भारत में वर्षा के प्रकार
(2) संवाहनीय वर्षा – भूमध्यरेखीय प्रदेशों में ऐसी वर्षा होती है लेकिन हमारे देश के दक्षिणी भाग में भी ऐसी वर्षा हो जाती है। प्रायः अक्टबूर तथा मार्च में स्थानीय गर्मी के कारण तीसरे प्रहर आकाश में बादल छा जाते हैं और हल्की वर्षा हो जाती है। गर्म होने पर वायु हल्की होती है। ऊपर उठने पर यह ठण्डी होती है तथा पानी बरसाती है।
(3) चक्रवातीय वर्षा – भारत के उत्तर-पश्चिमी भाग में शीत ऋतु में होने वाली वर्षा चक्रवातीय है।
भारतीय वर्षा की विशेषताएँ
1. भारत में होने वाली अधिकांश रूप में मानसूनी वर्षा है। इसका 85% ग्रीष्मकालीन मानसून दक्षिण-पश्चिमी हवाओं से सितम्बर माह तक होती है। इसलिए वर्ष के 8 महिने (अर्थात् दो तिहाई भाग) लगभग सूखे रह जाते है। जाडे ़ के दिनों में (अक्टबू र से फरवरी तक) 15% वर्षा होती है।
2. कभी-कभी वर्षा समय से पहले ही हो जाती है और कभी-कभी देर से। जब वर्षा नियत समय से पहले शुरू होती है, तो पहले समाप्त भी हो जाती है जिससे खेतों को उचित समय तक जल नहीं मिल पाता है। इसके ठीक विपरीत कभी-कभी वर्षा नियत समय से बहुत बाद तक होती है। प्रतिवर्ष वर्षा समान नहीं होती है। किसी वर्ष अधिक वर्षा होती है, तो किसी वर्ष कम।
3. कही वर्षा 250 सेंमी. से अधिक होती है कही 13 सेमी. से कम होती है। देश के 11% भाग में 190 सेमी. से अधिक वर्षा होती है 21% भाग में 125 से 190 सेंमी तक, 37% भाग में 72 से 125 सेमी. तक 24% भाग में 35 से 75 सेमी. तक और 7% भाग में 35 सेमी. से कम होती है।
6. मानसूनी वर्षा मसूलाधार होती है जिससे उसके अधिकांश जल का उपयोग नहीं हो पाता है। वह यों ही बहकर समुद्र में चला जाता है। वर्षा के जल की अधिक गति के कारण मिट्टी के अपरदन को भी बल मिलता है। मिट्टी के स्राव की भी समस्या कठिन हो जाती है। कई राज्य में कई दिन की औसत वर्षा प्रतिदिन 0.5 . सेमी 2.5 सेमी. होती है। इसीलिए कहा जाता है कि यहाँ वर्षा गिरती है यहाँ वर्षा कभी नहीं होती है।
भारत में वर्षा के दिन बहुत कम होते है। चेन्नई में 55 दिन, मुंबई में 75 दिन अजमेर में 45 दिन तथा कोलकाता में 118 दिन वर्षा होती है। कोलकाता में 118 दिन में 165 सेमी. वर्षा होती है जबकि लन्दन में 161 दिन में केवल 73 सेमी. वर्षा होती है।
