अनुक्रम
ही राजनीतिक आधुनिकरण को समझा जा सकता है। आधुनिकरण की धारणा एक बहुत व्यापक और विशाल धारणा है। इसका
सम्बन्ध जीवन के हर क्षेत्र में होने वाले परिवर्तनों से है। यह राजनीतिक व्यवस्था, उत्पादन प्रणाली, सामाजिक व धार्मिक क्षेत्र, शैक्षिक
तथा सांस्कृतिक क्षेत्र सभी से सम्बन्धित है।
है। यह प्राचीन से नवीनता की ओर समाज का प्रस्थान है। यह एक बहुमुखी प्रक्रिया है जो आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक,
शैक्षिक तथा राजनीतिक सभी क्षेत्रों में दृष्टिगोचर होती है। पर्यावरण एवं प्रकृति पर बढ़ता हुआ नियन्त्रण, तकनीकी विकास,
औद्योगिकरण, शहरीकरण, बढ़ती जनसहभागिता, बढ़ती राष्ट्रीय व प्रति व्यक्ति आय, संचार साधनों का विकास, सामाजिक
गतिशीलता, समानता के सिद्धान्त का विकास तथा राष्ट्रीय एकता के प्रति निष्ठा आदि आधुनिकीकरण की प्रमुख विशेषताएं हैं। लरनर
ने विवेकपूर्ण परिवर्तन की प्रक्रिया को ही आधुनिकीकरण का नाम दिया है। स्मैलर ने किसी राज्य की आर्थिक उन्नति को ही आधुनिकीकरण माना है।
राजनतिक आधुनिकीकरण की परिभाषा
क्षेत्रों में परिवर्तन से सम्बन्धित है।”
आधारित होती है और जिसका उद्देश्य आधुनिक समाज की स्थापना कहा जा सकता है।” इस प्रकार कहा जा सकता है कि
आधुनिकीकरण एक जटिल प्रक्रिया है। जिसका सम्बन्ध जीवन के सभी क्षेत्रों में होने वाले विकास से है।
कौलमैन के अनुसार, “आधुनिकीकरण राजनीतिक पक्ष संक्रान्तिकालीन समाजों की राजव्यवस्था में होने
वाले संरचनात्मक तथा सांस्कृतिक परिवर्तनों का समुच्चय है। इस प्रक्रिया में राजव्यवस्था, उसकी उप-व्यवस्थाएं, राजनीतिक
संरचनाएं, राजसंस्कृति, उनकी प्रक्रियाएं आदि शामिल होती हैं।”
है। साधारण रूप में तो समाज मेंं सामाजिक संचालन और आर्थिक विकास के परिणामस्वरूप हुए राजनीतिक परिवर्तनों को
राजनीतिक आधुनिकीकरण का नाम दे दिया जाता है।
से लिया है।
और इतना शक्तिशाली हो कि उसमें उठने वाली मांगों का मुकाबला किया जा सके।”
हो सकता है जिसमें व्यक्ति का अभिज्ञान राजनीतिक विकास और इसके विभिन्न पक्षों से होने लगता है।
आधुनिकीकरण, राजनीतिक विकास से अधिक व्यापक अवधारणा है और यह पाश्चात्यीकरण से अलग अवधारणा है, क्योंकि यह
पाश्चात्यीकरण के विचरित मूल्य युक्त व उद्देश्य युक्त परिवर्तन पर आधारित है।
राजनीतिक आधुनिकीकरण की विशेषताएं
आइजेन्स्टेड
ने भी राजनीतिक आधुनिकीकरण की अलग विशेषताएं बताई हैं। उसकी दृष्टि में राजनीतिक व्यक्ति, कार्यों और संस्थाओं में उच्च
मात्रा का विभिन्नीकरण तथा केन्द्रीयकृत एवं एकीकृत शासन व्यवस्था की विकास, केन्द्रीय प्रशासनिक एवं राजनीतिक संगठनों की
गतिविधियों का विस्तार तथा उनकी सभी सामाजिक क्षेत्रों में क्रमिक व्याप्ति, समाज की अन्तर्निहित शक्ति का अधिकाधिक समूहों तथा
वयस्क नागरिकों में फैलाव आदि राजनीतिक आधुनिकीकरण की विशेषताएं हो सकती हैं।
राज्य की लौकिक सत्ता की वृद्धि तथा शक्ति का बढ़ता केन्द्रीयकरण, संरचनात्मक विभेदीकरयण, बढ़ती जनसहकारिता, नवीन
सामाजिक संघटन, कार्यों का विशेषीकरण, अभिजन वर्ग की उपस्थिति, समान सहभागिता, हित समूहों व राजनीतिक दलों के माध्यम
से राजनीतिक मांगों का हित स्वरूपण को राजनीतिक आधुनिकीकरण विशेषताएं बताया है।
रस्तोव ने भी अत्यधिक विभेदीकृत शासकीय संगठन, शासकीय संरचनाओं में एकीकरण व सामंजस्य, धर्मनिरपेक्ष प्रक्रिया, व्यक्ति की
अति विस्तृत निष्ठा, राजनीति में जनसाधारण की सक्रिय सहभागिता, समानता का सिद्धान्त तथा समता व योग्यताओं के आधार पर
भूमिकाओं का वितरण को राजनीतिक आधुनिकीकरण की विशेषताएं माना है।
राजनीतिक आधुनिकीकरण की विशेषताएं हो सकती हैं :-
गतिविधियों से सम्बन्धित सारी शक्तियां एक राज्य या व्यवस्था में केन्द्रित होने लग जाती हैं। इसका अर्थ यह है कि राजनीतिक
व्यवस्था ही अधिकाधिक शक्तियों को नियामक व नियन्त्रक बनने लग जाती हैं। इसका प्रमुख कारण तकनीकी विकास,
अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में बदलाव, संचार साधनों में विकास तथा प्रतिरक्षा की आवश्यकता का बढ़ना है। इसमें व्यक्ति के जीवन
का राजनीेतिक पक्ष सर्वोपरिता की तरफ बढ़ना स्वाभाविक ही है।
है। इसका अर्थ यह नहीं है कि राजनीतिक शक्तियों के विकेन्द्रीयकरण की कोई व्यवस्था नहीं रहती। इसमें तो राजनीतिक
विकेन्द्रीकरण के रहते हुए भी राजनीतिक शक्ति ही महत्वपूर्ण और अन्य समस्त प्रकार की आर्थिक व सामाजिक शक्तियों की
नियामक व संचालक बनी रहती है।
2. समाज के लिए राज्य की अधिक पहुंच – आधुनिक युग पुलिस राज्यों का न होकर कल्याणकारी राज्यों का है। यातायात
व संचार के साधनों ने राज्य की सकारात्मक भूमिका में वृद्धि की है। आज सरकार जनकल्याण में अधिक रुचि लेने लगी है।
आज सरकार का कार्य जनता से लेना ही नहीं है, बल्कि उसे कुछ देना भी है। जब सरकार की जनता तक पहुंच वृद्धिपरक
होती है, तभी आधुनिकीकरण की स्थिति मानी जाती है। लोक कल्याण को बढ़ावा देने वाली सरकारें ही राजनीतिक
आधुनिकीकरण का प्रतिबिम्ब है।
बहुत बढ़ने लगती है। इस बढ़ती हुई अन्त:क्रिया का अर्थ यह है कि राजनीतिक शक्ति के विभिन्न केन्द्र आपस में इतने अधिक
अन्त:क्रियाशील हो जाते हैं कि दोनों स्तर के केन्द्र निरन्तर सम्प्रेषण के माध्यमों से जुड़ जाते हैं। अगर इसको हम राजनीतिक
आधुनिकीकरण के प्रथम लक्षण ‘राज्य में शक्ति का केन्द्रीयकरण’ से सम्बन्धित करके देखें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि
राजनीतिक आधुनिकीकरण दो तरफा चलने वाली प्रक्रिया है। यहां पर केन्द्र का अर्थ तो राजनीतिक व्यवस्था से है और परिसर
का अर्थ समाज से है। केन्द्र तथा परिसर अथवा राजनीतिक व्यवस्था तथा समाज से है। केन्द्र तथा परिसर अथवा राजनीतिक
व्यवस्था तथा समाज में इस अन्त:क्रिया या पारस्परिता को बढ़ाने के राजनीतिक दलों, हित समूहों तथा नौकरशाही का बहुत
अधिक योगदान रहता है। इस बढ़ती हुई पारस्परिकता वाला समाज व राजनीतिक व्यवस्था आधुनिकीकरण की निशानी है।
स्थान नए स्रोत लेने लगते हैं। इसके अन्तर्गत प्राचीन राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक आदि सत्ताओं का स्थान राष्ट्रीय
राजनीतिक सत्ता द्वारा ले लिया जाता है। प्राचीन समाज में राजनीतिक सत्ता केस्रोत राजा महाराजा, कबीलों के मुखिया,
धार्मिक नेता व पारिवारिक समूह थे और वे ही जनता की आस्था का केन्द्र थे, लेकिन सभी नवोदित राष्ट्रों में स्वतन्त्रता के
बाद से स्रोत निर्बल होने लगे और उनके स्थान पर नई राजनीतिक सत्ता के प्रति हो गई, क्योंकि इसका स्वरूप अधिक से
अधिक कल्याणकारी दिखाई देने लगा।
पारिवारिक व जातीय सत्ताओं की जगह एक लौकिकीकृत और राष्ट्रीय रजानीतिक सत्ता के द्वारा ले लिया जाता है।” अत:
सत्ता का स्थानान्तरण भी आधुनिकीकरण की महत्वपूर्ण विशेषता है।
5. राजनीतिक गतिविधियों का पृथक्करण और विशेषज्ञता – राजनीतिक आधुनिकीकरण की अवस्था में राजनीतिक
संस्थाओं का विभिन्नीकरण एवं विशेषीकरण भी होना आवश्यक माना जाता है। विकासशील देशों में विभिन्नीकरण की समस्या
तो नहीं है, लेकिन विशेषीकरण की समस्या जरूरी है। इसी कारण विकासशील देश संक्रमकालीन दौर से गुजर रहे हैं। वे
निरन्तर आधुनिक समाज की तरफ बढ़ने को प्रयासरत् हैं। आज सरकार का स्वरूप कल्याणकारी होने के कारण सरकारों
के कार्यों में आई जटिलता के लिए विभिन्नीकरण तथा विशेषीकरण का होना अपरिहार्य माना जाने लगा है। संस्थाओं के
विभेदीकरण व विशेषीकरण के बिना सरकारों द्वारा अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन करना कठिन काम है। विभेदीकरण और
विशेषीकरण का साथ साथ होना भी उतना ही आवश्यक है, जितना इनका राजनीतिक व्यवस्था में अस्तित्वान होना। भारत
जैसे देशों में विशेषीकरण व विभिन्नीकरण के टूटे हुए मेल के कारण ही आधुनिकीकरण की प्रक्रिया अधर में लटकी हुई है। अत:
राजनीतिक आधुनिकीकरण के लिए राजनीतिक संस्थाओं का विभिन्नीकरण व विशेषीकरण एक साथ होना आवश्यक है।
को राजनीतिक संस्थाओं में सहभागिता के अवसर कहां तक प्राप्त हैं। सर्वसाधारण की राजनीतिक सहभागिता के बिना
आधुनिकीकरण की बात करना निरर्थक है। विकासशील देशों में जनसहभागिता के अवसर तो जनता को प्राप्त होते ही रहते
हैं; लेकिन जनता प्राय: इस काम में उदासीनता ही दिखाती है। लोग राजनीति के प्रति इस सीमा तक लगाव नहीं रखते, जितना
आधुनिकीकरण के लिए आवश्यक है।
सकता। आधुनिक राजनीतिक व्यवस्थाएं लाभों का वितरण समाज के निचले स्तर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखती है, लेकिन
जन-सहभागिता के अभाव में वे लक्ष्य धरे के धरे रह जाते हैं। कुछ देशों में लोगों की राजनीति के प्रति उदासीनता इस सीमा
तक पहुंच जाती है कि उससे राजनीतिक व्यवस्था को पतन की तरफ धकेला जाने लगता है। भारत में मताधिकार की व्यवस्था
द्वारा जनसहभागिता का होना आवश्यक है जो अपने उत्तरदायित्वों को समझते हुए राजनीतिक व्यवस्था के विकास में योगदान
दे।
है। यदि समाज का बुद्धिजीवी वर्ग राजनीति के प्रति उदासीन रहेगा तो निष्क्रिय जनसहभागिता राजनीतिक व्यवस्था को पतन
के गर्त में धकेलने वाली हो सकती है। इसलिए राजनीतिक आधुनिकीकरण लाने व राजनीतिक व्यवस्था को विघटन से बचाने
के लिए जनता की राजनीतिक व्यवस्था के प्रति प्रबुद्ध निष्ठा का होना अनिवार्य है। प्रबुद्ध जनसहभागिता के बिना राजनीतिक
आधुनिकीकरण सम्भव नहीं है।
7. जनता का राजनीतिक व्यवस्था से प्रति लगाव – राजनीतिक आधुनिकीकरण के लिए लोगों का राजनीतिक व्यवस्था
के प्रति लगाव का होना जरूरी है। जिन देशों में जनता अपने राष्ट्रीय फर्ज के प्रति उदासीन हैं, वहां पर कभी आधुनिकीकरण
नहीं आ सकता। राष्ट्रीय अभिज्ञान और राष्ट्रीयता के अभाव में राजनीतिक व्यवस्था का विकास कभी नहीं हो सकता।
राजनीतिक व्यवस्था के प्रति अपनापन लाकर ही राजनीतिक व्यवस्था का विकास सम्भव है। इसके लिए व्यक्तियों की सोच
को बदलना जरूरी है। इसके बिना व्यक्ति की राजनीतिक व्यवस्था के बिना न तो निष्ठा आ सकती है और न ही राष्ट्रीयता
की भावना का विकास हो सकता है। जब राजनीतिक व्यवस्था में सभी वर्गों के लोग राष्ट्रीय अभिज्ञान व राष्ट्रीयता की भावना
से ओ्रत-प्रोत होकर चलते हैं तो उससे एक ऐसी बाध्यकारी धारा प्रवाहित होने लगती है कि राजनीतिक व्यवस्था स्वत: ही
आधुनिकीकरण की तरफ बढ़ने लगती है।
भी जरूरी है। आज राजनीतिक व्यवस्था में सरकारों के कार्यों में इतनी अधिक वृद्धि होती जा रही है कि सीमित आधार वाली
नौकरशाही द्वारा उन्हें पूरा करना असम्भव है। नए दायित्वों को सरकार के पास आ जाने से अनेक देशों में अधिक से अधिक
लोकसेवकों की भर्ती की जाने लगी है। इसके लिए समाज के सभी वर्गों के हितों का ध्यान रखा जाता है ताकि इसका आधार
व्यापक बना रहे। लेकिन भारत जैसे देशों में नौकरशाही का आधार उस स्तर तक नहीं पहुंचा पाया है जो आधुनिकीकरण के
लिए आवश्यक है। आज भारत में नौकरशाही की निरंकुशता, बढ़ता हुआ भ्रष्टाचार, दो तिहाई नौकरशाहों का ऊपर के तबके से
होना इसकी व्यापक आधार में बाधा दर्शाता है। अत: नौकरशाही का व्यापक आधार ही आधुनिकीकरण की प्रमुख पहचान है।
राजनीतिक आधुनिकीकरण को प्रभावित करने वाले तत्व
राजनीतिक व्यवस्था दो अलग-अलग देशों मेंं अलग-अलग दिशा में राजनीतिक आधुनिकीकरण की तरफ भी
जा सकती है। इसके लिए राजनीतिक आधुनिकीकरण को प्रभावित करने वाले तत्व ही उत्तरदायी हैं। ये तत्व हैं :-
राजनीतिक संरचनाओं का स्वरूप परम्परावादी होता है, वहां राजनीतिक आधुनिकीकरण की गति धीमी रहती है। नेपाल में
परम्परागत राजनीतिक संरचनाओं के कारण ही वहां पर राजनीतिक आधुनिकीकरण की गति धीमी है। इसके विपरीत भारत
में राजनीतिक संरचनाओं की नवीन प्रकृति आधुनिकीकरण की दिशा में राजनीतिक व्यवस्था को ले जा रही है।
अड़ियल प्रकार की संस्कृति राजनीतिक व्यवस्था में राजनीतिक समाजीकरण का मार्ग रोककर उसे आधुनिकता की तरफ जाने
से रोकती है। राजनीतिक आधुनिकीकरण पर दीर्घकालीन प्रभाव राजनीतिक संस्कृति का ही पड़ता है। परम्परागत संस्कृति
वाले देशों में राजनीतिक आधुनिकीकरण का मार्ग अधिक कठिन होता है, क्योंकि जनता परम्परागत नेतृत्व व संरचनाओं से
चिपकी रहती है।
3. ऐतिहासिक काल-नियति – राजनीतिक आधुनिकीकरण ऐतिहासिक काल-नियति के सन्दर्भ में ही सम्भव हो सकता है।
किसी भी राजनीतिक परिवर्तन को इतिहास की काल-नियति से अलग करके देखना असम्भव है। किसी भी कार्य को करने
के लिए उचित समय होता है। उस समय के विपरीत किया गया कार्य राजनीतिक-व्यवस्था के पतन का कारण बन जाता
है।
दोनों होती हैं। राजनीतिक आधुनिकीकरण की प्रवृत्ति राजनीतिक नेतृत्व में अभिमुखीकरण पर आधारित है। यदि किसी देश
के राजनेता राजनीतिक आधुनिकीकरण के लिए प्रयासरत हैं तो वहां पर राजनीतिक आधुनिकीकरण को आने से रोका नहीं
जा सकता।
लोकतन्त्रीय शासन व्यवस्था वाली राजनीतिक व्यवस्था हमेशा ही राजनीतिक आधुनिकीकरण की तरफ बढ़ाने के प्रयास करती
है। इसके विपरीदत सर्वाधिकारवादी या निरंकुश राजनीतिक व्यवस्था का प्रयास हमेशा ही राजनीतिक आधुनिकीकरण के
मार्ग में बाधा पहुंचाना होता है। लोकतन्त्रीय व्यवस्था में तो निवेश या निर्गत सामाजिक व्यवस्था से ही आते-जाते हैं। इसी
कारण जनता व सरकार का निरन्तर सम्पर्क बना रहता है।
आधुनिकीकरण की तरफ से जाने वाली होती है। इसके विपरीत सर्वाधिकारवादी व निरंकुश शासन व्यवस्थाएं राजनीतिक
आधुनिकीकरण के मार्ग में बाधा ही समझी जानी चाहिए।
राजनीतिक आधुनिकीकरण के अभिकरण
राजनीतिक आधुनिकीकरण एक जटिल प्रक्रिया है। इसमें अनेक अभिकरणों की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है। इस प्रक्रिया में
ये अभिकरण ही अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं :-
आधुनिकता के रंग में रंगने का प्रयास करता है। विकासशील देशों में इस वर्ग ने पश्चिम की राजनीतिक संरचनाओं को अपनाकर
अपनी राष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप ढालने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। इन्होंने अपनी बौद्धिकता और सृजनशीलता के
बल पर राजनीतिक आधुनिकीकरण के नये आयाम स्थापित किए हैं। सत्ता के वास्तविक धारक होने के कारण इस वर्ग की
ही भूमिका राजनीतिक आधुनिक के अनुकूल रही है। राजनीतिक व्यवस्था के लक्ष्यों, गन्तव्यों और साध्यों के विकल्प इसी वर्ग
द्वारा सुझाए जाते हैं ताकि राजनीतिक शक्ति को संरचनात्मक स्वरूप दिया जा सके।
आवश्यकताओं को पहचानकर उनका राजनीतिक व्यवस्था में अनुसरण करके राजनीतिक व्यवस्था को स्थायित्व प्रदान करता
है। जिन देशों में अभिजन वर्ग ने सामाजिक परिवर्तन के प्रति अरुचि दिखाई है, वहां की राजनीतिक व्यवस्थाओं का पतन हुआ
है। इसी कारण अभिजन वर्ग को राजनीतिक व्यवस्था की जीवन शक्ति भी कहा जाता है। इस वर्ग की राजनीतिक व्यवस्था
में भूमिका नकारात्मक व सकारात्मक दोनों हो सकती हैं। अत: राजनीतिक आधुनिकीकरण को गति देने वाला प्रमुख अभिकरण
अभिजन वर्ग ही है।
देती हैं और उनका नेतृत्व करती हैं। सरकारें ही आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक क्षेत्रों में प्रगति के द्वार खोलकर
राजनीतिक आधुनिकीकरण की पृष्ठभूमि तैयार करती है। राजनीतिक सहभागिता के नए आयाम सरकारों की इच्छा के ही
प्रतिफल हैं। प्रतिनिधि संस्थाओं में जनता की बढ़ती भागीदारी आज राजनीतिक शक्ति की इच्छा का ही परिणाम है।
सरकारों ही कल्याणकारी कार्यों को शुरु करके राजनीतिक आधुनिकीकरण की दिशा निर्धारित करती है। अत: शासन प्रणाली
या सरकारें भी राजनीतिक आधुनिकीकरण की प्रमुख अभिकरण हैं।
राजनीतिक व्यवस्था का कुशल संचालन राजनीतिक दलों की भूमिका पर ही निर्भर करता है। नियम-निर्माण, प्रयोग एवे अक्तिानिर्णय में राजनीतिक दल अपनी सकारात्मक भूमिका अदा करते हैं। सर्वाधिकारवादी देशों में तो साम्यवादी दल ही राजनीतिक
आधुनिकीकरण का नियामक होता है। राष्ट्रीय हित के अनुकूल विचारधारा विकसित करने तथा जनता में राजनीतिक चेतना
उत्पन्न करने में राजनीतिक दलों का ही महत्वपूर्ण योगदान रहता है। यही राजनीतिक चेतना जनसहभागिता में वृद्धि करके
लोकतन्त्रीय देशों में राजनीतिक आधुनिकीकरण का मार्ग प्रशस्त करती है।
विचारधारा को अमली जामा पहचाने का कार्य राजनीतिक दल व हित समूह करते हैं। विचारधारा के आधार पर सामाजिक
परिर्तन की प्रक्रिया को दिशा देने और प्राथमिकताओं का निर्धारण किया जाता है। राजनीतिक दलों के माध्यम से विचारधारा
राजनीतिक आधुनिकीकरण का अभिकरण बन जाती है। इससे व्यक्तियों की अभिवृ़ित्तयों में आसानी से परिवर्तन किया लाया
जा सकता है।
विचारधारा का विशेष योगदान होता है।
राजनीतिक समाजीकरण की तरफ मोड़ते हैं। राजनीतिक समाजीकरण की अवस्था में पहुंचकर जनता राजनीतिक आधुनिकीकरण
की गतिविधियों की आवश्यकता समझने लगती है और राजनीतिक आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को गति मिलती है।
की प्रक्रिया को तेज किया है। तकनीकी विकास का परिणाम संचार साधन आज राजनीतिक व्यवस्था में रचनात्मक परिवर्तन
और नूतन प्रवृत्तियों के वाहक बन गए हैं। इनसे मनुष्य एक दूसरे के काफी निकट आ गया है, जहां राजनीतिक घटनाओं की
जानकारी से बच पाना उसके लिए सम्भव नहीं है। इस तकनीकी व शैक्षिक विकास ने व्यक्तियों के चिन्तन को बदलकर
राजनीतिक आधुनिकीकरण का मार्ग प्रशस्त कर दिया है।