सकता है जिनके द्वारा शैक्षिक उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सके।
3. शैक्षिक तकनीकी की कार्यात्मक परिभाषा
हेडान (E. E. Hadden) की परिभाषा कार्यात्मक परिभाषा कही जाती है। इसमें शैक्षिक तकनीकी के सैध्दान्तिक
तथा व्यावहारिक दोनों ही पक्षों को समावेशित किया गया है। उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर हम निम्नांकित निष्कर्षों पर पहुँचते हैं –
- विज्ञान, शैक्षिक तकनीकी का आधारभूत विषय है।
- शैक्षिक तकनीकी, शिक्षा पर विज्ञान तथा तकनीकी के प्रभाव का अध्ययन करती है।
- शैक्षिक तकनीकी में व्यावहारिक पक्ष को महत्त्व दिया जाता है।
- शैक्षिक तकनीकी निरन्तर विकासशील विषय है।
- इसका उद्देश्य सीखने की प्रक्रिया में विकास करना है।
- यह मनोविज्ञान, इन्जीनियरिंग आदि विज्ञानों से सहायता लेती है।
- इसमें क्रमबद्ध उपागम (Systematic Approach) को प्रधानता दी जाती है।
- इसमें शिक्षक, छात्र तथा तकनीकी प्रक्रियायें एक साथ समावेशित रहती हैं।
- शैक्षिक -तकनीकी के विकास के पफलस्वरूप शिक्षण में नवीन-विधियों तथा नव शिक्षण-तकनीकियों का
प्रवेश हो रहा है। - यह शैक्षिक उद्देश्यों की पूख्रत हेतु अधिगम-परिस्थितियों में आवश्यक परिवर्तन लाने में समर्थ है।
उपर्युक्त परिभाषाओं तथा विशेषताओं के आधार पर यह स्पष्ट है कि शैक्षिक तकनीकी अति विस्तृत शब्द है। इसका
तात्पर्य सम्पूर्ण शैक्षिक प्रक्रिया को योजनाब( कर, कार्यान्वित करने में वैज्ञानिक सि(ान्तों को प्रयोग में लाना है।
डॉ. आनन्द (1996) के शब्दों में इसमें वह बात शामिल है जिसकी सहायता से शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में सुधार
लाने का प्रयास किया जाता है।
से सम्बन्धित है जैसे अनुदेशात्मक उद्देश्यों को निर्धारित करना, अधिगम सम्बन्धी वातावरण की योजना बनाना,
शिक्षण एवं अधिगम सामग्री को तैयार करना, शिक्षण हेतु उपयुक्त युक्तियों तथा अधिगम के माध्यमों का चयन करना
एवं शिक्षण तथा अधिगम प्रणालियों का मूल्यांकन करना, इत्यादि।
एक समय था जब शैक्षिक तकनीकी का अर्थ केवल श्रव्य-दृश्य साधनों के शिक्षण से समझा जाता था। आज के
युग में शैक्षिक -तकनीकी अत्यन्त विस्तृत धारणा युक्त हो गयी है। अब शैक्षिक तकनीकी की धारणा का प्रयोग उन
सभी विधियों, प्रविधियों, व्यूह रचनाओं तथा यान्त्रिक उपकरणों की अभिव्यक्ति हेतु किया जा रहा है जिनका प्रयोग
शिक्षण एवं अधिगम की प्रभावशीलता में वृद्धि करने के लिये किया जाता है। शैक्षिक -तकनीकी, शैक्षिक एवं
शैक्षणिक प्रक्रियाओं को नियोजित करने, संगठित करने, अग्रसरित करने तथा उनके प्रभावों को भली-भाँति नियन्त्रित
करने के लिये एक सुव्यवस्थित तथा वैज्ञानिक प्रयास कहलाता है।
तकनीकी, विज्ञान पर आधारित एक ऐसा विषय है जिसका उद्देश्य शिक्षक, शिक्षण तथा छात्रें के कार्य को
निरन्तर सरल बनाना है। जिससे कि शिक्षा के ये तीनों अंग मिलकर भली-भाँति समायोजित रहें और अपने
उद्देश्यों की प्राप्ति में क्रमब( उपागमों के माध्यम से सक्षम और समर्थ रहें।
अदा, प्रदा तथा प्रक्रिया (Input, Output and Process) तीनों ही पहलुओं को ध्यान में रखना
चाहिए।
शैक्षिक तकनीकी की मान्यताएँ
- प्रत्येक मानव, मशीन की भाँति कार्य करता है अत: शिक्षा के क्षेत्र में मानव व्यवहार में परिमार्जन तथा
परिष्करण हेतु इसके वैज्ञानिक सिद्धांतो का सपफलतापूर्वक प्रयोग किया जा सकता है। - शिक्षण कला तथा विज्ञान दोनों ही है।
अत: शिक्षण का विश्लेषण किया जा सकता है तथा शिक्षण को इसके
छोटे-छोटे तथ्यों, तत्वों एवं अवयवों में विभाजित किया जा सकता है। पिफर बाद में इन तथ्यों, तत्वों एवं
अवयवों का भी गहन प्रेक्षण, निरीक्षण तथा अध्ययन सम्भव है। अत: शैक्षिक तकनीकी, वैज्ञानिक उपागमों
पर आधारित है।
शैक्षिक तकनीकी के प्रयोग को प्रभावित करने वाले कारक
- राजनैतिक कारक
- मनोवैज्ञानिक कारक
- शैक्षिक कारक
- आर्थिक कारक
- सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारक
1. राजनैतिक कारक –
किसी भी राष्ट्र में शैक्षिक तकनीकी का विकास अनेक कारकों
पर निर्भर रहता है। इन कारकों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है राजनैतिक कारक। राजनैतिक कारकों से तात्पर्य है वे कारक
जो राष्ट्र की राजनीतिक परिस्थितियों, राजनीतिक नीतियों तथा वैज्ञानिक अन्वेषणों एवं राजनीतिक उद्देश्यों की प्राप्ति
से सम्बन्धित होते हैं। देश में जो भी सरकार है उसकी नीति शैक्षिक तकनीकी के विकास के क्षेत्र में केसी है। यदि
शासन करने वाली पार्टी को लगता है कि किन्हीं तकनीकी विशेष के प्रयोग से उन्हें ज्यादा लाभ सम्भव है तो वह
उनके विकास के लिये भरपूर प्रयास करेगी।
का पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। टेलीविजन तथा दूरसंचार के क्षेत्र में छुपे अभिनव प्रयोगों में तथा उनके प्रचार-प्रसार में
राजनीतिक कारकों का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हाथ रहा है।
शिक्षालयों की रुचि, स्तर, प्रवृत्तियों आदि का समावेशन होता है। शिक्षकों की अभिप्रेरणा, सीखने-सिखाने की
इच्छा-शक्ति, ध्यान एवं रुचि आदि का प्रभाव मनोवैज्ञानिक कारकों के अन्तर्गत समावेशित होते हैं।
शिक्षकों एवं छात्रें की शैक्षिक तकनीकी में व्यक्तिगत रुचि, अभिरुचि, अभिवृत्ति एवं प्रयासों पर बहुत कुछ निर्भर
करता है। यदि शिक्षा के ये दोनों अंग शैक्षिक तकनीकी का नवीनतम ज्ञान एवं सूचनायें रखते हैं, उन्हें प्रयोग करने
के लिये उचित प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं, उनके उपयोग के लिये विभिन्न स्थानीय एवं अन्य स्रोतों का भरपूर लाभ
उठा सकते हैं तथा अपने विद्यालयों के परिवेश में सही प्रकार से उपयोग करने के लिये सहज स्थिति पाते हैं तो
शैक्षिक तकनीकी शिक्षा के विकास में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
सि( होते हैं। शैक्षिक कारकों में शिक्षकों की शिक्षा एवं प्रशिक्षण मुख्य कारक हैं। यदि शिक्षकों को शैक्षिक तकनीकी
के क्षेत्र में उचित स्तर का सुनियोजित प्रशिक्षण प्रदान किया जाये तो ये शिक्षक शैक्षिक तकनीकी के विकास में मील
के पत्थर सिद्ध हो सकते हैं। ये शिक्षक शैक्षिक तकनीकी के विभिन्न उपागमों का प्रयोग करने के लिये प्रयोगशाला
का कार्य करने में सक्षम हो सकते हैं। ये नवीन प्रयोग, परिष्करण तथा अन्वेषण का कार्य प्रभावशाली ढंग से कर
नवीन खोजों एवं नवीन आयामों को प्रभावशाली नेतृत्व एवं स्वस्थ दिशा देने में समर्थ हो सकती हैं।
भूमिका अदा करते हैं। किसी भी प्रयोग, अन्वेषण तथा खोज की रीढ़ ‘धन’ होता है। बिना समुचित धन के किसी
भी तकनीकी का विकास, प्रसार तथा प्रशिक्षण सम्भव नहीं।
शैक्षिक तकनीकी में श्रव्य-दृश्य साधनों तथा अन्य उपकरणों के लिये तथा शैक्षिक तकनीकी की प्रयोगशाला निर्माण
करने के लिये भी आख्रथक अनुदान चाहिये। बिना अर्थ के न तो उपकरण खरीदे जा सकते हैं और न ही प्रयोग हो
सकते हैं और न ही किसी प्रकार के परिष्करण व अन्वेषण का कार्य सम्भव है।
दर्पण है। जैसा समाज होगा, जैसी संस्कृति होगी वैसी ही वहाँ की शिक्षा होगी। यदि समाज में शैक्षिक तकनीकी के
प्रति जागरूकता है, वांछित नेतृत्व का बोलबाला है तथा संस्कृति की नस-नस में तकनीकी का प्रभाव दृष्टिगोचर होता
है तो नि:संदेह शैक्षिक -तकनीकी के क्षेत्र में भी भविष्य उज्ज्वल रहेगा। तभी विद्यालय परिवेश को तकनीकी जामा
पहनाने के लिये समाज के लोगों का अभिभावकों का, तथा शिक्षा-विशेषज्ञों का दबाव पड़ेगा। फलस्वरूप शिक्षा के
मन्दिर में शैक्षिक तकनीकी अपनी प्रभावशाली भूमिका निभा सकेगी।
शैक्षिक तकनीकी की उपयोगिता
शैक्षिक तकनीकी की उपयोगिता आज दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। विश्व का प्रत्येक देश इसे अपना रहा है।
कोठारी कमीशन (1966) ने अपनी एक टिप्पणी में कहा है, फ्पिछले कुछ सालों में भारत के विद्यालयों में
कक्षा-अध्ययन को पिफर से जीवन-दान देने या उसे अनुप्राणित करने की प्रविधियों पर काफी ध्यान दिया गया है।
बुनियादी शिक्षा का पहला उद्देश्य प्राइमरी स्वूफलों के सारे जीवन और कार्य-कलापों में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाना एवं
बच्चे के मन, शरीर तथा आत्मा का सर्वोत्तम तथा सर्वांगीण विकास करना था। इस दृष्टि से भी शैक्षिक तकनीकी
का अपना महत्त्व स्वयंसिद्ध है।
अधिगम सिद्धांतों की जगह शिक्षण सिद्धांतों को उचित महत्त्व प्रदान करने वाली विषय-वस्तु शैक्षिक तकनीकी ही
है। शैक्षिक तकनीकी की उपयोगिता को निम्नांकित भाँति अधिक सरलता से प्रस्तुत किया जा सकता है
(1) शिक्षक के लिए उपयोगिता (Utility for a Teacher) ‘शैक्षिक तकनीकी’ पर अधिकार रखने वाला
शिक्षक अपने छात्रें के व्यवहारों का अध्ययन कर सकता है, समझ सकता है और उनमें वांछित सुधार लाने का प्रयत्न
कर सकता है। शिक्षक को विषय-वस्तु के साथ-साथ व्यवहार, अध्ययन और व्यवहार सुधार की प्रणालियों का ज्ञान
भी होना चाहिए। शैक्षिक तकनीकी इस क्षेत्र में शिक्षक को समर्थ बनाती है।
उपागमों, शिक्षण व्यूह रचनाओं तथा शिक्षण विधियों के विषय में वैज्ञानिक ज्ञान प्रदान करती है। किस समय, किस
प्रकरण को स्पष्ट करने के लिए कौन-सी श्रव्य-दृश्य सामग्री का प्रयोग किया जाय, रेडियो, टेलीविजन का उपयोग
कर किस प्रकार से रेडियो विजन तथा केसेट विजन का प्रयोग किया जाये तथा छात्रें को अपने सीखने की गति
के अनुसार अध्ययन करने के लिए केसे अभिक्रमित अध्ययन सामग्री तैयार की जाय यह शैक्षिक तकनीकी ही
शिक्षक को बताती है।
सीमुलेटेड टीचिंग तथा टी. ट्रेनिंग आदि नवीन विधियों का प्रयोग करने के लिए शैक्षिक तकनीकी दिशा निर्देश प्रदान
करती है।
शिक्षक अपनी शैक्षिक प्रशासन तथा प्रबन्ध से सम्बन्धित समस्याओं का अध्ययन करने के लिए ‘प्रणाली उपागम’
(Systems Approach) का प्रयोग कर सकता है। वह कक्षा में व्यक्तिगत भिन्नताओं (Individual Differences)
की समस्या के समाधान के रूप में अभिक्रमित अनुदेशन का उपयोग कर सकता है। ¯सह तथा वुफलश्रेष्ठ (1980)
ने ठीक ही लिखा है “The teacher needs educational technology to bridge the lives of the
children, aims of education and psychology in the present technological era.”
सच तो यह है कि शिक्षक का कोई भी कार्य हो चाहे पाठ-योजना बनाने का, शिक्षण बिन्दुओं के चयन का, पढ़ाने
की अच्छी विधियों को चुनने का या छात्रें को समझने का अथवा अपनी शिक्षण समस्याओं को सुलझाने का और
अपने शिक्षण व्यवसाय को एक व्यवसाय के रूप में विकसित करने का शैक्षिक तकनीकी, शिक्षक को प्रत्येक पद
पर, प्रत्येक पहलू पर तथा प्रत्येक बिन्दु पर निर्देशन देती है और उसकी पूर्ण रूप से सहायता करती है। आज के
युग में शिक्षक बिना ‘शैक्षिक तकनीकी’ का सहारा लिये एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता।
(2) सीखने के क्षेत्र में उपयोगिता (Utility of Educational Technology in Learning) शैक्षिक
तकनीकी हमें सीखने की प्रभावपूर्ण विधियों तथा सिंद्धांतो का ज्ञान प्रदान करती है, सीखी हुई विषय-वस्तु को
स्थायी करने की विभिन्न प्रक्रियाओं का अध्ययन करती है और छात्रें में सीखने के प्रति प्रेरणा जाग्रत करने में तथा
उनकी रुचि बनाये रखने में सहायता करती है सीखने के क्षेत्र में छात्रें को उनकी गति के अनुसार ही सीखने के सिद्धांत का पालन करती है। शैक्षिक तकनीकी सीखने और सिखाने दोनों ही प्रक्रियाओं का वैज्ञानिक विवेचन कर
शिक्षण अधिगम व्यवस्था बनाये रखती है। शिक्षण के नये प्रतिमानों की देन शैक्षिक तकनीकी की ही है जो हमें
अधिगम और शिक्षण के स्वरूप को भली-भाँति समझाते हैं। इस प्रकार शैक्षिक तकनीकी सीखने और सिखाने की
प्रक्रिया को अधिक प्रभावशाली तथा सार्थक बनाने में शिक्षक तथा शिक्षार्थी एवं प्रशिक्षणार्थी सभी के लिए उपयोगी
बनायी जा सकती है।
(3) समाज के लिए उपयोगिता (Utility to Society) गैरीसन (Garrison) आदि द्वारा शिक्षा-मनोविज्ञान
के सन्दर्भ में कहे गये शब्द शैक्षिक तकनीकी पर भी लागू होते हैं We know in advance if we
are……..(educational technologists), that certain methods will be wrong. Therefore they
save us from mistakes and clarifies human motives and thus makes it possible to
achieve understanding among individuals and groups (teaching and learning).
समाज में आज जनसाधारण के पास से रेडियो, ट्राँजिस्टर, टेपरिकॉर्डर आदि की सुविधायें हैं, उनका उपयोग शैक्षिक
तकनीकी के माध्यम से शिक्षा के क्षेत्र में किया जा सकता है।
जनसाधारण के ज्ञानात्मक, प्रभावात्मक तथा मनोगत्यात्मक पक्षों का उचित विकास करती है। सीमित संसाधन
(Resources) वाले देशों के लिए शैक्षिक तकनीकी ऐसी प्रविधियों का वरदान देती है जिनकी मदद से जन-शिक्षा
(Mass education) का प्रचार, प्रसार तथा विस्तार होता है। शैक्षिक तकनीकी के माध्यम से एक प्रभावशाली
शिक्षक, नेता या समाज-सुधारक के ज्ञान तथा कौशल का उपयोग, टेलीविजन, टेप तथा रेडियो, अभिभाषण आदि
के द्वारा समाज के प्रत्येक वर्ग तथा प्रत्येक भाग तक सरलता से पहुँचाया जा सकता है।
अत: कहा जा सकता है कि शैक्षिक तकनीकी आज के तकनीकी युग में शिक्षक की उपादेयता बढ़ाती है,
छात्रें व छात्रध्यापकों को प्रभावशाली विधि से सिखाती है और समाज के लिए ज्ञान के संचयन, प्रचार,
प्रसार तथा विकास के लिए अत्यन्त उपयोगी है।