का है ही नहीं। इस तथ्य की पुष्टि में उनका कहना है कि विषय मात्रा संभावनाओं पर आधारित है। भाषा के वैज्ञानिक
अध्ययन को भाषाविज्ञान कहते हैं। यदि भाषा का विकास और उसके प्रारंभिक रूप का अध्ययन भाषाविज्ञान का
विषय है, तो भाषा-उत्पत्ति भी निश्चय ही भाषाविज्ञान का विषय है। भाषा-उत्पत्ति का विषय अत्यंत विवादास्पद है।
विभिन्न भाषा-वैज्ञानिकों ने भाषा-उत्पत्ति पर अपने-अपने विचार प्रस्तुत किए हैं।
भाषा की उत्पत्ति
भाषा की उत्पत्ति से आशय उस काल से है, जब मानव ने बोलना आरंभ किया और भाषा सीखना
आरंभ किया, इस विषय में बहुत सी संकल्पनाएं हैं जो अधिकांशतः अनुमान पर आधारित हैं। मानव के
इतिहास में यह काल इतना पहले आरंभ हुआ कि इसके विकास से संबंधित कोई भी संकेत मिलना असंभव
है।
से निसृत होने वाली ध्वनियों को वस्तुओं, पदार्थों एवं भावों से जोड़ा। भाषा की उत्पत्ति का प्रश्न भाषा
विज्ञान की विचार सीमा में नहीं आता विज्ञान जो पदार्थ का तात्विक विश्लेषण करके यह बता देगा कि
भाषा किस वर्ग की भाषा है।भाषा की उत्पत्ति के विषय में विद्वानों ने दो प्रकार के विचार मार्ग अपनाएं हैं, जिन्हें प्रत्यक्ष एवं
परोक्ष मार्ग कहा जाता है।
- प्रत्यक्ष मार्ग:-
जिसमें भाषा की आदिम अवस्था से चलकर उसकी वर्तमान तक विकसित दशा का विचार किया
जाता है। - परोक्ष मार्ग :-
भाषा की आज की विकसित दशा से पीछे की ओर चलते हुए उसकी आदिम अवस्था तक पहुँचने
का प्रयास किया जाता है।
भाषा की उत्पत्ति के सिद्धांत
भाषा की उत्पत्ति के सिद्धांत इन सभी का संक्षिप्त विवरण है-
2. संकेत सिद्धान्त – इसे निर्णय-सिद्धान्त भी कहते हैं। इस सिद्धान्त के प्रथम प्रतिपादक फ्राँसीसी विचारक रूसो हैं। संकेत सिद्धान्त के अनुसार प्रारम्भिक अवस्था में मानव ने अपने भावों-विचारों को अपने अंग संकेतों से प्रषित किया होगा बाद में इसमें जब कठिनाई आने लगी तो सभी मनुष्यों ने सामाजिक समझौते के आधार पर विभिन्न भावों, विचारों और पदार्थों के लिए अनेक ध्वन्यात्मक संकेत निश्चित कर लिए। यह कार्य सभी मनुष्यों ने एकत्र होकर विचार विनिमय द्वारा किया। इस प्रकार भाषा का क्रमिक गठन हुआ और एक सामाजिक पृष्ठभूमि में सांकेतिक संस्था द्वारा भाषा की उत्पत्ति हुई।
- यह सिद्धान्त यह मान कर चलता है कि इससे पूर्व मानव को भाषा की प्राप्ति नहीं हुई थी। यदि ऐसा है तो अन्य भाषाहीन प्राणियों की भाँति मनुष्य को भी भाषा की आवश्यकता का अनुभव नहीं होना चाहिए था।
- यह तर्कसंगत नहीं है कि भाषा के सहारे के बिना लोगों को एकत्रित किया गया, भला कैसे? फिर विचार-विमर्श भाषा के माध्यम के अभाव में किस प्रकार सम्भव हुआ।
- इस सिद्धान्त के अनुसार सभी भाषाएँ धातुओं से बनी है परन्तु चीनी आदि भाषाओं के सन्दर्भ में यह सत्य नहीं हैं
- जिन वस्तुओं के लिए संकेत निश्चित किये गये उन्हें किस आधार पर एकत्रित किया गया।
- संक्षेप में, भाषा के अभाव में यदि इतना बडा निर्णय लिया जा सकता है तो बिना भाषा के सभी कार्य किये जा सकते हैं। अतः भाषा की आवश्यकता कहाँ रही?
- इस सिद्धान्त के अनुसार आदि मानव में नये-नये धातु बनाने की सहज शक्ति का होना कल्पित किया गया है जिसका कोई प्रामाणिक आधार नहीं है।
- यह सिद्धान्त शब्द और अर्थ में स्वाभाविक सम्बन्ध मान कर चलता है किन्तु यह मान्यता निराधार है।
- इस सिद्धान्त के अनुसार सभी भाषाएँ धातुओं से बनी हैं किन्तु चीनी आदि कुछ भाषाओं के सम्बन्ध में यह सत्य नहीं है।
- आज भाषाओं के वैज्ञानिक विवेचन से यह मान्यता बन गई है कि सभी ‘धातुओं’ या मूल शब्दों की परिकल्पना भाषा के बाद व्याकरण-सम्बन्धी विवेचन का परिणाम है।
- यह सिद्धान्त भाषा को पूर्ण मानता है जबकि भाषा सदैव परिवर्तन और गतिशील होने के कारण अपूर्ण ही रहती है।
- आधुनिक मान्यता के अनुसार भाषा का आरम्भ धातुओं से बने शब्दों से न होकर पूर्ण विचार वाले वाक्यों के द्वारा हुआ होगा।
आवज के आधार पर ही उनके नाम रखे गये होंगे। जैसे काँव-काँव (कौआ) कुहू-कूहू (कोयल)
आदि । इस सिद्धान्त को मानने वाले प्रमुख विद्वान हैं- ‘ह्निटनी’ ‘पाॅल’, ‘हर्डर’ आदि। मैक्समूलर ने इस सिद्धान्त का उपहास करते हएु इसे (कुत्ते की ध्वनि) बाॅक बाॅब सिद्धान्त कहा था। वैसे अंग्रेजी भाषा में इसके लिए आनोमाॅटोपेथिक या इकोइक शब्द का प्रचलन है। अनुकरण सिद्धान्त में भी अनुरणन की ही भाँति कुछ प्राकृतिकक ध्वनियों के अनुकरण पर पदार्थों के नामकरण की कल्पना की गई है। कुछ शब्द उदाहरण के लिए प्रस्तुत हैं- ‘काक‘, ‘कोकिल’ ‘भौं-भौं’, ‘म्याऊँ’, ‘कुक्कर’, ‘दादुर’, ‘निर्झर’, ‘टर्राना’, ‘मर्मर’, ‘तड़तड़’, ‘कडकना’ ‘गड़गड़ाना’, ‘टपकना’, ‘चहकना’, ‘चहचहाना’, ‘हिनहिनाना’, ‘गुर्राना’, ‘काँव-काँव’, ‘टेंटें करना’, ‘चिल्लाना’, ‘गरजना’, ‘टप-टप’, आदि।
- प्रसिद्ध विद्वान् ‘रेनन’ के अनुसार ध्वनियां का उत्पादन करने में मनुष्य पशु-पक्षियों से भी निकृष्ट सिद्ध होता है इसलिए यह सिद्धान्त विश्वास करने के योग्य नहीं है।
- यद्यपि कुछ भाषाओं में अनुकरणामूलक शब्द पाये जाते हैं। परन्तु इन शब्दों की संख्या इतनी अधिक नहीं होती कि इनसे भाषा का उत्पन्न होना मान लिया जाए। उत्तरी अमेरिका की एक भाषा ‘अथवाकन’ में तो एक भी शब्द अनुकरणमूलक नहीं है।
- अनुकाणमूलक शब्द सभी भाषाओं में एक समान नहीं हैं उनका रूप भिन्न-भिन्न है। कुछ विद्वानों ने इसका कारण भिन्न-भिन्न भाषाओं में ध्वनियों की भिन्नता बताया है परन्तु यह स्वीकार इसलिए नहीं किया जा सकता क्योंकि ध्वनियाँ तो इस सिद्धान्त के अनुसार अनुकरण का ही परिणाम है, हाँ अनुकरण की अपूर्णता इसमें आंशिक रूप में कारण माना जा सकता है।
- अनुकरण पर बने शब्द किसी भाषा में बहुत कम संख्या में होते हैं जिनके आधार पर भाषा का अलंकरण तो हो सकता है परन्तु उन्हें पूरी भाषा के अस्तित्व का आधार नहीं माना जा सकता।
- भाव-व्यंजक शब्दों को वाक्य के पहले अलग से जोड़ा जाता है वे हमारी भषा का मुख्य अंग या सम्पूर्ण अस्तित्व नहीं है।
- ‘बेनफी’ के अनुसार इस प्रकार के शब्द भाषा की असमर्थता को प्रकट करते हैं फिर वे भाषा कैसे बन सकते हैं। ;पपपद्ध भाषा सोच विचार कर उत्पन्न की गई ध्वनियों का व्यवस्थित रूप है परन्तु ये आवेशजनित निकलने वाले शब्द विचार और व्यवस्था से रहित होते हैं। ये तो स्वतः ही मुख से निकलने वाले आवेग हैं।
- इस प्रकार के शब्दों की संख्या किसी भी भाषा में इतनी थोड़ी होती है कि उसके आधार पर सम्पूर्ण भाषा के निर्माण की कल्पना नहीं की जा सकती।
- ये शब्द जो आवेगों को प्रकट करते हैं सभी भाषाओं में एक समान रूप से उपलब्ध नहीं होते हैं जैसे- पीड़ा को व्यक्त करने के लिए अंगे्रजी ओह, जर्मन ‘आउ’ फ्रांसीसी ‘आहि’ भिन्न-भिन्न शब्दों का प्रयोग करते हैं। हिन्दी में इसके लिए ‘हाय’, ‘दैया’ आदि शब्दों का प्रयोग होता है।
- आवेग से उत्पन्न ध्वनियाँ निरर्थक हैं और निरर्थक ध्वनियों द्वारा किसी सार्थक भाषा को विकसित कैसे किया जा सकता है।
- ये ध्वनियाँ केवल शारीरिक श्रम को व्यक्त कर पाती है, भावों और विचारों की इनमें कोई अभिव्यक्ति नहीं होती।
- इसमें जो शब्द हैं वे इतनी अल्प संख्या में हैं कि उन्हें सम्पूर्ण भाषा के विकास का आधार नहीं बनाया जा सकता।
निष्कर्ष इस सिद्धान्त के आधार पर बने शब्दों से भाषा की उत्पत्ति की समस्या का समाधान प्राप्त नहीं होता। प्रसिद्ध समाजशास्त्राी, अंग्रेज वकील ए. एस. डायमण्ड को एक प्राचीन भाषा ‘ओर’ में एक भी शब्द ऐसा नहीं मिला जो इस सिद्धान्त पर आधारित हो। अतः ऐसी भाषाओं के सम्बंध में तो यह सिद्धान्त पूरी तरह से विफल है।
1. भाषा विज्ञान – डाॅ भोलानाथ तिवारी, किताब महल, इलाहाबाद
2 हिंदी भाषा का संरचनात्मक अध्ययन – डाॅ सत्यव्रत, मिलिंद प्रकाशन, हैदराबाद
3. भाषा और भाषा विज्ञान – गरिमा, संजय प्रकाशन, दिल्ली
4. डाॅ. भोलानाथ – भाषा विज्ञान – 2002 – प्रकाशक किताब महल, 22 ए सरोजनी नायडू मार्ग इलाहाबाद।
5. डाॅ. देवेन्द्रकुमार शास्त्री – भाषा शास्त्र तथा हिन्दी भाषा की रूपरेखा – 1990 – विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी।
6. डाॅ. कपिलदेव द्विवेदी – भाषा विज्ञान एवं भाषा शास्त्र – 1992 – विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी।
7. डाॅ. बदरीनाथ कपूर – परिष्कृत हिन्दी व्याकरण – 2006 – प्रकाशन प्रभात प्रकाशन 4/19 आसफ अली रोड, नई 8. दिल्ली।