मानव विकास सूचकांक क्या है पॉल स्ट्रीटेन ने विकास के छ: कारणों की पहचान की। वे कारण हैं-

मानव विकास सूचकांक एक संयुक्त सूचकांक है जिसके द्वारा किसी देश के मानव
विकास की औसत उपलब्धियों को मानव विकास के तीन आधारभूत आयामों के
आधार पर माप सकते हैं। ये तीन आधारभूत आयाम हैं: 
  1. दीर्घ एवं स्वस्थ जीवन, 
  2. ज्ञान प्राप्त करना तथा 
  3. एक शिष्ट और शालीन जीवन जीना। 

इन तीनों आयामों
को निम्नांकित तरीकों से मापा जाता है-

  1. स्वस्थ एवं दीर्घायु का मापन जन्म के समय जीवन प्रत्याशा से किया जाता है।
  2. ज्ञान का मापन प्रौढ़ साक्षरता दर (2/3 की धारिता) और संयुक्त प्राथमिक,
    द्वितीयक तथा तृतीयक स्तर पर सकल नामांकिन दर के अनुपात (1/3 धारिता)
    से होता है।
  3. शिष्ट और शालीन जीवन जीने का मापन उस देश के सकल घरेलू उत्पादन तथा
    प्रति व्यक्ति क्रय शक्ति (अमेरिकी डालरो में) के सन्दर्भ में की जाती है। इसे क्रय
    शक्ति समरूपता (पी.पी.पी.) कहते हैं।

यह सूचकांक एक प्रकार
का बैरोमीटर है जो मानव कल्याण के उपागमो में हो रहे परिवर्तनों को मापता है तथा
देश के भिन्न-भिन्न राज्यों में हो रहे परिवर्तनो की प्रगति की तुलनात्मक स्थितियों को
प्रदख्रशत करने में सहायक है। मानव विकास की अवधारणा का आधार स्वतंत्रता तथा
मुक्त विकास है। 

मानव विकास ही क्यों?

पॉल स्ट्रीटेन, (विकास अर्थशास्त्री) ने विकास के छ: कारणों की पहचान की। वे कारण हैं-

  1. विकास के प्रयासों का अन्तिम लक्ष्य मानवीय दशाओं में सुधार करना तथा उन्हें
    अपने आपको विकसित करने के लिए अधिक से अधिक विकल्पों को बढ़ाना है।
  2. मानव विकास उच्चतम उत्पादकता का एक उत्तम साधन है। एक सुपोषित, स्वस्थ,
    सुशिक्षित, कुशल व जागरूक श्रमिक शक्ति सर्वाधिक उत्पादक परिसम्पति है।
    अत: उत्पादकता के आधार पर इस क्षेत्रा में किया गया पूँजी निवेश न्याय संगत
    है।
  3. इससे जनसंख्या वृद्धि दर में कमी लाने में सहायता मिलती है।
  4. मानव विकास का भौतिक पर्यावरण से मैत्राीपूर्ण संबंध है क्योंकि जब गरीबी घटती
    है तो जंगलों की कटार्इ, मरुस्थलीकरण और मृदा अपक्षरण एवं अपरदन में कमी
    आती है।
  5. मनुष्य की गरीबी एवं रहन-सहन की दशाओं में सुधार से एक स्वस्थ नागरिक
    समाज के निर्माण तथा उसमें अधिकतम स्थिरता लाने में सहायता मिलती है।
  6. मानव विकास से सामाजिक उथल-पुथल में कमी तथा राजनैतिक स्थिरता को
    बढ़ाने में सहायता मिलती है।

अब तक आप मानव विकास की आवश्यकता एवं महत्ता को समझ गए होंगे। अब हम
इसी विकास के सन्दर्भ में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की स्थिति पर विचार करेंगे तथा
भारत में मानव विकास का स्तर कम होने के कारणों को जानने का प्रयत्न करेंगे-

भारत: मानक विकास सूचकांक की प्रवृत्तियाँ

मानव विकास रिपोर्ट 2005 के अनुसार विश्व के कुल 177 देशों में भारत 127 वें
स्थान पर है। सभी 177 देशों को तीन श्रेणियों में विभक्त किया गया है। ये हैं उच्च,
मध्यम एवं निम्न वर्ग की श्रेणियाँ। वे देश जिनके मानव विकास सूचकांक का मूल्य
0.80 एवं उससे अधिक है, उन्हें उच्च वर्ग में गिना जाता है। इसी प्रकार मध्यम वर्ग
की श्रेणी वाले देशों मे मानव विकास सूचकांक 0.50 से 0.799 के बीच होता है। वे
सारे देश जिनके सूचकांक 0.50 से कम हैं, उन्हें निम्न मानव विकास वाली श्रेणी में
गिना जाता है। 

भारत का स्थान मध्यम विकास श्रेणी में रखे जाने वाले देशों में सबसे
नीचे आता है। हमारे पड़ोसी देश जैसे चीन (85वाँ स्थान), श्रीलंका (93वाँ), मालदीव
(96वाँ), भारत से (127 वें स्थान) बहुत ऊपर स्थित हैं। भारत से ठीक नीचे स्थान पाने
वाले अन्य पड़ोसी देश हैं म्याँमार (129वाँ), भूटान (134वाँ), पाकिस्तान (135वाँ) तथा
नेपाल (136वाँ)। भारत से नीचे सूचकांक वाले अधिकांश देश अफ्रीका महाद्वीप के हैं
तथा कुछ देश एशिया महाद्वीप के हैं। 
यदि हम पिछले 30 वर्षों की स्थिति को देखें
तो इतना तो कहा जा सकता है कि भारत की स्थिति (मानव विकास क्षेत्र के संदर्भ)
में काफी कुछ सुधार हुआ है। यह निम्न सारिणी से स्पष्ट है।

भारत में मानव विकास सूचकांक की प्रवृत्तिया 1975–2007

वर्ष 1975 1980 1985 1990 1995 2000 2005
मानव विकास सूचकांक 0.412 0.438 0.476 0.513 0.546 0.577 0.602

स्रोत- मानव विकास रिपोर्ट 2005, पृष्ठ 225

 भारत की मानव विकास में खराब स्थिति होने के पीछे जो
कारण हैं, वे अधोलिखित हैं-

  1. जनसंख्या में तेजी से वृद्धि,
  2. बहुत बड़ी संख्या में अशिक्षित प्रौढ़ों का होना तथा कुल विद्यालय प्रवेश अनुपात
    का कम होना,
  3. बीच में ही पढ़ार्इ छोड़ने वालों की उच्च दर,
  4. शिक्षा एवं स्वास्थ्य पर बहुत कम शासकीय अनुदान एवं खर्च,
  5. बहुत बड़ी संख्या में कुपोषित लोग तथा कम वजन के कमजोर बच्चे,
  6. बहुत ही निम्न स्तर की साफ-सफार्इ व्यवस्था तथा अति आवश्यक जीवन रक्षक
    दवाइयों का आम जनता के पहुँच के बाहर होना।

मानव विकास सूचकांक-राज्य स्तरीय विश्लेषण

यू.एन.डी.पी. द्वारा तैयार मानव विकास रिपोर्ट के समान भारत के योजना आयोग द्वारा
भी वैसी ही एक रिपोर्ट 2001 में तैयार की गर्इ थी। इस रिपोर्ट में भारत के कुछ बड़े
राज्यों (जिनमें अविभक्त बिहार राज्य भी शामिल था) में विद्यमान मानव विकास की
स्थितियों का विश्लेषण किया गया था। बिहार के अलावा अविभाजित मध्य प्रदेश तथा
उत्तर प्रदेश भी शामिल किए गए थे। इन राज्यों में मानव विकास सूचकांको को
निम्नांकित तालिका में दर्शाया गया है:

भारत: मानव विकास सूचकांक (राज्यों के नाम वर्ष 2001)

राज्यों की स्थिति मानव विकास सूचकांक
1 आन्ध्र प्रदेश  0.416
2 असम 0.386
3 बिहार 0.367
4 गुजरात 0.47.9
5 हरियाणा 0.509
6. कर्नाटक 0.638
7 केरल 0.638
8 मध्य प्रदेश 0.394
9 महाराष्ट्र 0.523
10 ओरिसा  0.404
11 पंजाब 0.537
12 राजस्थान  0.424
13 तामिल-नाडु  0.531
14 उत्तर प्रदेश 0.388
15 पश्चिम बंगाल 0.477
     भारत 0.472

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