अनुक्रम
राजा प्रवरसेन
वाकाटक विन्ध्यशक्ति भारशिव नागो का सामन्त था । इसी का बेटा प्रवरसेन था । प्रवरसेन बड़ा शक्तिशाली राजा हुआ उसकी मुख्य विजय मालवा, गुजरात और काठियावाड़ थे । यहां पर शक महाक्षत्रप का राज्य था इसे प्रवरसेन ने मिटाया ।
रूद्रसेन
335 र्इ. के लगभग प्रवरसेन की मृत्यु के बाद उसका पोता रूद्रसेन वाकाटक राजगद्दी में बैठा । हमेशा पारिवारिक विवाद में उलझा रहा आरै युद्ध करता रहा और अपने बड ़े साम्राज्य को सम्भाल नहीं पाया ।
पृथ्वीसेन
रूद्रसेन के बाद पृथ्वीसेन (350 से 365) र्इ. तक वाकाटक राजा बना इसका पुत्र रूद्रसेन द्वितीय था । पृथ्वीसेन का सम्बन्ध गुप्तों से किसी न किसी रूप में हमेशा रहा । इसलिये उसने अपनी कन्या प्रभावती गुप्ता का विवाह रूद्रसेन द्वितीय के साथ कर दिया । रूद्रसेन की मृत्यु के बाद प्रभावती गुप्ता ने स्वयं शासन का सूत्र अपने हाथों ले लिया । इस समय पाटलिपुत्र में जिस शक्तिशाली गुप्त साम्राज्य का विकास हो रहा था । उसके प्रताप के सम्मुख इन वाकाटकों की शक्ति सर्वथामन्द पड़ गयी थी, और ये गुप्त साम्राज्य के अन्तर्गत अधीनस्थ राजाओं के रूप में रह गये थे ।
तीनों राज्यों के पतन के बाद दक्षिण में नर्इ शिक्त्यों का उदय हुआ, इन शिक्त्यों के बीच 300 से 750 र्इ. तक परस्पर संघर्ष चलता रहा । ये शक्तियां थी बादामी के चालुक्य, कांची के पल्लव और मदूरा के पाण्ड्य । ये सभी र्इस्वी की छठी शताब्दी में प्रसिद्ध हुए । ये प्रभुसत्ता, राज्य विस्तार और लूटमार के लिए आपस में लड़ते रहे ।