अनुक्रम
योग का अर्थ
योग की परिभाषा
योग की परिभाषा योग शब्द एक अति महत्त्वपूर्ण शब्द है जिसे अलग-अलग रूप में परिभाषित किया गया है।
1. पातंजल योग दर्शन के अनुसार- योगष्चित्तवृत्ति निरोध: अर्थात् चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है।
‘योगष्चित्तवृत्तिनिरोध:’ यो.सू.1/2
‘तदा द्रश्टु: स्वरूपेSवस्थानम्।। 1/3
3. सांख्य दर्शन के अनुसार-
पुरुशप्रकृत्योर्वियोगेपि योगइत्यमिधीयते।
‘संयोग योग इत्युक्तो जीवात्मपरमात्मनो।’
‘यदा पंचावतिश्ठनते ज्ञानानि मनसा सह।
बुद्धिष्च न विचेश्टति तामाहु: परमां गतिम्।।
तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम्।
अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभावाप्ययौ।। कठो.2/3/10-11
5. मैत्रायण्युपनिषद् –
एकत्वं प्राणमनसोरिन्द्रियाणां तथैव च.।सर्वभाव परित्यागो योग इत्यभिधीयते।। 6/25
6. योगषिखोपनिषद् –
योSपानप्राणयोरैक्यं स्वरजोरेतसोस्तथा। सूर्याचन्द्रमसोर्योगो जीवात्मपरमात्मनो:।एवंतु़द्वन्द्व जालस्य संयोगो योग उच्यते।। 1/68-69
सर्वार्थ विषय प्राप्तिरात्मनो योग उच्यते।
8. अग्नि पुराण के अनुसार – अग्नि पुराण में कहा गया है कि
आत्ममानसप्रत्यक्षा विशिष्टा या मनोगति:तस्या ब्रह्मणि संयोग योग इत्यभि धीयते।। अग्नि पुराण (379)25
9. स्कन्द पुराण के अनुसार – स्कन्द पुराण भी उसी बात की पुष्टि कर रहा है जिसे अग्निपुराण और याज्ञवल्क्य स्मृति कह रहे है। स्कन्द पुराण में कहा गया है कि-
यव्समत्वं द्वयोरत्र जीवात्म परमात्मनो:।सा नष्टसर्वसकल्प: समाधिरमिद्यीयते।।परमात्मात्मनोयोडयम विभाग: परन्तप।स एव तु परो योग: समासात्क थितस्तव।।
समाधि ही योग है। वृत्तिनिरोध की ‘अवस्था में ही जीवात्मा और परमात्मा की यह समता और दोनो का अविभाग हो सकता है। यह वात नष्टसर्वसंकल्प: पद के द्वारा कही गयी है।
10. हठयोग प्रदीपिका के अनुसार – योग के विषय में हठयोग की मान्यता का विशेष महत्व है, वहां कहा गया है कि-
सलिबे सैन्धवं यद्वत साम्यं भजति योगत:।तयात्ममनसोरैक्यं समाधिरभी घीयते।। (4/5) ह0 प्र0
यदि हम विचार करे तो यहां भी पूर्वोक्त परिभाषा से कोई अन्तर दृष्टिगत नही होता। आत्मा और मन की एकता भी समाधि का फल है। उसका लक्षण नही है। इसी प्रकार मन और आत्मा की एकता योग नही अपितु योग का फल है।
पतंजलि योगसूत्र में योग की परिभाषा
अन्य ग्रन्थों की भांति योग सूत्र क्योंकि योग पर ही आधारित है, अत: वह प्रारम्भ में ही योग को परिभाषित करता है। समाधि पाद में योग की परिभाषा कुछ इस प्रकार बतायी गई है-
योगष्चित्तवृत्ति निरोध: ।। (पातंजल योग सूत्र, 1/2)
योग, चित्त वृत्तियों का निरुद्ध होना है। अर्थात् योग उस अवस्था विषेश का नाम है, जिसमें चित्त में चल रही सभी वृत्तियां रूक जाती हैं। यदि हम और अधिक जानने का प्रयास करें तो व्यास-भाष्य मे हमें स्पष्ट रूप से ज्ञात होता है कि योग समाधि है। इस प्रकार जब चित्त की सम्पूर्ण वृत्तियां विभिन्न अभ्यासों के माध्यम से रोक दी जाती है, तो वह अवस्था समाधि या योग कहलाती है। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है, कि योग को परिभाषित करने के लिए युज् धातु के कौन से अर्थ का प्रयोग किया गया है। जैसा कि आपने पहले देखा, युज् धातु तीन अर्थों में प्रयुक्त होती है। यहाँ युज् धातु समाधि अर्थ में प्रयोग हो रही है। अत: योग की परिभाषा के लिए यहां युज् समाधौ वाला प्रयोग ठीक है।
हमारा चित्त तरह-तरह की वस्तुओं, दृश्यों, स्मृतियों, कल्पनाओं आदि में हमेशा उलझा रहता है। इन दृश्यों, स्मृतियों, कल्पनाओं, वस्तुओं आदि को वृत्ति भी कहा जा सकता है। यहाँ पर आपको समझाने के लिए केवल इतना बताना चाहते हैं कि जब हमारा चित्त इन सभी वृत्तियों से बाहर आ जाता है, या जब चित्त में किसी भी प्रकार की हलचल नहीं होती तब वही स्थिति योग कहलाती है। इसमें बहुत से स्तर आते हैं। इन स्तरों को योग में विभिन्न उपलब्धियों के माध्यम से समझा जा सकता है। अंतिम उपलब्धि जिसमें की चित्त में कोई भी हलचल न हो, वह एक शान्त सरोवर की भांति हो, ऐसी स्थिति को चित्त का समाधि में होना कहलाता है। यही स्थिति योग भी है क्योंकि ऊपर हम बता आए हैं कि योग को ही समाधि कहा गया है। यहां ध्यान देने की बात यह है कि योग को समाधि पातंजल योग में कहा गया है। अन्य ग्रन्थों में योग की परिभाषा उन ग्रन्थों के अनुसार अलग हो सकती है।
योग के उद्देश्य
- मानसिक शक्ति का विकास करना।
- रचनात्मकता का विकास करना।
- तनावों से मुक्ति पाना।
- प्रकृति विरोधी जीवनशैली में सुधार करना।
- वृहत-दृष्टिकोण का विकास करना।
- मानसिक शान्ति प्राप्त करना।
- उत्तम शारीरिक क्षमता का विकास करना।
- शारीरिक रोगों से मुक्ति पाना।
- मदिरापान तथा मादक द्रव्य व्यसन से मुक्ति पाना।
- मनुष्य का दिव्य रूपान्तरण।
योग के प्रकार
- हठयोग
- लययोग
- राजयोग
- भक्तियोग
- ज्ञानयोग
- कर्मयोग
- जपयोग
- अष्टांगयोग
1. हठयोग
प्राचीन समय में हठयोग में सिद्ध महात्मा घेरण्ड हुए हैं। इन्होंने अपने शिष्य चण्डकपालि को क्रियात्मक रुप से समझाने के लिए घेरण्ड संहिता पुस्तक की रचना की जो आज भी उपलब्ध है। यह हठयोग का एक प्रामाणिक एवं सर्वमान्य ग्रन्थ है। इसमें हठयोग के सात अंगों षट्कर्म आसन, मुद्रा, प्रत्याहार, प्राणायाम, ध्यान और समाधि का वर्णन है ।
2. लययोग
योग के आचार्यों ने लय को भी ईश्वर प्राप्ति का एक साधन माना है इसका अर्थ है- ‘‘मन को आत्मा में लय कर देना, लीन कर देना।’’
‘‘आनंद त: पष्यन्ति विद्वांसस्तेन लयेन पष्यन्ति।’’
3. राजयोग
‘‘राजत्वात् सर्वयोगानां राजयोग इति स्मृत:’’ ।
4. भक्ति योग
‘‘पत्रं पुष्प फलं तोयंयो में भक्तया प्रयच्छति ‘‘
5. ज्ञानयोग
6. कर्मयोग
यज्ञार्था कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धन:गीता-तक्ष्र्थ कर्म कौन्तेय मुक्तासंग: समाचार:।।
7. जप योग
8. अष्टांग योग
- यम
- नियम
- आसन
- प्राणायाम
- प्रत्याहार
- धारणा
- ध्यान
- समाधि
उपरोक्त आठ अंगों का अभ्यास करने से पूर्व व्यक्तियों को षट्कर्म करना अतिआवश्यक होता है षट्कर्म निम्न प्रकार से बताये गये हैं –
- नेति
- नौलि
- धौति
- वस्ति
- कपाल भाति
- त्राटक


