अनुक्रम
लोकमत से अभिप्राय समाज में प्रचलित उन विचारों या निर्णयों से है, जो लगभग निश्चित हैं, जिनमें स्थिरता है और जो समाज के एक बड़े वर्ग के लोगों में समान रूप से स्थित होते हैं। लोकमत सार्वजनिक समस्या से सम्बन्द्ध होता है। यह सामान्य जनता का मत होता है।
लोकमत की परिभाषा
लोकमत की विशेषताएं
- लोकमत समाज के मौलिक घटकों (व्यक्तियों) की प्रतिक्रियाओं का प्रस्तुतिकरण है। वयस्क मताधिकार परआधारित लोकतंत्र में प्रत्येक व्यक्ति की अपनी-अपनी सम्मति का एक समान मूल्य है।
- प्रचार के लिए आवश्यक है कि लोकमत लिखित अथवा मौखिक रूप या प्रतीकों द्वारा व्यक्त हो। अव्यक्त भावनाएं चाहे कितनी भी गहरी हों, लोकमत के मूल्यांकन के लिए नगण्य हैं, क्योंकि उनके अस्तित्व को ही संदिग्ध माना जाता है।
- जिस प्रश्न या समस्या पर लोकमत का अध्ययन अपंक्षित है वह इतना स्पष्ट और प्रत्यक्ष होना चाहिए कि सम्बद्ध वर्ग अथवा जनसमुदाय उसका अस्तित्व तुरन्त स्वीकार कर लें। उदाहरणार्थ, टैक्सों के बोझ को तो सब कोइर् मानते है लेकिन यह विशय इतना स्पष्ट नहीं। इसके विपरीत बिक्री या अल्प विशेष टैक्स हटाया जाना चाहिए या उसमें कटौती या वृद्धि होनी चाहिए, इस पर जो भी प्रतिक्रिया प्रकट होती है, वह लोकमत की परिधि में आती है।
- लोकमत का रूप तभी स्पष्ट और ठोस होता है जब जनसमुदाय किसी प्रस्ताव को ‘‘हाँ’’ या ‘‘न’’ द्वारा स्वीकार करे या ठुकरा दे। नशाबन्दी के प्रश्न को लीजिए। वैसे तो सब कोइर् मानते हैं कि मदिरापान के दश्ु परिणाम क्या हो सकते है तो भी यही कहना पड़ता है कि इस प्रश्न पर हमारे देश में लोकमत पर्याप्त रूप से संगठित नहीं हुआ है क्योंकि नशाबन्दी को लागू करने के लिए अपेक्षित प्रयत्न नहीं किये जा रहे। इसके विपरीत परिस्थिति ऐसी हो ग है कि मदिरापान को प्रोत्साहन मिल रहा है इसलिए यह कहना पड़ेगा कि नशाबन्दी के लिए देश का लोकमत तैयार नहीं।
- लोकतंत्र में सबको विचारों की स्वतंत्रता होती है, इसलिए जो विचार किसी के मन में होता है वही जुबान पर या कलम की नोक पर आ जाता है। लेकिन कल्पना कीजिए उन दिनों की जब हमारे देश में विदेशी साम्राज्यवाद का बोलबाला था। हम अपने मन में तत्कालीन सरकार के बारे में जो कुछ सोचते-समझते थे, वह लिख या बोल नहीं सकते थे। ऐसी स्थिति में प्रापेगण्डा की सफलता इसी में थी कि लोगों की सच्ची भावनाओं को समझा जाए और उन्हें किसी न किसी तरह प्रकट किया जाए।
- लोकमत के दो रूप होते हैं -प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष। प्रत्यक्ष रूप में तो हमारा वह आचरण है, जब हम अनुभव करते हैं कि हमारी कथनी करनी को दूसरे सब देख रहे हैं। इसलिए हम सोच-समझ कर किसी प्रश्न पर अपना मन प्रकट करते हैं। दूसरा अप्रत्यक्ष रूप है- जब हम एकदम अपने आप में ही को अप्रत्यक्ष रूप में विचार प्रकट करते हैं। यह भी आवश्यक नहीं कि हम किसी को बताएं कि हमने क्या सोचा है। लोक सम्पर्क में हम लोकमत के प्रत्यक्ष रूप पर ही प्रभाव डाल सकते हैं। लेकिन मानना पड़ेगा कि प्रचार के किसी भी अभियान में अप्रत्यक्ष रूप की उपेक्षा नहीं की जा सकती। लोगों की पसन्द या नापसन्द के अप्रत्यक्ष रूप के महत्व और प्रभाव को दुकानों पर बिक्री का काम करने वाले ‘‘सेल्समैन’’ अच्छी तरह जानते हैं और समझते है। को भी माल खरीदने से पहले ग्राहक कुछ सोचता है या रूकता है।
लोकमत निर्माण के सिद्धांत
मानव व्यवहार संसार का सबसे बड़ा रहस्य है। इससे बड़ी बिडम्बना क्या हो सकती है कि पिछली तीन शताब्दियों में भौतिक शक्तियों और पदाथोर्ं के नियंत्रण और नियमन में मानव इतना विजयी हुआ है कि उसने चन्द्रमा पर भी अपने कदम रख दिए है मानव की बना मशीनें लाखों प्रकाश वर्ष दूर स्थित सितारों की परिक्रमा करके और चन्द्रमा से चटनें उखाड़ कर धरती पर अपने निर्दिष्ट स्थल पर लौट आती हैं, किन्तु मानव अभी अपने आचरण और व्यवहार पर नियमन नहीं कर सका है क्योंकि जो शक्तियां उसकी भावनाओं और वासनाओं को जगाती है उनके रहस्यों को मानव अब भी पूरा-पूरा जान भी नहीं सका है। उन पर नियन्त्रण करना तो दूर की बात है।
व्यक्तिगत रूप से मानव आचरण में सब प्रकार के गुण दोष की पराकाष्ठा देखी जा सकती है। अच्छे से अच्छे और बुरे से बुरे व्यक्ति एक ही परिवार घर या शहर में मिल सकते है सुनिश्चित रूप से यह कहना कठिन है कि एक ही जलवायु और अन्न-भोजन का सेवन करने वाले दो व्यक्तियों में से एक अच्छा नागरिक आरै दूसरा अपराधी क्यों बन जाता है हम जब ‘राम’ का स्मरण करते है तो ‘रावण’ का जिक्र किए बिना नहीं रह सकते। इसी तरह कृष्ण और कंस, जीजस और जूडास, गांधी और गोडसे सभी दो परस्पर विरोधी शक्तियों के ऐसे प्रतीक थे जिनको एक दूसरे का सामना करना पड़ा। तो इस प्रकार हम कह सकते हैं कि इतिहास में संघर्ष और अन्तर्द्वन्द्ध तो चलते ही रहते हैं।
जनसमुदाय की मनोदशा कितनी विलक्षण और चंचल होती है, इसका उदाहरण शेक्सपियर के प्रसिद्ध नाटक ‘‘जूलियस सीजर’’ के उस प्रसंग से मिलता है जहां पहले तो रोम की जनता जूलियस सीजर के हत्यारे बू्रटस और उसके शड्यन्त्रकारी साथियों से सहानुभूति प्रकट करती है, किन्तु जब बू्रटस का विरोधी मार्क एण्टनी मंच पर आकर अप्रत्यक्ष ढंग से जूलियस सीजर की श्रद्धांजलि अर्पित करता है और उसके हत्यारों की प्रच्छन्न निन्दा करता है तो वही जन समुदाय उसी क्षण बू्रटस और उसके साथियों के रक्त का प्यासा बन जाता है और इतना उत्तेजित हो जाता है कि एक निरपराध व्यक्ति के टुकड़े-टुकड़े कर देता है क्योंकि उसका नाम भी शड़यन्त्रकारियों में से एक के साथ मिलता जुलता होता है। लोकमत को रेखांकित करने के लिए विद्वानों ने क सिद्धान्त प्रतिपादित किए हैं। जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं
- यह जरूरी नहीं जो कुछ आप कहें सब सच्चा ही सच्चा हो। जरूरी तो यह है कि जनता को यह विश्वास हो जाए आप जो कछु कह रहे है वह सच है। यह बात बिल्कुल वैसी ही है जैसे अदालत में दोनों पक्षों के वकील अपनी-अपनी बात को सच्ची कहते हैं लेकिन फैसला उसी के हक में होता है जिसकी सच्चा पर न्यायाधीश को विश्वास हो जाए।
- प्रोपेगण्डा में सफलता का पहला सोपान यह है कि वक्ता अपने श्रोताओं का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करें ताकि वे उसकी बात सुनें। सार्वजनिक सभाओं में, जहां विरोधी भी मौजूद हों, अपना पक्ष प्रस्तुत करने में संकोच नहीं होना चाहिए। क्योंकि अपनी प्रतिष्ठा को स्थापित करने के लिए ऐसे मौके बड़े उपयोगी होते हैं।
- अगर आप समझते हैं कि अधिक संख्या में श्रोता आपके विरोधी हैं, तो समझ-बूझ से काम लें। लोगों को बहला-फुसला कर उनका समर्थन प्राप्त करने की कोशिश करें। जहां तक हो सके उनसे टकराव या झगड़ा मोल न लें क्योंकि आपके भाषण के दौरान अगर को गड़बड़ हु तो नुकसान आपका है, आप अपनी बात नहीं कह पाएंगे।
- प्रोपेगण्डा में भी एक यद्धु की तरह चालें चली जाती है जो भी किया जाए, शत्रु या विरोधी के लिए इतना अप्रत्याशित हो कि वह हैरानी या परेशानी में निष्क्रिय हो जाए।
- प्रोपेगण्डा चाहे लोकतंत्र का हो या अधिनायकवादी व्यवस्था का, उस का मूल मंत्र होता है जनता को अपेक्षित दिशा में प्रेरित करना। पेर्र णा तभी सफल होती है जब लोग यह विश्वास कर लें कि उन्हें वही कुछ करने के लिए कहा जा रहा है जो उनके मन की पुकार है। यह भी हो सकता है कि उन्हें ठीक-ठीक यह भी न पता हो कि वे क्या चाहते हैं। लेकिन जब पब्लिसिटी उनके सामने एक संदेश लेकर जाती है तो वे उसे स्वीकार कर लेते हैं क्योंकि उनका मन उसकी गवाही देने लगता है। जनता के साथ इस प्रकार का मानसिक तालमेल स्थापित करने के लिए मनोविज्ञान के व्यावसायिक अनुभव की को विषेश आवश्यकता नहीं। लोकसम्पर्क कर्ता यदि थोड़ी सी साधारण समझ बूझ से काम ले और मानदारी के साथ लोगों की भावनाओं को समझने की कोशिश करे और परिश्रम से मुंह न मोड़े, तो सफलता दूर नहीं।
- क बार ऐसा भी होता है कि विश्वविद्यालयों में छात्र और छात्राएं उत्तेजना में आकर खिड़कियों के शीषे तोड़ डालते हैं या को और उपद्रव करते हैं। किसी को पता ही नहीं चलता कि ऐसा क्यों हुआ, या को शिकायत भी होती है तो बिल्कुल मामूली-सी। जिस पर इतनी गड़बड़ का को औचित्य नहीं हो सकता। ऐसी स्थिति को निपटाने का एक तरीका तो यह है कि बल प्रयोग से छात्रों के इस दंगे फसाद को दबा दिया जाए। लेकिन ऐसा वही करते है जिनका दृृश्टिकोण संकुचित होता है या जो पुलिस की तकनीकों के अतिरिक्त और कुछ नहीं जानते। ‘‘लोक सम्पर्क में विश्वास रखने वाला को भी व्यक्ति इस स्थिति को अपने ही तरीके से निपटायेगा। वह यह सोचेगा कि ये पढ़े लिखे युवाजन हंगामा करने और अपने अभिभावकों की कमा बर्बाद करने के लिए तो विश्वविद्यालय में नहीं आते वह इस निष्कर्ष पर पहंचु ेगा कि यह दंगा फसाद तो एक बीमारी की निशानी है, जो बहुत गहरी है। अगर बीमारी का इलाज हो जाए तो यह निशानी यानी उपद्रव स्वत: ही बंद हो जाएगा।
प्रोपेगण्डा में दो अन्य मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों का लाभ उठाया जाता है। एक है संयुक्तिकरण का जिसे अंग्रेजी में rationalization कहते है इसका मतलब है कि हम बहुत से फैसले तो अपने मन में छिपे हुए झुकावों के कारण पहले कर लेते हैं और फिर प्रकट करते समय या उनको कार्य रूप देते हुए उनके समर्थन में युक्तियां तलाश कर लेते है शादी ब्याह से लेकर चुनावों में मत देने तक के फैसले अक्सर हम अपने मन की गहराइयों से निकली पेर्र णाओं से प्रभावित होकर पहले कर लेते हैं, इसके बाद अपने फैसलों को सिद्धान्तों, आदर्शो और नैतिक मूल्यों या सांस्कृतिक अभिरूचियों के आधार पर युक्तियुक्त सिद्ध करते हैं। प्रोपेगण्डा में सफलता उसी को मिलती है जो जनता के अवचेतन मन की छिपी पे्ररणाओं का लाभ उठा सके।
इसी सन्दर्भ में दूसरा सिद्धान्त है- पसंद या नापसंद के मूल रूपों का। कम्युनिस्ट विचारों के लोगों में ‘‘बुर्जुआ’’ कल्चर को बुरा समझा जाता है। इसलिए अगर को कम्युनिस्ट अपने किसी विरोधी को ‘‘बुर्जआ’’ या पूंजीवादियों का एजेंट कह दे तो उस व्यक्ति के प्रति कम्युनिस्ट लोगों के मन में गलत छवि बन जायेगी। इसका कारण यह है कि सभी लोगों ने अपने मन में अच्छा या बुरा की धारणाएं स्थिर कर ली हैं। हमारे मन में जो मूल रूप से स्थिर हो जाए, उनको हम आसानी से छोड़ नहीं सकते, और हमारे लिये यह बहुत मुष्किल है कि प्रत्येक फैसला करने से पहले हम मामले की गहरा में जाएं। जो कुछ हमारी पसंद की कल्पना में ठीक उतरेगा, हम तुरंत उसे अपना लेंगे या इसके विपरीत उसे नकार देंगे। इसलिए किसी के विरोध या समर्थन का प्रोपेगण्डा खुले तौर पर या तो बढ़ा चढ़ा कर तारीफ करने से होता है या कड़वे कटाक्षों से, क्योंकि साधारण जनता अपनी पसंद या नापसंद के मुताविक इधर या उधर की अपनी राय बना लेती है- तर्क की गहरायों में जाने के लिए न तो जनसाधारण में सामथ्र्य होती है और न ही को सुविधाएं।
हम अपने विचारों या अपनी राय की उन मूल्यों के आधार पर रचना करते हैं, जो धर्म या संस्कृति ने हमें दिए हों। धर्म या राजनीति या अन्य किसी प्रतिबद्धता को लेकर ही उन मानदंडों का सृजन होता है जो हमें किसी स्थिति को स्वीकारने या नकारने के लिए मजबूर करते हैं। धर्म हमें ‘‘सात्विकता’’ और ‘‘तामसिकता’’ में भेद करना सिखाता है। पाप और पुण्य के मानदण्डों का प्रयोग करके भी विवाद और टकराव की स्थिति में यह निष्चय किया जाता है कि दो परस्पर विरोधी पक्षों में हम किसका समर्थन करें या किसका विरोध। ऐसे मामले में हर को विवादग्रस्त प्रष्नों की तह में नहीं जाता। केवल एक संकेत की जरूरत होती है कि उस का धर्म या उसके सिद्धान्त उससे किस किस्म के आचरण की अपेक्षा करते है जनसाधारण या तो ‘‘पाप’’ समझता है या ‘‘पुण्य’’। दोनों के बीच क्या है, यह वह नहीं जानता। इसलिए जनता से जो अपील की जाती है वह सीधी और स्पष्ट होनी चाहिए। ढुलमुल नीतियां जो न इधर की हों और न उधर की, जनता को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सकतीं।
उपरोक्त सिद्धान्तों का अध्ययन करने से यह स्पष्ट है कि जनता से लोकमत हासिल करने के लिए जनता से लोकसम्पर्क बड़ी स्पष्टता से किया जाना चाहिए। लोकसम्पर्क उद्देश्यपरक होना चाहिए, सहनशीलता और सरलता से किया जाना चाहिए।