बेंथम का राज्य की उत्पत्ति का सिद्धांत

राज्य की उत्पत्ति के बारे में
बेन्थम ने विचार किया था। बेन्थम से पूर्व राज्य की उत्पत्ति के बारे में सामाजिक संविदा सिद्धांत का बोलबाला था।
बेन्थम ने संविदा सिद्धांत को अस्वीकार करते हुए उसका उग्र विरोध किया। उसने कहा कि ऐसा कोई भी संविदा नहीं हुआ था और यदि कोई ऐसा हुआ भी हो तो वर्तमान पीढ़ी उसे मानने के लिए बाध्य नहीं की जा
सकती। संविदा सिद्धांत से अलविदा मांगते हुए स्वयं बेन्थम ने लिखा है, मैंने प्राथमिक संविदा छोड़ दी है और इस
मिथ्या प्रलाप को आवश्यकता वाले उन व्यक्तियों के मनोरंजन के लिए छोड़ दिया है। इस प्रकार उसने ब्लैकस्टोन
के इस सिद्धांत को ध्वस्त कर दिया कि विधि का मूल स्रोत सामाजिक संविदा है।

राज्य की उत्पत्ति के सम्बन्ध में संविदा सिद्धात का खण्डन करने के बाद बेन्थम ने इस प्रश्न पर भी विचार किया है
कि राज्य की उत्पत्ति कैसे हुई? बेंथम आदर्शवादियों के इस मत से भी सहमत नहीं हैं कि हम राज्य की आज्ञा का
पालन इसलिए करते हैं क्योंकि राज्य नैतिक एवं श्रेष्ठतम संस्था है तथा राज्य के आदेशों का पालन करना हम अपना
नैतिक कर्तव्य मानते हैं अथवा ऐसा करने से हमारा नैतिक विकास होता है। 

बेंथम के अनुसार राज्य की उत्पत्ति का
कारण संविदा नहीं, अपितु आज्ञा पालन की आदत है। लोगों में आज्ञा पालन की आदत इसलिए आती है क्योंकि वह
उपयोगी है और सामान्य सुख तथा हित को बढ़ाने वाली है। बेंथम के शब्दों में, फ्राज्य की आज्ञा-पालन से होने वाली
हानि अवज्ञा से होने वाली हानि से कम है।

इस प्रकार बेन्थम का उपयोगिता सिद्धांत ही उसके राज्य की उत्पत्ति सम्बन्धी विचारों का आधार है। जब व्यक्तियों की
एक संख्या आदतन एक व्यक्ति या व्यक्ति समूह की आज्ञा-पालन करती है तो वे व्यक्ति राजनीतिक समाज (राज्य)
की रचना करते हैं। दूसरे शब्दों में, राज्य व्यक्तियों का एक योगमात्र है और उसका हित उसके घटकों के हितों के
योग के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। संक्षेप में, बेंथम के लिए राज्य का अस्तित्व व्यक्तियों के लिए है। राज्य
व्यक्तियों के हित साधन के लिए एक साधन मात्रा है। राज्य का कोई भी ऐसा हित नहीं हो सकता जो उसके घटकों (व्यक्तियों) के हितों से उपर हो।


सम्प्रभुता सम्बन्धी बेन्थम के विचार 

बेंथम राज्य की सम्प्रभुता का समर्थक है। चूंकि
कानून आदेश होता है, अतः यह सर्वोच्च शक्ति का ही आदेश हो सकता है। बेंथम की धारणा है कि राज्य का अस्तित्व
तभी तक रहता है जब तक सर्वोच्च सत्ता का आज्ञा का पालन लोग स्वभावतः करते हैं। विधिक दृष्टि से बेन्थम का
सम्प्रभु निरपेक्ष एवं असीमित होता है। राज्य की सम्प्रभुता पर प्राकृतिक कानून एवं प्राकृतिक अधिकार द्वारा कोई बन्धन
नहीं लगाया जा सकता। तथापि बेंथम का सम्प्रभु निरंकुश नहीं है। बेंथम के अनुसार व्यक्ति उसी सीमा तक सम्प्रभु
की आज्ञा का पालन और कानून की आज्ञा का पालन कर सकते हैं जिस सीमा तक वैसा करना उनके हित में लाभदायक
और उपयोगी होता है। यदि सम्प्रभु के आदेश व्यक्तियों के लिए उपयोगी न हों तो उनका यह दायित्व हो जाता है कि
वे उसका प्रतिरोध करें। बेंथम के शब्दों में, यदि अवज्ञा के सम्भावित अनिष्ट अभीष्ट से कम हों तो व्यक्ति सम्प्रभु
का प्रतिरोध कर सकता है।


बेन्थम द्वारा प्राकृतिक अधिकारों का खण्डन

जिस समय
बेन्थम एक विचारक के रूप में उभर रहे थे उस समय प्राकृतिक अधिकार (नैसर्गिक अधिकार) सिद्धांत का बोलबाला
था। थामस पेन तथा गाॅडविन जैसे विचारकों ने प्राकृतिक अधिकारों पर बहुत बल दिया था। यह कहा जाता था कि
मनुष्य को स्वतन्त्रता और समानता के अधिकार प्रकृति के नियम से मिले हुए हैं। बेन्थम ने इस धारणा की खिल्ली
उड़ाई। स्वतन्त्रता और समानता के अधिकारों की खिल्ली उड़ाते हुए उसने लिखा था, पूर्ण स्वतन्त्रता पूर्ण रूप से
असम्भव है……पूर्ण स्वतन्त्रता प्रत्येक प्रकार की सरकार की सत्ता की प्रत्यक्ष विरोधी है। क्या सब मनुष्य स्वतन्त्रा रूप
से उत्पन्न होते हैं……एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है इसके विपरीत सब मनुष्य पराधीन पैदा होते हैं। प्राकृतिक अधिकारों
को उसने केवल एक प्रलाप और मूर्खता का नंगा नाच बताया। उसका कहना था कि व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकारों
का विचार सामाजिक जीवन में अराजकता को, राज्य सत्ता के प्रतिरोध को स्थान दिलाता है। 
बेंथम के शब्दों में,
प्राकृतिक अधिकार बकवास मात्रा है, प्राकृतिक और अहस्तान्तरणीय अधिकार आलंकारिक बकवास है……शब्दाडम्बरों
के उपर की बकवास है।

प्राकृतिक अधिकारों का खण्डन करते हुए बेन्थम ने अधिकारों के सम्बन्ध में अत्यन्त सरल मान्यता का प्रतिपादन
किया। उसके अनुसार अधिकारों का निर्माण सामाजिक परिस्थितियों से होता है। वे ही अधिकार मान्य एवं उचित
हैं जो समाज के अधिकाधिक व्यक्तियों को अधिकाधिक सुख उपलब्ध करायें। बेन्थम के शब्दों में, फ्अधिकार मानव
के सुखमय जीवन के नियम हैं जिन्हें राज्य के कानूनों द्वारा मान्यता प्रदान की जाती है।

अधिकारो के प्राकृतिक स्वरूप को अस्वीकार करते हुए बेन्थम ने उनके सामाजिक और वैधानिक स्वरूप पर बल
दिया। उसने अधिकारों के दो प्रकार बतलाये-(1) कानूनी अधिकार और (2) नैतिक अधिकार। कानूनी अधिकार
मानव के बाह्य आचरण को और नैतिक अधिकार उसके आन्तरिक आचरण को नियन्त्रित करते हैं।

बेन्थम सिर्फ अधिकारों की ही चर्चा नहीं करता, वह कर्तव्यों पर भी बल देता है। क्योंकि बेन्थम के अनुसार कर्तव्य
रहित अधिकार निष्प्राण और महत्वहीन हैं।

संक्षेप में, बेन्थम के अनुसार प्राकृतिक अधिकारों का सिद्धात कोरी मूर्खता है। अधिकारों का मूल आधार उपयोगिता
है। अधिकार कानून की देन है न कि प्रकृति की। डेविडसन के अनुसार बेन्थम ने प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धात
का खण्डन करते हुए उसकी जगह उपयोगिता के सिद्धांत को प्रतिष्ठित किया। 

गेटेल के शब्दों में, उसे फ़्रांसीसी तथा अमरीकी क्रान्तियों की लोकतान्त्रिाक भावना में पूर्ण सहानुभूति थी, किन्तु उनमें निहित प्राकृतिक विधि
दर्शन से वह घृणा करता था। उसने प्राकृतिक और अलंघनीय अधिकारों के सिद्धांत का डटकर विरोध किया और
उसे बकवास कहकर पुकारा। उसने कहा कि मनुष्य उन्हीं अधिकारों का उपभोग कर सकते हैं जो उन्हें कानून द्वारा
प्रदान किये जाते हैं और अच्छे कानून की कसौटी यही है कि उससे किस सीमा तक अधिकतम संख्या को अधिकतम
सुख उपलब्ध होता है।


बेन्थम के शासन संबंधी विचार

बेन्थम राज्य और शासन (सरकार) के मध्य
अन्तर करता है। उसके अनुसार राज्य सम्पूर्ण जन समुदाय है, राज्य की सत्ता कानून निर्माण की अन्तिम शक्ति रखती है।
सरकार राज्य के अन्तर्गत वह छोटा-सा संगठन है जो राज्य की इच्छा (कानून) तथा उद्देश्य (अधिकतम सुख) को
कार्यान्वित करता है।

बेन्थम शासन प्रणाली के प्रकार के सम्बन्ध में विशेष चिन्तित नहीं है। उसका विचार है कि शासन का कोई भी
प्रकार हो, उसका आधार सिद्धात ‘अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख’ होना चाहिए। उसने उपयोगिता की कसौटी
पर विभिन्न शासन प्रणालियों की जांच करते हुए गणतन्त्राीय शासन प्रणाली का समर्थन किया है। उसके अनुसार
राजतन्त्रा शक्तिशाली शासन है, किन्तु उसमें राजा का हित सर्वोपरि हो जाता है कुलीनतन्त्रा गुणी और अनुभवी लोगों
का शासन तो है, किन्तु इसमें भी ‘सर्वाधिक व्यक्तियों के सर्वाधिक सुख’ के सिद्धांत की पालना नहीं होती। गणतन्त्रा
में ही ‘अधिकतम सुख’ का सिद्धांत साकार हो सकता है। 

अतः वह ‘इस कुटिल संसार को गणतन्त्रों का जाल
बिछाकर’ अच्छा बनाने की आशा करता था। उसके अनुसार गणतन्त्राीय व्यवस्था इसलिए अच्छी है क्योंकि यह
कुशलता, मितव्ययता और जनता की महत्ता की पोषक है। गणतन्त्रा व्यवस्था में कानून बनाने का अधिकार जनता
के प्रतिनिधियों के हाथ में होता है, किसी एक वर्ग के हाथ में नहीं, अतः कानून जनता के हित में बनते हैं। उसके
विचार में न तो पूर्ण राजतन्त्रा और सीमित राजतन्त्रा ही जनता को सर्वाधिक सुख प्रदान कर सकता हे। जब लोकतन्त्रात्मक ;गणतन्त्राद्ध शासन होता है तभी शासक और शासितों के हित एक हो जाते हैं क्योंकि तब अधिकतम
लोगों का अधिकतम सुख ही चरम लक्ष्य होता है।


बेन्थम के अनुसार राज्य के कार्य

बेन्थम राज्य को सामान्य सुख की वृद्धि का माध्यम
समझता है तथापि उसका राज्य एक नकारात्मक राज्य है। वह नकारात्मक इसलिए है क्योंकि यह लोगों
को दण्ड-विधान द्वारा ही समाज विरोधी कार्य करने से रोकता है, जनता के नैतिक चरित्र को उचा उठाना इसका कोई
उद्देश्य व्यक्ति के श्रेष्ठतम गुणों का विकास करना नहीं है। दूसरे शब्दों में, बेन्थम राज्य को सकारात्मक कार्य नहीं सौंपता
अतः उसका राज्य व्यक्तिवादी है।


कानून तथा स्वतन्त्रता सम्बन्धी विचार

बेन्थम के अनुसार राज्य एक विधि निर्माता
निकाय है और कानून सम्प्रभु के आदेश हैं। सम्प्रभु की इच्छा कानून के रूप में प्रकट होती है इसलिए उसका पालन
होता है। वह यह भी कहता है कि कानूनों का पालन करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है क्योंकि इस आज्ञा-पालन
मे ही उसकी और भलाई ;हितद्ध निहित है।

कानून की परिभाषा करते हुए बेन्थम कहता है, कानून सम्प्रभु का इच्छा के आदेशों की तरह अभिव्यक्तिकरण
है जिससे राजनीतिक समाज के सदस्य उसका स्वाभाविक पालन करते हैं। प्राकृतिक कानूनों को अस्वीकार करते
हुए उसने कानूनों के दो प्रकार बतलाये हैं-दैवी तथा मानवी। दैवी कानून रहस्यमय और ज्ञानातीत होते हैं, उनका
स्वरूप भी निश्चित नहीं है। अतः मानवी कानूनों का निश्चित रूप राज्य के लिए आवश्यक है। उसने यह भी
प्रतिपादित किया है कि प्रत्येक कानून का आधार उपयोगिता है। यदि कोई कानून समाज का हित साधन करने में
असफल रहता है तो वह कानून नहीं रहता। बेन्थम के शब्दों में, किसी कानून को समाप्त करने से समाज का
लाभ हो और फिर भी उसे समाप्त नहीं किया गया हो तो वह कानून नहीं रह जाता।

बेन्थम ने अपने उपयोगिता के सिद्धात को विधि निर्माण के लिए प्रयोग करने की सलाह दी। उसने कहा कि प्रत्येक
विधि अथवा कानून को ‘अधिकतम लोगों के अधिकतम हित’ के उद्देश्य से ही बनाना चाहिए। उसने राजसत्ता द्वारा
बनायी गयी प्रत्येक विधि की कसौटी उपयोगिता को माना है।

उसने यह भी मत प्रकट किया कि लोकतन्त्रात्मक राज्यों में विधि या कानून को सरल होना चाहिए ताकि लोग उसे
समझ सके। उसके मत में कानून का र्वप्रमुख एवं महान् कार्य है सर्वहित की भावना विधायक को हमेशा अपने हित
की तरह राज्य हित को देखना चाहिए। इसके लिए उसे विधि निर्माण में चारों बातों पर ध्यान देना चाहिए-

  1. आजीविका
  2. पर्याप्त
  3. समानता और सुरक्षा। 

इन चारों में संघर्ष की अवस्था में यह निर्णय करना विधायक का काम है कि प्रधानता किसे दी जाये।

 बेन्थम ने श्रेष्ठ
कानून के छः लक्षण बतलाये हैं-
  1.  कानून जनता की आशा-आकांक्षा या विवेक बुद्धि के अनुकूल हों
  2. कानूनों
    का जनता का ज्ञान-इसके लिए प्रचार, जनमत निर्माण, आदि का आश्रय लेना चाहिए 
  3. कानून विरोधाभासी न
    हों 
  4. कानून सरल, स्पष्ट एवं सुबोध हों 
  5. कानून व्यावहारिक हों तथा 
  6. कानूनों का पूर्ण रीति से पालन
    हो और कानून भंग के लिए दण्ड की व्यवस्था हो।

बेन्थम के अनुसार कानून सम्प्रभु के आदेश हैं, प्रतिबन्ध है इसलिए यह स्वतन्त्रता का विरोधी है। उसका विचार था
कि व्यक्ति सुरक्षा चाहते हैं, स्वतन्त्रता नहीं। सुरक्षा के लिए कानून की आवश्यकता है और कानून सम्प्रभु के आदेश
हैं। यदि स्वतन्त्रता और सुरक्षा के मध्य हमें अस्पष्टता को मिटाना है तो स्वतन्त्रता को सुरक्षा की एक शाखा ही स्वीकार
कर लेना चाहिए।

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