अनुक्रम
मानवीय क्रियाएं
वे सभी क्रियाएं जो मनुष्य अपनी आवश्यकता या इच्छा की संतुष्टि के लिए करता है, मानवीय क्रियाएँ कहलाती है।
हम प्रतिदिन कोर्इ न कोर्इ क्रिया अवश्य करते है, जैसे खेती करना, खाना पकाना, फुटबाल खेलना, विद्यालय में पढ़ना, दफ्तर में कार्य करना, व्यायाम करना, कहानी की किताब पढ़ना, गीत गाना आदि। ये सभी क्रियाएँ हम अपनी किसी न किसी आवश्यकता या इच्छा की संतुष्टि के लिए करते हैं। इन सभी क्रियाओं को हम मानवीय क्रियाएँ तो कह सकत े हैं परंतु इन क्रियाओं के उद्देश्य एवं अंतिम परिणामों का अध्ययन करने पर हम इनमें विभिन्नता पाते है। उदाहरण के लिए-पढ़ाने की क्रिया को ही लें-एक शिक्षक विद्यालय में छात्रों को पढ़ाता है और दूसरी ओर एक पिता घर में अपने बच्चों को पढ़ाता है। यहां हम पाएंगे कि शिक्षक एवं पिता द्वारा पढा़ने के उद्दश्े य एवं अंतिम परिणाम अलग-अलग हैं। एक शिक्षक का विद्यालय में छात्रों को पढ़ाना धनोपार्जन हैं जबकि दूसरी स्थिति में एक पिता का अपने बच्चों को पढ़ाना पारिवारिक जिम्मेदारी, बच्चा ें का पालन पोषण या स्वयं की संतुष्टि है।
मानवीय क्रियाएं ,जो धनोपार्जन के लिए की जाती हैं, आर्थिक क्रियाएं कहलाती है- जैसे : किसान द्वारा खेती करना, मजदूर का कारखाने में काम करना, व्यापारी द्वारा वस्तुओं का क्रय-विक्रय करना। अन्य क्रियाएं, जिनका उद्ेदश्य धनोपार्जन नहीं होता अथवा जो स्वयं की संतुष्टि के लिए की जाती है, अनार्थिक क्रियाएँ कहलाती है, जैसे- संगीत सुनना, घर के लिए वस्तुए खरीदना, माँ का अपने बच्चों के लिए भोजन पकाना, गरीब बच्वों की सहायता के लिए कोर्इ कार्यक्रम करना आदि।
आर्थिक क्रियाओं का वर्गीकरण
आर्थिक क्रियाओं के अनेक प्रकार हो सकते हैं। आर्थिक क्रिया मनुष्य द्वारा एक बार भी जा सकती है या फिर निरंतर भी। उदाहरण के लिए, यदि हम बिजली के उपकरणों की जानकारी रखते है और उन्हें सुधारना भी जानते हैं। किसी के विद्युत पंखे या कूलर को सुधारने के प्रतिफल में यदि हमे कुछ रूपये मिल जाते हैं तो यह एक आर्थिक क्रिया है जो एक बार की गर्इ है। जब यह क्रिया हम निरन्तर करने लगते हैं और माैि द्रक आय अर्जित करने लगते हैं तो हमारी इस क्रिया को धंधा कहा जायगे ा। वास्तव में पत््र येक व्यक्ति किसी न किसी धंधों में लगा हैं। धंधों को निम्न वर्गो में बांटा जा सकता है-
- पेशा
- रोजगार
- व्यवसाय
आइये, इनके बारे में कुछ विस्तृत अध्ययन करें।
(क) पेशा
एक इंजीनियर किसी भवन का नक्शा, उसकी लागत का अनुमान लगाने, निर्माण कार्य का निरीक्षण करने और मूल्यांकन करने में दक्ष होता है और विशिष्ट ज्ञान रखता है और इस कार्य हेतु वह फीस लेता है। एक डाक्टर, मरीजों की जांच करने, उनकी बीमारी का पता लगाने और इलाज करने हेतु विशिष्ट ज्ञान एवं प्रशिक्षण प्राप्त होता है, इन सभी कार्यो के लिए वह अपने मरीजों से फीस लेता है। इसी प्रकार हम अपने आस-पास देखें तो पाएगें कि चार्टर्ड एकाउण्टेण्ट, वास्तुकार, फिल्म अभिनेता, नर्तक, कलाकार आदि बहुत से लोग है जो अपने-अपने क्षेत्रों में विशिष्ट ज्ञान एवं प्रशिक्षण प्राप्त करके लोगों को अपनी सेवायें देते है और धनोपार्जन करते है। ये सभी पेशेवर व्यक्ति कहलाते हैं तथा जिन क्रियाओं को ये करते है उन्हें पेशा कहा जाता है।
इस प्रकार निष्कर्ष में हम कह कहते हैं कि ‘‘किसी व्यक्ति द्वारा जीविकोपार्जन के लिए की गर्इ कोर्इ भी क्रिया, जिसमें विशिष्ट ज्ञान एवं दक्षता के प्रयोग की आवश्यकता हो, पेशा कहलाती है। पेशे की अवधारणा को स्पष्ट करने इसके कुछ आधारभूत लक्षण इस प्रकार है-
- पेशा वह धंधा है जिसके लिए व्यक्ति को विशिष्ट ज्ञान एवं दक्षता प्राप्त करने की आवश्यकता होती है।
- इस प्रकार की सेवाओं के प्रतिफल के रूप में जो राशि उन्हें प्राप्त होती है, उसे ‘फीस’ कहते हैं।
- अधिकांश पेशेवर लोगों का विनियमन एवं पेशेवर संस्थान द्वारा किया जाता है। जो उस आचार संहिता को बनाती है जिसका पालन पेशे के सदस्य करते हैं। उदाहरण के लिए भारत में चार्टर्ड अकाउन्टैंट्स का विनियमन भारतीय चार्टर्ड अकाउन्टैंट्स संस्थान के द्वारा, क्रिकेट खिलाड़ियों का अन्र्तराष्ट्रीय परिषद् अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद् द्वारा होता है।
- अधिकांशत: पेशेवर लोग महाविद्यालय, विश्वविद्यालय अथवा विशिष्ट संस्थानों से विशिष्ट ज्ञान का अर्जन करते हैं। कुछ स्थितियों में लोग इस प्रकार का ज्ञान एवं कौशल प्रशिक्षण द्वारा या उस क्षेत्र के विशेषज्ञ से प्िर शक्षण प्राप्त करके करते हैं: जैसे कि नर्तक, संगीतज्ञ आदि।
- पेशेवर लागे सामान्यत: अकेले कार्य करते हैं, आरै अपनी सेवाओ के प्रतिफल के रूप में फीस लेते हैं तथा पेशारत कहलाते हैं। कुछ पेशेवर लोग ऐसे भी हैं जो संगठनों में कर्मचारी अथवा सलाहकार के रूप में कार्य करते हैं।
- यद्यपि सभी पेशेवर लोग फीस लेते हैं लेकिन फिर भी उनका मूल उद्देश्य सेवा प्रदान करना है। उन्हें अपने इस विशिष्ट ज्ञान का प्रयोग करके लोगों का शोषण नहीं करना चाहिए। वह सभी आर्थिक क्रियाएं जिनमें पेशेवर लोग प्रशिक्षण एवं दक्षता के आधार पर विशेषतापूर्ण एवं विशिष्ट प्रकृति की व्यक्तिगत सेवाएं प्रदान करते हैं तथा जिनमें कछु नियमों (आचार संहिता) का पालन करना होता है पेशा कहलाती हैं।
(ख) रोजगार
हम प्रतिदिन काम करने के लिए शिक्षक, क्लर्क, अधिकारी, नर्स, डाकिया, मजदूर को जाते हुए देखते हैं और कहते है कि ये सभी अपने रोजगार में जा रहे है। एक डाकिया पत्र बाँटता है और यही उसका रोजगार है। जिसमें डाक विभाग नियोक्ता है और डाकिया उसका ‘कर्मचारी’। डाकिया कुछ शर्तो के अंतर्गत कार्य करता है और प्रतिफल के रूप में उसे वेतन प्राप्त होता है। इस प्रकार हम कहते हैं कि ‘‘जब एक व्यक्ति दूसरों के लिए निरंतर कार्य करता है और प्रतिफल के रूप में मजदूरी/वेतन प्राप्त करता है, रोजगार में लगा हुआ कहलाता है। रोजगार के प्रमुख लक्षण इस प्र्रकार है-
- यह एक ऐसा धंधा है जिसमें एक व्यक्ति (कर्मचारी) दूसरे व्यक्ति (नियोक्ता) के लिए कार्य करता है।
- कार्य करने की कुछ शर्ते होती हैं जैसे कार्य के घंटे (एक दिन में कितने घंटे), कार्य की अवधि (सप्ताह अथवा महीने आदि में कितने दिन अथवा कितने घंटे), छुट्टियों की सुविधा, वेतन/मजदूरी, कार्य-स्थान आदि।
- कर्मचारियों को उनके कार्य के प्रतिफल के रूप में वेतन (सामान्यत: जिसका भुगतान प्रति माह किया जाता हैं) अथवा मजदूरी (सामान्यत: जिसका भुगतान प्रतिदिन/साप्ताहिक किया जाता है) प्राप्त होती है। यह राशि साधारणतया पूर्वनिर्धारित होती है, पारस्परिक सहमति से तय होती है तथा समय-समय पर बढ़ती रहती है।
- कानूनी रूप से नियोक्ता एवं कर्मचारी का संबंध ठेके अथवा अनुबंध पर आधारित होता है तथा दोनों पक्षों में से किसी भी पक्ष द्वारा शर्त उलंघन करने पर दूसरे पक्ष को कानूनी कार्यवाही का अधिकार होता है।
- कुछ रोजगार ऐसे होते हैं जिनके लिए किसी तकनीकी शिक्षा अथवा विशिष्ट दक्षता की आवश्यकता नहीं होती। लेकिन कुछ रोजगार कौशल, विशिष्टिता एवं तकनीकी अपेक्षित होत े हैं जिनके लिए एक स्तर विशेष की मूलभूत तकनीकी शिक्षा की आवश्यकता होती है।
- रोजगार का उद्देश्य मजदूरी एवं वेतन के रूप में निश्चित आय प्राप्त करना है। एक ऐसी आर्थिक क्रिया, जिसे एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के लिए, निश्चित प्रतिफल के बदले, सेवा अनुबंध के अंतर्गत करता है, रोजगार कहलाती है।
(ग) व्यवसाय
व्यवसाय अंग्रेजी भाषा के ठनेपदमे (बिज्-निस) का हिदीं समानाथ्र्ाी शब्द है। अंग्रेजी में इसका आशय है, ‘किसी कार्य में व्यस्त रहना: अत: हिदीं में व्यस्त रहने की अवस्था के अर्थवाले ‘व्यवसाय’ शब्द का चयन किया गया। इस प्रकार व्यवसाय का शाब्दिक अर्थ हैं- किसी न किसी आर्थिक क्रिया में व्यस्त रहना। आपने टाटा कम्पनी समूह के बारे में तो सुना ही होगा। वे नमक से लेकर ट्रक एवं बसों तक बहुत सी वस्तुओं का उत्पादन करते हैं और उन्हें हम और आप जैसे लोगों को बेचते हैं. इस प्रक्रिया में वे लाभ कमाते है. जरा अपने पास के दुकानदार पर नजर डालें. वह क्या करता है ? वह बड़ी मात्रा में माल खरीदता है उन्हें छोटी-छोटी मात्रा में बेचता है। वह इस प्रक्रिया में लाभ कमाता है। व्यवसाय में लगे हुए ये सभी व्यक्ति व्यवसायी कहलाते हैं। ये सभी अपनी क्रियाएं लाभ कमाने के लिए नियमित रूप से करते हैं। अत: व्यवसाय की परिभाषा एक ऐसी आर्थिक क्रिया के रूप में दी जा सकती है जिनमें लाभ कमाने के उद्देश्य से वस्तुओं एवं सेवाओं का नियमित उत्पादन क्रय, विक्रय हस्तातंरण एवं विनिमय किया जाता है।
हम बहुत से व्यवसायी जैसे केबल आपरेटर, कारखाना- मालिक, परिवहनकर्ता, बैकर, दर्जी, टैक्सी चालक आदि को क्रय-विक्रय करते अथवा सेवा प्रदान करते देखते हैं। इन्होंनें कुछ राशि का निवेश किया है, ये जोखिम उठाते हैं और लाभ कमाने के उद्देश्य से कार्य करते है। अत: व्यवसाय की प्रमुख विशेषताएँ हैं-
- यह एक ऐसा धंधा है जिसमें व्यक्ति वस्तुओं एवं सेवाओं के विनिर्माण अथवा क्रय-विक्रय में लगा रहता है। यह वस्तुएं उपभोक्ता वस्तुएं अथवा पूंजीगत वस्तुएं हो सकती है। इसी प्रकार सेवाएं परिवहन, बैकिंग, बीमा आदि के रूप में हो सकती है।
- इसमें क्रियाएं नियमित रूप से की जाती है। एक अकेला लेन-देन व्यवसाय नहीं कहलाता। उदाहरण के लिए यदि कोर्इ व्यक्ति अपनी पुरानी कार को लाभ पर बेचता है तो हम इसे व्यावसायिक क्रिया नहीं कहेंगें। लेकिन यदि वह नियमित रूप से पुरानी कारों का क्रय कर उन्हें बेचने का कार्य करता है तो हम कहेंगे कि वह व्यवसाय में लगा है।
- व्यवसाय का एकमात्र उद्देश्य लाभ कमाना है। यह व्यवसाय के अस्तित्व में रहने के लिए अनिवार्य है। हां, यह अवश्य है कि यह वस्तुएं एवं सेवाएं प्रदान करके ही किया जाता है।
- सभी व्यवसायों के लिए कुछ न कुछ पूंजी की आवश्यकता होती है जो रोकड़ अथवा सम्पत्ति अथवा दोनों के रूप में हो सकती है। इसे साधारणतया स्वामी द्वारा उपलब्ध कराया जाता है अथवा स्वामी अपने जोखिम पर उधार लेता है।
- व्यवसाय में आय सदैव अनिश्चित होती है क्योकि भविष्य अनिश्चित है तथा कुछ ऐसे तत्व हैं जो आय को प्रभावित करते हैं और जिन पर व्यवसायी का कोर्इ वश नहीं है। इस प्रकार प्रत्येक व्यवसाय में जोखिम का तत्व होता है और इसे व्यवसायी अर्थात स्वामी को वहन करना होता है।