अनुक्रम
हम बहुत से व्यवसायी जैसे केबल आपरेटर, कारखाना- मालिक, परिवहनकर्ता, बैकर, दर्जी, टैक्सी चालक आदि को क्रय-विक्रय करते अथवा सेवा प्रदान करते देखते हैं। इन्होंनें कुछ राशि का निवेश किया है, ये जोखिम उठाते हैं और लाभ कमाने के उद्देश्य से कार्य करते है। अत: व्यवसाय की प्रमुख विशेषताएँ हैं-
- यह एक ऐसा धंधा है जिसमें व्यक्ति वस्तुओं एवं सेवाओं के विनिर्माण अथवा क्रय-विक्रय में लगा रहता है। यह वस्तुएं उपभोक्ता वस्तुएं अथवा पूंजीगत वस्तुएं हो सकती है। इसी प्रकार सेवाएं परिवहन, बैकिंग, बीमा आदि के रूप में हो सकती है।
- इसमें क्रियाएं नियमित रूप से की जाती है। एक अकेला लेन-देन व्यवसाय नहीं कहलाता। उदाहरण के लिए यदि कोर्इ व्यक्ति अपनी पुरानी कार को लाभ पर बेचता है तो हम इसे व्यावसायिक क्रिया नहीं कहेंगें। लेकिन यदि वह नियमित रूप से पुरानी कारों का क्रय कर उन्हें बेचने का कार्य करता है तो हम कहेंगे कि वह व्यवसाय में लगा है।
- व्यवसाय का एकमात्र उद्देश्य लाभ कमाना है। यह व्यवसाय के अस्तित्व में रहने के लिए अनिवार्य है। हां, यह अवश्य है कि यह वस्तुएं एवं सेवाएं प्रदान करके ही किया जाता है। (घ) सभी व्यवसायों के लिए कुछ न कुछ पूंजी की आवश्यकता होती है जो रोकड़ अथवा सम्पत्ति अथवा दोनों के रूप में हो सकती है। इसे साधारणतया स्वामी द्वारा उपलब्ध कराया जाता है अथवा स्वामी अपने जोखिम पर उधार लेता है।
- व्यवसाय में आय सदैव अनिश्चित हातेी है क्येिक भविष्य अनिश्चित है तथा कुछ ऐसे तत्व हैं जो आय को प्रभावित करते हैं और जिन पर व्यवसायी का कोर्इ वश नहीं है। इस प्रकार प्रत्येक व्यवसाय में जोखिम का तत्व होता है और इसे व्यवसायी अर्थात स्वामी को वहन करना होता है।
व्यवसाय का महत्व
आधुनिक युग में व्यवसाय किसी भी राष्ट्र की प्रगति का आधार माना जाता है। व्यवसाय आधुनिक समाज का एक अभिन्न अंग है। वाणिज्यशास्त्री व्हीलर के शब्दों में आज व्यवसाय का जीवन से इतना घनिष्ठ संबधं है कि मौसम की तरह व्यवसाय भी सदैव हमारे साथ रहता है।
- जीवन स्तर में सुधार- व्यवसाय उचित समय और उचित स्थान पर श्रेष्ठत्तर गुणवत्ता वाली विविध वस्तुओं और सेवाओं को उपलब्ध कराके लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाता है।
- रोजगार की प्राप्ति- यह कार्य करने और जीविकोपार्जन करने के अवसर प्रदान करता है। इस तरह इससे देश में रोजगार के अवसर उत्पन्न होते हैं जिससे गरीबी दूर होती है।
- प्राकृतिक संसाधनोंं का विदोहन- इससे राष्ट्र के सीमित संसाधनों का उपयोग होता है तथा वस्तुओं एवं सेवाओं के अधिक से अधिक उत्पादन में सहायता मिलती है.
- अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार मेंं वृद्धि- यह उत्तम किस्म की वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन तथा निर्यात द्वारा राष्ट्रीय छवि में सुधार लाता है. अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में मेलों तथा प्रदर्शनियों में भाग लेकर यह बाहर के देशों में हमारी प्रगति और उपलब्धियों का प्रदर्षन भी करता हैं।
- श्रेष्ठ वस्तुओं का उत्पादन-इससे देश के लोगों को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की गुणवत्ता वाली वस्तुएं प्रयोग करने का अवसर मिलता है। ऐसा विदेशो से वस्तुए आयात करके अथवा अपन े ही देश में आधुनिक तकनीक के उपयोग से श्रेष्ठ गुणवत्ता वाली वस्तुओं के उत्पादन द्वारा संभव है।
- पूंंजी निवेश को प्रोत्साहन-इससे निवेशकों को उनके पूँजी निवेश पर अच्छा प्रतिफल मिलता है और व्यवसाय को विकास तथा विस्तार के श्रेष्ठ अवसर प्राप्त होते हैं।
- सामाजिक एवं राष्ट्रीय एकता को बढ़ा़वा- पर्यटन सेवाओं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों के प्रायोजन, व्यापार प्रदर्षनी आदि के माध्यम से यह देश में सामाजिक हितों को बढ़ावा देता है। इससे देश के विभिन्न भागों में रहने वाले लोग एक दूसरे के साथ अपनी संस्कृति, परम्परा तथा आचार-विचारों का आदान-प्रदान कर पाते हैं। इस तरह इससे राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा मिलता है
- अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों मेंं मधुरता- यह भिन्न-भिन्न देशों के लोगों को अपनी संस्कृति के आदान प्रदान के अवसर भी प्रदान करता है। इस प्रकार यह अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग और शांति को बनाए रखने में मदद करता है।
- नवीन उत्पाद एवं सेवाओंं का विकास- यह विज्ञान तथा तकनीक के विकास में भी सहायक होता है। यह नए उत्पादों एवं सेवाओं की खोज में शोध एवं विकास कार्यो पर बहुत अधिक धन व्यय करता है। इस प्रकार औद्योगिक शोधों के परिणामस्वरूप अनके नवीन उत्पादों तथा सेवाओं का विकास होता है।
व्यवसाय के उद्देश्य
साधारणतया यह माना जाता हैं कि व्यवसाय का एकमात्र उद्देश्य है लाभ कमाना तथा अपने स्वामियों के हितों की रक्षा करना। परंतु ऐसा करने के लिए कोर्इ भी व्यवसाय अपने कर्मचारियों, ग्राहकों तथा समग्र समाज के हितों की अनदेखी नहीं कर सकता क्योकिं प्रत्येक व्यवसायी समाज का एक अहम हिस्सा होता है। अत: किसी भी व्यवसाय के आर्थिक उद्देष्यों के अतिरिक्त सामाजिक, मानवीय, राष्ट्रीय एवं वैिश्वक उद्देश्य भी होते हैं, जिनका वर्णन निम्नानुसार किया जा सकता है। 1. आर्थिक उद्देश्य 2. सामाजिक उद्देश्य 3. मानवीय उद्देश्य 4. राष्ट्रीय उद्देश्य 5. वैश्विक उद्देश्य।
1. आर्थिक उद्देश्य –
किसी भी व्यवसाय का प्रथम लक्ष्य लाभ कमाना होता है। व्यवसाय के प्रमुख आर्थिक उद्देश्य इस प्रकार है-
- पर्याप्त लाभ कमाना;
- नये बाजार ढूंढना एवं और अधिक ग्राहक बनाना;
- व्यवसायिक क्रियाओं का विकास एवं विस्तार;
- वस्तुओं एवं सेवाओं में नव-प्रवर्तन एवं सुधार करना;
- उपलब्ध संसाधनों का श्रेष्ठतम उपयोग करना;
2. सामाजिक उद्देश्य –
चुंकि व्यवसायी भी समाज का एक अंग होता है। अत: समाज के हित में व्यवसाय के कुछ सामाजिक उद्देश्य भी होते है जिनका वर्णन इस प्रकार किया जा सकता है।
- समाज के लिए अच्छी गुणवत्ता वाली वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन तथा आपूर्ति करना;
- वस्तुओं काे उचित मूल्य पर उपलब्ध कराना;
- जमाखोरी, काला बाजारी, अधिक मूल्य वसूलना आदि अनुचित व्यवहारों से बचाव;
- समाज के सामान्य कल्याण एवं उत्थान कार्यों मे योगदान देना;
- निवेशकों को उचित प्रतिफल सुनिश्चित करना;
- उपभोक्ता शिक्षण के लिए कदम उठाना;
- प्राकृतिक संसाधन एवं वन्य जीवन की सुरक्षा करना तथा पर्यावरण को संरक्षण प्रदान करना;
3. मानवीय उद्देश्य –
अपने कर्मचारियों के हितों की सुरक्षा और उनका कल्याण भी एक व्यवसायी की जिम्मेदारी होती है। इस तरह उनके प्रति व्यवसाय के मानवीय उद्देश्य अग्रांकित हैं-
- कर्मचारियों को उचित प्रतिफल एवं अभिप्रेरक प्रदान करना;
- कर्मचारियों के लिए बेहतर कार्य परिस्थितियां एवं उचित कार्य वातावरण की व्यवस्था करना;
- कार्य को रोचक एवं चुनौतीपूर्ण बनाकर एवं सही पद पर सही व्यक्ति की नियुक्ति कर कर्मचारियों को कार्य संतुष्टि प्रदान करना;
- कर्मचारियों को अधिक से अधिक उन्नति के अवसर प्रदान करना;
- कर्मचारियों के विकास के लिए प्रशिक्षण एवं विकास कार्यक्रमों की व्यवस्था करना एवं
- समाज के पिछड़े वर्गो एवं शारीरिक तथा मानसिक रूप से अक्षम लोगों को रोजगार देना;
4. राष्ट्रीय उद्धेश्य –
- रोजगार के अवसर पैदा करना;
- सामाजिक न्याय को बढ़ावा देना;
- राष्ट्रीय हित एवं प्राथमिकताओं के अनुरूप वस्तुओं का उत्पादन एवं उनकी आपूर्ति करना;
- कर एवं अन्य बकाया राशि का र्इमानदारी से एवं नियमित रूप से भुगतान करना;
- अच्छे आद्यैोगिक सम्बन्धों को बढ़ावा देकर राज्यों को काननू व्यवस्था बनाने मे मदद करना;
- समय समय पर सरकार द्वारा बनार्इ गर्इ आर्थिक एवं वित्तीय नीतियों को लागू करना;
5. वैश्विक उद्देश्य-
किसी भी राष्ट्र के व्यवसाय के स्तर से ही विश्व स्तर पर उसकी प्रतिष्ठा आंकी जाती है। व्यवसाय के वैश्विक उद्देश्य इस प्रकार है :-
- वैश्विक प्रतियोगी वस्तुओं एवं सेवाओं को उपलब्ध कराना, एवं
- अपनी व्यावसायिक क्रियाओं का विस्तार कर धनी एवं गरीब राष्ट्रों के बीच की असमानताओ को कम करना;
व्यापार के प्रकार
प्रचालन के आधार पर व्यापार को निम्न दो भागों में वर्गीकृत किया जा सकता हैं- 1. आन्तरिक व्यापार, एवं 2. बाह्य व्यापार
1. आन्तरिक व्यापार –
जब व्यापार एक देश की भौगोलिक सीमाओं के अन्दर होता है जो इसे आन्तरिक व्यापार कहते हैं। इस का अर्थ है कि क्रय एवं विक्रय दोनों एक ही देश के अन्दर हो रहे हैं। उदाहरण के लिए एक व्यापारी लुधियाना के निर्माताओं से बड़ी मात्रा मे ऊनी वस्त्र खरीदकर उन्हें दिल्ली के विक्रेताओं को थोड़ी-थोड़ी मात्रा मे बेच सकता हैं। इसी प्रकार से गांव का एक व्यापारी निर्माताओ से या शहर के बाजार से वस्तुओं का क्रय करके थोड़ी-थोड़ी मात्रा में गांव के लोगो को/उपभोक्ताओ को बेचता है। इन दो उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि आन्तरिक व्यापार दो प्रकार का हो सकता है (क) उत्पादक से बड़ी मात्रा मे कं ्रय करके विक्रेताओं को थोडी-थोड़ी मात्रा में बेचना (जिसे थोक व्यापार कहते हैं) अथवा (ख) उत्पादकों/विक्रेताओं से खरीदकर सीधे उपभोक्ताओं को बेचना (जिसे फुटकर व्यापार कहते हैं)।
2. बाह्य व्यापार –
विभिन्न देशों के व्यापारियों के बीच होने वाला व्यापार बाह्य व्यापार कहलाता है दूसरे शब्दे में बाह्य व्यापार किसी देश की सीमाओं के बाहर वस्तुओं/सेवाओं का क्रय अथवा विक्रय करना है यह किसी भी रूप मे हो सकता है-
- ‘अ’ देश की फर्में ‘ब’ देश की फमोर्ं से अपने देश में विक्रय के लिए माल का क्रय करती हैं। इसे आयात व्यापार कहते है।
- ‘अ’ देश की फर्में अपने देश मे उत्पादित वस्तुएं ‘ब’ देश की फर्मों को बेचते है इसे निर्यात व्यापार कहते हैं।
- ‘अ’ देश की फर्मे ‘ब’ देश की फर्मो से ‘स’ देश की फमोर्ं को बेचने के लिए माल क्रय करते है। इसे पुन: निर्यात व्यापार कहते हैं।