मशीनी अनुवाद एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इसमें अल्प समय में मूलपाठ का अनुवाद तीव्र गति से किया जा सकता है। मशीनी अनुवाद की प्रक्रिया में मूलपाठ अर्थात् अनुवाद किए जाने वाले डाॅटा को कंप्यूटर प्रणाली में input के विकास की दिशाएँ रूप में डाला जाता है। कंप्यूटर की भीतरी प्रणाली में दोनों भाषाओं के शब्द, मुहावरा और व्याकरण नियम फीड होते हैं। ये एक प्रकार के शब्दकोश और व्याकरणिक विश्लेषण होते हैं, जो मूलपाठ के वाक्यों का विश्लेषण, अंतरण और संश्लेषण मुख्य तीन चरणों में करते हैं। यह प्रणाली मूल पाठ के डाॅटा का दूसरी भाषा में स्वचालित अनुवाद करती हैं और कुछ क्षणों में अनूदित पाठ Output के रूप में प्राप्त होता है। इसमें यह देखना है कि अनूदित पाठ कितना सही और स्वीकार्य है। इसका स्वरूप क्या है – सामान्य है या तकनीकी या साहित्यिक। इसमें यह भी देखा जाता है कि प्रणाली (system) में कितनी द्विभाषी शब्दावली है और कितने व्याकरणिक नियम उपलब्ध हैं और कितने सटीक है।
मशीनी अनुवाद की प्रक्रिया (Process of machine translation)
मशीनी अनुवाद कंप्यूटेशनल भाषाविज्ञान का एक अनुप्रयोग है जिसमें कंप्यूटर के प्रयोग द्वारा पाठ को एक प्राकृतिक भाषा से दूसरी प्राकृतिक भाषा में अनुवादित किया जाता है। इसमें स्रोत और लक्ष्यभाषा की प्रकृति समान या असमान हो सकती है। अनुवाद प्रक्रिया की जटिलता भाषायुग्म की भिन्नताओं पर निर्भर करती है। यह जटिलता विभिन्न कारणों से खड़ी हो सकती है। इनमें वाक्य संरचना के रूपों, व्याकरण रूपों, संदर्भिक द्वि-अर्थकता या वाक्य में पाई जाने वाली शाब्दिक द्वि-अर्थकता, लेखन शैली के रूपों, मुहावरों या लोकोक्तियों का प्रयोग, सांस्कृतिक भिन्नता आदि होते हैं। ये ऐसे प्रयोग हैं जिनसे मूल स्रोतपाठ एक विशिष्टता लिए रहता है और इसका दूसरी भाषा में अंतरण करते समय जटिलताएँ उत्पन्न होती हैं।
अनुवाद संबंधी प्रौद्योगिकी पत्रिकाओं में मशीनी अनुवाद को दस सबसे चुनौतीपूर्ण प्रौद्योगिकियों की सूची में रखा गया है। मशीनी अनुवाद के विस्तार में जाने से पूर्व हम देखेंगे कि अनुवाद स्रोतभाषा में व्यक्त संदेश के लिए लक्ष्यभाषा में निकटतम सहज समतुल्य संदेश को प्रस्तुत करना है, यह समतुल्यता पहले अर्थ के स्तर पर होती है फिर शैली के स्तर पर।
सामान्य अनुवाद के उद्देश्य, प्रविधि तथा उससे संबंधित चुनौतियों पर विचार करने से हम देखते हैं कि अनुवाद में हम उस समतुल्य को पाना चाहते हैं जो स्रोतभाषा पाठ में निहित होता है तथा अनुवाद प्रक्रिया द्वारा संप्रेषित किया जाता है। यहाँ समतुल्यता अर्थ, रूप, शैली और प्रभाव के संबंध में है। समतुल्यता प्रकृति में औपचारिक रूप से गतिशील हो सकती है। नाइडा के अनुसार तात्विक समतुल्यता रूप और तत्व दोनों में केवल संदेश पर केंद्रित रहती है, इसका लक्ष्य होता है पाठकों तक अधिक से अधिक लक्ष्यभाषा के संदर्भ को पहुँचाना। तथापि, परिवर्तनात्मक समतुल्यता समतुल्य प्रभाव के सिद्धांत पर आधारित होती है अर्थात् प्राप्तकर्ता और संदेशकता के बीच का संबंध वैसा ही होता है जैसाकि मूल प्राप्तकर्ताओं और स्रोतभाषा संदेशकता के बीच होता है। यदि हम मानवीय आधार पर अनुवाद प्रक्रिया का विश्लेषण करें तो हमें यहाँ दिए गए उपकार्यों की प्रक्रिया की तरह विश्लेषण करना होगा;
- स्रोतपाठ के अर्थ को समझना; और
- लक्ष्यभाषा पाठ में इस अर्थ को उचित रूप से गठित करना।
यद्यपि यह पूरी प्रक्रिया सामान्य-सी प्रतीत होती है, तथापि इसमें जटिल ज्ञानात्मक प्रक्रिया सम्मिलित रहती है। स्रोतपाठ के अर्थ को समझने अथवा विकोडीकरण करने में अनुवादक को दिए गए संदर्भ में पाठ में अंतर्निहित अर्थ की व्याख्या और विश्लेषण करना होता है जो स्रोतभाषा के व्याकरण, अर्थग्रहण वाक्य-विन्यास, मुहावरों आदि के साथ-साथ उसके बोलने वालों के सांस्कृतिक रूपों के गहन अध्ययन में निहित होता है। लक्ष्यभाषा में समान रूप से पुनर्गठित और कोडीकृत करने के लिए, अनुवादक को लक्ष्यभाषा के व्याकरण और लक्ष्यभाषा पाठकों के सांस्कृतिक रूपों की विस्तारपूर्वक जानकारी होनी चाहिए।
मशीनी अनुवाद के संदर्भ में जब यह बात आती है तब यह चुनौतीपूर्ण होता है कि कैसे एक कंप्यूटर पर प्रोग्राम किया जाए कि वह पाठ को मानव अनुवादक की तरह ‘समझे’ और लक्ष्यभाषा में नए पाठ की ‘रचना’ करे जो ऐसा प्रतीत हो कि लक्ष्यभाषा के किसी व्यक्ति द्वारा लिखा गया है। अर्थात् लक्ष्य पाठक उस रचित पाठ को स्वाभाविक रूप से ग्रहण करे।
मशीनी अनुवाद की कार्यप्रणाली में आने वाली समस्याओं को कई प्रकार से दूर किया गया है। साधनों और आवश्यकताओं के बढ़ने के साथ इसका क्षेत्रा भी बढ़ता जा रहा है। मशीनी अनुवाद की पद्धतियों को वर्गीकृत करने के लिए विभिन्न मानक बनाए गए हैं। तथापि सबसे प्रचलित वर्गीकरण भाषायी स्तर (और उत्पाद) को ध्यान में रखकर ‘सिस्टम’ की जरूरत के अनुसार अनुवाद प्रस्तुत करने के लिए किया गया है। इस पूरी प्रक्रिया को पिरामिड द्वारा समझा जा सकता है जिसे ‘वोकोइस त्रिकोण’ कहते हैं।