अनुक्रम
संधि का अर्थ है – मेल अथवा मेल-मिलाप। जब दो वर्ण इतना निकट आ जाएं कि एक दूसरे से अलग न रह सकें तब उनका मेल सन्धि कहलाता है।
विसर्ग संधि का अर्थ
जहाँ पर विसर्ग का लोप होता है और उसके स्थान पर कोई दूसरा वर्ण आ जाता है तो उसे विसर्ग संधि कहते हैं।
जैसेः
अतः + एव = अतएव
निः + चित = निश्चित
विसर्ग संधि किसे कहते हैं
निः + कलंक = निष्कलंक
निः + ठुर = निष्ठुरनिः + फल = निष्फलनिः+ कपट = निष्कपट
दुः + ट = दुष्ट
ले लेता है।
निः + संदेह = निःसंदेह, निस्संदेह
दुः + शासन = दुःशासन, दुश्शासन
रजः + कण = रजःकण; रजकण
4. यदि विसर्ग के पूर्व इ या उ हो और बाद में क, ख, प या ग हो तो विसर्ग ष, श में अथवा स में परिवर्तित हो जाता है।
दुः + कर्म = दुष्कर्म
निः + छल = निश्छल
5. विसर्ग के पूर्व अ, आ होने पर निम्न शब्दों में विसर्ग स् में परिवर्तित हो जाता है।
नमः + कार = नमस्कार
भाः + कर = भास्करपुरः + कार = पुरस्कार
दुः + उपयोग = दुरूपयोग निः + अर्थक = निरर्थकनिः + आशा = निराशा आशीः + वाद = आशीर्वाद
मनः + अनुकूल = मनोनुकूल
मनः + रथ = मनोरथयशः + दा = यशोदा
मनः + हर = मनोहर
8. विसर्ग के बाद र होने पर विसर्ग लुप्त हो जाता है तथा उसके पूर्व यदि हृस्व स्वर है तो वह दीर्घ हो जाता है।
निः + रज = नीरजनिः + रोग = नीरोग
अतः + एव = अतएव
10. अतः र अथवा स के बदले कहीं.कहीं विसर्ग होता है, जैसेः
अंतर + करण = अंतःकरण
तेजस + पुंज = तेजःपुंज; तेजोपुंज
विसर्ग संधि के भेद
- लोप संधि
- अपरिवर्तिता संधि
- परिवर्तिता संधि
1. लोप संधिः जिनमें विसर्गों का लोप होता है, उसे विसर्ग संधि कहते हैं। इसे लोप सन्धि भी कहते हैं, जैसेः
अतः + एव = अतएव
निः + रोगी = निरोगी (नीरोगी)निः + रोग = निरोग (नीरोग)
निः + रस = निरस (नीरस)
रजः + कण = रजःकण
निः + संदेह = निःसंदेह (निस्सन्देह)
अन्तः + करण = अन्तःकरणप्रातः + काल = प्रातःकाल
पयः + पान = पयःपान
यशः + इच्छा = यशइच्छा अतः + एव = अतएव
मनः + रथ = मनोरथ मनः + योग = मनोयोग
सरः + ज = सरोज पयः + द = पयोद
पयः + धर = पयोधर पुरः + हित = पुरोहितनिः + फल = निष्फल दुः + कृत = दुष्कृत
निः + चल = निश्चल दुः + प्राप्य = दुष्प्राप्य
बहिः + कृत = बहिष्कृत निः + छल = निश्छल
तपः + वन = तपोवन यशः + धरा = यशोधरा
मनः + ज = मनोज सरः + वर = सरोवरपुनः + जन्म = पुनर्जन्म निः + पाप = निष्पाप
आविः + कृत = आविष्कृत तिरः + कार = तिरस्कार
वाचः + पति = वाचस्पति
निः + आधार = निराधार निः + औषध = निरौषध
दुः + लक्ष्य = दुर्लक्ष्य दुः + वचन = दुर्वचन
दुः + वह = दुर्वहनिः + उपाय = निरुपाय निः + झर = निर्झर
बहिः + गत = बहिर्गत दुः + यश = दुर्यश
निः + कपट = निष्कपट निः + पाप = निष्पाप
दुः + कर = दुष्कर दुः + प्रज्ञ = दुष्प्रज्ञआविः + कार = आविष्कार निः + फल = निष्फल
निः + चय = निश्चय निः + चल = निश्चल
धनुः + टंकार = धनुष्टंकार ततः + ठकार = तटष्ठकार
नियम 5ः यदि विसर्ग के बाद ‘श’, ‘ष’ या ‘स’, हो, तो विसर्ग का क्रमशः ‘श’, ‘ष’, होता है या ज्यों का त्यों रहता है। जैसे-
दुः + शासन = दुश्शासन, दुःशासन वहिः + षट् = वहिष्षट्, वहिःषट
निः + सार = निस्सार, निःसार
निः + रोग = नीरोग। निः + ख = नीख।
निः + रस = नीरस। दुः + राज = दूराज।
