अनुक्रम
- व्यवसाय के लिए स्थार्इ सम्पत्ति क्रय करने के लिए जिससे कि वह अपनी व्यवसायिक क्रियाकलाप कर सके ।
- दैनिक व्यय का भुगतान- व्यवसाय मे कर्इ प्रकार के व्यय होते है जैसे कच्चा माल, परिवहन, मजदूरी, ढुलार्इ, किराया, डाकतार टेलिफोन आदि के लिए धन की आवश्कता पड़ती हैं।
- व्यवसाय का विकास- आधुनिक समय मे नर्इ तकनिकी की सामग्री अथवा उपकरण मशीन क्रय हेतु धन की आवश्यकता पड़ती है।
- उत्पादन एवं विक्रय अथवा विक्रय एवं भुगतान में कुछ समय का अन्तराल होता है किन्तु व्यय तो निरन्तर चालू रहते हैं इसके लिए धन की आवश्यकता होती हैं।
- आकस्मिक व्ययों की पूर्ति हेतु कुछ तत्व ऐसे होते हैं जो आकस्मिक आ जाते है। जैसे मशीन चलते चलते अचानक खराब हो गर्इ विशेषज्ञ को बुलाकर ठीक करवाने में हमे उसे फीस देती होगी इसके लिए धन की आवश्यकता पड़ती है।
व्यवसायिक वित्त का महत्व-
वित्त व्यवसाय का एक महत्वपूर्ण अंग है इसे व्यवसाय की जीवन-रेखा भी कह सकते है वित्त का महत्व निम्नलिखित कारणों से बढ़ गया है-
- बड़े़ पैमाने के क्रियाओं की आवश्कता-आजका समय प्रतियोगिता का समय है आज समस्त विश्व एक बड़ा बाजार बन गया है आरै इस बाजार में बने रहने के लिए बडे़ पैमाने पर व्यापार करना पडत़ ा है इसके लिए एक बड़ी धनराशि की आवश्यकता होती है।
- आधुनिक प्रौद्योगिकी का प्रयोग- आपका वही व्यापार या उत्पाद की वस्तुएँ एवं सेवाएँ बाजार मे उपलब्ध रहती है जो नर्इ तकनिकी को प्रयाग करके बाजार में आया है नर्इ तकनीकी की वस्तुए बाजार में उपलब्ध करने के लिए नर्इ तकनीकि की मशीन एवं प्रशिक्षण प्राप्त कर्मचारी की आवश्यकता होती है और इसके लिए बड़ी मात्रा मे धन व्यय करना पड़ता है।
- विक्रय संवर्धन-प्रतिस्पर्धा के भाग में उत्पादक अपनी वस्तुओं को बाजार में विक्रय करने के लिए एक बड़ी मात्रा में विज्ञापन, व्यक्तिगत बिक्री एवं कमीशन एजेण्ट की नियुक्ति करता है जिसके लिए विशाल धनराशि की आवश्यकता पड़ती है।
व्यावसायिक वित्त के प्रकार-
व्यवसायिक क्रिया का महत्वपूर्ण अंग है धन व्यापार छोटा हो या बड़ा धन की आवश्यकता पडती है व्यापारिक इकार्इ हो या उत्पादक इकार्इ सभी क्षेत्र में धन आवश्यक है अन्तर केवल इतना है कि उत्पादन इकार्इ वाले व्यापार के लिए ज्यादा धन की आवश्यकता पड़ती तो व्यापारिक क्रियाओं के कम इसके लिए व्यवसायिक अपने वित्त की आवश्कता को तीन भागों मे बाटता है-
- अल्पकालीन वित्त-दिन प्रतिदिन के दैनिक व्ययो का भुगतान करने हेतु जैस, मजदूरी, ढुलार्इ, डाकतार अखबार का वित्त आदि संक्षेप में हम कह सकते है कि अल्पकालीन वित्त एक वर्ष के अन्तराल वाली प्रवृति होती है।
- मध्यकालीन वित्त-यह वित्त उन उद्देश्यों को पूरा करता है जो कम से कम एक वर्ष एवं अधिक से अधिक 5 वर्षों के लिए विनियोग होता है।
- दीर्घकालीन वित्त-पांच वर्ष से अधिक अवधि की धनराशि की आवश्यकता पडने पर इसे दीर्घकालीन वित्त कहते हैं इसको व्यवसाय की स्थार्इ सम्पत्ति के लिए व्यय किया जाता है जैसे- मशीनरी, फर्नीचर, प्लांट, भूमि व भवन इत्यादि क्रय करना है।
वित्त के स्त्रोत-
वित्त के स्त्रोत अर्थात धन प्राप्ति के स्त्रोत व्यवसाय में 2 बतलाये गये हैं-
- व्यापारी की खुद की पूंजी जिससे वह व्यापार करता है। एवं लाभ-हानि स्वयं पाता हैं उस लाभ हानि एक एक भाग अपने पास रखकर एक भाग व्यापार मे पूर्व: लगा देता है आन्तरिक स्त्रोत के अन्तर्गत आता है।
- बाह्य स्त्रोत के अन्तर्गत साहूकार बैंक, ग्राहक, विक्रेता, वित्तीय संस्थाएँ आदि से ऋर्ण लेकर व्यापार करना बाह्य स्त्रोत के अन्तर्गत आता है।
अल्पकालीन वित्त एकत्र करने की विधियॉ-
1. व्यापारिक वित्त-
वितरको द्वारा विनिर्माताओं एवं व्यापारियों को कच्चामाल मशीन के पूर्जे आदि उधार विक्रय मे दी जाने वाली सुविधाएं ही व्यापारिक साख होती है यह आपूर्तिकर्ता द्धारा धन प्रदान करने के समान ही है।
2. बैक साख-
व्यापारिक बैक भी अल्पकालीन ऋण व्यापारिक वर्गो को प्रदान करती है बैक साख निम्न प्रकार का है।
- ऋण एवं अग्रिम-जब कोर्इ राशि निश्चित अवधि की समाप्ति के पूर्व भुगतान करने का वचन व्यापारिक वर्ग द्वारा दिया जाता है तो यह बैंक ऋण कहलाता है यह ऋण पृथक ऋण खाता खोल कर दिया जाता है व्यापारी अपनी आवश्यकतानुसार ऋण की राशि अपने ऋण खाते से निकाल सकता है।
- नकद साख-जब बैंक किसी व्यापारी को उसके निर्मित माल के स्टॉक वचन पत्र, प्रतिभूतियों या सरकारी बाण्डों के आधार पर उधार देती है तो उसे नकद साख कहते है।
- बैंक अधिविकर्ष-व्यापारी के खाते में जमा राशि से अधिक रकम निकालने की अनुमति बैंक द्वारा दिया जाता है तो इस अतिरिक्त राशि को अधिविकर्ष कहते हैं। यह एक अल्पकालीन ऋण है।
- बिलों को बट्ठे पर भुनाना-बैंक विनिमय विपत्रों को समय से पूर्व बट्ठे पर भुनाकर व्यापारी को धन उपलब्ध कराती है देयतिथि पर बिल का भुगतान बैंक द्वारा ले लिया जाता है
3. अढ़ती कार्य-
इस कार्य मे व्यवसाय अपने देनदार से राशि वसूलने का कार्य बैंक को दे देती है और देनदार से वसूलने वाली राशि को बैंक से व्यापारी अग्रिम के रूप में प्राप्त कर सकता है।
4. ग्राहकों से अग्रिम-
जब व्यवसायी अपने ग्राहक से किसी उत्पाद की पूर्ति हेतु अग्रिम की रूप में कोर्इ राशि प्राप्त करता हैं तो वह ग्राहक से अग्रिम होता है ग्राहक से अग्रिम रूप में प्राप्त की गर्इ राशि उत्पाद के मूल्य का एक भाग होता है।
नकद साख औैर बैंक अधिविकर्ष मे अंतर
- बैंक द्वारा किसी फर्म को दिए जाने वाले ऋण के लिए नकद साख एक व्यवस्था है फर्म का बैंक में खाता हो अथवा नहीं किसी भी खाताधारी को केवल उसकी क्षमता के आधार पर ही बैंक अधिविकर्ष दिया जाता है यह क्षमता बैंक के साथ ग्राहक की वित्तीय स्थिति और उसके विगत व्यवहार के आधार पर तय की जाती हैं।
- नकद साख की स्थिति मे ऋण की राशि ऋणकर्ता के अलग खाते में जमा की जाती है बैंक अधिविकर्ष की सीमा ग्राहक के वर्तमान खाते में जमा राशि से एक निश्चित सीमा तक अधिक राशि निकालने की सुविधा प्रदान की जाती है।
- नकद साख के मामले में ऋण की राशि प्रस्तुत प्रतिभूतियों के मूल्य के आधार पर निश्चित की जाती है लेकिन बैंक अधिविकर्ष की सीमा ग्राहक के खाते में औसत जमा राशि के आधार पर निश्चित की जाती है।
- अधिविकर्ष बिना किसी प्रतिभूतियों के स्वीकृत किया जाता है लेकिन नकद साख के लिए मूर्त परिसंपतियों का प्रस्तुतीकरण आवश्यक है।
साख प्राप्त करने के लिए अपेक्षित प्रतिभूतियां
- चल या अचल सम्पत्ति
- अंश पत्र
- माल के स्वामित्व का दस्तावेज
- स्थार्इ जमा की रसीद
- जीवन बीमा पॉलिसी
- आभूषण या मूल्यवान वस्तुएं
दीर्घकालीन ऋण प्राप्त करने की विधियां-
1. अंशो का निर्गमन-
अंश किसी कंपनी की वह इकार्इ हैं जिसमें उसकी पूंजी विभाजित होती है अंशों का निर्गमन कम्पनी द्धारा किया जाता है और यह दो प्रकार का होता हैं-
- समता अंश-जब किसी अंशधारी को लाभांश का भुगतान या पूंजी का भुगतान का पूर्वाधिकार प्राप्त नही रहता, समता अंश है समता अंशधारियों को लाभांश या अंश पूंजी के मूल्य का भुगतान समापन की दशा में दूसरे दावों के बाद किया जाता है।
- पूर्वाधिकारी अंश,-पूर्वाधिकारी अंश वह अंश है जिन्हें लाभांश या पूंजी वापसी का अधिकार समता अंश से पहले है पूर्वाधिकारी का अधिकार समता अंश से पहले है पूर्वाधिकारी अंशधारी के पास मताधिकार नही होता कम्पनी के प्रबंध में भाग नहीं ले सकते।
पूर्वाधकारी अंशधारी के प्रकार है-
- परिवर्तनीय एवं अपरिवर्तनीय पूर्वाधिकार अंश-जिनसे पूर्वाधिकारी अंशों को समता अंशों मे बदला जा सकता है वह परिवर्तनीय है और जिन्हें नही बदला जा सकता वह अपिवर्तनीय अंश होते हैं।
- संचयी एवं असंची पूर्वाधिकार अंश- कम्पनी को हानि की दशा में संचयी पूर्वाधिकारी का लाभांश अगले वर्ष ले जाया जा सकता है असंचयी को हानि की दशा में लाभांश वितरित नहीं किया जाता।
- भागीदारी और गैर भागीदारी पूर्वाधिकारी अंश- पूर्वाधिकारी अंशधारी को जब लाभांश में हिस्सा दिया जाता है तो भागीदारी पूर्वाधिकारी अंशधारी कहलाते हैं एवं जिन्हे अधिकार नहीं होता वह गैर भागीदारी पूर्वाधिकारी अंशधारी हैं।
- शोधनीय एवं अशोधनीय पूर्वाधिकारी अंशधारी- ऐसे पूर्वाधिकारी अंशधारी जिनका भुगतान निश्चित तिथि पर होते हैं शोधनीय पूर्वाधिकारी अंशधारी है जिन पूर्वाधिकारी को कम्पनी के समापन के समय भुगतान होता हैं वे अशोधनीय पूर्वाधिकारी अंश धारी होते है।