अनुक्रम
मजदूरी भुगतान अधिनियम, 1936
1. विस्तार
प्रारंभ में यह अधिनियम कारखानों और रेलवे-प्रशासन में काम करने वाले ऐसे कर्मचारियों के साथ लागू था, जिनकी मजदूरी 200 रुपये प्रतिमाह से अधिक नही थी। बाद में इसे कर्इ अन्य औद्योगिक प्रतिष्ठानों तथा नियोजनों में लागू किया गया। इनमें मुख्य हैं – (1) ट्राम पथ सेवा या मोटर परिवहन-सेवा, (2) संघ की सेना या वायुसेना या भारत सरकार के सिविल विमानन विभाग में लगी हुर्इ वायु-परिवहन सेवा के अतिरिक्त अन्य वायु परिवहन सेवा, (3) गोदी, घाट तथा जेटी (4) यांत्रिक रूप से चालित अंतर्देशीय जलयान (5) खान, पत्थर-खान या तेल-क्षेत्र, (6) कर्मशाला या प्रतिष्ठान, जिसमें प्रयोग, वहन या विक्रय के लिए वस्तुएं उत्पादित, अनुकूलित तथा विनिर्मित होती है, तथा (7) ऐसा प्रतिष्ठान, जिसमें भवनों, सड़कों, पुलों, नहरों या जल के निर्माण, विकास या अनुरक्षण से संबंद्ध कोर्इ कार्य या बिजली या किसी अन्य प्रकार की शक्ति के उत्पादन, प्रसारण या वितरण से संबंद्ध कोर्इ कार्य किया जा रहा हो।
श्रमिकों के लिए केवल मजदूरी की मात्रा ही महत्वपूर्ण नहीं होती, बल्कि उसकी अदायगी के तरीके, मजदूरी-भुगतान के अंतराल, उससे कटौतियां तथा उसके संरक्षण से संबद्ध अन्य कर्इ बातें भी महत्वपूर्ण होती है।जो न्यूनतम मजदूरी अधिनियम के दायरे में आते हैं। इस शक्ति का प्रयोग कर कर्इ राज्य सरकारों ने इस अधिनियम को कृषि तथा कुछ अन्य असंगठित नियोजनों में भी लागू किया है। इस तरह, आज मजदूरी भुगतान अधिनियम देश के कर्इ उद्योगों, नियोजनों और प्रतिष्ठानों में लागू है। यह अधिनियम उपर्युक्त प्रतिष्ठानों या उद्योगों में 142 ऐसे कर्मचारियों के साथ लागू है, जिनकी मजदूरी 6500 रु0 प्रतिमाह से अधिक नही है।
मजदूरी की परिभाषा
मजदूरी भुगतान अधिनियम में ‘मजदूरी’ की परिभाषा निम्नांकित प्रकार से दी गर्इ है- मजदूरी का अभिप्राय उन सभी पारिश्रमिक (चाहे वेतन, भत्ते या अन्य रूप में) से है, जिन्हें मुद्रा के रूप में अभिव्यक्त किया गया है या किया जा सकता है और जो नियोजन की अभिव्यक्त या विवक्षित शर्तो के पूरी किए जाने पर नियोजित व्यक्ति को उसके नियोजन या नियोजन के दौरान किए गए काम के लिए देय होता है। ‘मजदूरी’ के अंतर्गत निम्नलिखित सम्मिलित होते हैं –
- किसी अधिनिर्णय या पक्षकारों के बीच किए गए समझौते या न्यायालय के आदेश के अधीन देय पारिश्रमिक;
- ऐसा पारिश्रमिक जिसके लिए नियोजित व्यक्ति अतिकाल कार्य या छुट्टी के दिनों या अवधि के लिए हकदार है;
- ऐसा कोर्इ पारिश्रमिक (चाहे उसे बोनस या किसी अन्य नाम से पुकारा जाए) जो नियोजन की शर्तो के अधीन देय होता है;
- ऐसी कोर्इ राशि जो नियोजित व्यक्ति को उसकी सेवा की समाप्ति पर किसी कानून, संविदा या लिखित के अधीन कटौतियों के साथ या कटौतियों के बिना देय होती है तथा उसकी अदायगी के लिए अवधि की व्याख्या नही की गर्इ है; या
- ऐसी कोर्इ राशि जिसके लिए नियोजित व्यक्ति किसी लागू कानून के अधीन बनार्इ गर्इ योजना के अंतर्गत हकदार होता है।
अधिनियम के प्रयोजनों के लिए ‘मजदूरी’ की परिभाषा के अंतर्गत निम्नलिखित को सम्मिलित नही किया जाता –
- ऐसा बोनस, जो नियोजन की शर्तो, अधिनिर्णय, पक्षकारों के बीच समझोते या न्यायालय के आदेश के अधीन देय नही है;
- आवास-स्थान, प्रकाशा, जल, चिकित्सकीय परिचर्या, अन्य सुख-सुविधा का मूल्य, ऐसी सेवा का मूल्य जिसे राज्य सरकार के सामान्य या विशेष आदेश द्वारा मजदूरी की गणना से अपवर्जित कर दिया गया हो;
- नियोजक द्वारा किसी पेंशन या भविष्य निधि के अंशदान के रूप में दी गर्इ तथा उस पर प्राप्त किया जाने वाला सूद;
- यात्रा-भत्ता या यात्रा-संबंधी रियायत का मूल्य;
- किसी नियोजित व्यक्ति को उसके नियोजन की प्रकृति के कारण उस पर पड़े विशेष व्यय को चुकाने के लिए दी गर्इ धनराशि; या
- ऊपर के भाग (4) में वर्णित राशि को छोड़कर नियोजन की समाप्ति पर दिया जाने वाला उपादान।
न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948
भारत सरकार द्वारा 1944 में नियुक्त श्रमिक जाँच समिति ने देश के विभिन्न उद्योगों में श्रमिकों की मजदूरी और उनके अर्जन का अध्ययन किया और बताया कि लगभग सभी उद्योगों में मजदूरी की दरें बहुत ही निम्न है। समिति ने अनुभव किया कि उस समय तक देश के प्रधान उद्योगों में भी श्रमिकों की मजदूरी में सुधार लाने के लिए समुचित प्रयास नहीं किए गए। स्थायी श्रम-समिति तथा भारतीय श्रम-सम्मेलन में देश के कुछ उद्योगों और नियोजनों में कानूनी तौर पर मजदूरी नियत करने के प्रश्न पर 1943 और 1944 में विस्तार से विचार-विमर्ष किए गए। समिति और सम्मेलन दोनों ने कुछ नियोजनों में कानून के अंतर्गत न्यूनतम मजदूरी की दरें नियत करने और इसके लिए मजदूरी नियतन संयंत्र की व्यवस्था की सिफारिश की ।इन अनुशंसाओं को ध्यान में 148 रखते हुए भारत सरकार ने 1948 में न्यूनतम मजदूरी अधिनियम बनाया, जो उसी वर्ष देश में लागू हुआ। अधिनियम में समय-समय कुछ संशोधन भी किए गए है। अधिनियम के मुख्य उपबंधों की विवेचना नीचे की जाती है।
परिभाषाएँ
- मजदूरी – ‘मजदूरी’ का अभिप्राय ऐसे सभी पारिश्रमिक से है, जिसे मुद्रा में अभिव्यक्त किया जा सकता है तथा जो नियोजन की संविदा (अभिव्यक्त या विवक्षित) की शर्तो को पूरी करने पर नियोजित व्यक्ति को उसके नियोजन या उसके द्वारा किए जाने वाले काम के लिए देय होता है। मजदूरी में आवासीय भत्ता सम्मिलित होता है, लेकिन उसमें निम्नलिखित नहीं होते –
- आवास-गृह, प्रकाश और जल की आपूर्ति तथा चिकित्सकीय देखभाल का मूल्य;
- समुचित सरकार के सामान्य या विशेष आदेश द्वारा अपवर्जित किसी अन्य सुख-सुविधा या सेवा का मूल्य;
- नियोजक द्वारा किसी पेंशन निधि, भविष्य निधि या किसी सामाजिक बीमा-योजना के अंतर्गत दिया गया अंशदान;
- यात्रा-भत्ता या यात्रा रियायत का मूल्य;
- नियोजन की प्रकृति के कारण किसी नियोजित व्यक्ति को विशेष खर्च के लिए दी जाने वाली राशि; या
- सेवोन्मुक्ति पर दिया जानेवाला उपदान
- कर्मचारी – ‘कर्मचारी’ का अभिप्राय ऐसे व्यक्ति से है, जो किसी ऐसे अनुसूचित नियोजन में कोर्इ काम (कुशल, अकुशल, शारीरिक या लिपिकीय) करने के लिए भाड़े या पारिश्रमिक पर नियोजित हैं, जिसमें मजदूरी की न्यूनतम दरें नियत की जा चुकी है। कर्मचारी की श्रेणी में ऐसा बाहरी कर्मकार भी सम्मिलित है, जिसे दूसरे व्यक्ति द्वारा उसके व्यवसाय या व्यापार के लिए बनाने, साफ करने, धोने, बदलने, अलंकृत करने, पूरा करने, मरम्मत करने, अनुकूलित करने या अन्य प्रकार से विक्रय हेतु प्रसंस्कृत करने के लिए वस्तु या सामग्री दी जाती है, चाहे वह प्रक्रिया बाहरी कर्मकार के घर पर या अन्य परिसरों में चलार्इ जाती हो। कर्मचारी की श्रेणी में ऐसा कर्मचारी भी सम्मिलित है, जिसे समुचित सरकार ने कर्मचारी घोषित किया हो, लेकिन इसके अंतर्गत संघ के सशस्त्र बलों का सदस्य शामिल नहीं है।
- समुचित सरकार – ‘समुचित सरकार’ का अभिप्राय हैं – (1) केन्द्र सरकार या रेल प्रशासन के प्राधिकार द्वारा या अधीन चलाए गए किसी अनुसूचित नियोजन के संबंध में या किसी भवन, तेलक्षेत्र या महापत्तन या केंद्रीय अधिनियम द्वारा स्थापित किसी निगम के संबंध में – केंन्द्रीय सरकार तथा (2) अन्य अनुसूचित नियोजनों के संबंध में – राज्य सरकार।
- नियोजक – ‘नियोजक’ का अभिप्राय ऐसे व्यक्ति से हैं, जो या तो स्वयं या अन्य व्यक्ति के द्वारा या तो अपने किसी अन्य व्यक्ति के लिए या अधिक कर्मचारियों को ऐसे किसी अनुसूचित नियोजन में नियोजित करता है, जिसके लिए मजदूरी की न्यूनतम दरें इस अधिनियम के अधीन नियत की जा चुकी है। ‘नियोजक’ के अंतर्गत निम्नलिखित सम्मिलित हैं –
- कारखाना-अधिनियम 1948 के अधीन कारखाना का प्रबंधक;
- अनुसूचित नियोजन में सरकार के नियंत्रण के अधीन वह व्यक्ति या प्राधिकारी, जिसे सरकार ने कर्मचारियों के पर्यवेक्षण और नियंत्रण के लिए नियुक्त किया है। जहाँ इस प्रकार के किसी व्यक्ति या प्राधिकारी को नियुक्त नहीं किया गया है, वहाँ विभागाध्यक्ष को ही नियोजक माना जाएगा;
- किसी स्थानीय प्राधिकारी के अधीन ऐसा व्यक्ति, जिसे कर्मचारियों के पर्यवेक्षण और नियंत्रण के लिए नियुक्त किया गया है। अगर वहाँ इस तरह का कोर्इ व्यक्ति नहीं है, तो उस स्थानीय प्राधिकारी के मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी को नियोजक समझा जाएगा; तथा
- अन्य स्थितियों में ऐसा व्यक्ति, जो कर्मचारियों के पर्यवेक्षण और नियंत्रण के लिए या मजदूरी देने के लिए स्वामी के प्रति उत्तरदायी है।
विस्तार
अधिनियम की अनुसूची से उन नियोजनों का उल्लेख है, जिनमें करने वाले श्रमिकों के लिए मजदूरी की न्यूनतम दरें नियत की जा सकती है। प्रारंभ में अधिनियम की अनुसूची के भाग एक में सम्मिलित नियोजन थे – (1) ऊनी गलीचे या दुषाले बुननेवाले प्रतिष्ठान, (2) धानकुट्टी, आटा-मिल या दाल-मिल, (3) तंबाकू (जिसके अंतर्गत बीड़ी बनाना भी शामिल है) का विनिर्माण, (4) बागान, जिसमें सिनकोना, रबर, चाय और कहवा सम्मिलित है, (5) तेल-मिल, (6) स्थानीय प्राधिकार, (7) पत्थर तोड़ने या फोड़ने के काम, (8) सड़कों का निर्माण या अनुरक्षण तथा भवन-संक्रियाएं, (9) लाख-विनिर्माण, (10) अभ्रक संकर्म, (11) सार्वजनिक मोटर परिवहन तथा (11) चर्म रंगार्इशाला और चर्म विनिर्माण।
अधिनियम की अनुसूची के भाग दो में सम्मिलित नियोजन है – कृषि या किसी प्रकार के कृषिकर्म में नियोजन, जिसमें जमीन की खेती या उसे जोतना, दुग्ध-उद्योग, किसी कृषि या बागबानी की वस्तु का उत्पादन, उसकी खेती, उसे उगाना और काटना, पषुपालन, मधुमक्खीपालन या मुर्गीपालन तथा किसी किसान द्वारा या किसी कृषिक्षेत्र पर कृषिकर्म संक्रियाओं के आनुशंगिक या उनसे संयोजित (जिसमें वन-संबंधी या लकड़ी काटने से संबद्ध संक्रियाएं तथा कृषि-पैदावार को बाजार के लिए तैयार करने और भंडार या बाजार में देने या ढोने के कार्य शामिल है) कोर्इ भी क्रिया सम्मिलित है।
मजदूरी की न्यूनतम दरों का नियतन और पुनरीक्षण
1. न्यूनतम मजदूरी-दरों का नियतन –
समुचित सरकार (अपने-अपने अधिकार-क्षेत्र में केंद्रीय या राज्य सरकार) के लिए अधिनियम की अनुसूची में उल्लिखित तथा उसमें शामिल किए जाने वाले अन्य नियोजनों में काम करने वाले श्रमिकों के लिए मजदूरी की न्यूनतम दरें नियत करना आवश्यक है। अनुसूची के भाग 2 में सम्मिलित नियोजनों, अर्थात् कृषि एवं संबद्ध क्रियाओं में समुचित सरकार पूरे राज्य की जगह केवल राज्य के विशेष भागों या विशिष्ट 150 श्रेणी या श्रेणियों के नियोजनों (पूरे राज्य या उसके किसी भाग) के लिए मजदूरी की न्यूनतम दरें नियत कर सकती है।
- मजदूरी की मूल दर और परिवर्ती निर्वाहव्यय-भत्ता;
- निर्वाहव्यय-भत्ता के सहित या रहित मजदूरी की मूल दर तथा अनिवार्य वस्तुओं की रियायती दरों पर आपूर्ति के नकद मूल्य; या
- ऐसा सर्वसमावेशी दर, जिसमें मूल दर, निर्वाहव्यय-भत्ता तथा रियायतों के नकद मूल्य सम्मिलित हों।
2. न्यूनतम मजदूरी दरों के नियतन की प्रक्रिया –
अधिनियम में अनुसूचित नियोजनों में पहली बार मजदूरी की न्यूनतम दरें नियत करने की दो प्रक्रियाओं की व्यवस्था है। पहली प्रक्रिया में समुचित सरकार समिति या समिति के सहायतार्थ विभिन्न क्षेत्रों के लिए उपसमितियों का गठन कर सकती है। समिति की सिफारिशों को ध्यान में रखकर सरकार संबंद्ध नियोजन के लिए मजदूरी की न्यूनतम दरें ‘राजपत्र‘ में प्रकाशित कर नियत कर देती है।
दूसरी विधि में समुचित सरकार किसी अनुसूचित नियोजन में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए मजदूरी की न्यूनतम दरों के प्रस्ताव प्रभावित हो सकने वाले व्यक्तियों के सूचनार्थ राजपत्र में प्रकाशित कर देती है और उन्हें प्रकाशन की तिथि से दो महीने के अंदर अपने अभ्यावेदन देने का मौका देती है। इस संबंध में प्राप्त किए गए सभी अभ्यावेदनां पर विचार करने के बाद सरकार संबंद्ध अनुसूचित नियोजन के लिए मजदूरी की न्यूनतम दरें राजपत्र में प्रकाशित कर नियत कर देती है। दोनों में किसी भी प्रक्रिया द्वारा नियत की गर्इ मजदूरी की दरें राजपत्र में अधिसूचना के प्रकाशन के तीन महीने की अवधि के बीत जाने के बाद लागू हो जाती है।
3. न्यूनतम मजदूरी दरों का पुनरीक्षण –
नियत की गर्इ न्यूनतम मजदूरी दरों की पुनरीक्षण के लिए भी वे ही विधियां अपनार्इ जाती है, जो उन्हें नियत करने के लिए हैं। मजदूरी दरों के पुनरीक्षण के लिए भी समिति और उपसमिति का गठन या राजपत्र में प्रस्तावों की अधिसूचना के प्रकाशन की विधि का प्रयोग किया जा सकता है। संशोधित मजदूरी की न्यूनतम दरें भी अलग-अलग अनुसूचित नियोजनों, एक ही अनुसूचित नियोजन में अलग-अलग प्रकार के कामों, वयस्कों, तरुणों और शिक्षुओं तथा अलग-अलग क्षेत्रों के लिए अलग-अलग हो सकती है। ये दरें भी तीन प्रकार की हो सकती है। – (1) मजदूरी की मूल दर और अलग से परिवर्ती निर्वाहव्यय-भत्ता, (2) निर्वाहव्यय-भत्ता के सहित या उनके बिना मजदूरी की मूल दर तथा अनिवार्य वस्तुओं की रियायती दरों पर आपूर्ति के नकद मूल्य, तथा (3) ऐसी सर्वसमावेशी दर, जिसमें मूल दर, निर्वाहव्यय-भत्ता तथा रियायतों के नकद मूल्य सम्मिलित हों।
4. स्मिति, उपसमिति, सलाहकार बोर्ड और केंद्रीय सलाहकार बोर्ड –
समिति, उपसमिति तथा सलाहकार बोर्ड प्रत्येक में समुचित सरकार द्वारा मनोनीत अनुसूचित नियोजनों के नियोजकों और कर्मचारियों के प्रतिनिधि बराबर-बराबर की संख्या में, तथा अधिकतम एक-तिहार्इ की संख्या में स्वतंत्र व्यक्ति होगें। स्वतंत्र व्यक्तियों में एक को समुचित सरकार अध्यक्ष के रूप में नियुक्त करेगी। सलाहकार बोर्ड का काम समितियों और उपसमितियों के कार्यो को समन्वित करना तथा न्यूनतम मजदूरी-दरों के नियत किए जाने और उनमें संशोधन लाने के संबंध में समुचित सरकार को सलाह देना है। केंद्रीय सलाहकार बोर्ड की नियुक्ति केंद्रीय सरकार करती है। केंद्रीय सलाहकार बोर्ड में भी अनुसूचित नियोजनों के नियोजकों और कर्मचारियों के प्रतिनिधि बराबर-बराबर के अनुपात में तथा अधिकतम एक-तिहार्इ की संख्या में स्वतंत्र व्यक्ति होंगे। इन सभी सदस्यों को केंद्रीय सरकार मनोनीत करेगी। केंद्रीय सरकार स्वतंत्र व्यक्तियों में एक को अध्यक्ष के रूप में नियुक्त करेगी। केंद्रीय सलाहकार बोर्ड का मुख्य काम मजदूरी की न्यूनतम दरों को नियत करने या उनमें संशोधन लाने तथा अधिनियम के अंतर्गत अन्य विषयों के बारे में सलाह देना तथा सलाहकार बोर्डो के कार्यो को समन्वित करना है।
5. प्रकार में मजदूरी –
इस अधिनियम के अंतर्गत नियत की गर्इ मजदूरी को नकद देना आवश्यक है, लेकिन जहाँ मजदूरी को पूर्णत: या आंशिक रूप में प्रकार में देने का प्रचलन है, वहाँ समुचित सरकार इस तरह से भुगतान दे सकती है। प्रकार में मजदूरी तथा अनिवार्य वस्तुओं की रियायती दरों पर आपूर्ति के नकद मूल्य का निर्धारण विहित तरीके से करना आवश्यक है। जहाँ कर्मचारी मात्रानुपाती कार्य पर नियोजित है तथा जिसके लिए न्यूनतम कालानुपाती मजदूरी ही नियत की गर्इ है, वहाँ उसे मात्रानुपाती मजदूरी दर के हिसाब से मजदूरी दी जाएगी।
6. न्यूनतम मजदूरी का भुगतान –
किसी भी अनुसूचित नियोजन में, जिसमें मजदूरी की दरें नियत की जा चुकी है।, नियत की गइर् मजदूरी से कम दरों पर मजदूरी का भुगतान नहीं किया जा सकता। नियत की गर्इ मजदूरी से केवल वे ही कटौतियाँ की जा सकती है।, जो सरकार द्वारा अधिकृत की गर्इ हो। जिन नियोजनों में मजदूरी भुगतान अधिनियम, 1936 लागू है, उनमें उसी अधिनियम के उपबंधों के अनुसार मजदूरी से कटौतियां की जा सकती है। समुचित सरकार को मजदूरी भुगतान अधिनियम, 1936 के उपबंधों को राजपत्र में अधिसूचना द्वारा उन अनुसूचित नियोजनों में लागू करने की शक्ति प्राप्त है।, जिनमें मजदूरी की न्यूनतम दरें नियत की गर्इ है।
7. दो या अधिक वर्गो के कामों के लिए मजदूरी –
अगर किसी कर्मचारी से दो या अधिक प्रकार के काम लिए जाते है।, जिनके लिए मजदूरों की विभिन्न दरें नियत की गर्इ है।, तो उसे प्रत्येक काम के लिए अलग-अलग दरों से मजदूरी दी जाएगी।
सामान्य कार्य के घंटों आदि का नियतन
कर्मचारियों के लिए दैनिक कार्य के घंटों, अंतराल, साप्ताहिक विश्राम तथा अवकाश-दिवस के कार्य के लिए भुगतान-संबंधी उपर्युक्त उपबंध केवल विहित सीमाओं और विहित शर्तो के अनुसार ही लागू होते है। –
- अत्यावष्यक काम पर या आपातकालीन स्थिति में काम करने वाले कर्मचारी;
- प्रारंभिक या अनुपूरक प्रकृति के कामों पर नियोजित कर्मचारी, जिन्हें निर्धारित अवधि की सीमाओं के बाद भी काम करना जरूरी होता है;
- ऐसे कर्मचारी, जिनका नियोजन मूलत: आंतरायिक है;
- ऐसे कर्मचारी, जिनका काम तकनीकी कारणों से कर्त्तव्यकाल के समाप्त होने के पहले ही किया जाना जरूरी होता है; या
- ऐसे कर्मचारी, जो उन कार्यो पर नियोजित है, जिन्हें प्राकृतिक शक्तियों की अनियमित क्रियाओं के अलावा अन्य समयों में नही किया जा सकता।
आगे कोर्इ कर्मचारी नियोजक के लोप के कारण निर्धारित कार्य के दैनिक घंटों से कम घंटों के लिए काम करता है, तो भी उसे पूरे दिन के लिए नियत मजदूरी-दर से भुगतान किया जाएगा। लेकिन, अगर वह अपनी अनिच्छा से या अन्य विहित परिस्थितियों के कारण पूरे समय तक काम नहीं करता, तो वह पूरे दिन के लिए मजदूरी का हकदार नहीं होता।
अन्य उपबंध
- संविदा द्वारा त्याग पर रोक – ऐसी कोर्इ भी संविदा या समझौता, चाहे वह इस अधिनियम के पहले या बाद में किया गया हो, जिसके द्वारा कोर्इ कर्मचारी इस अधिनियम के अंतर्गत मजदूरी की न्यूनतम दर, विशेषाधिकार या रियायत को छोड़ देता है या घटा देता है, वह अकृत और शून्य होता है।
- दाबे – प्राधिकारी को गवाही लेने, गवाहों की उपस्थिति के लिए बाध्य करने, और दस्तावेजों को पेश करने के लिए सिविल प्रक्रिया-संहिता, 1908 के अधीन सिविल न्यायालय की सभी शक्तियाँ प्राप्त रहती है। प्राधिकारी को दंड प्रक्रिया-संहिता के प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा। न्यूनतम मजदूरी या अन्य रकम के बकाए की राशि के दावे से संबद्ध आवेदन कर्इ कर्मचारी मिलकर एक साथ भी दे सकते है।, लेकिन ऐसी स्थिति में हर्जाने की अधिकतम राशि न्यूनतम मजदूरी के बकाए की स्थिति में कुल राशि के दसगुने से अधिक और अन्य स्थितियों में प्रतिव्यक्ति 10 रु0 से अधिक नहीं हो सकती। प्राधिकारी किसी अनुसूचित नियोजन में बकाए से संबंद्ध अलग-अलग दिए गए कर्इ आवेदनों पर एक आवेदन के रूप में भी विचार कर सकता है।
- असंवितरित रकमों का भुगतान – अगर किसी कर्मचारी की मृत्यु के कारण उसे इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों के अंतर्गत देय न्यूनतम मजदूरी या अन्य रकम की राशि का भुगतान नहीं किया जा सका हो, तो नियोजक के लिए इस राशि को प्राधिकरी के पास जमा करना आवश्यक होगा। प्राधिकारी जमा की गर्इ इस राशि का व्यवहार विहित तरीके से करेगा।
- जिस्टरों और रिकॉर्डो का अनुरक्षण – अनुसूचित नियोजनों में नियोजकों के लिए अपने कर्मचारियों से संबद्ध ब्योरे, उनके कार्य, दी जानेवाली मजदूरी, मजदूरी की रसीद तथा अन्य विवरणियों के लिए रजिस्टर और रिकॉर्ड रखना आवश्यक है। उनके लिए कर्मचारियों को दी जाने वाली सूचना की समुचित व्यवस्था करना भी अनिवार्य है। समुचित मजदूरी-पुस्तिकाओं या मजदूरी-पर्चियों को दिए जाने के संबंध में नियम बना सकती है।
- वादों का वर्णन – निम्नलिखित स्थितियों में कोर्इ भी न्यायालय बकाए की मजदूरी या अन्य रकम की वसूली के लिए किसी भी वाद को विचारार्थ नहीं ले सकता –
- अगर दावे की राशि के लिए वादी या उसकी ओर से आवेदन इस अधिनियम के अंतर्गत नियुक्त प्राधिकारों के पास दिया जा चुका हो;
- अगर प्राधिकारी ने दावे की राशि के संबंध में वादी के पक्ष में निर्देश दिए हो;
- अगर प्राधिकारी के निदेशानुसार दावे की राशि वादी को देय नही है; या
- अगर दावे की राशि इस अधिनियम के अधीन वसूल की जा सकती हो।
- निरीक्षक – केंद्र और राज्य सरकारें अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए निरीक्षकों की नियुक्ति और उनके कार्य की स्थानीय सीमाओं का निर्धारण कर सकती है। निरीक्षक को भारतीय दंडसंहिता के अर्थ में लोकसेवक समझा जाता है। निरीक्षक द्वारा किसी दस्तावेज या वस्तु को उपस्थित करने की माँग करने पर उसे प्रस्तुत करना संहिता की धाराओं 175 और 176 के अनुसार कानूनी रूप से अनिवार्य होता है।
- कुछ अपराधों के लिए शासितयाँ – अगर नियोजक किसी कर्मचारी को नियत की गर्इ न्यूनतम मजदूरी से कम दर पर या उसे देय अन्य रकम से कम का भुगतान करता है या कार्य के घंटों या विश्राम-दिवस से संबद्ध नियमों का उल्लंघन करता है, तो उसे अधिकतम 6 महीने के कारावास या 500 रुपये तक के जुर्माने या दोनों से दंडित किया जा सकता है। लेकिन, नियोजक को दंडित करते समय न्यायालय के लिए दावे से संबद्ध मामलों में उस पर लगाए गए हर्जाने की राशि को ध्यान में रखना आवश्यक है। जहाँ अधिनियम या उसके अंतर्गत बनाए गए नियमों के उल्लंघन के लिए दंड का उल्लेख नहीं किया गया है, वहाँ अपराध के लिए नियोजक को अधिकतम 500 रुपये के जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।
- अपराधों का संज्ञान – अगर कोर्इ शिकायत न्यूनतम मजदूरी या अन्य रकम के बकाए से संबद्ध हो और उस संबंध में प्राधिकारी ने उसे पूर्ण या आंशिक रूप में स्वीकृत कर दिया हो, तो कोर्इ भी न्यायालय समुचित सरकार या उसके द्वारा अधिकृत अधिकारी की स्वीकृति के बिना उस शिकायत पर विचार नहीं कर सकता। अगर कोर्इ शिकायत शासितयों से संबद्ध हो, तो न्यायालय उस पर केवल निरीक्षक द्वारा शिकायत करने या उसकी स्वीकृति पर ही विचार कर सकता है। उल्लिखित शासितयों के बारे में शिकायत इसके लिए मंजूरी दी जाने से एक महीने के अंदर और अन्य प्रकार की शासितयों के लिए अपराध के अभिकथित दिन से 6 महीने के अंदर ही की जा सकती है।
- छूट और अपवाद – समुचित सरकार को मजदूरी संबंधी अधिनियम के उपबंधों को अंशक्त कर्मचारियों के साथ लागू नहीं होने से संबद्ध निदेश देने की शक्ति प्राप्त है। अगर किसी अनुसूचित नियोजन में कर्मचारियों का इस अधिनियम में नियत की गर्इ मजदूरी की दरां से अधिक दर पर मजदूरी मिलती है, या उनकी सेवा की शर्ते और दशाएँ इस अधिनियम के अंतर्गत निर्धारित शर्तो और दशाओं से ऊँचे स्तर की हैं, तो समुचित सरकार इन कर्मचारियों, प्रतिष्ठानों, या किसी क्षेत्र में अनुसूचित नियोजन को अधिनियम के संबद्ध उपबंधों से छूट दे सकती है।
- केंद्रीय सरकार द्वारा निदेश देने की शक्ति – इस अधिनियम के समुचित निष्पादन के लिए केन्द्र सरकार राज्य सरकारों को निदेश दे सकती है।
- नियम बनाने की शक्ति – केन्द्र सरकार को केंद्रीय सलाहकार बोर्ड के सदस्यों की पदावधि, कामकाज के संचालन के लिए प्रक्रिया, मतदान के तरीके, सदस्यता में आकस्मिक रिक्तियों के भरे जाने और कामकाज के लिए आवश्यक गणपूर्ति के संबंध में नियम बनाने की शक्ति प्राप्त है।
समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976
1. विस्तार
अधिनियम सारे भारत में लागू है। केन्द्रीय सरकार को इसे विभिन्न स्थापनों या नियोजनों में लागू करने की शक्ति प्राप्त है। अब तक यह अधिनियम देश के अधिकांश उद्योगों, स्थापनों या नियोजनों में लागू किया जा चुका है। अगर किसी अधिनिर्णय, समझौते या सेवा की संविदा या किसी अन्य कानून के उपबंध इस अधिनियम के उपबंधों के विरोध में हों, तो वहाँ इसी अधिनियम के उपबंध लागू होंगे।
2. पुरुष और स्त्री-कर्मकारों को समान पारिश्रमिक देने के संबंध में नियोजक का दायित्व
किसी स्थापना या नियोजन में कोर्इ भी नियोजक एक ही या समान कार्य पर लगे किसी भी कामगार को उन दरों से कम अनुकूल दरों पर मजदूरी, चाहे वह नकद हो या प्रकार में, नहीं देगा, जिन दरों से वैसे ही काम पर लगे दूसरे लिंग के कामगारों को देय होती है। इन उपबंधों के अनुपालन के लिए कोर्इ भी नियोजक किसी कामगार को देय पारिश्रमिक की दर को घटा नही सकता। जिस स्थापन या नियोजन में इस अधिनियम के लागू होने के पहले पुरुष और स्त्री-कामगारों को एक ही या समान कार्य के लिए देय पारिश्रमिक की दरों में केवल लिंग के आधार पर ही भिन्नता रही है, वहाँ इस अधिनियम के लागू होने पर उच्चतम दरें ही लागू रहेंगी। अधिनियम के अधीन एक ही या समान प्रकृति के कार्य से ऐसे कार्य का बोध होता है, जिसे अगर पुरुष या स्त्री द्वारा समान दशाओं में किया जाए, तो उसमें वांछित कोषल, प्रयास या दायित्व समान हो, तथा उसमें किसी पुरुष या स्त्री द्वारा किए जाने के लिए कोषल, प्रयास या दायित्व-संबंधी भिन्नताएं नियोजन की शर्तो एवं दशाओं के प्रयोजनों के लिए व्यावहारिक महत्व के नहीं हो।
3. स्त्री और पुरुष कामगारों की भरती और नियोजन की शर्तो में भेदभाव करने का प्रतिशेध
उन स्थितियों को छोड़कर जहाँ स्त्रियों के नियोजन को प्रतिशिद्ध या प्रतिवंधित किया गया है, इस अधिनियम के प्रारंभ होने पर कोर्इ भी नियोजक एक ही या समान प्रकृति के कार्य पर भरती करते समय स्त्रियों के साथ किसी तरह का भेदभाव नहीं करेगा। स्त्रियों के साथ भेदभाव की मनाही भरती के उपरांत सेवा की दशाओं जैसे पदोन्नति, प्रशिक्षण या स्थानांतरण के संबंध में भी की गर्इ हैं। लेकिन, भेदभाव-संबंधी उपर्युक्त उपबंध अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, भूतपूर्व सैनिकों, छंटनी किए गए कर्मचारियों या अन्य वर्ग या श्रेणी के व्यक्तियों से संबंद्ध प्राथमिकताओं या आरक्षण के साथ लागू नही होगें।
4. सलाहकार समिति
स्त्रियों को रोजगार के अधिकाधिक अवसर प्रदान करने के उद्देश्य से केन्द्रीय या राज्य सरकारें अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में एक या अधिक सलाहकार समितियों का गठन कर सकती है। सलाहकार समिति में समुचित सरकार द्वारा मनोनीत कम-से-कम 10 सदस्य होगे, जिनमें आधी स्त्रियां होगी। समिति का मुख्य कार्य केन्द्रीय सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट प्रतिष्ठानों या नियोजनों में स्त्रियों को नियोजित किए जा जा सकने के संबंध में सलाह देना है। सलाह देते समय सलाहकार समिति को कतिपय बातों को ध्यान में रखना आवश्यक है; जैसे – सम्बद्ध प्रतिष्ठान या नियोजन में नियोजित व्यक्तियों की संख्या, कार्य की प्रकृति, कार्य के घंटे, नियोजन के लिए स्त्रियों की उपयुक्तता, स्त्रियों को रोजगार के अधिकाधिक अवसर उपलबध कराने की आवश्यकता तथा समिति द्वारा समझी जाने वाली अन्य सुसंगत बातें। समिति की सिफारिशों पर विचार करने तथा संबद्ध व्यक्तियों को अभ्यावेदन का समुचित अवसर प्रदान करने के बाद समुचित सरकार स्त्री-कामगारों के नियोजन के संबंद्ध में निर्देश दे सकती है।
5. विशिष्ट मामलों में अधिनियम का लागू नहीं होना
जहां किसी कानून के अंतर्गत महिलाओं के नियोजन की शर्तो और दशाओं से संबद्ध विशेष व्यवहार की व्यवस्था है, वहां इस अधिनियम के उपबंध लागू नही होंगे। जहाँ बच्चों के जन्म या संभावित जन्म या सेवा-निवृत्ति, विवाह या मृत्यु से संबद्ध नियोजन की शर्तो एवं दशाओं के संबंध में महिलाओं के लिए विशेष व्यवस्था की गर्इ है, वहां भी इस अधिनियम के उपबंध लागू नहीं होंगे।
6. घोषणा करने की शक्ति
जहाँ समुचित सरकार इस बात से संतुष्ट है कि किसी स्थापन या नियोजन में पुरुष और महिला-कामगारों के पारिश्रमिक में अंतर लिंग के अलावा अन्य कारकों से हैं, वहाँ वह इस संबंध में घोषणा कर सकती है, तथा इस तरह 156 के अंतर के सिलसिले में नियोजक के किसी भी कृत्य को इस अधिनियम के उपबंधों का उल्लघंन नही समझा जाएगा।
7. दावे और शिकायतें
अधिनियम के अधीन दावों एवं शिकायतों तथा निर्धारण के प्रयोजन के लिए समुचित सरकार प्राधिकारी की नियुक्ति कर सकती है। ऐसा पदाधिकारी से निम्न कोटि का पदाधिकारी नहीं होगा। ऐसे दावों या शिकायतों को विहित तरीके से करना आवश्यक है। प्राधिकारी के लिए दावे या शिकायत के संबंध में आवेदक तथा नियोजक को सुनवार्इ का अवसर प्रदान करना आवश्यक है। ऐसे प्रत्येक प्राधिकारी को साक्ष्य लेने, गवाहों को उपस्थित होने के लिए बाध्य करने तथा दस्तावेजों को पेश करवाने के संबंध में सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन सिविल न्यायालय की शक्तियाँ प्राप्त है। प्राधिकारी के निर्णय से विक्षुब्ध व्यक्ति आदेश के दिन से 30 दिनों के अंदर सरकार द्वारा नियुक्त अपील-प्राधिकारी के पास अपील कर सकता है।
8. निरीक्षक
अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में केन्द्रीय एवं राज्य सरकारें इस अधिनियम तथा इसके अधीन बनाए गए नियमों के अनुपालन से संबंद्ध जांच के लिए निरीक्षकों की नियुक्ति कर सकती है। निरीक्षक भारतीय दंडसंहिता के अधीन लोकसेवक होता है। निरीक्षक को अपने अधिकार क्षेत्र की स्थानीय सीमाओं में अग्रलिखित शक्तियाँ प्राप्त रहती है- (1) किसी भी भवन, कारखाना, परिसर या जलयान में प्रवेश करने की शक्ति, (2) नियोजक से कामगारों के नियोजन से संबद्ध रजिस्टर या अन्य दस्तावेजों को पेश करवाने की शक्ति, (3) अधिनियम के उपबंधों के अनुपालन के संबंध में किसी व्यक्ति के साक्ष्य लेने की शक्ति, (4) किसी कामगार के संबंध में नियोजक, उसके अभिकर्ता या सेवक से पूछताछ करने की शक्ति, तथा (5) किसी रजिस्टर या अन्य दस्तावेज से नकल लेने की शक्ति।
9. शक्तियाँ
अधिनियम के अंतर्गत कर्इ कृत्यों या लोपों के लिए दोषी व्यक्तियों को कारावास या जुर्माने या दोनों से दंडित किया जा सकता है। विहित रजिस्टर या दस्तावेज के अनुरक्षण या उसे पेश करने में विफलता तथा साक्ष्य या कर्मकारों के नियोजन से संबंद्ध वांछित सूचना देने में विफलता या संबंद्ध व्यक्तियों को सूचनाएं देने से रोकने के दोषी व्यक्ति को एक महीने तक के कारावास या 10 हजार रुपये तक के जुर्माने या दोनों से दंडित किया जा सकता है। भरती, पदोन्नति, स्थानान्तरण, प्रशिक्षण आदि में स्त्रियों के साथ भेदभाव करना या पुरुष और स्त्री-कर्मकारों को एक ही या समान कार्य के लिए असमान मजदूरी देना या सलाहकार समिति द्वारा स्त्री-कर्मकारों के संबंध में दिए गए निर्देशों का पालन नहीं करना 10 हजार से 20 हजार रुपये तक के जुर्माने या 3 महीने से एक वर्ष तक के कारावास या दोनों से दंडनीय है। निरीक्षक के समक्ष रजिस्टर, दस्तावेज या सूचना नहीं प्रस्तुत करने के दोषी व्यक्ति को 500 रुपये तक के जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।
10. अन्य उपबंध
अधिनियम के कुछ अन्य महत्वपूर्ण उपबंध है –
- रजिस्टरों का अनुरक्षण – प्रत्येक नियोजक के लिए अपने कर्मकारों के संबंध में विहित रजिस्टरों और दस्तावेजों का रखना आवश्यक है।
- कंपनियों द्वारा अपराध – जहाँ अधिनियम के अधीन कोर्इ अपराध किसी कंपनी द्वारा की गर्इ हो, वहाँ ऐसा प्रत्येक व्यक्ति जो अपराध के समय कंपनी के व्यवसाय के संचालन के प्रभार में हो या कंपनी के प्रतिदायी हो, अपराध के लिए दोषी समझा जाएगा और उसके विरुद्ध अभियोग चलाया जाएगा और दंडित किया जाएगा। लेकिन, अगर ऐसा व्यक्ति यह साबित कर देता है कि अपराध उसके ज्ञान के बिना किया गया हो या उसने उसे रोकने के लिए तत्परता दिखार्इ हो, तो उसे दंडित नहीं किया जाएगा। अगर यह पाया जाता है कि अपराध कंपनी के किसी निदेशक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता या उपेक्षा के कारण हुआ है, तो उसे ही दंडित किया जाएगा।
- अपराध का संज्ञान – अधिनियम के अंतर्गत किसी अभियोग का विचारण मेट्रोपोलिटन दंडाधिकारी या प्रथम श्रेणी के न्यायिक दंडाधिकारी से अन्यून कोटि का न्यायालय ही कर सकता है। अधिनियम के अंतर्गत अभियोग का संज्ञान न्यायालय द्वारा अपने स्वयं के ज्ञान या समुचित सरकार या अधिकृत पदाधिकारी द्वारा की गर्इ शिकायत के आधार पर ही किया जा सकता है। इस तरह की शिकायत अपराध से क्षुब्ध व्यक्ति या कोर्इ मान्यता-प्राप्त कल्याण संस्था या संगठन भी कर सकता है।
- नियम बनाने की शक्ति-अधिनियम के उपबंधों को लागू करने के प्रयोजनों के लिए केन्द्र सरकार विहित विषयों से संबंद्ध नियम बना सकती है।