अनुक्रम
बेंथम के राजनीतिक विचार
- बेंथम के राज्य सम्बन्धी विचार
- बेंथम के सरकार सम्बन्धी विचार
- बेंथम के सम्प्रभुता सम्बन्धी विचार
- प्राकृतिक अधिकारों सम्बन्धी धारणा
- बेंथम के कानून सम्बन्धी विचार
- बेंथम के न्याय सम्बन्धी विचार
बेंथम के राज्य सम्बन्धी विचार
राज्य की विशेषताएँ – बेंथम के सिद्धान्त के अनुसार राज्य को निम्नलिखित विशेषताएँ है :
- यह अधिकतम सुख को बढ़ाने वाला एक मानवी अभिकरण है।
- यह व्यक्ति के अधिकारों का स्रोत है।
- यह व्यक्ति के हितों में वृद्धि करने का एक साधन है।
- इसका लक्ष्य अपने नागरिकों के सुख में वृद्धि करना है।
- यह दण्ड-विधान द्वारा नागरिकों को अनुचित कार्यों को करने से रोकने वाला साधन है।
इस प्रकार राज्य अपने नागरिकों के हितों को अधिकतम सीमा तक बढ़ाने के लिए कानून का सहारा लेता है। वह कानून को ढाल बनाकर ‘अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख’ में वृद्धि के मार्ग में आने वाली रुकावटों पर अंकुश लगाता है।
- राज्य लोगों के सुख में वृद्धि तथा दु:ख में कमी करने का प्रयास करता है।
- वह नागरिकों को गलत कार्यों को करने से रोककर उनके आचरण का नियन्त्रित करता है।
इस प्रकार राज्य के कार्यों के सम्बन्ध में बेंथम का दृष्टिकोण नकारात्मक ही रहा है। उसने व्यक्तिवादी और लेसेज-फेरे (Individualist and Laissez-faire) की धारणा पर ही अपने राज्य सम्बन्धी विचारों को खड़ा किया है। उसका राज्य नागरिकों के व्यक्तित्व का विकास करने की बजाय उनके सुख में वृद्धि करना है। अत: बेंथम की दृष्टि में नागरिकों का स्थान राज्य से उच्चतर है।
बेंथम के सरकार सम्बन्धी विचार
बेंथम के सरकार या शासन सम्बन्धी विचार भी उसके उपयोगितावादी सिद्धान्त पर ही आधारित हैं। बेंथम राज्य और सरकार में अन्तर करते हुए सरकार को राज्य का एक छोटा सा संगठन मानता है तो कानून तथा अधिकतम सुख के लक्ष्य को कार्यान्वित करता है। बेंथम उपयोगितावाद के सिद्धान्त की कसौटी पर विभिन्न शासन प्रणालियों को परखकर गणतन्त्रीय सरकार का ही समर्थन करता है। उसका विश्वास है कि “अन्ततोगत्वा प्रतिनिधि लोकतन्त्र ही एक ऐसी सरकार है जिसमें अन्य सभी प्रकार की सरकारों की तुलना में अधिकतम लोगों की अधिकतम सुख प्राप्त कराने की क्षमता है।”
बेंथम के सम्प्रभुता सम्बन्धी विचार
बेंथम ने राज्य की सम्प्रभुता का समर्थन किया है। उसका मानना है कि शासक सभी व्यक्तियों और सब बातों के सम्बन्ध में कानून बना सकता है। चूँकि कानून आदेश होता है, अतएव यह सर्वोच्च शक्ति का ही आदेश हो सकता है। बेंथम का मानना है कि राज्य का अस्तित्व तभी तक रहता है, जब तक सर्वोच्च सत्ता की आज्ञा की अनुपालन लोगों द्वारा स्वभावत: की जाती है। बेंथम के अनुसार राज्य सम्प्रभु होता है, क्योंकि उसका कोई कार्य गैर-कानूनी नहीं होता। कानूनी दृष्टि से सम्प्रभु निरपेक्ष एवं असीमित होता है। उस पर प्राकृतिक कानून एवं प्राकृतिक अधिकार का कोई बन्धन नहीं हो सकता। लेकिन बेंथम के अनुसार सम्प्रभु निरंकुश, अमर्यादित एवं अपरिमित नहीं हो सकता। बेंथम के अनुसार व्यक्ति उसी सीमा तक सम्प्रभु की आज्ञा का पालन और कानून का आदर करते हैं, जिस सीमा तक वैसा करना उनके लिए लाभदायक और उपयोगी होता है।
इस प्रकार हॉब्स की तरह बेंथम भी कानून-निर्माण को सम्प्रभु का सर्वोच्च अधिकार मानता है लेकिन वह कार्यपालिका और न्यायपालिका सम्बन्धी अधिकारों को सम्प्रभु को नहीं सौंपता। वह शासक की असीमित शक्तियों के विरुद्ध है। उसके अनुसार शासक समस्त सामाजिक सत्ता का केन्द्र नहीं है। उसका सम्प्रभु तो कानून निर्माण के क्षेत्र में ही सर्वोच्च है, अन्य में नहीं।
प्राकृतिक अधिकारों सम्बन्धी धारणा
बेंथम ने प्राकृतिक अधिकारों की धारणा का खण्डन करते हुए प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धान्त को मूर्खतापूर्ण, काल्पनिक, आधारहीन व आडम्बरपूर्ण बताया है। उसने कहा है- “प्राकृतिक अधिकार बकवास मात्र हैं – प्राकृतिक और हस्तान्तरणीय अधिकार आलंकारिक बकवास हैं – शब्दों के ऊपर भी बकवास है।” उसके मतानुसार प्रकृति एक अस्पष्ट शब्द हैं, इसलिए प्राकृतिक अधिकारों की धारणा भी निरर्थक है। उसके मतानुसार अधिकार प्राकृतिक न होकर कानूनी हैं जो सम्प्रभु की सर्वोच्च इच्छा का परिणाम हैं। उसके अनुसार पूर्ण स्वतन्त्रता पूर्ण रूप से असम्भव है, इसलिए अधिकार प्राकृतिक न होकर कानूनी हैं।
बेंथम ने टामस पेन तथा गॉडविन जैसे प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धान्त के समर्थक विचारकों का खण्डन करते हुए कहा कि प्राकृतिक अधिकार केवल एक प्रलाप और मूर्खता का नंगा नाच हैं। उसका मानना है कि प्राकृतिक अधिकारों का निर्माण केवल सामाजिक परिस्थितियों में होता है। वे अधिकारों का निर्माण केवल सामाजिक परिस्थितियों में होता है। वे अधिकार ही उचित हो सकते हैं जो ‘अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख’ के लक्ष्य को प्राप्त कराने में सहायक हों। बेंथम ने कहा है- “अधिकार मानव जीवन के सुखमय जीवन के वे नियम हैं जिन्हें राज्य के कानून मान्यता प्रदान करते हैं।”
अत: अधिकार प्रकृति-प्रदत्त न होकर समाज-प्रदत्त होते हैं। वे मनुष्य के सुख के लिए हैं जिन्हें राज्य मान्यता देता है और उनके अनुसार अपनी नीति बनाता है। राज्य ही अधिकारों का स्रोत है। नागरिक प्राकृतिक अधिकारों के लिए राज्य के विरुद्ध किसी प्रकार का दावा नहीं कर सकते, क्योंकि अधिकारों के साथ कुछ कर्त्तव्य भी बँधे हैं जिनके अभाव में अधिकार निष्प्राण व निरर्थक हैं।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि बेंथम ने प्राकृतिक अधिकारों की धारणा को कोरी मूर्खता बताया है। उसके अनुसार अधिकार कानून की देन है और अच्छे कानून की परख ‘अधिकतम लोगों की अधिकतम सुख’ प्रदान करने के लक्ष्य को प्राप्त करने पर ही हो सकती है। इस तरह बेंथम ने प्राकृतिक अधिकारों की धारणा का खण्डन करते हुए उन्हें काल्पनिक कहा है।
बेंथम के कानून सम्बन्धी विचार
बेंथम का विचार है कि मनुष्य एक स्वाथ्र्ाी प्राणी होने के नाते सदैव अपने सुख की प्राप्ति में लगा रहने के कारण दूसरों के हितों के रास्ते में बाधा उत्पन्न कर सकता है। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए कुछ बन्धनों का होना जरूरी है। इसलिए राज्य के पास कानून की शक्ति होती है जो परस्पर विरोधी हितों से उत्पन्न संघर्ष से अधिक कारगर ढंग से निपटने में सक्षम होती है।
बेंथम के मतानुसार- “कानून सम्प्रभु का आदेश है। कानून सम्प्रभुता की इच्छा का प्रकटीकरण है। समाज के व्यक्ति स्वाभाविक रूप से कानून की आज्ञा का पालन करते हैं। कानून न तो विवेक का और न ही किसी अलौकिक शक्ति की आज्ञा है। सामान्य रूप से यह उस सत्ता का आदेश है, जिसका पालन समाज के व्यक्ति अपनी आदत के कारण करते हैं।” कानून व्यक्ति की मनमानी पर अंकुश है। यह व्यक्ति व समुदाय के हितों में तालमेल बैठाने का साधन है जो अपना कार्य दण्ड व पुरस्कार के माध्यम से करता है। कानून का सम्बन्ध व्यक्ति के समस्त कार्यों से न होकर केवल उन्हीं कार्यों का नियमन करने से है जो व्यक्ति के अधिकतम सुख के लक्ष्य को प्राप्त कराने के लिए आवश्यक है।
बेंथम का मानना है कि कानून इच्छा की अभिव्यक्ति है। ईश्वर और मनुष्य के पास तो इच्छा होती है लेकिन प्रकृति के पास कोई इच्छा नहीं होती। इसलिए दैवी कानून और मानवीय कानून तो हो सकते हैं, लेकिन प्राकृतिक कानून नहीं हो सकते। दैवी कानून भी अनिश्चित होता है। अत: मानवीय कानून ही सर्वोच्च कानून होता है जो समाज व व्यक्ति के सम्बन्धों का सही दिशा निर्देशन व नियमन कर पाने में सक्षम होता है।
- नागरिक कानून (Civil Law)
- फौजदारी कानून (Criminal Law)
- संवैधानिक कानून (Constitutional Law)
- अन्तरराष्ट्रीय कानून (International Law)
इस प्रकार बेंथम ने कानून को सम्प्रभु का आदेश मानते हुए उसे व्यक्तियों के अधिकतम सुख प्राप्त करने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आवश्यक माना है। उसने मानवीय कानून को सर्वोच्च कानून माना है। अपने अन्य सभी सिद्धान्तों की तरह बेंथम ने कानून को भी उपयोगितावादी आधार प्रदान किया है।
बेंथम के न्याय सम्बन्धी विचार
अपने अन्य विचारा ें की ही तरह बेंथम ने न्याय को भी उपयोगिता के आधार पर परिभाषित किया है। बेंथम का कहना है कि कानून पर आधारित होने के कारण न्याय का परिणाम उपयोगिता होना चाहिए। बेंथम ने अपने न्याय सम्बन्धी विचारों में तत्कालीन इंगलैण्ड की न्याय व्यवस्था की कटु आलोचनाएँ की हैं। उसने कहा है कि मुकद्दमे में वादी और प्रतिवादी दोनों पक्षों के लिए न्याय प्राप्ति के मार्ग में दुर्गम बाधाएँ उपस्थित हो जाती हैं। उन्हें न्याय प्राप्त करने के लिए भारी फीसें वकीलों को देनी पड़ती हैं। साथ में ही समय अधिक लगता है। न्याय प्राप्त करने के लिए न्यायपालिका के कर्मचारियों को कदम कदम पर सुविधा शुल्क देने पड़ते हैं। इसलिए बेंथम के तत्कालीन न्याय-व्यवस्था पर टिप्पणी करते हुए लिखा है- “इस देश में न्याय बेचा जाता है, बहुत महंगा बेचा जाता है और जो व्यक्ति इसके विक्रय मूल्य को नहीं चुका सकता है, न्याय पाने से वंचित रह जाता है।” बेंथम न्यायधीशों को एक कम्पनी की संज्ञा देता है। यह कम्पनी अपने लाभ के लिए उन कानूनों का सहारा लेती है जिन्हें अपने लाभ के लिए न्यायधीशों ने बनाया है।
इस प्रकार बेंथम ने तत्कालीन न्याय-व्यवस्था के दोषों पर भली-भान्ति विचार करके उन्हें अपने दर्शन में प्रस् किया है। उसके न्याय-सम्बन्धी विचार आज भी प्रासंगिक है। जैसे दोष उसने उस समय बताए थे, वे आज भी विद्यमान हैं।