भारत के संविधान में 6 मूल अधिकार कौन कौन से हैं और उनका संक्षिप्त वर्णन

भारत के संविधान में 6 मूल अधिकार

संविधान में 7  मूल अधिकार थे। लेकिन 44वें संशोधन के बाद 1978 में
इन्हें 6 मूल अधिकार कर दिया गया। इस संशोधन ने 7वें मूल अधिकार सम्पति का अधिकार को समाप्त कर दिया था। यह अधिकार अनुच्छेद 31 के अंतर्गत था। भारत के संविधान में अब कुल 6 मूल अधिकार है। मूल अधिकार कौन कौन से हैं?

  1. समानता का अधिकार 
  2. स्वतंत्रता का अधिकार 
  3. शोषण के विरूद्ध अधिकार 
  4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार 
  5. संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार 
  6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार 

भारत के संविधान में 6 मूल अधिकार कौन कौन से हैं और उनका संक्षिप्त वर्णन

मूल अधिकार के नाम और उनका संक्षिप्त वर्णन, 6 मूल अधिकार कौन कौन से हैं? 

  1. समानता का अधिकार –
  2. स्वतंत्रता का अधिकार 
  3. शोषण के विरूद्ध अधिकार –
  4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार –
  5. संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार –
  6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार –

1. समानता का अधिकार

अनुच्छेद 14 से 18 तक समानता के अधिकार से संबंधित है। अनुच्छेद 14 में कहा गया
है कि राज्य किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता से वंचित नहीं करेगा तथा
भारत के किसी भी क्षेत्र में उन्हें समान रूप से कानून के द्वारा सुरक्षा प्राप्त होगी। इस
प्रकार यह अधिकार सभी व्यक्तियों को कानून के समक्ष समानता का अधिकार प्रदान करता
है। किसी भी व्यक्ति, धर्म, नस्ल, जाति, लिगं या जन्म के स्थान पर उनके साथ भेदभाव मौलिक अधिकार
नहीं किया जायेगा। 

अनुच्छेद 15,16,17, और 18 सामाजिक एवं आर्थिक समानता से
संबंधित है। अनुच्छेद 15 राज्य को किसी भी व्यक्ति के विरूद्ध धर्म, भाषा, जाति के
आधार पर भेदभाव करने को निषेध मानता है। 
अनुच्छेद 16 सभी नागरिकों को समान अवसर प्रदान करने की गारन्टी देता है। यह
अनुच्छेद सभी नागरिकों को रोजगार के अवसर प्रदान करना तथा किसी भी प्रकार के
भेदभाव को निषेध मानता है। राज्य किसी भी नागरिक को धर्म, जाति, लिंग, नस्ल या जन्म
स्थान के आधार पर रोजगार के मामलों में भेदभाव नहीं कर सकता है। 
अनुच्छेद 17 के
अंतर्गत अस्पृश्यता या छुआछूत का पूर्ण रूप से प्रतिबंध किया गया है। किसी भी प्रकार की
छुआछूत का कानूनी रूप से दंडनीय अपराध माना गया हैं। अनुच्छेद 18 के अंतर्गत राज्य
किसी भी प्रकार को उपाधि नहीं देगी सिवाय सेना या शैक्षिक प्रतिष्ठा के अलावा। कोई भी
भारतीय नागरिक विदेशी राज्य से किसी भी प्रकार की उपाधि स्वीकार नहीं करेगा। कोई
भी व्यक्ति जो पद पर आसीन हो वह किसी भी प्रकार का गिफ्ट, उपहार स्वीकार नहीं
करेगा तथा कोई भी विदेशी उपहार भी स्वीकार नहीं करेगा।

2. स्वतंत्रता का अधिकार

स्वतंत्रता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19 से 22 तक दिया गया है। स्वतंत्रता का
अधिकार अपने आप में पूर्ण नहीं है। यह कानूनी रूप से नियंत्रित अधिकार है। अनुच्छेद
19 में  अधिकार दिये गये है :-

  1.  इसका मुख्य उद्देश्य भारत की एकता एवं
    संप्रभुता की रक्षा करना, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध,
    कानून और व्यवस्था, नैतिकता स्थापित करना, तथा सार्वजनिक संपत्ति को गंदा ना
    करना या किसी गलत कार्य को उकसाना इत्यादि।
  2. बिना हथियारों के शांतिपूर्ण तरीके से एकत्रित होना, यह भारत की सुरक्षा एवं एकता
    एवं अखंडता को सुनिश्चित करता है, तथा शांति व्यवस्था कायम रखता है।
  3. संघ एवं संगठनों को गठित करना, यह भारत की संप्रभुता एवं एकता को संयोजित
    रखता हैं तथा लोक नैतिकता को भी बनाये रखता है। यह ‘‘सहयोगिक समाज’’ जो
    कि 2012 में 97वें संशोधन के द्वारा जोड़ा गया था, को भी शामिल करता है।
  4. भारत के किसी भी क्षेत्र में मुक्त भ्रमण करना, इससे आम नागरिक एवं अनुसूचित
    जनजातियों के हितों केा सुरक्षित रखा जाता है।
  5. भारत के किसी भी भूभाग में निवास करना या स्थायी आवास बनाना। तथा
    अप) किसी व्यवसाय को शुरू करना, किसी भी कारोबार, व्यापार या व्यवसाय को करना,
    यह शिक्षित व्यवसाय पर आधारित होता है। इसके लिए योग्यताऐं होना आवश्यक है।

अनुच्छेद 20, 21 एवं 22 व्यक्तियों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है। सभी
मौलिक अधिकारों में यह केन्द्रिय अधिकार है अर्थात् जीवन का अधिकार और व्यक्तिगत
स्वतंत्रता का अधिकार। इसके अतिरिक्त, 2002 में 86 वें संविधान संशोधन के द्वारा, अनुच्छेद 21 ए भी
जोड़ा गया था जिसमें राज्य छ: वर्ष से चौदह वर्ष के बीच के बच्चों के लिए अनिवार्य एवं
मुफ्त शिक्षा की गांरटी प्रदान करता है। पहले यह नीति-निर्देंशक तत्वों के अनुच्छेद 45
में शामिल था। 

3. शोषण के विरूद्ध अधिकार

अनुच्छेद 23 एवं 24 शोषण के विरूद्ध अधिकार से संबंधित है।
अनुच्छेद 23 बाल शोषण, बेगार तथा बंधुआ मजदूरी पर रोक लगाता है। अनुच्छेद 24 के
अनुसार, 14 वर्ष से कम की आयु के बच्चों को किसी भी फैक्ट्री, कारखानें, या हानिकारक
व्यवसाय में रोजगार नहीं दे सकते या उन्हें काम पर नहीं रख सकते हैं।

4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार

अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। सभी व्यक्तियों को किसी भी
धर्म की पूजा, उपासना करने का अधिकार प्राप्त है। ये अनुच्छेद है 27 एवं
28। अनुच्छेद 27 में कहा गया है कि किसी भी व्यक्ति को किसी विशिष्ट धर्म की अभिवृद्धि
या रखरखाव में व्यय के लिये कोई कर अदा करने के लिये बाध्य नहीं किया जायेगा। राज्य से मान्यता तथा सहायता
प्राप्त संस्थाओं के मामलों में, प्रत्येक व्यक्ति को धार्मिक शिक्षा या उपासना में उपस्थित न
होने की स्वतंत्रता होगी।

5. शिक्षा का अधिकार

अनुच्छेद 29 एवं 30 शिक्षा से संबंधित है। 

6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार

अनुच्छेद 32 के अनुसार भारतीय संविधान मौलिक अधिकारों को लागू कराने के लिये
समुचित कार्यवाही द्वारा देश के सर्वोच्च न्यायालय का द्वार खटखटाने के अधिकार  देता है। उच्चतम न्यायालय जिन उपायों से मूल अधिकारों की रक्षा करता है उन्हें
याचिका या न्यायिक प्रक्रिया कहा जाता है। ये रिट या न्यायिक प्रक्रिया इस प्रकार है :- 

सर्वोच्च न्यायालय
मूल अधिकारों को लागू कराने के लिये इन याचिकाओं का आदेश दे सकता है। इन रिटों
का अर्थ इस प्रकार है :-

  1. बंदी प्रत्यक्षीकरण – यह  जीवन के अधिकार की रक्षा करती है तथा व्यक्तिगत
    स्वतंत्रता को सुरक्षित रखती है। यह रिट न्यायालय द्वारा जारी की जाती है, यदि
    किसी व्यक्ति को बिना किसी सुनवायी के हिरासत मे ले लिया गया हो तो उसे
    न्यायालय मे प्रस्तुत किया जाता हैं। 
  2. परमादेश – परमादेश का अर्थ है आदेश। यह किसी भी अधिकारी द्वारा जारी किया
    जा सकता है। इसके द्वारा किसी भी व्यक्ति को अपनी डयूटी पूरी करने के लिये कहा
    जाता है जो कि उसने करने से मना कर दिया हो। यह आदेश राष्ट्रपति, राज्यों के
    राज्यपाल, तथा सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के विरूद्ध जारी
    नहीं किया जा सकता । यह किसी व्यक्तिगत या निजी संस्था के विरूद्ध भी नहीं
    जारी किया जा सकता।
  3. प्रतिषेध – यह रिट उच्च न्यायालय द्वारा जारी की जाती है। सर्वोच्च न्यायालय या
    उच्च न्यायालय निम्न कोर्ट को यह रिट जारी करता है। यह निम्न कोर्ट को अपने
    अधिकार क्षेत्र में सुनवायी के लिए किसी केस को निषेध मानती है।
  4. अधिकार पृच्छा – इस रिट के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय किसी
    निम्न कोर्ट द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र मे रखे गये रिकार्ड को मंगा सकती है। 
  5. उत्प्रेषण – इस रिट के माध्यम से कोर्ट किसी व्यक्ति से उसके बारे में पूछ सकता
    है कि किस अधिकार क्षेत्र से वह किसी कार्यालय अथवा सत्ता में आसीन है

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